Thursday, May 12, 2011

मेरे वैरागी ह्रदय द्वारा , एक स्नेह करने वाले ह्रदय का आभार

आपके स्नेह का सम्मान करने का कोई और तरीका मेरे 'वैरागी ह्रदय' को समझ नहीं आताइसलिए आपकी भावनाओं का सम्मान करते हुए इसे अपने ब्लॉग पर स्थान दे रही रही हूँआपके द्वारा व्यक्त भावनाओं से स्नेही हृदयों को प्रेरणा भी मिलेगी

-----------------------

11052011-1724

Day # 523


Dearest ZEAL

पंखी -ओ ए कलशोर कार्यो भाई , धरती ने सूरज चुम्यो

उथली ली ने सांज नो समीर आज वन -ए -वन घूम्यो

-------

पंखियो ने कलशोर किया भाई , धरती को सूरज चूमा

बहते हुए शाम का समीर आज बन -बन घुमा

The tweet and the chirp of the birds is in the air and the pre-twilight of dusk is witness to the sun kissing the earth. At such a beautiful moment the evening breeze gleefully travels through the woods causing a merry whisper of the leaves sheltering the birds nesting there for the night.

I hope it will be fine with you that I have used the Gujarati song’s opening lines. They had come instantly today morning as I read your creation and I knew I would share with you in Our Samvaad of the day.

In fact, the wish is to share the entire song [mp3] with you and I think I will do it tonight. It was indeed nice to read the post you wrote on respected father’s birthday. Touched the heart instantly and thank you for sharing the same.

It was a bit troubling to see you very sad and though I did ask you the reason thereof, however, it was not to be shared with me. I honor your decision, dearest ZEAL. Whenever you will find me worthy of sharing, you will. Till then, I bide my time.

Your compassion is very deep and sincere. It reaches out strongly – the voice of heart. I am always with you and will be so, forever. It is for you to feel so. You will never find me away.

Today, I choose to share with you a very serene song sung by Lata Mangeshkar. It is written in chaste Hindi and the lyrics are amazing. The song is incredibly soothing and at the same time, tremendously inspirational. Here it is:

Song # 337

ज्योति कलश छलके

ज्योति कलश छलके

हुए गुलाबी , लाल , सुनहरे

रंग दल बादल के

ज्योति कलश छलके


The Ewer Of Glory! That is what your hands hold। That is what you are endowed with. That is what you are in entirety. All the things around you take the beautiful hues, Sangini. You bring a sea-change in the environment with your presence!


घर आँगन वन उपवन उपवन

करती ज्योति अमृत के सिंचन

मंगल घात ढलके

ज्योति कलश छलके


Any place be it may, the home, the neighborhood, a distant land, a wilderness even. Sangini, your deeds sow the seeds of glory! You shape the things tenderly and lovingly. All who come in contact with you benefit in a way.

अम्बर कुमकुम कण बरसाए

फूल पंखुडियो पर मुस्कुराए

बिंदु तुही जल के

ज्योति कलश छलके

The Heavens shower blessings on you in form of the sprinkling of the Benedictine and the flowers seemingly bloom with a zmile at your visage. You are the crystal clear water – the Elixir Of Life, Sangini.

पात -पात बिरवा हरियाला

धरती का मच हुआ उजाला

सच सपने कल के

ज्योति कलश छलके

Your arrival at a place enlivens it and like the shoving away of a gloomy autumn, Sangini, spring follows to the place where you lay your feet upon. The earth respires, shining brilliantly to see you. The dreams do come true with your arrival. Desires of my mind to see you at our doorstep also await to experience the same magic, sweetheart.

उषा ने आँचल फैलाया

फैली सच की शीतल छाया

नीचे आँचल के

ज्योति कलश छलके

The morning rays shielded by the clouds, bring about a pleasant shade with the cover that shelters all beneath it. This is the way you take all in your refuge, comforting everyone. Sangini, all through the song, I simply behold you.

