Tuesday, February 8, 2011

हम ब्लोगिंग क्यूँ करते हैं ?

मेरी मित्र राधिका , जो वर्षों जो मुझे जानती है , ने कहा - " दिव्या तुम बहुत complicated हो "

मैंने सादगी से कहा - " हाँ हूँ , तुम्हारे लिए " क्यूंकि जब प्रश्न हल नहीं हो पाता , तो 'कठिन' कहलाता है , जब अंगूर अप्राप्य हो जाता है तो 'खट्टा' कहलाता है और जब कोई किसी की सादगी कों समझ पाने में असफल रहता है , तो उसे complicated' कहता है।

राधिका कौन है ? -
राधिका कोई एक चरित्र नहीं बल्कि एक symbolic पात्र है । मेरा किसी से भी जो संवाद होता है , वो राधिका के नाम से लिखती हूँ। और एक ही लेख में बहुत से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से हुआ संवाद राधिका के नाम से ही कहा गया है , इसलिए कोई भी स्वयं कों राधिका न समझे , हाँ इसे पढने के बाद आपको अपनी झलक कहीं कहीं राधिका में अवश्य मिलेगी।

दिव्या कौन है ? -
दिव्या एक स्त्री है जो स्वयं कों सुधारना चाहती है और अपने साथ साथ , पूरे समाज कों सुधारना चाहती है । वो एक ऐसी दुनिया की कल्पना करती हो जहाँ स्त्री पुरुष समान अधिकार और सम्मान के साथ जिए, एक समाज जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो , एक परिवेश जिसमें सभी संवेदनशील हो , द्वेषमुक्त हों तथा अपनापन हो।

वो एक मुखर , स्वीकारात्मक व्यक्तित्व की है जो अपने सामने आई समस्याओं कों no-nonsense तरीके से सुलझाने का प्रयास करती है। वो एक सामान्य व्यक्ति की तरह कुछ कमजोरियों और कुछ अच्छाइयों का मिश्रण है जो अपने मन के द्वन्द कों स्वयं तक ही सीमित रखती है और उनके हल ढूँढने के बाद समाजोपयोगी रूप में प्रस्तुत करती है । उस सहानुभूति पसंद नहीं है क्यूंकि वो उसे कमज़ोर करती है , और कमज़ोर व्यक्तित्व समाजोपयोगी नहीं रह जाते । वो अपने चारों तरफ एक कठोर आवरण बुन कर रखती है , जो अभेद्य कवच की तरह उसकी रक्षा करते हैं। वो अपने मित्रों के साथ कठोरता से ( straight forward) तरीके से पेश आती है , क्यूंकि वो उन्हें भी कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहती , उन्हें strong देखना चाहती है। मित्रों की strength दिव्या की भी ताकत है ।

दिव्या अन्दर से एक कोमल और भावुक व्यक्तित्व की धनी है , लेकिन अपनी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं करती क्यूंकि उसे लगता है की इस विनाश शील सृष्टि में भावनाओं का कद्र करने वाले विरले ही हैं। कोई चार दिन आपको समझेगा लेकिन फिर मानवीय दुर्गुण जैसे - पूर्वाग्रह , ईर्ष्या, अहंकार , द्वेष आदि उस पर हावी हो जायेंगे जो परस्पर सम्बन्धों में दूरी लाते हैं। इसलिए बेहतर है की हर किसी के साथ एक निश्चित दूरी पर ही रहा जाए।

आप अच्छे थे पहले अजनबी की तरह ।
मुझसे मिलते तो थे अपनों की तरह ।
अपना बनकर तो आप बहुत दूर हो गए
अब कुशल क्षेम भी होती है गैरों की तरह ।


एक बार राधिका ने मुझसे कहा - " मैंने मित्रों से शर्त लगाई है , तुम्हारी ब्लोगिंग छह महीने से ज्यादा नहीं चलेगी। मैंने कहा- " हर चीज़ का अंत तयशुदा है । मैं हारूंगी तो तुम्हारी जीत का जश्न मनाऊँगी । "

