Monday, September 27, 2010

हमारा जीवन और अपेक्षाएं !

"Greater the expectations, Greater is the disappointment "

बहुत कोशिशों के बाद भी हमको ये मालूम पड़ता है की कहीं न कहीं हम भी , किसी न किसी से कुछ अपेक्षा कर ही रहे होते हैं। अपेक्षाएं हमें कुछ नहीं देतीं , सिवाय निराशा के।

पत्नी या पति चाहे सब कुछ समर्पित कर दें एक दुसरे के लिए, फिर भी कहीं न कहीं कुछ शेष रह ही जाता है॥

दोस्त कितनी भी संजीदगी से आपके साथ हो, लेकिन कहीं न कहीं वो अनजाने में ऐसी कोई भूल कर रहा होता है , जिससे उसके दोस्त का भला नहीं बल्कि नुकसान हो रहा होता है, क्यूंकि मानवीय भूलें तो स्वाभाविक हैं। और हमें पता भी नहीं होता की अमुक व्यक्ति की हमसे अपेक्षाएं क्या है।

इसलिए स्वयं को दुखों से बचाने के लिए हमें कोशिश करनी चाहिए की हम किसी से कोई भी अपेक्षा न रखें।

अपेक्षाएं हमारे व्यक्तित्व को कमज़ोर बनाती हैं। जब हम अपेक्षाओं का दमन करने में सफल हो जाते हैं , तो हमारे आत्म विश्वास में वृद्धि होती है।

आभार ।

36 comments:

Bhushan said...

बात सही है. अपेक्षा न करना ही मोह से मुक्ति का मार्ग है. दिल दुखने की हर राह बंद करना आदमी अनुभव से सीखता है. अंत में कहूँगा कि जीते जी सब कुछ भूल जाना ही जीवन-मुक्ति है. इसके अतिरिक्त क्या रास्ता है?

ashish said...

अपेक्षा पूरी ना हो तो दुःख होता है ये सत्य है , लेकिन हम अपेक्षा किये बिना रह नहीं सकते , ये मानव की प्रकृति है . बस इतना कर सकते है कि हम अपनी अपेक्षावो को एक दायरा दे सकते है . अच्छा चिंतन, बढ़िया आलेख .

sanjay said...

UPROKT COMMENT KO HAMARI BHI MANI JAI....

PRANAM

यशवन्त माथुर said...

You are absolutely right but i think expectations are the result of emotions.

cmpershad said...

अपेक्षाएं हू उपेक्षाओं को जन्म देती हैं :)

RAJAN said...

सुन्दर आलेख। मैं आशीष जी से भी सहमत हूँ।अपेक्षाऐं किस हद तक हो यह व्यक्ति को अपने विवेक से तय करना चाहिये।आखिर सर्वशक्तिमान ईश्वर (जैसा कि बताया जाता हैं)तक अपने भक्तों से अपेक्षाऐं रखता हैं फिर हम तो इन्सान है।

Kailash C Sharma said...

बहुत ही सुलझे विचार..यह सही है की अपेक्षा करना और फिर उसका पूरा न होना ही दुखों का कारण है .....अगर कोई अपेक्षाओं से मुक्त हो सके तो फिर दुःख का कोई कारण ही नहीं रहेगा...लेकिन वास्तव जीवन में इस स्थिति को प्राप्त करना इतना सहज भी नहीं है...जब आप किसी से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं तो स्वाभाविक है की आपकी कुछ अपेक्षाएं भी साथ आजाएंगी ...निष्काम कर्म एक आम आदमी के लिए संभव नहीं है....फिर भी अपेक्षाओं से दूर रहने का प्रयास अवश्य किया जा सकता है ,इसमें कितना सफल होते हो यह अलग विषय है....बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति...आभार....

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

ek behad suljha hua sandesh .....

प्रकाश गोविन्द said...

