
मनोविज्ञान बहुत रुचता है इसलिए अकसर मेरे लेखों में मनोविज्ञान को समझने की कोशिश होती है।
प्रेम एक आकर्षण है , जो व्यक्ति के साथ हो सकता है अथवा उसके विचारों से। कभी कभी किसी के विचारों से आकर्षित होकर हम ऐसा सोचने लगते की हम अमुक व्यक्ति से प्रेम करते हैं।
व्यक्ति के वाह्य स्वरुप के प्रति आकर्षण अल्प-कालिक होता है । स्थूल सौन्दर्य घटने के साथ ही आकर्षण घटने लगता है और एक निश्चित अवधी के बाद समाप्तप्राय सा हो जाता है। कभी-कभी जिनसे हम स्नेह रखते हैं , उन्हें करीब से जानने पर ऐसा लगता है की हम दोनों में तो मूलभूत अंतर है । ऐसी अवस्था में रिश्तों की औपचारिकता बनाए रखने के साथ-साथ उनके विचारों का पूर्ण सम्मान होना चाहिए।
इसके विपरीत यदि व्यक्ति के विचारों के प्रति आकर्षण हो तो यह आकर्षण समय के साथ बढ़ता जाता है और एक दुसरे के प्रति मन में आदर-सम्मान पैदा करता है। व्यक्ति के विचार ही उसकी पहचान होते हैं। यदि हम किसी के विचार से कभी प्रभावित होते हैं , तो उन विचारों के प्रति सम्मान कभी कम नहीं होने देना चाहिए, चाहे उस व्यक्ति के साथ दूरियां कितनी ही क्यूँ न बढ़ जाएँ।
स्थूल प्रेम दिल में उत्पन्न होता है और दरारें भी दिल में ही पड़ती है। जबकि विचार मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। विचारों की सुन्दरता
, की विवेचना भी मस्तिष्क ही करता है , इसलिए प्रभावी विचारों के लिए सम्मान सतत बना रहना चाहिए। ह्रदय के विचलन से जोड़कर उन विचारों की अहमियत को कतई कम नहीं होने देना चाहिए।
दिल में स्थित व्यक्ति के प्रति अनुराग को कभी intellectualize नहीं करना चाहिए और न ही विचारों के प्रति आकर्षण को प्रेम समझने की भूल करनी चाहिए।
आज जिन्हें पढ़ती हूँ , उनके लेखों के माध्यम से अथवा टिप्पणियों के माध्यम से , उनके विचारों के प्रति मेरे मस्तिष्क में उनके प्रति एक सम्मान उत्पन्न होता है । मेरे लिए यही आकर्षण है और यही मेरा प्रेम है।
आभार ।