कल राधिका ने मुझसे पूछा - " तुम ब्लॉगिंग क्यूँ करती हो , पैसा भी नहीं मिलता और समय की बर्बादी करती हो , तुम जो कर रही हो उसे समझने वाले भी बहुत कम हैं "

मैंने कहा -
  • आज तक समाज ने मुझे बहुत कुछ दिया है , अब मेरी बारी है लौटाने की । मेरा भी छोटा सा योगदान होना चाहिए उस समाज कों जिसमें मैं रहती हूँ। ( social service )
  • मेरा समय किसी सकारात्मक जगह उपयोग हो इसलिए लिखती हूँ।
  • लिखने के बहाने पढ़ती भी हूँ , जिससे मेरा खुद का ज्ञानार्जन होता है ।
  • किसी विषय पर दूसरों से सीखती हूँ और कुछ विषयों पर लगता है मैं योगदान कर सकती हूँ। कोई भी अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है।
  • संसार में हमारा जन्म किसी विशेष प्रयोजन से होता है । उसे पहचानना है और उसे अंजाम देना है । हर कार्य का पुरस्कार " धन " नहीं होता। कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए निस्वार्थ भाव से भी किया जाता है ।
  • ब्लोगिंग से बहुत कुछ सीखा है । इसके कारण मेरे मस्तिष्क के अन्दर नया वसंत आ गया है । रंग बिरंगे फूलों की तरह अनेक सतरंगी विचार आते हैं और उस पर पाठकों के विचार पूरे उपवन की सुन्दरता कों द्विगुणित कर देते हैं।
  • लोगों का व्यक्तित्व पढना मेरा शौक भी है , जिसके लिए ब्लोगिंग एक सार्थक माध्यम है ।
  • जीवन एक सफ़र है , जिसमें मुसाफिर मिलते हैं और एक मकाम आने पर बिछड़ जाते हैं। कारवां बनता और बिखरता है । इसी प्रक्रिया में मोह-माया से गुज़रते हुए एक दिन ये प्राण उस अनंत यात्रा पर निकल जायेंगे।

एक बार मैंने राधिका से पूछा - " तुम मुझे पत्र लिखती हो , मेरे लेखों का इंतज़ार करती हो , शिद्दत से पढ़ती हो , मुझसे कहती हो - मेरा सम्मान भी करती हो और प्यार भी करती हो । फिर क्यूँ कतराती हो अपने विचार रखने से मेरे लेखों पर ? ".......राधिका ने जवाब नहीं दिया।

मैंने राधिका से कहा - " Beauty lies in the eyes of beholder "
एक बार प्यार से तो देखो , सादगी भी दिखेगी ।

52 comments:

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बेहद सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति।

प्रवीण पाण्डेय said...

जितनी भी अतिरिक्तता है जीवन से निकाल दें, सब कुछ हल्का सा हो जायेगा, स्फूर्त, ऊर्जान्वित, सरल, सुखमय।

Mukesh Kumar Sinha said...

aapne blogging ki ek saarthak paribhasha de di..:)
happy basant panchami..
maa shardey aise hi aapke kalam me taakat deti rahe..:)
god bless...Doctor!

अमिताभ मीत said...

Nicely put.

निर्मला कपिला said...

बिलकुल समय का सदुपयोग है। कहते हैं न खाली दिमाग शैतान का घर होता है। मै तो शायद रिटायर होने के बाद गली मे औरतों के साथ गप्पें लडाती और कितनी परेशानियाँ मोल लेती। आमने सामने बच निकलने का रास्ता भी नही होता। या फिर अकेले पडे कुछ सोचती रहती। और कुछ न भी सही कम से कम समय बिताने और ग्यानार्जन के लिये अच्छा साधन है। सार्थक आलेख। बधाई

सुशील बाकलीवाल said...

