Thursday, February 24, 2011

मुट्ठी भर सौभाग्य ..

आज एक ब्लोगर मित्र ने कहा -

  • अगर तुम अपने आपको एक बड़ी लेखिका समझती हो तो तुम गलत हो
  • लोग तुम्हारी झूठी प्रशंसा करते हैं , और तुम बहुत खुश हो जाती हो सच्चाई के धरातल पर रहो तो बेहतर होगा

मैं लिखती ज़रूर हूँ लेकिन खुद को कभी लेखिका नहीं समझा पहले इंग्लिश में लिखती थी तो सभी ने हिंदी में लिखने को प्रेरित किया पहले हिंदी में लिखना बहुत दुष्कर लगता था , फिर धीरे-धीरे शब्दों के सही उच्चारण के साथ लिखना सीख लिया मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम और एक स्थान मिल गया आस पास परिवेश में जो विसंगतियां हैं , उस पर लिखने लगी लेकिन अच्छी तरह जानती हूँ की मैं लेखिका नहीं हूँ जिसने कभी साहित्य ही पढ़ा हो , वो लेखिका कैसे बन सकता है मैंने खुद को कभी बड़ा नहीं समझा मुझे अपनी कमतरी का पूरा -पूरा एहसास है आभार तो उन पाठकों का है , जिन्होंने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया , बल्कि मेरे छोटे-छोटे प्रयासों का भी मान रखा

रही बात प्रशंसा की तो कोई किसी की झूठी प्रशंसा क्यूँ करेगा अगर कोई दो मीठे शब्द प्रोत्साहित करने के लिए लिख देता है , तो वही मेरा पुरस्कार है और मेरा मुट्ठी भर सौभाग्य वर्ना जिंदगी में खुद पर मुस्कुराने के लिए मेरे पास है ही क्या ?

नौकरी करती नहीं हूँ , जहाँ मेरे काम की कोई प्रशंसा होगी कोई salary मिलनी नहीं है कोई incentive मिलना नहीं है कोई appreciation मिलना नहीं है कोई promotion होना नहीं है

ब्लॉग लेखन से भी प्यार कम नफरत ज्यादा पायी

कोई 'लोहारिन' कहता है ,
कोई 'लौहांगना' ,
कोई 'जंग लगा लोहा'
कोई 'माटी का माधव'

इन उपाधियों के बावजूद , अगर एक-दो लोग मीठा बोल ही देते हैं और मुझे थोड़ी सी ख़ुशी मिल ही जाती है तो बुरा क्या है

एक निवेदन -

कभी मेरी झूठी प्रसंसा मत कीजियेगा मैं सचमुच उसे सच ही मान लेती हूँ जब कोई बताता है की ये झूठी प्रशंसा थी तो मन विरक्ति से भर जाता है

और यदि कभी मैं आपकी प्रशंसा करूँ , तो उसे सच ही समझिएगा , क्यूंकि जब भी किसी की प्रशंसा करती हूँ तो ह्रदय से करती हूँ , दिखावे की नहीं

आभार

60 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

लो जी!
लिखती हो तो लेखिका ही हुई न!
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ बिटिया रानी!
तुम वाकई में बहुत अच्छा लिखती हो।
लेकिन दर्पण भी देखती रहती हो,
तभी तो उममें दर्प नहीं आया है!

वन्दना said...

दिव्या जी
क्यों किसी के कहे पर परेशान होती हैं …………ये दुनिया किसी को आगे बढता नही देखना चाहती मगर आप इन छोटी छोटी बातो की परवाह ना करके अपने कार्य और शौक को अन्जाम दीजिये देखियेगा एक दिन ये ही लोग आपके इसी लेखन को सराहेंगे…………यही दुनिया की रीत है आगे बढने वाले की टांग पकड कर घसीटती है और चढते सूरज को सलाम करती है…………जो आपको सुकून दे उसे दूसरो के लिये मत छोडियेगा।

vijaymaudgill said...

diyva ji agar aap last main nivedan na bhi karti tab bhi hame apke bare main pata tha ki aap kaisi hain. kyuki har shaks k shabd uska vyaktitva darshate hain. aur rahi baat lekhak hone ya na hone ki to main kahunga ki jaroori nahi ki lekhak hone k liye sahitya parhna jaroori hai. maharishi valmiki ji ne kaun sa sahit parha tha. baba bulle shah ne kaun sa sahit parha tha. asli sahit hum khud hain insaan ki samvednaye hain ehsaas hain bas unhe mat marne dijiye. shukriya

Dilbag Virk said...