ज्योति यशोदा , धरती गैया

नील गगन गोपाल कन्हैया

श्यामल छवि झलके

ज्योति कलश छलके

This stanza takes the thought to a wonderfully esoteric level. It transcends the mundane and boldly steps onto the doorstep of Heavens! The imagery is so enticing, so profound. As if you are the Mother, the entire earth tended by you, the sky being the God Himself tending over The Chosen One. What a beautiful sight!! Can you feel what I sense, Sangini? It is beyond the capacity of words. It is an experience that will fill your heart, infuse your mind and caress your soul.

Caress is what you had mentioned in the poem, and the song that incidentally happened to be the one for today, brings me to the same thrilling feeling. Nothing could stop me from experiencing your hand in mine at this moment, Sangini!!

It is like a trance that I am in right now and I guess it is best not to say anything more. Our Samvaad of the day was thus, Sangini and thank you for making it a very lovely day. Sangini, thanks a zillion.

Semper Fidelis,

Committed for life

The Greatest Friend –

Forever – ZEAL’s

11052011-1955

Wednesday, May 11, 2011

रूह को सहलाती सुरभित समीर.....[A caressing breeze]


थम गए जिनके हाथ देते-देते , वो साथ क्या चलेंगे
ज़ख़्मी हो गया जिनका अहम् , वो मान क्या देंगे ..

हो जाओ तुम भी शामिल उस कतार में ,
जिनके लिए मेरा प्यार बरसता है ,
इस लेखनी के अंदाज़ से अंगार बरसता है ,
पास मेरे आओगे तो जल जाना तुम्हारा तय है
छुप जाओ , उस भीड़ में , जिनके लिए
मेरा प्यार , बा-अदब , बेज़ार बरसता है।

तुम तो फूलों से भी ज्यादा नाज़ुक हो , प्यार क्या करोगे
हम तो कायल हैं उन झोकों के , जो 'लोहे' को सहला कर गुज़र जाते हैं ।

Monday, May 9, 2011

चंदा ने पूछा तारों से , तारों ने पूछा हज़ारों से- "सबसे अच्छा कौन है ? --पापा--मेरे पापा ....


२० वर्ष पूर्व पिताजी द्वारा दिया गया autograph । "A message to my daughter"





आज , नौ मई को
पिताजी के जन्म-दिन पर उनकी बहुत याद रही है , इसलिए ये लेख लिख रही हूँबेटियां होना भी कितना कष्टदाई होता है कभी-कभी जो माता पिता हमें इतने कष्ट उठाकर हमें पढ़ाते लिखाते हैं , और किसी काबिल बनाते हैं , उनसे दूर हो जाना पड़ता है विवाहोपरांत जब वे बूढ़े हैं , और उन्हें हमारी सेवा की ज़रुरत होती है , तो हम लाचार और विवश , उनसे मीलों दूर बैठे हुए होते हैं , चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते सिर्फ याद कर सकते हैं
मेरे आदर्श और मेरे गुरु समान पिताजी अत्यंत optimistic व्यक्तित्व के धनी हैंजीवन भर परेशानियां झेलीं लेकिन अपने बच्चों को सदैव सुख से रखा और उच्च शिक्षा दीउनकी तनखाह से ,ज्यादा हम चारों की स्कूल की फीस थी , लेकिन जैसे तैसे बिना किसी व्यवधान के , यथाशक्ति हमें शिक्षा दिलाई , ताकि भविष्य में हमें कोई कष्ट देखना पड़े
बैंक की नौकरी में , हर तीन साल पर छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में होते स्थानान्तरण होने के बावजूद भी उन्होंने अपने परिवार को लखनऊ जैसे महानगर में रखा ताकि हमें कोई कष्ट हो जाड़ा , गर्मी और बारिश में हर सप्ताह शनिवार की रात घर आना और २४ घंटे बाद पुनः निकल पड़ना कर्म-स्थल के लिएबहुत कठिन जीवन-चर्या थी , लेकिन उस एक दिन के अवकाश में घर आते ही , बिना समय नष्ट किये हम चारों को गणित और अंग्रेजी पढ़ाते थेआज उसी पढाई की बदौलत हम कुछ बन सके
पिताजी कहा करते थे -" A single minute wasted at school means a chance of misfortune in future "...उनकी इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर , कभी समय नष्ट नहीं कियासमय का भरपूर सदुपयोग कियाहालाँकि आज जब यही बात अपने बच्चों से कहती हूँ तो वो समय की एहमियत नहीं समझते हैं
पिताजी के कुछ पसंदीदा वाक्य जो वे अक्सर कहते हैं , और फोन पर भी सुनने को मिलता रहता है - "समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता" और " जो हम आज हैं , वो कल नहीं रहेंगे", क्यूंकि बदलाव ही प्रकृति का नियम है , इसलिए सकात्माक बदलाव की तरफ सतत प्रयत्नशील रहना चाहिएपिताजी के अध्यात्मिक विचारों से इतनी प्रभावित हूँ की अक्सर मेरे लेखों में उनकी ही झलक मिलती है

