Monday, August 8, 2011

ज्ञान और वैराग

एक ऐसा ग्रन्थ जिसका महात्म्य सर्वविदित है , वह है भगवद गीता! बहुत बार मन किया इसे पढूं , लेकिन पढ़ नहीं सकी क्यूंकि मन में एक संशय था की गीता पढने से मन में वैराग उत्पन्न हो जाता है ! ऐसा कहीं सुना था ! पहले से ही वैरागी मन थोडा सा अनुराग और थोडा सा अज्ञान ढूंढता है ताकि मन , घर संसार में रमा रह सके!

तार्किक मन ये बात नहीं मानता , उसका कहना है की - "गीता पढने से वैराग नहीं, ज्ञान आता है ! इस पर तार्किक मन पुनः बोल उठा -" ज्ञान से ही वैराग आता है , अन्यथा ये मोह-माया का बंधन तो अज्ञानता के कारण ही है ! एक बार यदि ज्ञान हो जाए तो किसी भी प्रकार के मोह में पड़ना संभव ही नहीं है !

परिजनों के मोह में जकड़े अर्जुन को ज्ञान देकर और मोह दूर करके ही उन्हें उनके कर्तव्य पथ पर लाया गया! वैसे गीता तो बहुतों ने पढ़ी होगी , लेकिन यदि कोई उसमें लिखे उपदेशों को पूरी तरह समझकर आत्मसात नहीं करेगा , तब तक उसे न ही ज्ञान होगा , न ही वैराग !

विद्वान् पाठक कृपया अपने विचार रखकर मेरा संशय दूर करें !



65 comments:

: केवल राम : said...

यह संशय तब तक दूर नहीं हो सकता जब तक व्यक्ति गीता के मूल मर्म को नहीं समझ लेता ....गीता पढने के लिए नहीं बल्कि आत्मसात करने के लिए है ....गीता को पढने वाले तो बहुत मिल जायेंगे लेकिन आत्मसात करने वाले ???????...!

DR. ANWER JAMAL said...

हैप्पी फ़्रेंडशिप डे।

Nice post .

हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।
बेहतर है कि ब्लॉगर्स मीट ब्लॉग पर आयोजित हुआ करे ताकि सारी दुनिया के कोने कोने से ब्लॉगर्स एक मंच पर जमा हो सकें और विश्व को सही दिशा देने के लिए अपने विचार आपस में साझा कर सकें। इसमें बिना किसी भेदभाव के हरेक आय और हरेक आयु के ब्लॉगर्स सम्मानपूर्वक शामिल हो सकते हैं। ब्लॉग पर आयोजित होने वाली मीट में वे ब्लॉगर्स भी आ सकती हैं / आ सकते हैं जो कि किसी वजह से अजनबियों से रू ब रू नहीं होना चाहते।

सदा said...

बहुत ही अच्‍छा विषय ...गीता पढ़ना ही नहीं बल्कि जरूरी है उसके मूल तत्‍वों को समझना आत्‍मसात करना ...
यूं ही आपका लेखन निरंतर आगे बढ़ता रहे शुभकामनाएं ..इन पंक्तियों को भी पढि़एगा ..
http://sadalikhna.blogspot.com/2011/06/blog-post_28.html

इमरान अंसारी said...

ज्ञान भी दो तरह के होते हैं एक तो थोथा ज्ञान रटंत विद्या भी कह सकते हैं जिसे.......वो ज्ञान दो कौड़ी का है.....ये सच है जब ज्ञान का प्रकाश फैलता है तो वैराग्य उत्पन्न होता है.......ये भी मन का खेल है वो शांति को भी स्वीकार नहीं करता.........सच कहूँ आपसे कुछ ऐसी ही कशमकश से गुज़र रहा हूँ इन दिनों....बंधन बहुत मजबूत जान पड़ते हैं.....अगर गीता की बात करें तो मुझे यही लगता है आप बिना डरे गीता पढ़े......क्योंकि गीता में भी कर्म करने पर ही जोर दिया है कृष्ण ने......मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य कर्म करना है.......फल की चिंता न करें......शुभकामनाये|

shilpa mehta said...

दिव्या जी - यह जो सोच है गीता को लेकर - इस सोच से मिलती जुलती सोच के कुछ उदाहरण दूं ?
१) केमिस्ट्री लेब में केमिकल्स से काम करना जो सीख लेगा, वह बम (रासायनिक) बनाने वाला (आतंकवादी) हो जाएगा..
२) बहू को (गाँवों में - बालविवाह हो ससुराल आई बच्चियों को) पढने दिया, तो वह बड़ी होकर "मैं पढ़ी लिखी हूँ" सोच कर घर में पति और घरवालों की इज्ज़त नहीं करेगी|
३) आग से जल जाते हैं - जो भी किचन में खाना पकाए, वह जल जाएगा / जायेगी | तो आज से किचन जाना बंद हो |
४) पानी में डूब जाते हैं - तो आज से नहाना धोना बंद कर दिया जाए |
आदि आदि
दिव्या जी, गीता में ज्ञान है, वैराग्य भी - पर वह वैसा नहीं जो आप सोच रही हैं (शायद सोच रही हैं ) | वह वैराग्य यह नहीं है कि जीवन से और अपने साथ वालों से मन उचट जाए|

