Tuesday, July 24, 2012

टॉक इन इंग्लिश ...

स्कूल बस में बैठी वह मासूम सी शिक्षिका 'मोना' खिड़की के बाहर देख रही थी। दिन भर की थकान के बाद घर पहुँच कर अपने मासूम बच्चों से मिलकर उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाने की जल्दी थी उसे। अपने ही ख्यालों में डूबी हुयी वह खिड़की के बाहर देख रही थी। बस अपनी रफ़्तार से बढ़ी चली जा रही थी। बस के अन्दर अन्य शिक्षिकाओं और स्कूल के बच्चों की आवाजें गूँज रही थीं। बच्चे भी घर जाने की ख़ुशी में मस्त , दोस्तों के साथ निश्चिन्त होकर बातें कर रहे थे। कोई चुटकुला सुना रहा था तो कोई आपस में मिलकर खेल रहा था।

सहसा नेपथ्य में कोर्डीनेटर-मैडम की आवाज़ गूँज उठी- " टॉक इन इंग्लिश" और फिर नाज़ुक गालों पर चाटों की बरसात। सहम गए मासूम बच्चे। गुनाह कर दिया था हिंदी में बात करके....

मोना सोचने लगी, कहाँ जा रहा है ये देश । अपने ही देश में जन्मे बच्चे अपनी मातृ-भाषा में बात भी नहीं कर सकते। मैकाले की शिक्षा पद्धति ने किस कदर हमें गुलाम बना लिया है।

लाचारी में उसकी आँखों से दो- बूँद आँसू टपक पड़े...

बस आगे बढ़ी जा रही थी। बच्चे के सिसकने की आवाज़ आ रही थी। अगले स्टॉप पर कोर्डीनेटर-मैडम उतर गयीं। उनके जाने के बाद मोना ने उस बच्चे को अपनी गोद में बैठा लिया। उसकी सिसकियाँ थम गयीं थीं। मोना ने उसके आँसू पोछे और उससे हिंदी में एक गीत सुनाने को कहा।

बच्चा गुनगुना उठा--- सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दोस्ताँ हमारा....

Zeal

35 comments:

expression said...

मन में गहरे पैठ गए हैं कुछ संस्कार.....
अच्छे भी....बुरे भी....

अनु

Pallavi saxena said...

अपने देश में आज हिन्दी का यही हाल है। यथार्थ का आईना दिखती बहुत ही बढ़िया कहानी है। काश इसे पढ़कर लोगों कुछ समझ सकें कुछ सीख सकें।

शालिनी कौशिक said...

bahut achchha sandesh deti kahani.aabhar.हमें आप पर गर्व है कैप्टेन लक्ष्मी सहगल

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही दुखद..

Ramakant Singh said...

pranam swikaren
प्रणाम खुबसूरत पोस्ट के लिए और आपकी लेखनी को सलाम

S.M Masum said...

"टॉक इन इंग्लिश" हमारी मजबूरी है |हिंदी अब हिन्दोस्तान में पस्ती कि निशानी समझी जाती है जबकि सभी हिन्दुस्तानी इसे बोलना पसंद करते हैं |

अर्शिया अली said...

सत्‍यता के बेहद करीब।

............
International Bloggers Conference!

Dr.NISHA MAHARANA said...

KATU SATYA HAI...

Bharat Bhushan said...

मैकाले सुधारों के बाद कपिल सिब्बलाना सुधारों का दौर आ गया है. निजी विश्वविद्यालय छा गए हैं. शिक्षा आम आदमी के हाथों से बाहर जा रही है. ऋण लो और पढ़ाई करो. गाँव के सरकारी स्कूलों में पढ़ो, सस्ता क्षम बनो. सभी विश्वविद्यालयों और राज्यों में एक सा पाठ्यक्रम लागू नहीं, हिंदी का भी नहीं. सरकार सभी नागरिकों के लिए एक समान शिक्षा का प्रबंध करने के अपने दायित्व से बच रही है. इसी सिलसिले में हिंदी की भी दुर्गति हो रही है.

रविकर फैजाबादी said...

एजेंडा सरकार का, पछुवा बहे बयार ।

संस्कृति भाषा सभ्यता, सब कुछ मिले उधार ।

सब कुछ मिले उधार, पियो घी भरा कटोरा ।

अंग्रेजी गुणगान, बके हिंदी गर छोरा ।

इक झन्नाटे दार, मैम से थप्पड़ खाता ।

माई कंट्री बेस्ट, यही फिर गीत सुनाता ।।

निर्मला कपिला said...

फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा। जय हिन्द्\

महेन्द्र मिश्र said...

भारतभूषण जी के विचारों से सहमत हूँ ... काफी अच्छा विचारणीय प्रस्तुति ... लेख अच्छा लगा ... आभार

B.P.SINGH Chandel said...

