Friday, August 3, 2012

अन्ना का निर्णय गलत है.

अना हजारे का राजनीति में आने का निर्णय १०० फीसदी गलत है। नयी पार्टी बनाकर वे हिन्दू वोटों को बाँट कर खंडित करेंगे। हमारी शक्ति कमज़ोर होगी। दलालों की पार्टी कांग्रेस तो चाहती ही यही है। उसकी तो चांदी हो जायेगी। क्योंकि मुल्लों को तो उसने खरीद ही रखा है। मुल्लों के वोट तो बाटेंगे नहीं , वे तो दलाल कांग्रेसियों को ही मिलेंगे। मैं अन्ना के निर्णय का पुरजोर विरोध करती हूँ। अन्ना को भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई जारी रखनी चाहिए। अनशन द्वारा जान देकर नहीं बल्कि धरना देकर , उनकी नाक में दम करके। राजनीति में उतरने का विचार त्याग दीजिये। राजनीति आपको मुद्दों से भटका देगी। पहले ही अनेक पार्टियाँ भटकी हुयी हैं । आप क्यूँ उसका हिस्सा बनना चाहते हैं ? जन नायक ही बने रहिये ना।

13 comments:

Rajesh Kumari said...

दिव्या जी आपकी बात भी अपनी जगह सही है किन्तु ये भी सच है की आज कोई भी इतनी पाक साफ़ सुद्रढ़ पार्टी कोई भी नहीं है जो इस वंशानुगत राज से पीछा छुड़ा सके अगर अन्ना जी वचन बद्धता साफ़ मंशा के साथ पार्टी बनाते हैं तो देश को कम से कम एक विकल्प तो मिल जाएगा वरना उनके आमरण अनशन ,धरने से तो सरकार के सर पर जूं तक नहीं रेंग रही है शेर को पछाड़ने के लिए रिंग में तो कूदना ही पड़ेगा

Kailash Sharma said...

अन्ना का निर्णय सिद्धांततः गलत नहीं कहा जा सकता. लेकिन राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ आयेंगी. ५०० से ऊपर ईमानदार व्यक्तियों का चुनाव में उम्मीदवार के रूप में चयन आसान नहीं होगा. अगर वे चुनाव में जीत भी गये तो क्या गारन्टी है कि वे राजनीतिक बुराइयों से अछूते रहेंगे. राजनीति में उतरने से पहले अन्ना को इन प्रश्नों पर गहन चिंतन की आवश्यकता है.

रविकर फैजाबादी said...

क्षमा करना डाक्टर-
आज मन खराब है-
बस आप सभी टिप्पणियां प्रकाशित कर दो-||

(1)
राहुल की खातिर करे, रस्ता अन्ना टीम ।
टीम-टाम होता ख़तम, जागे नीम हकीम ।

जागे नीम-हकीम, दवा भ्रष्टों को दे दी ।
पॉलिटिक्स की थीम, जलाए लंका भेदी ।

ग्यारह प्रतिशत वोट, काट कर अन्ना शातिर ।
एन डी ए को चोट, लगाएं राहुल खातिर ।।

(2)
माथा भन्नाता विकट, हजम करारी हार |
छाया सन्नाटा अटल, तम्बू-टेंट उखार |

तम्बू-टेंट उखार, खार खाए थी सत्ता |
हफ़्तों का उपवास, हिला न कोई पत्ता |

कांगरेस की जीत, निरंकुश उसे बनाए |
राजनीति की दौड़, अगर अन्ना लगवाये ||

(3)
कुलबुलाय कीड़ा-कपट, बेईमान इंसान ।
झूठ स्वयं से बोल के, छोड़ हटे मैदान |

छोड़ हटे मैदान, डटे थे बड़े शान से |
बार बार आमरण, निकाले खड्ग म्यान से |

अनशन अब बदनाम, महात्मा गांधी अन्ना |
खड्ग सिंह विश्वास, टूटता मिटी तमन्ना |

(4)
राष्ट्र कार्य करने चले, किन्तु मृत्यु भय साथ |
लगा नहीं सकते गले, फिर ओखल क्यूँ माथ ?

फिर ओखल क्यूँ माथ, माथ पर हम बैठाए |
देते पूरा साथ, हाथ हर समय बढाए |

आन्दोलन की मौत, निराशा घर घर छाई |
लोकपाल की करें, आज सब पूर्ण विदाई ||

(5)

वोटर भकुवा क्या करे, वोटर जाति-परस्त ।
बिरादरी को वोट दे, हो जाता है मस्त ।

हो जाता है मस्त, पार्टी मुखिया अपना ।
या फिर कंडीडेट, जाति का देखे सपना ।

चले लीक को छोड़, हिकारत भरी निगाहें ।
इसीलिए हैं कठिन, यहाँ सत्ता की राहें ।।

(6)