आपके ब्लॉग पर किसी ने कहा था कि ब्लोगरस कुंठित मानसिकत के ( frustrated ) होते हैं , मैंने इसका विरोध किया था . आप्पके साथ जो हो रहा है , उसे देखकर लगता कि शायद मैं गलत था

Shah Nawaz said...

ब्लॉग जगत एक टिपिकल भारतीय परिवार की ही तरह है, जहाँ रूठना - मनाना, स्नेह - लड़ाइयाँ.... तारीफ - चापलूसी, गुर्राना - चुगलियाँ सब कुछ चलता है....

राज भाटिय़ा said...

अरे लिखो बेझिझक लिखो, अच्छा लिखती हो तभी हम सब तारीफ़ भी करते हे, कुछ को शायद अच्छा नही लगता, इस लिये यह सब कहते होंगे,कुछ फ़र्क नही पडता आखिर लोहारन भी तो मेहनत ही करती हे, वो भी एक नारी ही हे बुरा नही मानते , बस उन्हे भुल जाते हे, बुरे सपने की तरह से, पलट का जबाब भी ना दो, एक दिन खुद ही थक हार जायेगे.

प्रतुल वशिष्ठ said...

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@ आप स्वयं को लौह महिला लिखते हैं.
सावधान बहिन! आपके समीप एक इंजीनियर रहता है कहीं आपका प्रयोग किसी कंस्ट्रक्शन में न कर लिया जाये.

जिस लोहे से वैचारिक जंग लड़ी जाये वो तलवार हो तुम.
आज तक सोने के हथियारों से लड़ते नहीं सुना.
जंग बेशक लौहे में लगती है लेकिन उसका गलनांक सोने की बनिस्पत अधिक रहता है.
वह आसानी से नहीं गलता.
सोना-चांदी प्रायः सजावट में काम आते हैं. जबकि लोहे के उपयोग ने इस युग की ही काया पलटकर रख दी है.

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Sunil Kumar said...

दिव्या जी, मेरा मानना है की कोई झूठी तारीफ़ तब करता है जब उसका कोई फायदा हो, यहाँ आपसे क्या लाभ मिलने वाला है सिवाय अछे संबंधों के, इतनी समझदार तो आप है ही की इस बात का अंदाजा आपको हो जाता है| की यह तारीफ़ सच्ची है या झूठी !

सञ्जय झा said...

apke mitra se sahmat.....agar bakai aap aisa sochte hain? ..... aap sirf lekhak hain ....
chota-manjhla-bara....ye to pathak nirnaya karenge........

saath hi apke bloger mitra ko bhi padhna chahenge....jara unke kad ki lambai bhi pata chale.....aur unki baton pe vichar kiya jai

आभार तो उन पाठकों का है , जिन्होंने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया , बल्कि मेरे छोटे-छोटे प्रयासों का भी मान रखा ।

kahe se nanhe-munhe pathak ko sar pe chadhate hain.....

ब्लॉग लेखन से भी प्यार कम नफरत ज्यादा पायी ।

प्यार ko f.d kar den...
नफरत ko bad debts me daal den...

कोई 'लोहारिन' कहता है ,
कोई 'लौहांगना' ,
कोई 'जंग लगा लोहा'
कोई 'माटी का माधव' ।

uprokt sare 'koi' ko 'ek' me badal de aur ek jor den ..... kul kitne hue 5.

apke prashanshak 277 f.d + c/a. me 500 + bhool-chuk leni deni jaida nahi.....sab milke 1000

5/1000 = 0.005% .... result dismal ke baad 2 digit hi hisab-kitab me li jati hai .......
tai hua ke anargal pralap karne wale abhi ginti
me nahi aate hain........

pranam.