अपेक्षाओं और आकांक्षाओं से मुक्त होना सांसारिक जीवन में संभव नहीं है ! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी कहाँ मुक्त हो पाए ?
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अपेक्षाओं और आकाक्षाओं की मात्रा जितनी अधिक होगी ...उतना ही अधिक तनाव...क्रोध..परेशानियां भी होंगी ! दूसरों से अधिक अपेक्षाएं पालना सदैव ही कष्टदायी होता है । मानवीय क्षमताएं व साधन सीमित होते हैं। अक्सर हम दूसरों की क्षमताओं व साधनों का गलत अनुमान लगा लेते हैं । याद रखना चाहिए कि हमेशा क्रिया के अनुसार ही प्रतिक्रिया हो, यह आवश्यक नहीं है !
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अनेक छोटे-छोटे उदाहरण हैं :
हमने किसी ब्लॉगर के यहाँ दस बार प्रतिक्रिया दी अब अपेक्षा पाले बैठे हैं कि वो भी आकर हाजिरी दे !
नहीं हुआ अगर ऐसा तो बस जले-भुने बैठे हैं :)

हमने अपने दोस्त के बेटे के जन्म-दिन पर पांच सौ रुपये का उपहार दिया, अब मेरे बेटे का जन्म-दिन है ! दोस्त ने सौ रुपये का ही उपहार दिया ,,,, बस फुला लिया मुंह अपना :)

हम जब मित्रों को फोन करते हैं तो समय और बिल का ध्यान नहीं रखे लेकिन जब वो हमको फोन करते हैं तो एक-एक मिनट का ध्यान रखकर आनन-फानन बात करके फोन काट देते हैं ,,,,, बस हो गए असहज इसी बात पर :)

ऐसी ही ना जाने कितनी ही बातें हैं जो रोजमर्रा के जीवन में हमारे साथ घटित होती हैं ! अभिप्राय सिर्फ इतना सा है कि दूसरों से अधिक पाने की इच्छा ही दुःख का कारण बनती है । स्मरण रहे : अपनी संतान भी हमारे मन मुताबिक़ नहीं रहेगी, वह एक अलग व्यक्तित्व है। उसके अपने विचार और दर्शन हैं । अतः तनाव मुक्त सुखी जीवन के लिए दूसरों से कम से कम उम्मीद करना ही श्रेयकर है ।
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लगता है ज्यादा हो गया :)
एडिट कर लीजियेगा जी

'उदय' said...

... behatreen abhivyakti !!!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सुनने में बड़ा सहज लगता है, लेकिन है नहीं. हमें तो बचपन से यही सिखाया जाता है कि अच्छे काम का फल अच्छा मिलता है..स्वर्ग तभी मिलेगा जब भलाई करोगे, नहींतो नरक में जाना पड़ेगा... यह धर्म का सारा खेल ही इसी अपेक्षा के चारों ओर बुना गया है..जिस दिन यह अपेक्षा समाप्त हो गई मानव बुद्धत्व को प्राप्त हो जाएगा...

डा० अमर कुमार said...
This comment has been removed by the author.
डा० अमर कुमार said...
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boletobindas said...

बचपन से पढ़ा कि आशा ही निराशा का कारण होती है। अपनी समझ से उसे जीवन में उतारने का भरपूर प्रयास किया, पर पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए। क्या करें सधारण इंसान इतना अपेक्षा न करे, ये उसके लिए असान नहीं होता दिव्या जी। निस्काम, निष्पाप होना बड़ा ही कठिन है, ठीक उसी तरह अपेक्षा न रखना भी।

ZEAL said...

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@ dr amar--

Disappointments often act as a fuel to ignite the zeal in some people. And this true with this ZEAL [ proper noun] also. But unfortunately most of the people are bogged down by disappointments.

Depression, frustration, Anxiety, COD and many other mental illness are a result of unfulfilled expectations only.

Crime in society is an outcome of disappointment among people.

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ZEAL said...

As far as science is concerned. The word disappointment doesn't exist in the dictionary of doers.

They are self motivated people. They are born to do or die.

ZEAL said...

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Dr Amar--

Your expectations are very high.

I am not gonna remove MODERATION.

< winks at cutie pie--Dr Amar >

Hey hey Hey...Chillax Dr.

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ZEAL said...

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रोहित जी,

निस्संदेह , ये एक दुष्कर कार्य है । लेकिन हमारी भलाई इसी में है। इश्वर ने इसे बनाया ही इसीलिए है ताकि हम 'अपेक्षा' रुपी मृगतृष्णा से कभी बाहर न आ सकें। , लेकिन मनुष्य तो वही है , तो इन् कमजोरियों से बाहर आ जाये।

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ZEAL said...

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Life becomes extremely beautiful when we stop expecting from lesser mortals.


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ZEAL said...