सन २००७ में माँ की मृत्यु बाद से उन्होंने माता और पिता दोनों का दायित्व अपने ऊपर ले लिया है । अपने बच्चों की ही चिंता किया करते हैं, अपनी किसी भी तकलीफ को जाहिर तक नहीं होने देते। इतना भावुक होता है, एक पिता का दिल भी। एक माँ की ही तरह कोमल होता है , पिता का ह्रदय भी । आज जो कुछ भी हूँ , पिताजी के प्रयत्नों और आशीर्वाद से ही हूँ । मन में पिताजी के लिए आभार एवं कृतज्ञता है।

अपने पिताजी के जन्मदिन पर समस्त पुरुष जो पिता का धर्म निभा रहे हैं , उन्हें मेरा नमन। बेटियां कितनी भी दूर क्यूँ न चली जाएँ , सदैव अपने पापा की लाडली ही रहती हैं।

चंदा ने पूछा तारों से , तारों ने पूछा हज़ारों से-
"सबसे अच्छा कौन है ? --पापा--मेरे पापा ....
आभार

Friday, May 6, 2011

जिंदगियों में उगते खर-पतवार - [Art of weeding]

जैसे खेतों में खर पतवार उग आते है, जो फसल के लिए नुकसानदेह होते हैं और उनकी निराई की जाती है , कंप्यूटर में कुकीज़ बन जाती हैं और उन्हें समय-समय पर डिलीट करते रहना पड़ता है , ताकि सिस्टम सुचारू रूप से काम करता रहे। उसी प्रकार हमारी जिंदगियों में अक्सर अनावश्यक रूप से कुछ ऐसे लोग शामिल हो जाते हैं , जो negative vibes हम तक भेजते हैं। ऐसे लोगों को पहचानकर उनसे छुटकारा पाना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। अन्यथा वो हमारी growth को बाधित करते हैं। और हमारी उन्नति में व्यवधान उपस्थित करते हैं।

यदि हमें किसी भी क्षेत्र में विकास की राह पर अग्रसर होना है तो हमें सदैव सकारात्मक ऊर्जा [positive vibes] वाले लोगों के सानिध्य में रहना चाहिए शुभचिंतकों की यह सकारात्मक ऊर्जा हमारे लिए synergistic प्रभाव रखती है और उद्देश्य प्राप्ति में योगदान करती है।

लेकिन जिंदगियों में आने वाले नकात्मक ऊर्जा से युक्त लोगों से दूरी कैसे बनाई जाए , क्यूंकि साथ रहते रहते इनसे एक जुड़ाव भी हो जाता है प्रकृति इसमें हमारी मदद करती है। समय के साथ कुछ ऐसी सुनियोजित घटनाएं घटती हैं , जो हमारे बीच दूरियां लाती हैं जिस प्रकार हम बढती निकटता को सम्मान देते हैं , उसी प्रकार किसी कारणवश बीच में आती दूरियों को भी gracefully accept करना चाहिए। यह दूरियां किसी ईश्वरीय विधान के तहत आती हैं , जो हमारे survival के लिए किसी किसी प्रकार से शुभ ही होती है।