यादव-मुस्लिम की सपा, धता रही बतलाय ।
कहे राम गोपाल जी, अन्ना टीम जताय।

अन्ना टीम जताय, जमानत बच न पाए ।
अपना कंडीडेट, अगर अन्ना लडवाए |

किन्तु सफा इक बात, वोट अच्छा वह काटे |
बड़े विपक्षी वोट, यहाँ कांग्रेस हित बांटे ||

(7)

गिरगिटान कश्मीर पर, दिखलाये निज रंग ।
देखो अन्ना टीम का, बदला बदला ढंग ।

बदला बदला ढंग, चुकाया बढ़िया बदला ।
चोला बदले छद्म, बना के सबको पगला ।

भाजप राजद शरद, सपा तृण-मूल खलेगा ।
बासठ शठ दल खड़े, अब तिर-शठ भी छलेगा ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (04-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

दिवस said...

अन्ना अपने उद्देश्यों को पाने में सफल रहे। उस समय अंग्रेजों से लड़ते समय एक गांधी पनौती के रूप में आया था आज कांग्रेस से लड़ते समय एक ये नया गांधी पनौती बनकर उभरा है। पार्टी बनाकर क्या उखाड़ लेगा? वही मुल्ला तुष्टिकरण जो कांगेस करती है, कल ये करेगा। कांग्रेस पार्टी सोनिया की चमची तो अन्ना की आने वाली पार्टी अन्ना की चमची होगी। इन दोनों पर व्यक्तिवाद इतना हावी है कि देश तो कहीं दिखता ही नहीं। फिर इनमे और कांग्रेस में फर्क ही क्या रह जाएगा?

ZEAL said...

रविकर जी, आपने तो दिल का पूरा दर्द ही बयान कर दिया अपनी रचना के माध्यम से। आभार।

Bharat Bhushan said...

कल शाम तक सारा मीडिया वही कह रहा था जो आपने दोपहर तक लिख दिया था. बढ़िया.

दीर्घतमा said...

अन्ना NGO के इशारे पर काम कर रहे है ये सभी विदेशी NGO है हमारे देश के हितैसी नहीं है अन्ना इमानदार हहै इसमें कोई सक नहीं, लेकिन उसी में अरुंधती राय और प्रशांत भूषण भी है जिसे देश भक्त नहीं कहा जा सकता है देश बड़ा है या प्रशांत भूषण यह तो बिचार करना ही होगा.

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

divya jee aaj aapke bichaar se thoda ashmat hoon..kintu aapke tarkon par mgaur kiya wo bhee kafi had tak sahi hain..anna jee ko partee banana chahiye kintu uska agenda aaur ghosnapatra sarvatha bhinna hona chahiye..har pratyashi ka chayan janta kee sahbhagita se ho..aay ka bistrit byora ho..pichle paanc barshon me arjit aay ke aausat se jyada aaya uske netritva kaal me na ho...nikat ke tamam ristedaaron kee aay ka bistrit bibran bhee usme shamil ho..is pahal se hame sabse pahle banswaad se chutkaara mil jaayega..ab ham naagon se nahi lad sakte chote sapolon ke saanp banne se pahle kuchal sakte hain..aaur chori ka maal rastriy sampaa ghoshit kar sakte hain..sadar badhayee ke sath

सुबीर रावत said...

आपका कहना बिल्कुल सही है. यदि अन्ना जी सचमुच ही राजनीति में उतरते हैं तो कांग्रेस को वाक्ओवर मिलना तय है.

Mansoorali Hashmi said...

ज़रूरी नहीं कि 'रविकरजी' का अंदेशा सही निकले लेकिन उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति बड़ी सुन्दर बन पड़ी है.

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

आत्मीय स्वजन, जो कुछ हुआ वो कभी-कभी लगता है पूर्व नियोजित था। आज सुयोग से मुझे सुरेश चिपलूणकर का एक लेख पढ़ने को मिला। मैं सुरेश को नहीं जानता परंतु लेख की सारगर्भिता ने विवश किया कि उसे और लोग भी पढ़ें तो अच्छा हो। लिंक दे रहा हूं-हो सकता है आपको भी रुचे। मैं भी महसूस करता हूं कि अन्ना के बैकफुट पर आने से बड़ा नुकसान हुआ है, कम से कम अब शांतिपूर्ण आंदोलनों को निगलने में आसुरी सत्ताओं के लिए यह वरदान सदृश होगा।
​http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/04/jan-lokpal-bill-national-advisory.html

Vaanbhatt said...

अन्ना के आन्दोलन से उम्मीद थी...कि संसद अब जनता की आवाज़ पर विधेयक लाएगी...पर चुनाव लड़ कर कानून बनने की कवायद बहुत लम्बी खिंचेगी...जब देश के ईमानदार व्यक्ति सत्ता और विपक्ष दोनों के निशाने पर हैं...वहां अन्ना का ये आन्दोलन...सिर्फ इतिहास में दर्ज हो कर ना रह जाए...