Friday, May 25, 2012

एक लोमड़ी ने सारे गीदड़ों को हलाकान कर रखा है...

ब्लॉग-जगत के 'बाघ' और दो-चार 'घाघ' आजकल एक लोमड़ी के पीछे पड़े हुए हैं। बेचारों को न तो मंहगाई दिखती है, न रूपए का अवमूल्यन, न ही धधकता पेट्रोल और न ही जोरू की तकलीफ।


ले- दे के बस उनके सपनों में बस वही एक 'लोमड़ी' आती है। बेचारे नाकाम आशिकों की बदहाली पर तरस आता है। जहाँ देखो वहीँ, बस लोमड़ी-पुराण खुला हुआ है। कोई भजन लिख रहा है , तो कोई उस लोमड़ी पर बोध-कथा लिख रहा है। कोई जार-बेज़ार रोये जा रहा है अपनी कविता में। लेकिन लोमड़ी मस्त है अपनी दुनिया में। दूर बैठ मुस्कुराती रहती है , इनकी तिलमिलाहट पर....


गीदड़ों की दुर्दशा देखकर बरबस ही -- नाना पाटेकर की 'यशवंत' फिल्म का एक डायलौग याद आ गया, जिसमें नाना पाटेकर कहता है -----" एक मच्छर , इंसान को हिंजड़ा बना देता है "


यहाँ इस लोमड़ी ने ही इन गीदड़ सरीखे बाघ और घाघ, दोनों को ही - - - - - - - ।


शशश श श श स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्.........


Hats off to this wise and invincible fox !


Zeal

18 comments:

विनीत कुमार सिंह said...

किसी बड़े पेंड को काटने से पहले उसके सारे टहनियों को काट देते हैं, फिर तने को और अंत में जड़ को खोद कर बहार फेंक दिया जाता है| पर शुरुवात अपने विष-रूपी बातों से जड़ को दूषित करने की करें तो जड़ तो क्या उसकी पत्तियां भी हसेंगी

दिवस said...

शानदार, जानदार, ईमानदार
क्या खूब कह दी आपने। भ्रष्टाचार चरम पर है, पैट्रोल के दाम फिर बढ़ गए, व्यापारियों ने मौके का फायदा उठाते हुए दालों के दाम भी बढ़ा दिए, हिंदुत्व खतरे में है, मुगलिस्तान बनाने की राह पर मुल्ले एकजुट हैं, सरकारी मंत्री अश्लील MMS बना रहे हैं, जातिवाद आरक्षण के चलते देश का बट्टा बैठ गया है, आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद ने जीना हराम कर रखा है, देश की 60 करोड़ जनता भूखी सोती है। यह सब मंज़ूर है इन घाघों को किन्तु लोमड़ी के नाम से इनके पिछवाड़े धुआँ छोड़ रहे हैं। सारी दुनिया की तकलीफें गयी भाड़ में, इनकी तकलीफ तो बस लोमड़ी है। ऐसी ऊटपटांग कवितायेँ लगवा कर ये अपनी ही इज्ज़त की भजिया तलवा रहे हैं। ब्लॉगिंग को पता नही क्या समझ रखा है इन बागड़ बिल्लों ने? इनकी लेखनी कभी भी सामाजिक व राष्ट्रीय अथवा हिंदुत्व के हितों पर नहीं चलती। दो कौड़ी की घटिया कवितायेँ, गंदे-भद्दे आक्षेप यहाँ-वहाँ बांटना यही उद्देश्य रह गया है इन गधों का। एक लोमड़ी(?) के नाम से इतने आतंकित हैं कि सोते-जागते, हँसते-रोते, आते-जाते, खाते-पीते, हगते-मूतते केवल एक लोमड़ी का भय सताता रहता है और समझते हैं खुद को शेर। आपने इन्हें गीदड़ तो कहा किन्तु साथ में सूअर भी कहिये। क्योंकि गीदड़ की तरह डरपोक हैं तो सूअर की तरह घिनौने और गंदे भी।
अपनी पोस्ट पर टिप्पणियों में गालियाँ ही खा रहे हैं ये सूअर+गीदड़।

Really Hats off to this wise and invincible fox !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

Shiv Kumar said...

बढ़िया लेख ...