ये तो थी natural weeding , लेकिन कुछ सन्दर्भों में हमें स्वयं चिन्हित करना होगा , अपने विकास में बाधक लोगों को , जो हमारे उद्देश्यों की प्राप्ति में रोड़ा बनते हैं। हमारे अपमान का कारण बनते हैं और येन केन प्रकारेण हमें दुःख दे जाते हैं। ऐसे लोग कभी नफरत के कारण , पूर्वाग्रह के कारण , कभी ईर्ष्या के कारण , कभी professional rivalry के कारण तो कभी inferiority complex के चलते बढती असुरक्षा से ग्रस्त होकर हमारे इर्द-गिर्द नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाकर , हमारी शक्ति और ऊर्जा का ह्रास करते हैं।

इसलिए हमें थोडा सा निर्मोही होकर आवश्यकतानुसार , दूरी बना लेनी चाहिए इन negative vibes वालों के साथ , ताकि हम अपने शुभ प्रयोजन के साथ आगे बढ़ सकें और अपनी मंजिल पा सकें। हमारे आस पास , हमारे कारवां में , सकारात्मक ऊर्जा से युक्त शुभचिंतक ही हमें अभीष्ट की प्राप्ति में योगदान करते हैं इसलिए समय समय पर अपनी जिंदगियों में अनायास ही शामिल इन खर-पतवार रुपी नकारात्मक व्यक्तित्वों [शरारती तत्वों] की weeding [निराई/छंटाई ] करते रहना चाहिए।

आभार

Wednesday, May 4, 2011

प्रेम से उपजते शिकारी , बलात्कारी और कातिल -- (obsession)

अब प्रश्न ये है कि क्या प्रेम के कारण किसी में इस तरह के दोष भी सकते हैं ? प्रेम यदि विकृत होकर जूनून [Obsessive love] बन जाए तो व्यक्ति एक मानसिक रोगी हो जाता है जिसकी परिणति शिकारी [stalker], बलात्कारी [rapist] अथवा कातिल [murderer] में होती है।

ये मानसिक रोग हर किसी को नहीं होता ये उसे ही होगा जिसके अन्दर इसके जींस पहले से ही मौजूद होंगे। एक सामान्य व्यक्ति [स्त्री हो अथवा पुरुष] , वो आकर्षित तो हो सकता है किसी से , लेकिन जुनूनी नहीं होगा। इसके विपरीत असामान्य व्यक्तियों में ये प्रक्रिया कई चरणों में घटित होती है , जिसका उसे पता ही नहीं चलता कि कब वह जूनून [obsession] के कारण उन्माद का शिकार हो गया है। इस प्रकार के रोगी दिखने और बात करने में सामान्य लगते हैं , लेकिन ये अपनी बनायी हुयी धारणाओं से बाहर नहीं पाते और अपने जूनून में किसी प्रकार का भी गुनाह कर जाते हैं।