ऐसे पाठकों की कहाँ कमी है जो ब्लाग पढते तो हैं किन्तु विचार व्यक्त नहीं करते । किन्तु वे भी किसी भी रुप में इस विधा से लाभान्वित तो होते ही हैं ।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आद.दिव्या जी,
"हर कार्य का पुरस्कार " धन" नहीं होता। कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए निस्वार्थभाव से भी किया जाता
है"
आपके लेख ने न जाने कितने ब्लोगेर्स के मन को शांत कर दिया होगा !
आपका लेख पढ़कर लगा जैसे मेरे मन की सारी बातें आपने लिख दिया है !
धन्यवाद और वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं !

Atul Shrivastava said...

आपने सही कहा। अंगूर को जब हम अपनी पकड से बाहर देखते हैं तो उसे खटटे हैं कहकर अपने मन को ढांढस दे देते हैं। यह मानव स्‍वभाव है। आपने दो पात्रों के माध्‍यम से अपने ब्‍लाग लेखन और जीवन दर्शन के बारे में कुछ कुछ बातें कहीं, वे आम जीवन में तकरीबन हर जगह, हर व्‍यक्ति के साथ कहीं न कहीं होता ही है।
आपकी एक और अच्‍छी पोस्‍ट।

सदा said...

आप अच्छे थे पहले अजनबी की तरह ।
मुझसे मिलते तो थे अपनों की तरह ।
अपना बनकर तो आप बहुत दूर हो गए
अब कुशल क्षेम भी होती है गैरों की तरह ।

बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने यह पंक्तियां बहुत कुछ कहती हुई,

हमेशा यूं ही आपकी लेखनी चलती रहे बिने रूके ..शुभकामनायें ।

सञ्जय झा said...

nishya hi ek achhi post......sakaratmak darshan....

pranam.

arvind said...

सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति।

वाणी गीत said...

कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए किये जाते हैं ...जरुर किये भी जाने चाहिए ...
ब्लौगिंग के सकारात्मक पक्ष पर अच्छी पोस्ट !

mridula pradhan said...

आप अच्छे थे पहले अजनबी की तरह ।
मुझसे मिलते तो थे अपनों की तरह ।
अपना बनकर तो आप बहुत दूर हो गए
अब कुशल क्षेम भी होती है गैरों की तरह ।
bahut khoobsurat hain ye pangtiyan aur likha hua bhi.

सुज्ञ said...

लोगों नें अपने व्यवहार व वाणी में इतनी गूढ्ता और complications
भर दिए है कि कोई सहज और सुलझा व्यक्तित्व सामने आए तो उसकी सच्चाई माया प्रतीत होने लगती है। हम आज सोच तक नहीं पाते कि इस जमानें में कोई सहज,सरल,सुलझा हो भी सकता है।

उलझनों से हम इतने अभ्यस्त हो चुके है कि सुलझाव को समझना दुष्कर हो गया है।

संजय भास्कर said...

दिव्या जी,
आपके लेख ने न जाने कितने ब्लोगेर्स के मन को शांत कर दिया !

P S Bhakuni said...

------- "हम ब्लोगिंग क्यों करते है" ?
------- सबके अपने-अपने उद्देश्य हैं ,
वैसे कहते हैं की "कभी किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता " बावजूद इसके कुदरत ने हर किसी को किसी-न- किसी हुनर से नवाजा है, कुदरत से प्राप्त इस हुनर का यदि इंसान देश एवं समाज हित में सदुपयोग कर सकता है तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है, ब्लोगिंग या लेखन भी तो एक हुनर ही है न ?
कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए भी किये जाते हैं .वहां पर आत्मिक शुकून ही सबसे बड़ा पुरूस्कार होता है ,जिसके सामने रुपया पैसा नगण्य है ,
उपरोक्त पोस्ट हेतु आपका आभार और बसंत पंचमी की शुभकामनाएं .

वन्दना said...