वह वैराग्य यह है कि जिनसे आप प्रेम करते हैं, उनसे शुद्ध प्रेम [- अपेक्षाजनित, मोह रहित, दुःख से रहित प्रेम ] और भी बढ़ जाए - जैसे बच्चों से प्रेम | साथ ही - जो आपको अब तक "शत्रु" लगते थे, उनकी गलत बातें आपको दिखेंगी तो सही , आप उन्हें सज़ा ( सिर्फ और सिर्फ यदि आपके स्थान से औचित्य और सज़ा की आवश्यकता हो तो ) तो दे सकेंगे, परन्तु उस ज़रूरी "सज़ा" कर्म से आपका निजी क्रोध , बदले की भावना , और नफरत हट जाएगा |

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कही, सुनी, पढी बात जब तक अति साधारण और सरल न हो, हम उसका उतना ही अर्थ समझ पाते हैं जितना समझना कचाहते हैं या जितने के सक्षम/अधिकारी होते हैं। इसीलिये गीता जैसे जटिल ग्रंथ का अर्थ कई बार अलग नज़रिये से देखने पर अलग लगता है। वैराग्य मिले या अनुराग, ज्ञान के मार्ग में भय कैसा? क्या पता ज्ञान आने पर अनुराग और वैराग्य का अंतर ही मिट जाये?

मैंने मूल गीता को खूब पढा है, विभिन्न लोगों द्वारा की गयी उसकी विभिन्न व्याख्यायें भी पढी हैं। आजकल गीता पर शिल्पा मेहता के आलेख पढ रहा हूँ ...

JC said...

सन '८४ में पहली बार पढ़ और, वर्तमान में सत्य को पाने हेतु वैज्ञानिक और अन्य के माध्यम से ज्ञानोपार्जन कर और उस पर मनन कर गीता का सार जो मुझे लगा वो है कि 'हम' सभी मानव, पृथ्वी पर, कुछेक वर्ष के लिए ही आये हैं (वर्तमान में किसी को न मालूम क्यों, यद्यपि प्राचीन ज्ञानियों ने कहा, "मैं कौन हूँ"?!)... और इसे आज के युवकों के शब्द में दुर्भाग्य ही कहेंगे कि 'भारत' अथवा 'महाभारत' अनादिकाल से एक देव भूमि रही है, जिस कारण यह अनादी काल से योगियों (योगेश्वर विष्णु / शिव भी), सिद्धों आदि की पवित्र भूमि रही है, जिस में सदियों से पश्चिम दिशा निवासी 'समुद्र मंथन' अथवा 'मानस मंथन' के लिए समय समय पर आते रहे / रहते हैं इस भूमि से 'सोना' - पीला अथवा काला - आदि खनिज पदार्थ निकालने, जिन कार्यों में उन्होंने अपने देशों में भी महारत प्राप्त की है,,, और इस भूमि से, बदले में, ज्ञानी लोग, सिद्ध पुरुष आदि पश्चिम देशों में जाते रहते हैं...

यही है 'योग' जिसे मानव की प्रकृति में भी आध्यात्मिक और भौतिक के बीच बराबरी (बैलेंस) के लिए द्वन्द चलता है...
भारत में इसी लिए 'शिव' (पृथ्वी-चन्द्र, दाए और बाए पैर के योग के द्योतक, और इनको जोड़ने वाले मंगल, निराकार द्योतक रूप में शिवलिंग-पारवती कि योनी) को 'नटराज' भी कहते हैं, और, जो देखा जा सकता है हमारे सौर-मंडल (महाशिव) के सूर्य से शनि तक सदस्यों के लगभग साढ़े चार अरब वर्षों से हमारी गैलेक्सी में, शून्य में, विद्यमान रह अपना अपना निर्धारित कार्य अनादि काल से करते चले आने से...किन्तु इसे दुर्भाग्य कहें कि सौभाग्य कि हमारे सौर-मंडल की वैज्ञानिकों ने आयु साधे चार अरब वर्ष आँका है, अर्थात 'हिन्दू' मान्यतानुसार ब्रह्मा के दिन के अंत के निकट...

भागवदगीता का असर पढने वाले के प्राकृतिक मानसिक रुझान पर निर्भर करता है - जिसे बैरागी बनना है वो बैरागी बन जायेगा और किसी 'जूने अखाड़े' में पहुँच जाएगा,,, और 'मेरे' जैसा शायद कोई भेद भाव नहीं मानेगा, आनंद को ही खोजेगा, जैसे 'मैं' अपने मुसलमान मित्रों के ईद आदि पर निमंत्रण पर 'बकरा' भी खाया हूँ, जमजम का पानी पीया हूँ किसी हाजी के घर,,, क्रिसमस पर इसाई मित्रों के घर केक आदि खाया हूँ...आदि आदि... यह बात अलग है कि अब आयु के कारण दांत भी टूटते जा रहे हैं और आना- जाना कम हो गया है, किन्तु पुरानी बातें याद कर 'अकेले' में भी आनंद उठाता हूँ, जब तक कृष्ण की मर्जी होगी:)

पी.एस .भाकुनी said...

पहले से ही वैरागी मन थोडा सा अनुराग और थोडा सा अज्ञान ढूंढता है ताकि मन , घर संसार में रमा रह सके....
और इसमें कोई बुराई भी नहीं है , क्योंकि "संसार से भागे फिरते हो भगवन को तुम क्या पावोगे...................
आभार...........