ये प्रक्रिया कुछ इस प्रकार से है --
  • सर्वप्रथम ये एक तीव्रता और गहनता के साथ आकर्षित होते हैं किसी के प्रति
  • फिर शीघ्र ही उसके साथ बिना compatibility का विचार किये , एक निश्चित सम्बन्ध बना लेना चाहते है।
  • बहुत possessive होने लगते हैं धीरे-धीरे।
  • इसके बाद शुरू होती है इनकी unrealistic fantasies ।
  • यहाँ से इनके अन्दर अनियंत्रित जूनून आकार लेना शुरू कर देता है।
  • यहाँ से उस निर्भर रहने कि प्रवृति वाले व्यक्ति में एक प्रकार का भय जन्म लेने लगता है। उसे लगता है कि उसका साथी उसे छोड़कर चला जाएगा , या धोखा दे देगा या फिर उससे छोड़कर किसी और को प्यार करने लगेगा ।
  • वह बहुत ही डिमांडिंग होने लगता है । उसे बार बार आश्वासन कि आवश्यकता होती है । वो साथी कि निकटता का एहसास हर पल करना चाहता है। चाहे फ़ोन द्वारा हो , चाहे पत्रों द्वारा अथवा व्यक्तिगत मुलाकातों द्वारा।
  • उसके अन्दर अविश्वास तेज़ी से पनपने लगता है और वो अवसाद [depression] का रोगी हो जाता है।
  • उसकी नाराजगी भयानक गुस्से का रूप धारण कर लेती है। उसे लगता है कि उसके साथ धोखा हो रहा है।
  • उसकी Rational बुद्धी [विवेक] , उसका साथ छोड़ देती है।
  • यहाँ पर जूनून कि इंटेंसिटी और तीव्र होने लगती है।
  • उसे लगता है कि उसका मित्र सिर्फ उसी तक सीमित होकर रहे , किसी दुसरे से मिले-जुले अथवा बात न करे। वह अपने साथी पर पूरा नियंत्रण रखना चाहता है।
  • जब साथी उसके नाजायज नियंत्रण और डिमांड को पूरा नहीं करता तब यह व्यक्ति हिंसक हो उठता है। उस पर मौखिक और शारीरिक हिंसा पर उतर आता है ।
  • इस अवस्था में obsession और भी तीव्र हो जाता है और वह व्यक्ति 'प्रेम' के बारे में सोचना नहीं बंद कर पाता। उसको पूरा पूरा attention चाहिए होता है ।
  • इस अवस्था में पहुँचने तक साथी व्यक्ति उससे अपना सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ लेता है । एवं सम्बन्ध पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं।
  • वह व्यक्ति पूरी तरह मानसिक रोग [ Obsessive compulsive disorder] कि चपेट में आ जाता है ।
  • उसे लगता है कि साथी ने उसे धोखा दिया है। फिर वह उसे हर तरह से परेशान [harass] करने लगता है।
  • बार बार उसके घर अथवा ऑफिस पर फोन करता है और उसका attention , डिमांड करता है।
  • जब attention नहीं मिलता तो हिंसक हो उठता है। अभद्र क्रिया कलापों में लिप्त हो जाता है।
  • अंतिम चरण आते आते , वह विनाश कि और अग्रसर हो चुका होता है।
  • अवसाद से ग्रस्त रहने लगता है तथा साथी को खो देने के कारण अपना आत्म-सम्मान [self esteem] भी खो देता है।
  • किसी के समझाने पर सुनता भी नहीं है ।
  • अपनी धारणाओं के प्रति जडवत हो जाता है , उसे लगता है कि वह जो सोच रहा है , वही सही है। जो भी उसे समझाने कि कोशिश करता है , वह उसे भी अपना दुश्मन समझने लगता है
  • ऐसा व्यक्ति जीवन पर्यंत शिकायतों [grudges] को अपने मन में रखता है और उसे पालता पोसता रहता है। वो अपने मन में पैदा होने वाली घृणा से नहीं लड़ पाता , चीज़ों को भुला नहीं पाता और उसकी नकारात्मकता दिन दूनी बढती जाती है।
  • वह कभी खुद को आघात पहुंचाता है और कभी खो गए साथी को अनेक प्रकार से नुकसान पहुंचाने कि कुचेष्टा करता है।
  • धीरे-धीरे वो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए , शराब, ड्रग्स , सेक्स आदि में फंस जाता है।

उसका अंत या तो आत्महत्या में होता है , या फिर वह शिकारी [stalker] , बलात्कारी[rapist] अथवा कातिल[murderer] में तब्दील हो जाता है। आजकल 'असफल प्रेमियों' द्वारा ह्त्या के बहुत से किस्से आये दिन प्रकाश में रहे हैं।