JAGDISH BALI said...

I like your writing in both the languages.

प्रतुल वशिष्ठ said...

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यदि कोई मछरिया को कहे कि तुम अपने को बड़ी तैराक समझती हो.
यदि कोई खरगोश से कहे कि तुम अपने को बड़ा उछल्लू या तेज़ धावक समझते हो.
उसी तरह यदि कोई पिंजरबद्ध कैदी से कहे कि तुम तो कमाल के संतोषी हो दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं.
उसी तरह यदि कोई डाकिये से कहे तुम पर कोई काम-वाम नहीं है घर-घर घूमते रहते हो.
........ बस उसी तरह कई ब्लोगर ब्लोगिंग न करें तो क्या करें?

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Deepak Saini said...

डा0 दिव्या जी, हूँ तो मै आपसे बहुत छोटा लेकिन आज आपसे एक बात कहे बिना नही रहूगाँ, आप बिना बात लोगो की बातो को मन से ना लगाया करें लोगो क्या वो तो कुछ ना कुछ कहेगें ही, कुछ लोगो की शक्ल और जुबाँ दोनो की खराब होती है,
आप अच्छा लिखती है और तभी तो प्रसंशा होती है और जो लिखता है वही लेखक है और लेखक क्या बडा क्या छोटा ?
इस तरह के बातों को एक कान से सुनकर दुसरे से निकाल देने चाहिए
(भगवान ने दो कान दिये ही इसलिए है )
शुभकामनाये

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दिव्या जी ,

अब किसने कहा यह तो मैं नहीं जानता लेकिन उस व्यक्ति को पहले लेखन की परिभाषा बतानी चाहिए जिस आधार पर उसने आपको लेखिका न होने की बात कही | मेरे विचार से सच्चा लेखन वही है जो जनोन्मुख हो , समाज का दर्पण हो , सच्चाई और ईमानदारी से बिना किसी दुराग्रह के निर्भीकता से लिखा जाये | आप के लेखों में

ये सभी तत्व मौजूद हैं , इस लिहाज से आप निःसंदेह लेखिका हैं | अब रही साहित्य होने या न होने की बात तो कुछ लोग इसे अपने चश्मों से देखते हैं अतः वह सर्वमान्य नहीं हो सकता |

Kunwar Kusumesh said...

दिव्या जी,
आजकल आपकी पोस्ट बहुत जल्दी जल्दी बदल रही है. जब मैं पढ़ने के लिए खोलता हूँ तो देखता हूँ की आपकी पोस्ट बदल गई. आपकी ये पोस्ट बहुत विनम्र भाव से आपने लिखी है.एक बात कहें मैडम, ऊपर से नीचे तक पढ़ते पढ़ते थोड़ी हंसी भी आने लगी.अगर कोई पहली बार आपकी पोस्ट पढ़ रहा हो और वो भी ये वाली पोस्ट तो सोचेगा कि अरे कितनी विनम्र हैं मैडम.जबकि ब्लॉग जगत में आपके गुस्से कि पराकाष्ठ भी बहुतों ने देखी है. अरे ये मैंने क्या लिख दिया ,कहीं आप मेरे ऊपर गुस्सा न जायें.हा,हा,हा.

शरदिंदु शेखर said...