OM JI,BRTMAAN ME BHARAT KI BADI BICHITRA STHITI ,MEKALE-PADDHTI NE KR I HAI ,JISME BHRTIYA AISE RM GYE HAI ,YH BS KI GHTNA HI NAHI ,ADHIKANSH GHRO ME SUBAH HOTE HI ,MATA=PITA APNE BACHCHO KO GOOD MORNG ,HAY,HELO KAHLBATE HUYE APNE KO GAURABANWAT SAMJHTE HAI,IHA TK HI NAHI HMARE MAAN NEEY PRADHAN MNTRI DR.MMS KO SHYAD 99.99 % ENGLISH BOLTE DIKHAI DETE HAI ,SATH-SATH HINDI CHETRA KE MNTRI/SANTRI /NAUKERSHAH/CORPORATE AADI-AADI ENGLISH BONA PASHAND KAREGE ,YH BADI AZIB BAAT HAI KI HINDI JAANTE HUYE BHI HM HINDI KI 99.99% UPEKSHA KRTE DIKHAI DETE HAI ISKO BADI BIDAMBNA HI KAHA JAKTA HAI ,IS LIYE AB SAMAY AAGYA KI HAME AB MUL-CHUL BYABASTHA PARIBRTN APNE BHARTIYA PARIBESH/SANSKRITI /ADHYATM KO DEKHTE HUYE ABILAMB KRNA CHAHIYE NAHI TO PASCHNI KARAN KE KARAN BHARTIY SANSKRITIK MULYO KI SMAPTI KE SATH -SATH HINDI KA BAJUD HI SMAPT HO JAYEGA.
ATAH UTHO AUR NASHTH HOTI HUI APNI RASHTRIYA BIRASHAT KO NIRMUL HONE SE BACHAYE.

Rajesh Kumari said...

दिव्या जी आपकी पोस्ट ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया इतना कहूँगी कोवों को हंस कि चाल कि नक़ल इतनी भी नहीं करनी चाहिए कि वो अपनी चाल ही भूल जाए माना कि इंग्लिश भी बहुमुखी विकास के लिए जरूरी है फिर भी अपनी मात्र भाषा का अपमान तो नहीं करना चाहिए उसका दर्जा सब से पहले है बाकी भाषाएँ बाद में आती हैं |इतना मैं कह सकती हूँ कि मरते वक़्त इन सो काल्ड अंग्रेजों के मुख से हिंदी ही निकलेगी चाहे कोई भी शर्त लगा लो |

kshama said...

Aah!

वन्दना said...

उफ़ …………एक कटु सत्य को चित्रित कर निशब्द कर दिया और मन बेहद दुखी हुआ।

Aruna Kapoor said...

...बच्चे कितने भोले-भाले और मासूम होते है!...हिन्दी में बोलने की सजा बच्चे को मिल गई..फिर भी वह मन में बिना कोई दर् पाले हिन्दी में कविता सुना रहा है...सरे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा!

...क्या बड़े लोग, इंग्लिश के हिमायती इससे कोई सबक ले सकतें है?...बहुत सुन्दर आलेख!

somali said...

aaj ke daur ke sach ko bahut behtareen dhang se pratibimbit kiya hai aapne mam.....

Bhagat Singh Panthi said...

गलती १००% हमारी है हम अपने बच्चों को मूर्खों द्वारा पिटते हुए देख रहे हैं.

Bhagat Singh Panthi said...

गलती १००% हमारी है हम अपने बच्चों को मूर्खों द्वारा पिटते हुए देख रहे हैं.

Suresh kumar said...

Sahi baat hai aapki .esa kafi jagah ho raha hai. baccho ko marta to nahi pr jurmaana jarur laga diya jata hai ..
Jai hind.....

प्रतुल वशिष्ठ said...

इस क्षेत्र में मुझे भी काम करने का अवसर मिल रहा है...

हाल तो वही हैं जो दिव्या जी ने बयाँ किये हैं...

लेकिन अब जहाँ तक संभव होगा इस हालात को बदलने की कोशिश होगी मतलब शिक्षा बाल-रुचियों के इर्द-गिर्द घूमेगी. बच्चा प्रकृति और परिवेश से सीखेगा.

mahendra verma said...

इस लघुकथा में तथाकथित उच्च वर्ग द्वारा थोपी गई गुलाम मानसिकता को नई पीढ़ी द्वारा ढोते रहने की मजबूरी को सशक्त अभिव्यक्ति मिली है।
रूस, चीन, जापान जैसे देशों ने अपनी भाषा के बल पर उन्नति हासिल की हैं। भारत भी ऐसा कर सकता है पर केन्द्र के अफसर और नेता हिंदी के मार्ग में बहुत बड़े बाधक हैं।

शिवनाथ कुमार said...