विल्कुल सही कह रही है दिव्या जी।बसंत पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएं.

Dilbag Virk said...

आत्मकथात्मक और संवादात्मक शैली में लिखा गया सुंदर लेख , इससे आपके व्यक्तित्व के बारे में पता चला , यहाँ तक राधिका जैसे लोग हैं वे सभी लिखने वालों को मिलते रहते हैं , क्योंकि लोग वही काम करना चाहते हैं जिसमे फायदा हो और लेखन तो अपने आप को जलाना है .पल-पल मिटना है . इसमें फायदा कैसा ? लेकिन इसमें जो मजा है वो राधिका क्या जाने .

दर्शन लाल बवेजा said...

बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने

धीरेन्द्र सिंह said...

मैंने भी सोचा चलो देखते हैं राधिका और दिव्या में कौन अधिक समझदार है और मेरी निगाहें शब्दों से चिपक गईं. (यह मेरी सोच से कहीं अधिक लिखे गए शब्दों के आकर्षण का परिणाम है) दिव्या का चरित्र सचमुच सशक्त लगा, एक दूरी बनाकर रहना फिर भी भावनाओं को बखूबी समझना, बस यहीं आकर मैं भी अटक गया और बरबस मेरी ज़ुबां भी बोल उठी complecated हो दिव्या।

amar jeet said...

बसंत पंचमी की शुभकामनाए

धीरेन्द्र सिंह said...

एक अलग और अनोखे अंदाज़ के लिए बधाई। पढ़ते-पढ़ते यकायक मेरी ज़ुबां भी बोल गई - complecated है दिव्या, क्योंकि एक दूरी भी रखती है और संवेदनाओं की हल्की खनक को भी बखूबी पकड़ लेती है।

बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।

अरविन्द जांगिड said...

आप जो कर रही हैं, बहुत ही अच्छा कर रही हैं, शुभकामनाएं. वर्तमान समय में हमने कार्य उसी को मान लिया है जिससे "पैसा" जुड़ा होता है, बहुत ही शर्म की बात है. ये तो अहसानफरामोशी हुई, बस लेते जाओ, वापस समाज को दो कुछ नहीं! फिर यहाँ आये किसलिए थे?

आभार.

mahendra verma said...

इस अनुपम प्रस्तुति में आपके द्वारा व्यक्त विचारों से सहमत।

प्रत्येक व्यक्ति के भीतर चिंतन की उर्जा होती है। कुछ लोग इसका रचनात्मक उपयोग करते हैं तो कुछ लोग अन्य तरीकों से व्यय करते हैं। व्यर्थ कार्यों में उर्जा व्यय करने से अच्छा है कि इसका रचनात्मक उपयोग किया जाए।

लेखन भी चिंतन उर्जा का रचनात्मक उपयोग है, चाहे पत्र-पत्रिकाओं में लिखा जाए या ब्लाग पर। आपका ब्लाग लेखन निश्चित रूप से समाज सेवा ही है।

ब्लागिंग आत्मसंतुष्टि का साधन है, सीखने वालों के लिए यह ज्ञानार्जन का स्रोत है, व्यक्ति और संसार को समझने का एक जरिया है, समय का सदुपयोग है.....।


शुभकामनाओं के साथ।

V!Vs said...

90% bloggers r frustrated, mano ya na mano.

Satish Chandra Satyarthi said...

कई बार यह सवाल उठता है मन में.. पर जवाब बस एक ही है... 'अच्छा लगता है इसलिए'..

Dorothy said...

सार्थक और सुंदर आलेख के लिए आभार.
आपको वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
सादर,
डोरोथी.

जयकृष्ण राय तुषार said...

आदरणीया डॉ.दिव्या जी बसंत की हार्दिक शुभकामनायें |

घनश्याम मौर्य said...

hum blogging kyun karte hain? Yeh sawaal waisa hi hai jaise poochha jaye ki hum pustakein kyun padhte hain? ramvriksha benipuri ji ka ek nibandh yaad aa raha hai "gehuoon aur gulaab". gehun bhookh mitaata hai aur gulab humaare maanas ko tript karta hai. Blogging gulaab ki shreni me aati hai.