दिव्या जी, आपके ब्लॉग पर कमेंट्स देने वालों की तादाद इतनी ज्यादा है, कि कहने के लिए कुछ बचता ही नहीं। आपके ब्लॉग से सीधा जुड़ाव होने के चलते लगातार पढ़ता जरूर हूं, हालांकि अपनी राय नहीं दे पाता। एक बात लगातार मेरे सामने आई है, आपके ब्लॉग को लेकर कुछ लोगों की वैसी प्रतिक्रिया, जो आपको ठेस पहुंचाने वाली साबित होती है। इस मामले में मेरा व्यक्तिगत मत ये है, कि आप वैसे लोगों के दिमागी फितूर पर अपनी सोच को शब्दों को सहारे उकेरने की कोशिश कर, ना सिर्फ अपना वक्त जाया करती हैं, बल्कि उनको बढ़ावा भी देती हैं। मैं सलाह तो नहीं दे सकता, ये मेरे नजरिए से हिमाकत होगी, क्योंकि आपको मैं एक काबिल इंसान में शुमार करता हूं। लेकिन अपनी व्यक्तिगत राय जरूर जाहिर कर सकता हूं। और वो ये है, कि कृपया उनकी बातों को नजरअंदाज करें। जिससे वैसे लोग उपेक्षित महसूस करें। सीधी सी बात है, दुनिया की भीड़ में मतों को समेटना संभव नहीं। जरूरी नहीं कि हर शख्स हमारी, आपकी विचारधारा से सहमत हो। ये उनकी अपनी विचारधारा है, जीने दीजिए उनको इसके साथ।

शरदिंदु शेखर said...

हां, एक बात और, जहां.....about me का जिक्र है, वहां an iron lady लिखा है। ऐसे में मेरी इल्तजा है, कि इस तरह के वाक्य, जो आपने ब्लॉग में लिखा है......वर्ना जिंदगी में खुद पर मुस्कुराने के लिए मेरे पास है ही क्या ?........ लिख कर विरोधाभास ना पैदा करें। ............. ऐसे निराशावादी विचारों का जुड़ाव आपके साथ बेहतर नहीं लगता। ये भी मेरी व्यक्तिगत राय है। उम्मीद है......... सकारात्मक और आत्मविश्वास की बातों के साथ आप लोगों की हौसला आफजाई करेंगी।

Kailash C Sharma said...

मन की भावनाओं का स्पष्ट विश्लेषण..सच कहा जाय तो अधिकाँश ब्लोग्गर्स न तो professional लेखक हैं न कवि. वे केवल स्वान्तःसुखाय अपने मन के विचारों को लिखते और ब्लॉग करते हैं.यह पैसे कमाने या लेखक की उपाधि पाने के लिए नहीं करते.यह मानवीय स्वभाव है कि अगर कोई प्रशंशा करता है या प्रोत्साहन देता है तो अच्छा लगता है, लेकिन अधिकाँश ब्लोग्गेर्स केवल प्रशंशा पाने के लिए नहीं लिखते. जहां तक दूसरों की प्रशंशा करने का प्रश्न है, अगर कोई रचना अच्छी लगती है तो दिल से वाह अपने आप निकल जाती है. इसमें चाटुकारिता जैसी कोई बात नहीं.

मैं तो यही कह सकता हूँ कि जिसको लिखना अच्छा लगता है वह लिखता रहे,चाहे दूसरे उसे पसंद करें या नहीं. और जो रचना दूसरे ब्लॉगर की आप को अच्छी लगे उसकी जरूर प्रशंशा कीजिये.

kshama said...

Taareef jhoothee hai yaa sachhee is baat se kisi any ko kya lena dena? Kamaal hai kuchh logon ka bhee! Na khud chain se rahenge,na rahne denge!

kaafir said...

दिव्या जी..

आपका आज का शीर्षक " मुट्ठी भर सौभाग्य " बड़ा सुन्दर लगा ... इस शीर्षक में बड़ा सार और संभावनाए छिपी हुई है| एक पूरा धारावाहिक इसपर बन जाये.. तो भी बात पूरी न हो..

और एक बात, ये लेखक नाम का जीव बड़ा स्वाभिमानी टाइप का होता है.. जब तक बहुत जरुरी न हो ये तो अपने बनाने वाले (भगवान् ,GOD ) की तारीफ भी नहीं करता..
रही बात उपनाम देते रहने की तो आपने जितनी आलोचना सही है.. ये सबके बस की बात नहीं है...
और फिर लोग विरोध भी उसका करते है जिससे कुछ मात्रा में सहमत होते है..बस उन विरोधियों को अपने मत पर संदेह होता है..