@---अपेक्षाओं और आकाक्षाओं की मात्रा जितनी अधिक होगी ...उतना ही अधिक तनाव...क्रोध..परेशानियां भी होंगी ! दूसरों से अधिक अपेक्षाएं पालना सदैव ही कष्टदायी होता है । मानवीय क्षमताएं व साधन सीमित होते हैं। अक्सर हम दूसरों की क्षमताओं व साधनों का गलत अनुमान लगा लेते हैं । ....

प्रकाश जी,

अपेक्षाओं से बेहतर है --"नेकी कर दरिया में दाल "-- को अपना लेना।

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ZEAL said...

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अपेक्षाओं से बेहतर है --"नेकी कर दरिया में डाल "-- को अपना लेना।

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ZEAL said...

Dearest ZEAL:

I came. I read.

Hope at least this is allowed to be written and deemed proper enough to pass through the seive of moderation.


Arth Desai


अब देखिये कुछ लोग हाथ धोकर पीछे पड़े हैं की मोडरेशन हटा दो -- लेकिन मुझे इनसे कोई अपेक्षा नहीं है की ये कभी समझेंगे ।

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ZEAL said...

Ref--Disappointments are a real fuel to ignite the Zeal to see your expectations come true....


Corrected version --

Failures act as fuel for your Dreams to come true !

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संगीता पुरी said...

अपेक्षा न रखना तो बढिया है .. पर इतने लंबे जीवन में कभी न कभी तो सबकी आवश्‍यकता पडती ही है !!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

"नेकी कर दरिया में डाल "
..सुंदर मंत्र है लेकिन बिना तपस्या के सिद्ध नहीं हो सकता। तपस्या करते रहना चाहिए।

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

संजीव गौतम said...

बिल्कुल सही कहा है आपने। एक बार मैं नगर के प्रसिद्ध साहित्यकार आदरणीय सतीश चन्द्र चतुर्वेदी जी के पास गया ता उन्होंने बातचीत में कहा कि मैंने अपने बेटों के जन्म के समय ही अपनी पत्नी से कह दिया था कि इनसे कोई अपेक्षा मत रखना नहीं तो तुम्हें बहुत कश्ट होगा।
सही बात है कि अपेक्षा का पूरा न होना ही कश्ट को जन्म देता है। सार्थक पोस्ट

रंजन said...

अपेक्षा और उपेक्षा.. दोनों बड़े खतरनाक है..

Vijai Mathur said...

Tamam tippniyon ke Adhar per main yah kahna chahta hun ki Hamen Apechcha sirf SWAMYA se rakhna chahiye ki apne Kartavya ka palan sahi SAMAIY per karte rahen jo naa kathin hai naa hi Asambhav.

संजय भास्कर said...

बिल्कुल सही कहा है आपने।
...........सार्थक पोस्ट

रंजना said...

सार्थक चिंतन...

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

True...

and thanks for writing this.

रूप said...

thanks 4 visiting my blogs. it's nice 2 c people like u show concern. i've gone thru ur blogs PARADISE n ZEAL. ur ZEAL is commendable Dr. Divya. my salutations. keep reading n motivating me . thax again , b a follower, if u please!

ZEAL said...

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Roop ji,

Thanks for visiting both of my blogs. You are very welcome here. I will surely continue visiting your blogs.

Regards,

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Priya said...

Dr. amar ji swayam se apeksha ke liye mana nahin kiya gaya hai. scientist swayam se apeksha karta hai. tab failure bhi sukh deta hai.
jab doosron se karte hain tab thoda bahut apeksha poori hone par bhi is baat kaa dukh rah jaata hai ki saari apekshayen kyon nahin poori huyi.
Aasha hai ab DIVYA ji ki post ki sarthakta spashta ho gayi hogi

I am now talking in general terms: whenever we read, see or hear (or for that matter any intake through our senses) something, we should actually READ BETWEEN THE LINES, WATCH and LISTEN respectively and then respond. We shouldn't react.

Salutations to Divya ji and Congrats for consistently good topics and excellent writings

ZEAL said...

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प्रिया जी,

" स्वयं से अपेक्षा "----बहुत सुन्दर तरीके से परिभाषित किया आपने। निसंदेह हमें सिर्फ स्वयं से ही अपेक्षा करनी कहानी चाहिए। इस तरह हम निराश भी नहीं होंगे , और स्वयं से अपनी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत भी रहेंगे। जो हमें निश्चय ही उचाईयों की और ले जाएगा।

आपने मेरी बात स्पष्ट करने में बहुत मदद की.....आपका आभार !

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