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

"बहुत बार मन किया इसे पढूं , लेकिन पढ़ नहीं सकी क्यूंकि मन में एक संशय था की गीता पढने से मन में वैराग उत्पन्न हो जाता है !"
आयरन लेडी ऐसा सोचे और कहे थोड़ा अजीब लगता है,मैंने जो किया बता सकता हूँ ,पढ़ा सब को गीता से लेकर क्र्श्नमूर्थी ,रजनीश से स्वामी योगानंद ,स्वामी राम,इत्यादी
आत्म सात वो की करा जो मेरे विवेक को उचित लगा .बिना सबको पढ़े आप अपना मत कैसे बना सकते हैं,कौन आपके लिए तय करेगा क्या अछा और क्या बुरा है,अनुसरण होना चाहीये अन्धानुकरण नहीं

vidhya said...

वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

वन्दना said...

्गीता पढने से सिर्फ़ वैराग्य या ज्ञान ही उत्पन्न नही होता बल्कि इंसान को जीवन कैसे जीना चाहिये वो भी आ जाता है मगर तभी जब वो उसके मूल अर्थ को समझे। गीता मे अर्जुन ने कौन सा घर बार का त्याग किया बल्कि उसे भगवान ने कर्म के लिये प्रेरित किया । गीता कहती है सब कर्म करो मगर उसमे लिप्त होकर नही । सिर्फ़ कर्म करना है क्योंकि मनुष्य एक पल भी कर्म किये बिना नही रह सकता और ये धरती कर्मभूमि है तो यहां जो आयेगा उसे कर्म करना ही पडेगा मगर कर्म करने के बाद क्या होगा ये सब भगवान पर छोड दो क्योंकि कर्म करने तक ही तुम्हारी सामर्थ्य है । साथ ही मोह के फ़ंद ऐसे ही नही छूटते जब तक गीता की गहराई मे ना उतरो और वहाँ तक उतरने के लिये सत्पुरुषो का संग करना पडता है अर्थात भक्ति की जोत जलानी पडती है तब जाकर इंसान तन से सारे जगत के कर्म करता है और मन प्रभु के चरणो मे । वहाँ कभी ये नही कहा कि सब सन्यासी बन जाओ , घर बार त्याग दो …………ऐसा कुछ नही कहा गया कभी भी गीता मे सिर्फ़ मन के खेल है और इसकी धारा को ही मोडना गीता ज्ञान है। बाकि इस विषय मे जितना लिखो उतना कम है इसलिये या तो इतने को ही समझने का प्रयास करो नही तो गीता जरूर पढो जीना आ जाता है और सारे संताप मिट जाते है और मनुष्य हर हाल मे खुश रहना सीख जाता है।

महेन्द्र मिश्र said...

ज्ञान हो जाए तो किसी भी प्रकार के मोह में पड़ना संभव ही नहीं है...
यहाँ मैं आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ ... वैसे ज्ञानार्जन करना और वैराग्य धारण करना दोनों अपनी जगह अलग अलग हैं ...

सुज्ञ said...

यह संशय वस्तुतः "वैराग्य" को न समझ पाने के कारण है। वैराग्य जीवन संघर्ष से पलायन नहीं है जैसा कि अकसर माना जाता है। वैराग्य आना और सन्यास ग्रहण कर लेना अथवा घर संसार का परित्याग के बीच पतली सी भेद रेखा है। मोह का त्याग करना, अनुकम्पा विहिन हो जाना नहीं है। वात्सल्य खत्म हो जाना नहीं है। बैरागी मन में वात्सल्य वृद्धि पाता है। मोह बंधन है, उसी के प्रति राग का त्याग वैराग्य है। पर प्रेम, दया, करूणा, वात्सल्य और अनुकंपा का विरोधी नहीं है।

शिल्पा दीदी नें सही कहा………
"वह वैराग्य यह है कि जिनसे आप प्रेम करते हैं, उनसे शुद्ध प्रेम [- अपेक्षाजनित, मोह रहित, दुःख से रहित प्रेम ] और भी बढ़ जाए - जैसे बच्चों से प्रेम | साथ ही - जो आपको अब तक "शत्रु" लगते थे, उनकी गलत बातें आपको दिखेंगी तो सही , आप उन्हें सज़ा ( सिर्फ और सिर्फ यदि आपके स्थान से औचित्य और सज़ा की आवश्यकता हो तो ) तो दे सकेंगे, परन्तु उस ज़रूरी "सज़ा" कर्म से आपका निजी क्रोध , बदले की भावना , और नफरत हट जाएगा |"
और अनुराग जी नें भी कि……… "क्या पता ज्ञान आने पर अनुराग और वैराग्य का अंतर ही मिट जाये? "

निश्चित ही वह अन्तर मिट जाता है। ज्ञान से सब कुछ स्पष्ठ हो जाता है। न संशय रहता है न शंका!!!

रूप said...

geeta padhne se kabhi wairag nahi hota , balki zindagi ki haqeeqat sw ru-b-ru hota hai manaw !

Rajesh Kumari said...

sach kahun aaj tak geeta padhne ka avsar hi nahi aaya ya kahen novel to khoob padhe geeta padhna hi nahi chaha.isliye pata hi nahi vairagya kya aur gyaan kya?jab khbhi padhungi to fark jaanne ki koshish jaroor karungi.achche vishya par likha hai.is vishya par bhi dhyaan jaana chahiye.god bless you.Divya...happy friendship day.

JC said...