अच्छा लेखक सभी को स्थान देता है..

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

अगर तुम अपने आपको एक बड़ी लेखिका समझती हो तो तुम गलत हो । -------------------तथाकथित महान लेखक


मैं इस कथन से हरग़िज़ सहमत नहीं हूँ। ये एक विचार मात्र है। किसी की काबिलियत नापने का पैमाना नहीं। रचनात्मक क्षेत्र में इस तरह की मत भिन्नता आम है। इसे गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

mahendra verma said...

@लेकिन अच्छी तरह जानती हूँ कि मैं लेखिका नहीं हूँ । जिसने कभी साहित्य ही न पढ़ा हो , वो लेखिका कैसे बन सकता है । मैंने खुद कों कभी बड़ा नहीं समझा ।

बड़े बड़ाई ना करैं, बड़े न बोलैं बोल,
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल।

OM KASHYAP said...

aapne sahi kaha
jhoti parsansha se kya hoga

dev said...

Main her sachey prytn ki taareef kartaa hun. Aap ki saafgoi ki main taareef kartaa hun. Likhti rahiye......or...or....or.

प्रवीण पाण्डेय said...

स्वयं को व्यक्तित्व व्यक्त कर पाना और उस अभिव्यक्ति को औरों के द्वारा यथारूप समझ पाना दुष्करतम कार्य है।

अमिताभ मीत said...

अपना काम किये जाइए..... पढने वाले पढ़ रहे हैं !

सुशील बाकलीवाल said...

हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमान...

कुश्वंश said...

दिव्या जी, मुझे लगता है आप आहत है, आपकी पोस्ट से आपकी भावनाए छलक रही है, टिप्पणी वाले गैर जरूरी, गैर जिम्मेदाराना ब्लॉग लेखन ने आपको ही नहीं सही अर्थो में, इस वर्चुअल संसार को ही रुशवा किया है, इस संसार में कौन किसको जानता है, सिर्फ लेखन ही है जो आपका आइना होता है और यही लेखन आपकी पहचान व्यक्त करता है, एक दूसरे की प्रशंशा करने से यदि कुछ भी ख़ुशी दूसरो को दी जा सकती है तो उसे जरूर देनी चाहिए, मैं तो यही करना भी चाहता हूँ और चाहता भी हूँ आकछेप, कटाक्छ का कही भी स्थान नहीं होना चाहिए इस थोड़े से मशीनी interection में. Divya जी आप iron lady है लौहंगना की तरह ही सोचिये, और अपने लेखन पर इसका प्रभाव नहीं होना चाहिए शायद उस शक्श का यही मकशद हो, जिसे कदापि पूरा नहीं होने देना है आपको, शुभकामनायो सहित , भावुक पोस्ट के लिए बधाई

Rajesh Kumar 'Nachiketa' said...

ही किसी की निजी तारीफ़ का भी कोई मतलब नहीं है...मैं अपनी बात कहूं तो मैं तो लेख पर टिप्पणी करता हूँ...उसे जैसे देखता हूँ वैसे कह देता हूँ.....

mridula pradhan said...

mujhe to apka lekhan bahut achcha lagta hai aur 'An iron lady' ka parichay bhi.

यादें said...

नमस्कार ! आज आप का लेख पड़ कर ऐसा लगा कि जैसे आप दुखी कम ,और परेशान ज्यादा हैं|आप के मन मैं इस बात कि झुंझलाहट है,कि आप अपने दिल के ऐहसास दूसरों को कैसे कराएँ|वैसे मैं जांन गया हूँ कि मेरी टिप्पणी की कोई औकात तो नही होगी | यहाँ बड़े बड़े ज्ञानी-ध्यानी बैठे हैं |मैं तो वैसे भी यहाँ अनपड़ और नोसखिया हूँ |
पर फिर भी एक बात कहूँगा की आप अपने दिल के ऐहसास से जो भी लिख रही हैं ,लिखती जाइये | बिना पीछे मुड़े | कुछ तो लोग
कहेंगे... बस आप एक बात याद रखिये ?
जो भले हें,वो बुरे को भी भला कहते हें
न बुरा सुनते हें "अच्छे"न बुरा कहते हें "गालिब"

खुश रहिये |

mridula pradhan said...

mujhe apka lekhan bahut achcha lagta hai.'An iron lady' naam janchta hai.