कहते हैं कि शिक्षक के हाथों में भविष्य
सही भी है ...
पर हिंदी का भविष्य किसके हाथों में है !
सोचने को विवश करता हुआ सुंदर पोस्ट ...

Vaanbhatt said...

ये हमारा ही माद्दा है...कि फिर भी मानते हैं सारे जहाँ से अच्छा...अन्ना के आन्दोलन पर पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों भड़के हैं...सबको संसद की गरिमा और संविधान की मर्यादा याद आ गयी...

सुशील said...

हमारा चलना बोलना
बैठना खाना पहना भी
जब इंग्लिश में ही
अब सब होने लगा है
तो मैडम ने क्या गलत
बच्चे से करने को कहा है?

आमिर दुबई said...

जहाँ हिंदी हमारी भाषा है वहीँ पर इंग्लिश वक्त की जरुरत.पर आज ऐसा लगता है की हमने अपनी भाषा पर अपनी जरुरत को ज्यादा अहमियत दे दी है.तभी तो हिंदी फिल्मो में काम करने वाले अभिनेता भी ,असल जिन्दगी में इंग्लिश बोलते नज़र आते हैं.



मोहब्बत नामा
मास्टर्स टेक टिप्स

आमिर दुबई said...

जहाँ हिंदी हमारी भाषा है वहीँ पर इंग्लिश वक्त की जरुरत.पर आज ऐसा लगता है की हमने अपनी भाषा पर अपनी जरुरत को ज्यादा अहमियत दे दी है.तभी तो हिंदी फिल्मो में काम करने वाले अभिनेता भी ,असल जिन्दगी में इंग्लिश बोलते नज़र आते हैं.



मोहब्बत नामा
मास्टर्स टेक टिप्स

Bikramjit said...

But mam, 99.9% of the people who send their kids to school, THEY od their best to send thier child to a ENGLISH medium school.

Many people say this and that, BUT The same person will make sure his child goes to a best school and Feel proud when the child learns a line in english.

Majority of the people who comment on your article and have children , they themselves have probably studied in english and are sending their wards to learn english.

The problem is although hindi is national language yet all work is done in english..

and I dont think it is BAd, what is bad IS, that we are forgetting our languages .. THat is bad , hindi - punjabi - gujrati and all regional languages have taken a back seat ..


I think we as indians have become hypocrites , all of us , WE think something , DO something else , Try to show entirely something else ..

If we become True to ourself first then not just we but the whole society will do good..

What you are saying about hindi, I have the same concern for my mother tongue Punjabi, although I did have hindi as a language instead of punjabi.

Bikram's

ZEAL said...

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बिक्रम जी, अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने में कोई गुनाह नहीं है। न ही अंग्रेजी सीखने में। अंग्रेजी को हथियार बनाना चाहिए, उसे अपनी पहचान नहीं। अंग्रेजी सीखिए और उसमें लिखे लिटरेचर को भी समझिये। अंग्रेजों को पीछे छोड़ना है तो उनकी भाषा समझनी ही होगी। लेकिन अंग्रेजी सीखने के चक्कर जो लोग अपनी भाषा का तिरस्कार करते हैं , वे बहुत बड़ा गुनाह करते हैं। वे ही पाखंडी (Hypocrit) हैं। यदि माता-पिता अंग्रेजी स्कूल में अपने बच्चों को भेज रहे हैं , तो अंग्रेजी सीख लीजिये, लेकिन हिंदी बोलने पर उनके साथ इतनी क्रूरता का व्यवहार क्यों ? ज़रुरत भर अंग्रेजी आनी चाहिए, लेकिन उसे अपनी पहचान नहीं बनने देना है। हमारी पहचान और हमारी शान सिर्फ और सिर्फ 'हिंदी' ही है।

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ZEAL said...

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http://zealzen.blogspot.in/2011/01/blog-post.html

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Vivek Rastogi said...

यही होता है, जब हमारे खुद के संस्कृति के स्कूल नहीं हैं तो हमें यह भी सहना होगा । केवल बात करने से कुछ नहीं होगा, कोई कदम उठाना होगा ।

Dr. sandhya tiwari said...

यथार्थ का आईना दिखती बहुत ही सुन्दर आलेख!

sheshnath said...

It is a good laghu 'katha' full of sensitiveness. Mother tongoue ia a unavoided part of one's nature.

Bikramjit said...

I agree with what you say . BUT dont agree with that hamari pehchan sirf hindi main hai.. what about rest of the languages..

hamari pehchan hamari mother tongue main hai.. That is why india is called a secular and democratic and Diverse country because we have so much diversity in it :)

take care