दिव्या जी, ज्ञान भी अलग अलग स्तर का होता है...

किन्तु परम ज्ञान को पा ले कोई तभी आत्मा के सत्य का पता चलता है,,,
यानि प्राचीन ज्ञानियों के शब्दों में, "शिवोहम! तत त्वम् असी!"
अर्थात, में ही परमात्मा हूँ और आप भी हैं!

DUSK-DRIZZLE said...

WHAT IS YOUR OPINION ABOUT VIVEKANAND ON THE GITA.ONCE VIVEKANAND SAID TO PLAY FOOTBALL IS MORE IMPORTANT THAN READING THE GITA.

शालिनी कौशिक said...

दिव्या जी ,
गीता ज्ञान का भंडार है किन्तु हम संसार के माया मोह मरे फंसे लोग इसे पढने से बचते हैं यहाँ तक भी कहते हैं कि इसे घर में पढने से झगडे बढ़ते हैं पर हम जानते हैं कि ये सांसारिक लोगों द्वारा फैलाया गया प्रपंच है ताकि माया मोह हमें यूँ ही लपेटे रहें .हमने अपने बी.ए..के संस्कृत के पाठ्यक्रम में गीता का थोडा बहुत अध्ययन किया है और यही वह ताकत देती है जो हमें दुःख के सागर से बार बार बाहर ले आती है इसलिए जब भी ज्ञान पाने कि इच्छा हो इसे ज़रूर पढना चाहिए.

arvind said...

divyaji.....geeta jaroor padhna chaahiye...yah unique book hai jo jeena sikhatee hai..sahi maayne me. badhiya post.हैप्पी फ़्रेंडशिप डे।

JC said...

@ DUSK-DRIZZLE जी, 'बंगाली' को फुटबौल का खेल अधिक प्रिय है... मानव शरीर एक फुटबौल के मैदान समान ही है जिसमें सूर्य से शनि ग्रह तक के, नवग्रह के, सार खेल रहे हैं...

(पंचभूतों में से एक), आकाश में तो ये साढ़े चार अरब वर्षों से निरंतर खेलते आ रहे हैं, और आराम कर ब्रह्मा के दूसरे दिन फिर खेलते जायेंगे...

किन्तु क्यूंकि क्रिकेट हो या फुटबौल या हॉकी आदि टीम खेल, सब खेल मैदान और मौसम आदि पर निर्भर करते हैं, वे क्या करें यदि कोइ भी मैदान सही न हो ?

वैसे भी ज्ञानी 'हिन्दू' कह गए कि मानव की क्षमता काल के अनुसार भी सतयुग में १००% से कलियुग के अंत तक, यानि सागर मंथन के आरम्भ में, ०% रह जाती है / थी...और विष व्याप्त था (जो नादबिन्दू विष्णु, जैसा नाम दर्शाता है, उनमें समाया था / रहता है)...

Suresh kumar said...

गीता हमें जरूर पढनी चाहिए इससे हमें बहुत कुछ सिखने को मिलता है उसको हम कितना याद रख पाते है ये हमारे ऊपर निर्भर है श्री कृष्ण ने कहा है की आप हिंदी के बढ़िया से बढ़िया लेख लिखो और टिप्णी की चिंता न करो

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी,
जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ, गीता ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न हो जाना सर्वथा सही नहीं है| होता भी है तो वैराग्य कोई गलत तो नहीं है|
प्रेम बना रहे बस और क्या चाहिए?
जैसा की भाई सुज्ञ जी व बहन शिल्पा जी ने कहा, मैं भी उनसे सहमती रखते हुए कहता हूँ कि इन भयों से भयभीत न हों और गीता ज्ञान का आनंद लें|
मैंने भी गीता पढी तो है, किन्तु अभी उसका भावार्थ व मूल समझने में थोडा समय लगेगा| आप भी इस आनद से वंचित न हों|

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

अच्छी बात आपने उठायी है। असल बात तो ज्ञान कहीँ से मिले उसे आत्मसाध करके अमल मेँ लाने की है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपके द्वारा उठाये मुद्दे पर मैं तो औरों की टिप्पणियों से ज्ञान प्राप्त कर रही हूँ .. सार्थक चर्चा चल रही है ..

गीता पढ़ यदि उसका शतांश भी जीवन में उतार लें तो जीवन में दुःख महसूस नहीं होंगे ..मोह तो रहेगा ..मोह के बंधन नहीं ..

मुझे ऐसा ही लगता है ..

Bhushan said...

गीता मैंने पढ़ी है. यह मन की सूक्ष्म कार्यप्रणाली पर लिखा गया ग्रंथ भी है. पुस्तक पढ़ कर या किसी कारण (किसी की मृत्यु, किसी हानि आदि) से आया वैराग्य टिकाऊ नहीं होता. कहते हैं कि वैराग्य वही होता है जो अकारण होता है.

वाणी गीत said...

गीता से वैराग्य और ज्ञान नहीं , जीवन जीना आ जाता है ...
अपनी ओर से अच्छे कर्म किये जाओ , फल मिले तो ठीक , ना मिले तो निराश मत हो !

G.N.SHAW said...