इसलिए यदि आप किसी के मित्र हैं , लेकिन वो बहुत ज्यादा डिमांडिंग हो रहा है और आप पर पूरा नियंत्रण रखने कि कोशिश कर रहा है , तो समय रहते सचेत होकर ऐसे लोगों से दूरी बना लीजिये अन्यथा ये आपकी हँसती मुस्कुराती जिंदगी को नरक समान बना देंगे। क्यूंकि 'जियो और जीने दो' क्या होता है , ये इन्हें मालूम ही नहीं होता।

आभार।

Monday, May 2, 2011

सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉगर - डॉ दिव्या श्रीवास्तव - परिकल्पना समूह

फोन पर रवीन्द्र जी का निमंत्रण मिला - " दिव्या जी , आपको सर्वश्रेष हिंदी ब्लॉगर के लिए चयनित किया गया है , ३० अप्रैल को सम्मलेन में आपकी उपस्थिति अपेक्षित है "

हे भगवान् , इतना बड़ा सम्मान , मुझ जैसे अदना ब्लॉगर को ? मेरे तो पाँव ही नहीं पड़ रहे थे ज़मी पर। खैर सज धज कर मैं सम्मलेन में पहुंची , एक से एक विद्वान् और वरिष्ठ ब्लॉगर्स के दैदीप्यमान चेहरों को देखने का अभूतपूर्व सुख मिला कुछ भी तो आभासी नहीं था। सभी तो मेरी तरह bilaterally symmetrical और emotional थे वहां पर। एक दुसरे से मिलने का सुखद सिलसिला जारी था लोगों से मिलकर कभी अधर मुस्कुराते थे तो कभी नेत्र अश्रुपूरित हो छलछला उठते थे भावुक दिव्या भावनाओं में बही जा रही थी ....

स्टेज पर सम्मान ग्रहण करने के लिए मेरा नाम पुकारा गया। सकुचाती हुयी कांपते हाथों से इतना बड़ा सम्मान ग्रहण किया ह्रदय मानो कृतज्ञता के बोझ तले दबा जा रहा था। अनेक तेस्वीरें खिंच गयीं। कुछ मुस्कुराते हुए , कुछ लजाते हुए , कुछ तस्वीरों में तो गालों पर छलकी लाली भी बखूबी कैद हो गयी

अजय कुमार झा जी ने बेहतरीन तसवीरें लीं हमारी और वादा भी किया की शीघ्र ही कूरियर से भेजेंगे मुझे ताकि मैं उन तस्वीरों को अपने इस लेख पर लगा सकूँ।

अब बधाई देने वालों का तातां लग गया ...