वीना said...

बहुत ही खूबसूरती के साथ मन करे भावों को सामने रखा है...
बसंत पंचमी पर बधाई...

G Vishwanath said...

ये "राधिकाएं" हर जगह मिल जाएंगी।
मेरे घर में भी है एक "राधिका" जो पूछ पूछकर नहीं थकती कि क्यों इन ब्लॉग्गरों के चक्कर में पढते हो?
लिखने दो उनको, तुम्हें क्या? न जान न पहचान।
क्या जरूरत है इधर उधर भटककर अपनी टिप्पणी छोड जाने की।
क्या मिलता है तुम्हें? उस ब्लॉग्गर का तो कम से कम अंतरजाल में नाम होता है।
सुना है गूगल ऐड्स से उनकी अच्छी खासी कमाई भी होती है।
पर कौन पूछेगा तुम्हे? क्या कोई पढता भी है तुम्हारी टिप्पणी को?
चलो बस करो, उठो उस कुरसी से जिससे घंटों तक चिपके बैठे हो
घर का इतना सारा काम पडा है! बाजार जाना है।

हम एक ठंडी आँह भरते हैं, कुरसी से उठकर "राधिका" के साथ कुछ समय बिताते हैं, उसे शॉप्पिंग ले जाते हैं, और उसे तृप्त करके वापस आकर फ़िर शुरु हो जाते है।
अगली शिकायत तक सब शांत रहता है।

हमारी "राधिका" कभी यह नशा नहीं समझेगी।
उसे समझाने की कोशिश भी नहीं करता।

कृष्ण की राधिका ने तो उसकी बंसी चुरायी थी।
डरता हूँ मेरी राधिका एक दिन लैपटॉप छुपा देगी।

लिखते रहिए। इन नासमझ "राधिकाओं" की पर्वाह मत कीजिए
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

Rahul Singh said...

सहज, सरल, सुगम.

Deepak Saini said...

ब्लागिंग का तो सब का अपना अपना उदेदश्य है
लेकिन मन की शांति सबसे बडी चीज है
एक बार फिर एक अच्छे व प्रेरणा दायक लेख के लिए
धन्यवाद

: केवल राम : said...

आपका आलेख विचारणीय है ...शुभकामनायें

अरुण चन्द्र रॉय said...

स्फूर्त, ऊर्जान्वित, सरल, सुखमय।

cmpershad said...

`राधिका कौन है ? - '

ओह!! मैं ने समझा कोई ब्लागर है ... तो फ़ालो करेंगे :)

ehsas said...

बिल्कुल सही कह रही है आप। समाज ने बहुत कुछ दिया है अब बारी हमारी है।

Anupam karn said...

Good point of views

शोभना चौरे said...

हम सब में राधिका है और हम सब में दिव्या भी |राधिका के बिना दिव्या कहाँ ?और दिव्या के बिना राधिका का कोई अस्तित्व नहीं ?
कुछ तो लोग कहेंगे ,लोगो का काम है कहना
छोड़ो बेकार की बातो में ,कहीं छूट न जाय ब्लाग पढना |
ब्लागिंग के लिए इससे सकारात्मक बात और क्या हो सकती है ?
अच्छा विश्लेषण |लिखती रहे ,लिखती रहे और लिखती रहे |

sagebob said...

बहुत ही अद्भुत आलेख.खुद को विषय वस्तु बनाकर कोई विरला ही लिख सकता है.
ढेरों शुभ कामनाएं.

अजय कुमार said...

kuchh kaam 'aatm santusti' ke liye kiye jaate hain, blog lekhan aisa hee kaam hai mere liye

अभिषेक मिश्र said...