संक्षेप में कहे तो गीता जीवन का सुन्दर पथप्रदर्शक है , जो हमें सही मार्ग निर्देश करती है !इसे ब्लॉग के ऊपर समझना उतना ही कठिन है जैसे पेड़ पर लगे आम को देख कर ललचाना ! सही योगी से अच्छी तरह समझा जा सकता है ! इससे वैराग्य नहीं बल्कि स्वार्थ और मोहनी भावनाओं का नाश होता है !हम भी योग्य पुरुष तथा दूसरो को योग्य बनने के लिए प्रेरित करते है !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

अपुन ने तो अभी पढी ही नहीं।

------
ब्‍लॉग के लिए ज़रूरी चीजें!
क्‍या भारतीयों तक पहुँचेगी यह नई चेतना ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़ लीजिये, कहीं नहीं भागेंगी।

ashish said...

मै तो रोज पढता हूँ , वैरागी नहीं बन पाया , गीता एक जीवन दर्शन का नाम है .

Jyoti Mishra said...

Give it a try.. and then let me know hows it :P

shilpa mehta said...

@shalini kaushik ji
that has not been said about the geeta, it is about the mahabharata ... and that too is a myth.... false, not true ... "ghar me mahabhaarat rakhne se mahabhaarat hogi " - nope - rather we understand the effects of our words and deeds, and become more careful in our behavior, thereby reducing the possibility of bitterness...

कुश्वंश said...

गीता कर्म करना सिखाती है बैराग्य नहीं . बैराग्य को यदि बेहतरीन तरीके से परिभाषित किया है तो आदरणीय सुज्ञ जी ने. मोह, अनुराग त्यागना बैराग्य है सरल शब्दों में यही है बस . क्लिस्ट शब्दों के लिए और बहुत से सुधी जन है उन्हें पढ़िए गुनिये मोह भंग हो जायेगा .

mahendra verma said...

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 5, श्लोक 1 और 2 में श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद इस प्रकार है-

अर्जुन - हे कृष्ण! आप पहले कर्मों से सन्यास और फिर निष्काम कर्म की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में जो निश्चित कल्याण कारक है, उसे मेरे लिए कहिए।
श्रीकृष्ण - कर्मों से सन्यास और निष्काम कर्म, यह दोनों ही परम कल्याण कारक हैं, परंतु उन दोनों में भी सन्यास की अपेक्षा निष्काम कर्म करना श्रेष्ठ है।

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को बार-बार कर्मशील होने का उपदेश देते हैं।
श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए ज्ञान से अर्जुन सांसारिक कर्म (युद्ध) के लिए प्रवृत्त हुआ, न कि वैराग्य की ओर।

जो ज्ञान सांसारिक कर्म करने के लिए प्रवृत्त करे वह वैराग्य कैसे उत्पन्न कर सकता है ?

mahendra verma said...

गीता में जो ज्ञान है वह कर्म की ओर प्रवृत्त करने के लिए है, वैराग्य उत्पन्न करने के लिए नहीं।

एक बात और-
गीता को समझने के लिए हमें यह ध्यान रखना होगा कि श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त किए गए शब्दों को हम उन्ही अर्थों में ग्रहण करें जो अर्थ श्रीकृष्ण के मन में उन शब्दों को बोलते समय था।

SAJAN.AAWARA said...

Mam hame to bas itna hi pta hai ki kram kro or fal ki icha mat kro.....
Baki sab vidwan or bhagwan jane...;
jai hind jai bharatMam hame to bas itna hi pta hai ki kram kro or fal ki icha mat kro.....
Baki sab vidwan or bhagwan jane...;
jai hind jai bharat

JC said...

गीता सम्पूर्ण संसार के लिए है न कि केवल 'भारत' और 'भारतीयों' के लिए...
सारांस में कह सकते हैं कि मानव को दृष्टा भाव से जीने का उपदेश दिया गया है... अर्जुन के माध्यम से भी दर्शाया गया है कि हरेक को 'परम सत्य' को जानने की आवश्यकता है,,, जो अर्जुन ने 'दिव्य चक्षु' पा जाना कि मानव कर्ता नहीं है!
असली कर्ता कृष्ण है, यानि कृष्ण के विराट रूप विष्णु,,, जिनके हाथ में शंख, चक्र, गदा, पद्म हैं और जिनके हर दिशा में अनंत आँखें ओर मुख हैं (पृथ्वी अथवा अमृत शिव के सभी प्रतिरूप प्राणी!),,, जिसमें सभी 'महाभारत' अर्थात संसार के राक्षश और देवता सभी प्रवेश कर रहे थे (पृथ्वी में अंततोगत्वा सभी प्राणी मृत्यु के ग्रास बनना निश्चित है!)...
कृष्ण ने उन्हें बता दिया कि वे (ब्रह्मा के दिन के) आरम्भ से अर्जुन के साथ जुड़े थे, और जबकि अर्जुन, (एक आम आदमी समान 'अप्स्मरा पुरूष'), अपने इसी जन्म के बारे में जानता था, कृष्ण (अर्जुन कि आत्मा) उसका इतिहास आरम्भ से जानते थे! इस 'सत्य' को जान अर्जुन अपना गांडीव उठा तीर चलाने लग पड़ा! (द्वापर के 'धनुर्धर' अर्जुन, और त्रेता के राम, दोनों सूर्य के प्रतिरूप हैं, जबकि कृष्ण गैलेक्सी के केंद्र के, जो कहते हैं कि वो सूर्य और चन्द्र दोनों को प्रकाशमान करते हैं, अर्थात उनमें उपलब्ध शक्ति के स्रोत हैं!...

Vaanbhatt said...