Rakesh Kumar said...

दिव्या जी ,
जैसे जैसे घड़ा भरता जाता है ,शोर कम होता जाता है.ऐसे ही विचार के द्वारा ही विद्वान लोग भी निंदा प्रंशसा के शोर से से आगे निकल जाते है.मीठे बोल उत्साह वर्धन करते हैं इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहियें,परन्तु कड़वे वचन भी हमें और अधिक विवेकशील बनाने में मदद करते हैं.इसीलये शायद कबीरदास जी ने कहा "निंदक नीयरे राखिये..."

सतीश सक्सेना said...

शुभकामनायें आपके लिए !

वाणी गीत said...

दिखावे की प्रशंसा से तो बचना ही चाहिए ...
ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का एक सशक्त प्लेटफोर्म है जहाँ हम वह लिख सकते हैं , जो हम सोचते हैं ...लिखते लिखते लेखिका बन जाएँ तो सोने में सुहागा !

जयकृष्ण राय तुषार said...

डॉ० दिव्या जी कवि कुंवर बेचैन जी का एक शेर है -जिसमे दम है वो विरोधों में और चमकेगा /किसी दिये पे अँधेरा उछाल कर देखो |नकारात्मक टिप्पड़ियों को तवज्जो मत दीजिए |सिर्फ अपना काम कीजिये सकारात्मक टिप्पड़ियों पर ध्यान दीजिए |लोकप्रियता के साथ विरोध और विरोधी दोनों बढते हैं -निंदक नियरे राखिये रहिमन कुति छवाय ......

Rahul Singh said...

कई बार आपके विचारों से पूरी तरह सहमत न होने के बाद भी आपकी पोस्‍ट न सिर्फ पठनीय, बल्कि विचारणीय होती है. इसके अलावा कुछ चीजें खटकती हैं, जैसे- ''मैं लिखती ज़रूर हूँ लेकिन खुद कों कभी लेखिका नहीं समझा । पहले इंग्लिश में लिखती थी तो सभी ने हिंदी में लिखने कों प्रेरित किया ।'' आपके इस लिखे में ''कों'' के स्‍थान पर बिना अनुस्‍वार ''को'' लिखना ठीक होगा, कृपया विचार कर लें.

ashish said...

मन के भावो का उदगार को हम लिखते है . लेखिका या लेखक का तमगा जरुरी तो नहीं है . स्वान्तः सुखाय भी लोग लिखते है .

Abnish Singh Chauhan said...

'जितने मुँह उतनी बातें'. आप लोगों की बातों पर ध्यान न दीजियेगा, बस अपना काम करते रहियगा. आपका मन कहता है कि आप अच्छा काम कर रहीं हैं, तो अच्छा ही कर रही हैं. आप सचमुच अच्छा काम कर रहीं हैं. अवनीश सिंह चौहान

mridula pradhan said...

aap ka likha mujhe bahut achcha lagta hai aur yah 'An iron lady'ka upnam bhi.

ZEAL said...

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राकेश जी ,

वक्त निकालकर निम्न लेख अवश्य पढियेगा । मेरा पसंदीदा लेख है ।

http://zealzen.blogspot.com/2010/12/beware-
of-critics.html

निदक नियरे राखिये , आँगन कुटी छवाय -- Beware of critics

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ZEAL said...

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मृदुला जी ,

आपको " Iron Lady " , ये परिचय अच्छा लगता है । ये जानकार मन कों बहुत अच्छा लगा । आपका आभार ।

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ZEAL said...

मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए , यहाँ आये सभी मित्रों का विशेष आभार ।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आद.दिव्या जी,
आपकी विनम्रता को नमन !
मैंने हमेशा देखा है कि आप अपने लेखों में सामाजिक विद्रूपताओं के विरोध में आवाज़ उठाती है और उस पर विमर्श भी आमंत्रित करती हैं ! आपके लेख सुन्दर,जागरूक और विचारणीय होते हैं ! पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी बड़ी संतुलित होती हैं !
अमृत के साथ विष हर युग में मौजूद रहा है ! कृपया व्यक्तिगत एवं पूर्वाग्रहों से ग्रसित टिप्पणियों को
नज़र अंदाज़ करते हुए इन्हें अपनी लेखनी की शक्ति बनाएं !
शुभकामनाएँ !

सम्वेदना के स्वर said...

फिल्म अमर प्रेम का वो गाना याद है न!

कुछ तो लोग कहेंगें, लोगो का काम है कहना.....
छोड़ो इन बेकार की बातों को, तुम ब्लोगिंग करती रहों न!

STRANGER said...

I'd like to make it clear that blogging means "giving voice to our feelings" and for doing this, no extra knowledge of grammar or language is required. However, we've to be careful for writing error-free, that's all. It is therefore always better to draft in "doc file" first, make corrections and then let it go.

Jai Shri Krishna

ZEAL said...

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राहुल जी ,

कुछ तकनिकी खराबी से को का कों हो जा रहा है । तथा शब्द आपस में जुड़ जा रहे हैं । भूल सुधार ली है । आभार

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निर्मला कपिला said...

ये मेरा भी मुठी भर सौभागय है कि तुम्हें पढने का अवसर मिलता है।किसी की बात पर मत जाओ अपने काम मे लगी रहो। जितनी जिसकी मुठी है उसे सौभागय मिलेगा ही। और तुम्हें दोनो मुठियाँ भर कर मिले। शुभकामनायें।

P S Bhakuni said...

> दिव्या जी, मेरा मानना है की कोई झूठी तारीफ़ तब करता है जब उसका कोई फायदा हो, यहाँ आपसे क्या लाभ मिलने वाला है सिवाय अछे संबंधों के, इतनी समझदार तो आप है ही की इस बात का अंदाजा आपको हो जाता है| की यह तारीफ़ सच्ची है या झूठी !
श्री सुनीलकुमार जी से पूर्णत सहमत हूँ ,
समयाभाव के कारण और कुछ तकनिकी वजह से अपनी बात नहीं रख पाता हूँ जिसका मुझे खेद है ,

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इस मुट्ठी भर सौभाग्य के लिए सभी तरसते हैं ...जिसको मिल जाये उसे आनंद से रहना चाहिए .. स्वयं की भावनाओं को लिख कर दूसरे तक पहुंचाना लेखिका या लेखक बना देता है ...कोई सुर्खाब के पर नहीं लगते किसी लेखक या लेखिका में ...अपना काम किये जाओ ...बाकी ....पाठकों पर छोड़ दो .

rashmi ravija said...

कुछ तो लोग कहेंगे,लोगो का काम है कहना....

यहाँ किसी द्वारा तारीफ़ लोगो को नहीं पचती.....मेरी कई कहानियाँ...और शॉर्ट नॉवेल पढ़ एक वेब साइट पर किसी ने मेरे परिचय में 'साहित्यकार' लिख दिया...एक महाशय हाथ धो कर पीछे पड़ गए....'साहित्यकार' कैसे कह दिया...(अब मैने तो नहीं कहा था,कहने को)...लगे बेनामी बनकर यहाँ वहाँ कमेन्ट करने....{वे महाशय तुम्हारे बड़े नियमित टिप्पणीकार हैं :)} इसलिए लोगो के कहने का क्या..