  • समीर लाल जी आये , बोले --" दिव्या बधाई हो , तुम ही असली हक़दार हो इस पुरस्कार की "
  • निर्मला कपिला जी बोलीं - " दिव्या मुझे गर्व हैं तुम पर , शुभकामनाएं "
  • डॉ अरुणा कपूर जी ने ह्रदय से लगा लिया , उनके नेत्रों में प्रेम के अश्रु थे
  • रश्मि प्रभा जी ने मधुर शब्दों में बधाई दी
  • अजित गुप्ता जी आयीं - गर्मजोशी से मेरी पीठ ठोकी , " ये हुयी कोई बात दिव्या -बधाई"
  • शोभना चौरे जी ने अश्रुपूरित नयनों से अंक में भर लिया - "बहुत खुश हूँ दिव्या , गर्व है तुम पर"
  • वाणी जी आयीं , बोलीं -" आनंद गया-बधाई "
  • सदा जी चहकती हुयी आयीं - "दोस्त हो तो दिव्या जैसी , सखियों का नाम रौशन कर दिया"
  • अनूप शुक्ल जी आये , मुस्कुराकर बोले - " बहुत खूब " --मुझे लगा कमेन्ट कट-पेस्ट हो गया है।
  • LA से जगन जी आये , मुस्कुराए और बोले - " You genuinely deserve this award "
  • रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी आशीर्वाद स्वरुप सर पर हाथ फेरा और बहुत आशीष दिया
  • आशीष जी आये , बोले - " मैं कहता था , तुम ही इस सम्मान की असली हक़दार हो "
  • प्रतुल जी बोले - "बहिन , मुझे गर्व है तुम पर "
  • अचानक मेरी निगाह कोने में खड़े एक छोटे से समूह पड़ी , उस समूह में खड़े विद्वान् ब्लॉगर्स को देखकर सहम गयी , उनकी निगाहें मानों कह रही थीं -" इस मूर्ख को किसने चयनित किया है " --
  • मुझे सहमा हुआ देखकर सुज्ञ जी गए , बोले - " डरना मना है , जो डर गया वो मर गया "
  • तभी सतीश सक्सेना जी नज़र आये , मुस्कुराए और बोले - "आशीर्वाद एवं शुभकामनायें डॉ दिव्या "
  • फिर डॉ रूपेश और संजय कटानवणे साथ साथ नज़र आये , इससे पहले की डॉ रुपेश कुछ कह पाते , संजय जी बोलेआपने अभी तक मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया , फिर आपको ये सम्मान आखिर दिया किसने
  • "भूषण जी दूर बैठे मुस्कुरा रहे थे
  • अचानक ब्लॉगर-डाक्टरों का दल निकट आया , डॉ अमर बोले -" अरे सारे ढंग-तरीके के बिलागर मर गए थे क्या जो दिव्या को पुरस्कार थमा दिया ?" ...फिर मुस्कुराए और बधाई दी
  • aarkay जी हर्षातिरेक से भावुक थे अपनी दिव्या के लिए ।

मेरी निगाहें किसी को तलाश रहीं थीं , तभी राधिका टपकी , बोली - " दिव्या अब ज्यादा खुश होना बंद करो , चलो जल्दी चलो " मैंने कहा रुको , थोड़ी देर बाद चलेंगे , मुझे यहाँ अच्छा लग रहा है

लेकिन राधिका नहीं मानी , मुझे जोर-जोर से खींचने लगी गुस्से में बोली- " तुम्हें खयाली पुलाव बनाने की आदत सी पड़ गयी है "

हडबडाहट में मेरी आँख खुल गयी , देखा पतिदेव मुझे हिला-हिला कर जगा रहे थे , बोले "जल्दी उठो देर हो रही है , बच्चों के लिए टिफिन तैयार कर दो , वैन आने वाली है "

मैंने कहा - " प्रियतम , आपसे मेरा थोडा भी सुख नहीं देखा जाता , इतना मीठा स्वप्न देख रही थी ...."

वे बोले - " इसमें नया क्या है , तुम तो रोज ही सपना देखती हो की ओबामा ने तुम्हें भोज पर आमंत्रित किया है अब बस भी करो मुंगेरीलाल की तरह हसीन सपने देखना। इस तरह के सपने देखने से कोई लाभ होने वाला नहीं है।"

क्या करती धीमी आवाज़ में बोली - " स्वामी , यह एक सकारात्मक स्वप्न था , इसे कहते हैं 'Stress management' "

आभार

लोग तिलमिलाते क्यूँ है ? -- एक विश्लेषण .

नित्य प्रतिदिन आस-पास के परिवेश में लोगों को बात-बात पर तिलमिलाते हुए देखती हूँ , कहीं संसद में विवाद उठ खड़ा होता है और लोग गली गलौज पर उतर आते हैं , कहीं रेल-यात्रा करते समय भड़क उठते हैं और सहयात्री को रेल के बाहर धक्का दे देते हैं , कहीं किसी स्कूल की टीचर अथवा प्रिंसिपल, मासूम बच्चों को कठोर सजा देते हैं तो कहीं तीसरी मंजिल से नीचे धक्का दे देते हैं।