कर्म के साथ फल को अटैच मत कीजिये...निष्काम कर्म...और क्या...ज्ञान के साथ डीटाच्मेंट तो आएगा ही...जब आप कर और फल दोनों से मुक्त हैं...क्या मस्त ज़िन्दगी होगी...परिंदों के माफिक...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मैने एक बार पढ़ने की हिम्मत की थी और सच मानिये मेरा मन संसार से उचटने लगा था. और फिर डर के मारे मैंने नहीं पढ़ी, लेकिन अब फिर पढ़ूंगा..

Vivek Jain said...

Vaanbhatt जी की टिप्पणी तो पूरा गीता ज्ञान है,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

A said...

Zeal,

I am not expert (Vidwan) but I will still give my opinion. Reading Geeta can be useful only.

To start with being afraid of failure to understand the complete thing should not stop you. You will understand. We trust you.

I don't believe any knowledge can be harmful if applied correctly. I don't agree 'half the knowledge can be dangerous'...well you get to start somewhere.

मनोज भारती said...

गीता में समस्त दर्शन समाहित हैं। गीता में कर्म,भक्ति और ज्ञान तीनों ही मार्गों से सत्य का अन्वेषण है। गीता में समग्र का ज्ञान है। जिसे हमने संसार कहा है,वह खंड-खंड है उसमें समग्रता नहीं है। समग्रता ज्ञान का परिणाम है,जिससे असार छूट जाता है और सार की उपलब्धि होती है। जिंदगी की ए,बी,सी जो सीख लेता है;उसे वैराग्य स्वभावत: मिलता है। लेकिन यह संसार से भागना नहीं है,बल्कि सत्य की सहज प्राप्ति है। अब जरा जिंदगी की ए,बी,सी को देखिए-
ए: अवेरनेस(सजगता)हमारी सजगता ही हमारे ज्ञान के विषय को विस्तृत बनाती है। जितना गहरी सजगता होगी,उतना ही बड़ा ज्ञान का वर्तुल होगा। सजगता के साथ ज्ञान का विकास होता जाता है।
बी: बिलीफ(विश्वास)हमारे विश्वास हमारे ज्ञान को बनाते हैं। विश्वास ही ज्ञान है। विश्वास सत्य होने पर सम्यक ज्ञान होता है;विश्वास गलत होने पर असत्य ज्ञान होता है। विश्वासों को अनुभव की कसौटी पर कसते रहने से उनकी परख होती है। अनुभव से जो विश्वास सत्य-तथ्य न लगे उसे छोड़ दें। आपके विश्वास ही आपके ज्ञान का आधार बनते हैं।
सी:(चॉइस)यानी चुनाव!!! जिंदगी में जो आपने चुना वह आपके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। आपकी जिंदगी आपके चुनावों का परिणाम है। जो आप चुनते हैं,वैसे आप बन जाते हैं ।

उक्त तीनों का जोड़ हमारी जिंदगी है। साधक इन तीनों चीजों में सावधानी रखता है; वह अपनी इन्द्रियों की सजगता का विकास करता है;अपने विश्वासों को निरंतर परखता है और सत्य को चुनता है। इन तीनों का सहज परिणाम होता है: (डी)डिटैचमेन्ट अर्थात् वैराग्य! यह ठीक वैसे ही है जैसे बच्चे के बड़े होने पर उसके खिलौने छूट जाते हैं या फल के वृक्ष पर पकने पर वह सहज रूप से वृक्ष से अलग हो जाता है। इसी प्रकार यदि व्यक्ति ने अपने जीवन में ज्ञान,भक्ति या कर्म मार्ग पर चलते हुए परम सत्य को प्राप्त कर लिया है(स्थितप्रज्ञता)...तो संसार उससे स्वत: छूट जाता है...वह संसार से भागता नहीं । और ऐसे व्यक्ति के जीवन में (ई)एंजायमेन्ट(आनंद)सहज ही आ जाता है। यह सहज साधना है।

गीता में इस प्रकार प्राप्त स्थितप्रज्ञता का मार्ग प्रशस्त होता है।

udaya veer singh said...

dhayi akhar prem ka padhe so pandit [gyani ]hoye"
Anubhutiyon aur samvedanaon ke dwar sakaratmakata ko swikaryata pradan karte hain ,krishn ne isi tathya ko sthapit karn ki koshish ki ..... usake bad unhone udghoshit kiya --
........tadtmanam srijamyaham .
rag & bairagy both are compliments to each other .These are the subject of intuition ,search it in innerside .../ unique zeal of search...thanks ji .

JC said...

"जहां न पहुंचे रवि / वहाँ पहुंचे कवि"...
प्रकृति कहो अथवा परम सत्य, उसने संकेत छोड़े हैं गंतव्य तक, अर्थात स्वयं तक, व्यक्ति विशेष के पहुँचने के लिए (अंतर्मुखी हो न कि बहिर्मुखी)...

किन्तु साकार की बात करें तो आप अपने पृथ्वी से अस्थायी रूप से जुड़े शरीर को रवि का प्रतिरूप मान लीजिये और आपके द्वारा उडाई जाती पतंग को आपके मन का - जो वैसे तो 'आकाश' को छू रहा है,,, किन्तु पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को नहीं भेद सकता,,, क्यूंकि हरेक पतंगबाज़ की पतंग को ऊपर उठाने की अपनी अपनी भौतिक सीमा है जो निर्भर करती है उसके पास कितना सूत है,,, उसके मांजे में अन्य अनेक उसी क्षेत्र में पतंग उड़ाने वालों के मान्जों से पेंच लड़ा उनको काटने की क्षमता है भी कि नहीं,,, आदि आदि...