"मेरा समय किसी सकारात्मक जगह उपयोग हो इसलिए लिखती हूँ।"

बहुत ही मह्त्त्वप्पूर्ण कारक गिनवाए हैं आपने.

मनोज कुमार said...

आप उन रचनाकारों में से है जो विभिन्न विषय पर लिखती रही है और समकालीन भारतीय समाज के दुख दर्द को केंद्र में रखकर लिखती रही है। आपको पढ़ते हुए किसी आधुनिक, पेशेवर या समय के साथ कदमताल करती स्‍त्री का चेहरा सामने जरूर आ जाता है।

एस.एम.मासूम said...

मानवीय दुर्गुण जैसे - पूर्वाग्रह , ईर्ष्या, अहंकार , द्वेष से बहार आने पे ही आप की यह बातें सही होंगी की एक बार प्यार से तो देखो , सादगी भी दिखेगी
.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सही ओर सुंदर लिखा, वेसे हम ब्लागिंग करते हे सिर्फ़ मनोरंजन के लिये, लेकिन इस मनोरंजन मे ध्यान भी रखते हे कि किसी का दिल ना दुखे, किसी का अपमान न हो जाये, बस इसी पाप से बचने के लिये कई बार बहुत कुछ सह भी लेते हे.

अरूण साथी said...

ब्लॉगिगं समाज को कुछ लौटाने का जरिया है। आपकी बात से सहमत पर मेरे लिए ब्लौगिंग एक ऐसा जरिया है जिसमें सारा जहां परिवार हमारा हो गया है। गांव मे रह कर दुनिया के लोगों से जुड़ना, उनके विचार जानना एक अजीब सा अहसास है।
आपने ब्लॉगिंग के लिए जो कारण गिनाए है उसमें परिवार बनाना भी जोड़ दें मेरी ओर से....

Bhushan said...

यदि हम कांप्लिकेटिड नहीं होंगे तो क्या मानव से इतर जीव होंगे. हम अंतर्विरोधों से भरे हुए हैं और रहेंगे क्योंकि मानव मन और जीवन बना ही ऐसा है. ब्लॉगिंग से खुशी न मिलती तो क्यों कोई यहाँ आता. कहीं पढ़ा था कि इंसानों को अपनी गहनतम पीड़ा को एकांत में कुत्ते की भाँति रोकर भी कहते देखा गया है. ब्लॉग एकांत की भूमिका निभाता है तो साथ ही साथियों का अहसास भी देता है. यह इंसानी तरीका बेहतर है.

सुलभ § Sulabh said...

हर कार्य का पुरस्कार " धन" नहीं होता। कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए निस्वार्थभाव से भी किया जाता
है".... यही तो जज्बा है जो हमें सामाजिक बनाता है. अपनी सी बात है, अपनापन है. आपकी आभिव्यक्ति सर्वहित में है.

सम्वेदना के स्वर said...

सोचपरक लेख के लिये धन्यवाद!

अजय कुमार झा said...

इस प्रश्न का उत्तर सब पहले भी ढूंढते रहे हैं और टिप्प्णी में मिले विचारों से सहमति -असहमति , तर्क वितर्क देते समझते रहे हैं । और मुझे लगता है कि हर ब्लॉगर को एक न एक बार इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश भी करनी चाहिए ...फ़िर चाहे दशकों तक इसका सार्वभौमिक उत्तर मिले न मिले । शुभकामनाएं

डा० अमर कुमार said...

Good !
You have made me proud.
Keep it up.

यादें said...

मेरे लिए इस उम्र मैं सब से अच्छा और सटीक उपाय | अपने अकेले पन को दूर करने का और कुछ अच्छा सीखने का ,बगेर अपनी "राधिका" के टी.वी.सीरिअल्स मैं दखलंदाजी के | वो भी खुश और हम भी राजी |
लगी रहो डाक्टर बच्ची... |
खुश और सेहतमंद रहो

अंकल अशोक'अकेला"|