Vivek VK Jain said...

mam, once i commented, 90% bloggers r frustrated.....u made a post on tht cmmnt.
now i dont knw about 90% but some are really frustrated,
like mr anwar zamaal ofhttp://ahsaskiparten.blogspot.in ,
another on amrendra tripath, i think he is not a student at all...ya Ph D kar rha hoga, wo bhi bakwas hai...
in sare cracks ka mujhe ni pta ki krna hai....
but aap likhte rahiye....
भ्रष्टाचार चरम पर है, पैट्रोल के दाम फिर बढ़ गए, व्यापारियों ने मौके का फायदा उठाते हुए दालों के दाम भी बढ़ा दिए,
ye bilkul sahi h....
lekin sach kahoon to yha baut jyada nhi h padhne baale
100-200 hi h, vhi jo likhte h aur cmmnts krte h...baki log shayad hi blogs par aate ho....
aur unme bhi kuchh to 'ek kamre me do duniya banaane bale log hain'

maine wo ahsas ki parten blog par dekha. poora blog hi bakwas h.

Haan, IPL me CSK final me pahuch gyi!! :)

ZEAL said...

.

विवेक जी ,
आपका कथन सत्य है, फ्रस्ट्रेशन का शिकार हो रहे कुछ ब्लॉगर्स अश्लीलता और अभद्रता की सारी हदें पार कर रहे हैं। एक- दो बार तो इनकी बेशर्मी नज़र अंदाज़ की जा सकती है , लेकिन निरंतर इनकी बढती रुग्णता का इलाज तो जरूरी हो जाता है। ये लोग स्वयं तो सकारात्मक कुछ करते नहीं , उलटे सकारात्मक लिखने वालों के मार्ग में व्यवधान उत्पन्न करते रहते हैं। इनकी गुटबाजी और गुंडागर्दी को रोकने का कोई प्रभावी हल होना चाहिए अन्यथा इनकी गन्दगी ब्लौजगत को संक्रमित कर रही है।

इन छिछोरे ब्लॉगर्स का सम्पूर्ण इलाज किया जाएगा। इनकी ये औकात तो है नहीं पुरुषों का विरोध कर सकें, इसलिए ये डरे हुए सस्ते ब्लॉगर्स अपने गिरोह के साथ मिलकर स्त्री को अपमानित करने में ही अपनी मर्दानगी समझते हैं।

लेकिन समझदारों पर इनकी असलियत अब जाहिर हो चुकी है।

देर होती है , लेकिन अंधेर नहीं होता।

.

ZEAL said...

दिवस जी ,
बहुत सही पकड़ा आपना। सबसे दुखद तो यही है की , इन छिछोरे ब्लॉगर्स की गन्दगी वाले आलेखों पर कुछ स्त्रियाँ भी वाह वाही करने पहुँच जाती हैं। ऐसी स्त्रियों को भी क्या कहा जाये । सब कुछ स्पष्ट है।

रचना said...

tumko likhtae rahena haen
taaki kehaa jaa sake


tum ho to kyaa gam haen :)

ZEAL said...

.

रचना जी ,

ये लेखनी तो अब अविराम, अनवरत चलती रहेगी। तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ तो लिखना ही है और जागरूकता लानी ही होगी जन साधारण में। --युद्ध जारी है ! चाहे वो केंद्र में बैठी सरकार हो , या फिर ब्लॉग जगत के गुंडे। दोनों को सुधारा जायेगा ।

अन्याय सहना सबसे बड़ा अन्याय है।

.

दिवस said...

इन सूअरों की पोल यहाँ भी देखिये।
http://www.diwasgaur.com/2012/05/blog-post_25.html

Bharat Bhushan said...

कई ब्लॉगर देखे हैं जिन्हें कीचड़ में उछलने में ही मज़ा आता है. उनके मुकाबले वे ब्लॉगर बेहतर हैं जो अपने ब्लॉग पर सुंदर कविताएँ लिखते हैं या लिखने का प्रयास करते हैं.
'लोमड़ी' अपने मिशन में सफल हो, 'ब्लॉग जंगल' समुदाय ऐसी कामना करता है.

Maheshwari kaneri said...

मेरी तरफ से लोमडी को शुभकामनाएं.....सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई..

Vivek VK Jain said...

@divya ji
viase vivek ji ki jagah vivek chaleg.....main aapse bahut chhota hoon. :)

elaaz ki zaroorat nhin h, unki bakwas sunne koi ni ja rha h.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

Kya karen sunvron ko keechad hee bhaata hai !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

mahendra verma said...

जिनके पास लिखने के लिए कुछ नहीं है, जिनका मस्तिष्क खाली है, वे ही ऐसा कर रहे हैं।

Vijay Kumar Sappatti said...

दिव्या , मुझे तो ये लेख पढकर बहुत मज़ा आ गया जी ... सही लिखा है ..

ये दुष्ट सजा के ही काबिल है .

वन्दना said...

हम साथ साथ हैं।