और, सबसे पहले तो अभ्यास हेतु आवश्यकता है सही गुरु की, (कक्षा एक से सीढ़ी के पायदान समान बढती), जो आपकी पतंग को आपसे हवा की सही दिशा में (जो बच्चे मिटटी उड़ा जान पाते हैं, और उद्योगपति जनता की वस्तु विशेष की डिमांड अर्थात मांग को जान), धरा पर ही ले जाए,,, फिर पतंग को सही दिशा में पकडे - यानि उसका सर ऊपर और पूंछ नीचे - जिस से जब आप डोर खींचे तो वो ऊपर जाए, न कि सर के बल धरती से ही टकरा जाए!,,,

अब आपको पतंग को ठुमकी मार मार ऐसे उठाना है कि आप इमारतों, वृक्ष, बिजली/ टेलीफोन आदि के तारों के जाल से बच आकाश की ओर, वायु की सहायता से, अग्रसर हो जाए,,, फिर तो आकाश ही सीमा है,,,
किन्तु, प्रकृति अपना हाथ इस में भी दर्शाती है कि पतंग यदि बादल को भी छू जाए, अथवा वर्षा हो जाए, तो कागज़ की बनी होने से नष्ट हो जायेगी, और सारा सूत धरती की ओर गिरने लगेगा और लूटने वाले बच्चे लगभग सभी डोर लूट ले जायेंगे, केवल उतना ही बचेगा जितना आप जल्दी जल्दी खींच लेंगे!... और फिर एक नयी पतंग उड़ायें!...

ajit gupta said...

दिल्‍ली गयी हुई थी इसलिए इस पोस्‍ट पर देरी आ पायी, क्षमा करें। मैं तो केवल एक ही बात जानती हूँ कि कृष्‍ण का संदेश कर्म के प्रति है। इसलिए जो भी गीता को पढ़ता है उसे वास्‍तविक कर्म का ज्ञान होता है। यदि लोग कर्म से भागने को ही संन्‍यास कहते हैं तो उसे मैं उचित नहीं मानती।

Dinesh pareek said...

मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

Dinesh pareek said...

मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

Rakesh Kumar said...

आपने सबकी अच्छी परीक्षा ले डाली है.
क्या सच में आप गीता के वैराग्य से डरती हैं.
शिल्पा जी,वंदना जी ,सुज्ञ जी के विचार अच्छे लगे पढकर.

गीता सबसे पहले 'विषाद' को 'विषाद योग'(अध्याय १) में परिवर्तित करती है.फिर वैज्ञानिक विश्लेषण से 'सांख्य योग'(अध्याय २) के द्वारा उलझे दिमाग को सुलझा कर 'कर्मयोग'(अध्याय ३) के द्वारा जीवन को कर्म पथ पर अग्रसर करती है.कर्म से अनुभव की प्राप्ति होते हुए जब 'ज्ञान योग'(अध्याय ४) का उपार्जन होने लगता है तभी 'कर्म संन्यास योग'(अध्याय ५)हो पाता है.अर्थात उन कर्मों से छुटकारा जिनकी आवश्यकता समाप्त हो चुकी है.इसके बाद ही फिर आगे के 'योगो' की तरफ बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता जाता है.

यदि कोई बीमार(विषादग्रस्त)हो,भूख न लगती हो तो सबसे पहले उसके इलाज यानि 'विषाद योग'की आवश्यकता है.फिर विश्लेषण(सांख्य योग)के द्वारा उसे सही खान पान और भोजन करने की रीति की जानकारी की.फिर भूख लगने पर 'सही' प्रकार से उचित भोजन ग्रहण करना 'कर्मयोग' है तो भूख की समाप्ति पर भोजन का त्याग करना 'कर्म संन्यास योग' है.
यदि ऐसा नहीं करेंगें तो बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं.

'गीता' को माँ का दर्जा यूँ ही नहीं दिया गया.क्या कोई माँ अपनी संतान का बुरा चाहेगी.

JC said...

भागवदगीता का नवां (९) अध्याय 'पढ़े लिखे' अध-पके ज्ञानीयों के लिए 'परम गुह्य ज्ञान' है?
सातवाँ श्लोक वर्तमान में संभवतः अधिक लाभदायक हो (हिंदी रूपांतर नीचे दे रहा हूँ).

"हे कुन्तीपुत्र! कल्प का अंत होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ..." - ७

प्रतीक माहेश्वरी said...

गीता में यह लिखा है कि जिन माता-पिता को यह संशय है कि गीता पढने से उनके बच्चे सन्यासी हो जाएंगे. तो यह एक गलत सोच है..
गीता तो एक पथ-प्रदर्शक है अपने कर्म की ओर.. वह आपको अपने जीवन के चारों आश्रम का यथार्थपूर्ण पालन करने का यंत्र है..
और वैसे भी आपने सही लिखा है कि जो उसमें डूबेगा नहीं, उसे ज्ञान होगा नहीं.. और ज्ञान नहीं होगा तो वैराग कहाँ?

मनोज कुमार said...