कहीं ससुराल में तिलमिलाई जनता एक स्त्री को आग के हवाले कर देती है। कहीं गुस्से से तमतमाया पति , पत्नी पर हाथ उठा बैठता है। कहीं अति-क्षुब्ध हुयी माता , फूलों से नाज़ुक बच्चों को फटकार देती है , कहीं आफिस में होती साजिश पर तिलमिलाते लोग तो कहीं सत्ता के ठेकेदारों से तिलमिलाई हुयी जनता।

सबसे बढ़कर तिलमिलाना देखा ब्लौगिंग के क्षेत्र में काफी निकट से हस्तियों की तिलमिलाहट देखने को मिली। कहीं तिलमिलाकर लोग अनर्गल प्रलाप करते हैं टिप्पणियों में तो कहीं ऐसे लेख ही लिख डालते हैं जिससे दूसरे की छवि को नुकसान पहुंचे।

इस तरह तिलमिलाकर लेखन कर्म वही लोग करते हैं , जिनके अन्दर अहंकार ज्यादा होता है और वे उस अहंकार पर नियंत्रण नहीं रख पाते यही अहंकार उनके अनियंत्रित क्रोध का कारण बनता है और इसी क्रोधाग्नि में जलकर कब वे अपना सर्वस्व नष्ट कर लेते हैं , उन्हें पता ही नहीं चलता। इस तरह से तिलमिलाए हुए लोग समाज में उपहास का पात्र भी बन जाते हैं। लोग उनकी तिलमिलाहट का भी भरपूर आनंद उठाते हैं और कुछ ऐसा शगूफा छोड़ देते हैं जिससे तिलमिलाया हुआ व्यक्ति क्रोधवश अपने संस्कारों , शिक्षा, संयम और भाषा पर से नियंत्रण खो बैठता है एक निश्चित स्तर से भी बहुत नीचे गिर जाता है। और अनर्गल प्रलाप करके उपहास का पात्र बनता है।

किसी भी परिस्थिति में यदि विवेक का इस्तेमाल किया जाए तो तिलमिलाहट नहीं होगी। प्रतिद्वंदी तो हर क्षेत्र में होते हैं उनपर विजय पाने के लिए सूझ-बूझ ज्यादा काम आती है , भाषाई निम्नता नहीं।

एक तिलमिलाया हुआ व्यक्ति 'विवेकशून्य' हो जाता है सही गलत का निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है इन विपरीत परिस्थितियों में वह गलत लोगों के साथ गुटबाजी में भी फंस जाता है। उसके कमज़ोर क्षणों में शातिर तत्व आकर उसे भड़काते हैं और व्यक्ति का स्वविवेक समाप्तप्राय हो जाता है। तिलमिलाहट के वशीभूत होकर लोग वाद को विवाद में परिवर्तित कर देते हैं। यदि अहंकार पर नियंत्रण होगा तो विवाद कभी भी उपस्थित नहीं होंगे। चर्चा स्वस्थ होगी एवं सकारात्मक परिणाम आयेंगे।

ईष्या , दोष और मोह को यदि स्वयं पर हावी होने दिया जाए तो तिलमिलाहट कभी नहीं होगी। प्रतिशोध की अग्नि में जलते लोग स्वयं ही अपनी उन्नति में बाधक होते हैं। अपनी सारी ताकत वे दूसरों के विनाश करने में ही लगा देते हैं , इसलिए कोई सृजनात्मक कार्य नहीं कर पाते। ऐसे लोग जो बात-बात पर तिलमिला जाते हैं वे समाज के लिए अनुपयोगी होते हैं।

समाज के हित में लगे हुए लोगों को संयमी , शांतिप्रिय और प्रगतिशील लोगों के सानिद्ध्य में रहना चाहिए। असामाजिक तत्वों की तिलमिलाहट से तटस्थ रहते हुए अपने सुन्दर उद्देश्यों के साथ परहित में सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए।

क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो स्वयं को भस्म करती है स्वयं पर संयम रखकर और विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने अहंकार को जीतकर ही इस तिलमिलाहट से निजात पायी जा सकती है।

आभार