हाँ...negative vibes वालों से हमेशा दूर रहना चाहिए....वे खुद कुछ नहीं कर पाते..इसीलिए हतोत्साहित करते हैं...बस मुट्ठी भर सौभाग्य काफी है....'मेरी खिड़की से दिखते आसमान में टंगे ये चार-पांच तारे ...लगते हैं मुझको प्यारे' के तर्ज पर.

सदा said...

आपका लेखन बहुत अच्‍छा है ...आप हमेशा लिखती रहें ...यूं ही
शुभकामनाएं ।

Rakesh Kumar said...

आदरणीय दिव्या जी
आपके निर्देशानुसार कथित पोस्ट पढ़ी.ज्ञानवर्धन के लिए धन्यवाद.
आपने तो ऑपरेशन ही कर डाला निंदको का.निंदकों ने भी खूब चलवा दी है आपकी कलम. आप कुछ भी माने,हम तो धन्यवाद ही कहेंगे निंदकों का कि उन्होंने आपकी कलम चलवाई ही नहीं बल्कि बड़ी खूबसूरती से दौड़वा दी है.जिसका आस्वादन सभी कर रहे हैं .

गौरव शर्मा "भारतीय" said...

कुछ तो लोग कहेंगे..
लोगों का काम है कहना ..
छोडो बेकार की बातों को..
कहीं बीत न जाये रैना ...
आप बस अपनी सार्थकता को बनाये हुए लिखती रहिये यही हमारा आग्रह है रहा सवाल भला बुरा कहने वालों का तो लोगों का काम ही है इसपर आप ध्यान न देवें |

परावाणी : Aravind Pandey: said...

सशक्त चिंतन..

madansharma said...

आप लगातार विविधरंगी पोस्ट्स का उपहार देती रहती
हैं … आपके लेख सुन्दर,जागरूक और विचारणीय होते हैं ! बहुत साधुवाद के पात्र हैं आप!!
हमारी शुभकामनाये आपके साथ है,

एस.एम.मासूम said...

दुसरे लोगों से अपनी तारीफ सुनना अच्छे लोगों को नायकत्व की तरफ बढ़ने की प्रेरणा देती है. और बुरे लोगों को और अधिक बुराई की तरफ ले जाती है.

धीरेन्द्र सिंह said...

सच कहूँ तो आप प्रतिभाशाली हैं.

Suman said...

aap bahut sunder likhati hai......
aur haan ye jhuti tariff nahi hai..

G Vishwanath said...

Sorry for being late.
You know the reason.
I am now back in Bangalore and have just resumed reading blogs of my internet friends.

I read your blog for your views which I find interesting, even if you are not always right
If I am in the mood for high quality literature, I know where to go and find it.
I am not looking for literary merit here. I am looking for mature thoughts and ideas, news, information, views and opinions expressed in an acceptable way and have never ever sought to compare the quality of your writing with other bloggers or literary figures.

I also come here to feel the pulse of your readers and see how they react to your views.
I come here to socialize, make more friends, and become more familiar with a variety of people even if I may never actually meet them.
I have never praised you insincerely and will never do so.
Frankly, I don't see any advantage in doing so.
I am not a blogger and am not looking for reciprocal flattering comments.


Ignore these critics.
Of course you and other bloggers are not authors/writers/literary figures.
None of you have claimed to be.
So what is this critic's problem?
I hope he/she is not merely jealous of your readership and following.
May be he/she feels that he/she is a better writer than you and is frustrated at not getting enough readers.
The world of blogs is full of good writers and not all of them are fortunate to have a large number of readers. They must be patient and allow readership to increase on its own by maintaining quality and being regular in writing. Criticizing another blogger is not a proper thing to do.

Keep writing
Regards
GV

ZEAL said...

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Respected GV Sir,

Glad to see you back . the points you mentioned above in your comment are very valid and quite convincing.

I always get encouraged by your kind words. Thanks for the genuine and selfless affection.

बड़ों के प्रोत्साहन और आशीर्वाद से ही छोटे पनपते और समृद्ध होते हैं।

Regards,
Divya

.