गीता पर कुछ भी टिप्पणी का अधिकारी नहीं हूं।
बस मुझे यह लगता है कि इसमें जीवन मे कर्मपथ पर आगे बढ़ने का संदेश है।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

good

मनोज भारती said...

प्रतीक माहेश्वरी जी !!!गीता में यह कहीं नहीं लिखा कि गीता पढ़ने से संन्यासी हो जाएंगे...यह तो लोगों की एक गलत सोच है।

aarkay said...

गीता कर्मयोग की शिक्षा देती है . भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश हम सभी के लिए है. साथ ही गीता को किसी धर्म की संकुचित परिधि में भी नहीं बांधा जा सकता. एडविन अर्नोल्ड ने इसे "The Song Celestial " का नाम दिया है जो कि सर्वथा उचित है . यह व्यक्ति पर निर्भर है कि वह क्या ग्रहण करता है

Maestro-2011 said...

AISE DARNE SE kuchh thhoudee hi houtaa? You have nothing to FEAR than "Fear" itself. Apne happiness and unhappiness ki "Kunjee" Sirf apne haath mein houneee chahiye na!. Shab Bakhair.

anu said...

देरी के लिए क्षमा करे.....ज्ञान अपने ही मन के अंदर है.....खुद का परिवर्तन ही ज्ञान है ....
--

anu

amruta patil said...

माफ़ कीजीये, मेरा हिंदी भाषा पे प्रभुत्व नहीं है. सिर्फ इतना कहना था की आप लोगों की चर्चा सुन कर मन को बहुत ख़ुशी हुई. इन्टरनेट की दुनिया में लोगों की गहरी चर्चा करने की क्षमता बिलकुल ना के समान हो गई है. JC जी, धन्यवाद.

कविता रावत said...

bahut achha likha hai aapne..
lekin is vishay mein main yahi kahungi ki jab jiske man mein vairaag utpann hone wala hoga us samay use koi nahi rog sakta ...waise aajkal pahle jaise vairaagi milti kahan hain....
Main to yahi kahungi ki bina kisi fal kee chinta kiye geeta saar ke anusar bas apne kram path par aage badhte raho..bas...

प्रतिभा सक्सेना said...

मुझे लगता है न आसक्ति,न वैराग्य बल्कि गीता में प्रवृत्ति-परक स्वस्थ जीवन-दर्शन का प्रस्तुतीकरण है - विभिन्न मानसिकताओं के अनुसार ही .
वैसे मुंडे मुंडे मतिर्भिन्नः.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दिव्या जी ,
थोड़े शब्दों में कहें तो गीता में कर्मयोग का ज्ञान निहित है | अच्छे कर्मों में रत हों -बुरे कर्मों से विरत रहें |

Bhola-Krishna said...

दिव्या जी ,
"झंझट" जी का उपरोक्त कमेन्ट सार्थक है !हमने भी महापुरुषों से यही जाना है कि सभी सांसारिक कर्मो को अपनी पूरी दक्षता और क्षमता से करते रहना ही परम धर्म है ! दिव्या जी ,विरक्ति तो कर्म फल से लेनी है, कर्म से नहीं !
"भोला कृष्णा"

Vaanbhatt said...

आपकी विरक्ति को पढ़ा...कमेन्ट ऑप्शन ही बंद था...सो यहाँ भांज रहा हूँ...ब्लोगिंग में दिल पर लोड नहीं डालना चाहिए...ये भड़ास निकालने का एक माध्यम है...कोई पढ़ ले और उसे भी बदहजमी हो जाये...तो क्या किया जाए...उसे पूरी छूट होनी चाहिए अपनी अपच से बाहर निकालने की...हमें उसका आभारी होना चहिये की उसने कम से कम पढ़ा तो...और हमारे विचारों से उद्वेलित हुआ...तभी तो कुछ लिखा...कभी-कभी टिप्पणियां...लेख से ज्यादा मजेदार हो जातीं हैं...विरक्ति के लिए एक उम्र निर्धारित है...उम्मीद है तब तक आप इस प्रस्ताव को टालने की कृपा करेंगी...

JC said...

किन्तु 'अच्छा' / 'बुरा' हरेक के दृष्टिकोण से भिन्न भिन्न हो सकता है...
कहावत है, "जो एक का भोजन है / वो दूसरे के लिए विष है"...

इसी 'द्वैतवाद' के कारण आम आदमी संशय में रह जाता है, "करूं / न करूं ?"

और दूसरी ओर कृष्ण से जुड़ी मीरा विष पी गयी / फिर भी नहीं मरी!

(भोलानाथ शिव जी तो हलाहल / कालकूट पी गए!
सांकेतिक चित्रों में गले में सांप लटकाई दिखाए जाते हैं और माथा ठंडा रखने, और सोमरस प्रदान करने हेतु, पवित्र गंगा माता का स्रोत चन्द्रमा!)...

"बहुत कठिन है डगर पनघट की..."

ZEAL said...

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इस आलेख पर सभी ब्लौगर मित्रों के विचार से अत्यंत ज्ञानवर्धन हुआ है तथा मन में उत्पन्न संशय का समाधान भी ! आप सभी का ह्रदय से आभार !

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रक्षाबंधन के इस पावन पर्व पर अपनी सभी ब्लौगर बहनों और ब्लौगर भाइयों को प्यार, मिठाइयाँ एवं शुभकामनायें ! ईश्वर से प्रार्थना है ये स्नेह इसी तरह हमारे दिलों में पल्लवित होता रहे !

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