Wednesday, July 14, 2010

ये रोना -धोना बंद करो - खुद पर गर्व करना सीखो !

कब तक रोती रहोगी?,
भीख मांगती रहोगी?

मुझे सामान अधिकार चाहिए ..
मुझे बराबरी चाहिए..
मुझे नौकरी करनी है..
मैं भ्रूण हत्या नहीं कराऊंगी..
मैं इस दहेज़ लोभी से शादी नहीं करुँगी ..
मैं अकेले मंदिर जा सकती हूँ..
मुझे भी pilot बनना है ..

अरे तो बनो न , रोका किसने है? क्यूँ मुफ्त में बेचारे पति को बदनाम करती हो ? सास को भी बिना जुर्म की सजा दिलाती हो?

"नाच न आये आँगन टेढ़ा !"

अरे भाई खुद में दम है तो करके दिखा दो ! पति भी तुम्हारी उपलब्धियों से खुश होगा ! फख्र से तुम्हारा ज़िक्र करेगा अपने दोस्तों से ! उसका भी मान बढ़ता है , तुम्हारी शान से !

लेकिन तुम जब रोती हो , उदास होती हो , शिकायक करती हो , आंसू बहाती हो तो तुम्हारी बहनें जिन्होंने मेहनत से इस जहान में अपनी जगह बनाई है वो लज्जित होती हैं !

मिलो अपनी बहनों से -

किरण बेदी
कल्पना चावला
सुनीता
इंदिरा गाँधी
प्रतिभा पाटिल
लता मंगेशकर
पी टी उषा
ऐश्वर्या राय
सोनिया गाँधी
शबाना आज़मी
मायावती
ममता बनर्जी
डॉक्टर कल्याणी
डॉक्टर चन्द्रावती

क्या इतने नाम काफी नहीं?

महिलाओं को अपनी आदत बदलनी होगी ! सहानुभूति की भीख से बचो ! अपनी मागदर्शक खुद बनो ! जब एक जैसा माँ-बाप ने पाला , तो फिर तुम कमतर कैसे हो सकती हो?

एक जैसा अन्न खाती हो , फिर कमज़ोर भला कैसे हो सकती हो?

सदियों से चली आ रही दासता से मुक्त हो जाओ ! अपना attitude बदलो ! अपनी मानसिकता को बदलो ! अपनी इज्ज़त आप करना सीखो फिर ज़माना खुद-ब-खुद आपकी इज्ज़त करने लगेगा !

जब तक हम ज़माने से बदलने की फ़रियाद करते रहेंगे , कुछ नहीं बदलेगा ! कोशिश करो खुद में साहस और हिम्मत लाने की, आगे बढ़ने की , फिर आगे-आगे चलने की ! फिर देखना आदत पड़ जाएगी मुस्कुराने की ! अपने आप पर गर्व करने की !

" Gradually winning becomes our habit ."

आज समय आ गया है की हम अपने भटके हुए भाइयों को सही राह दिखायें ! सम्मान के नाम पर जो अपनी बहनों को मार कर अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं, हम उन्हें सही राह दिखा सकते हैं। आज समय है की हम अपनी स्त्री शक्ति को पहचाने और समाज के उत्थान में योगदान करें !

अपने को कमतर समझना और समाज से उम्मीद करना की हमे बेहतर समझे , ये हमारी नादानी है !

आज समय के साथ, समाज बहुत बदल गया है ! हम शुक्र गुज़ार हैं की हम एक बेहतर समाज में जी रहे हैं। पहले 'सती-प्रथा' थी , जो आज इतिहास बन गयी है ! क्या ये बदलाव नहीं है?

चाँद पे पुरुष पहुंचा, तो औरत भी ! क्या ये बदलाव नहीं है?

पुरुष, एक देश सम्हाल सकता है तो क्या हमारी बहनें नहीं संभाल रही ? क्या ये बदलाव नहीं है?

बदलाव की मांग मत करो , खुद को बदलो ! आखिर बदलाव चाहते किस्से हैं? कौन देगा हमे परिवर्तन? हम खुद ही इस समाज का हिस्सा हैं , हम बदल सकते हैं अपने समाज को!

जो बदलाव आया है वो स्त्री और पुरुष दोनों की व्यवहारिक सोच बदलने से संभव हुआ है ! हम दोनों हाथों से इस बदलाव का स्वागत करते हैं !

" खुदी को कर बुलंद इतना की,
खुदा बन्दे से पूछे , बता तेरी रज़ा क्या है? "
.

108 comments:

वाणी गीत said...

बदलाव की मांग मत करो , खुद को बदलो ! आखिर बदलाव चाहते किस्से हैं? कौन देगा हमे परिवर्तन? हम खुद ही इस समाज का हिस्सा हैं , हम बदल सकते हैं अपने समाज को!

जो बदलाव आया है वो स्त्री और पुरुष दोनों की व्यवहारिक सोच बदलने से संभव हुआ है ! हम दोनों हाथों से इस बदलाव का स्वागत करते हैं !

yahi to ...!!

शोभना चौरे said...

दिव्याजी
यही तो है असली आवाज |बहुत बढिया पोस्ट |बहुत बदलाव हुए है और होंगे |
हमे सिर्फ सिर्फ और सिर्फ सोच बदलने की है दरकार है
अपनी शक्ति को पहचानने का समय आ गया है |
हम होंगे कामयाब हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास पुरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन .......

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच, ओजस्वी और हिला देने वाली पोस्ट।
................
पॉल बाबा का रहस्य।
आपकी प्रोफाइल कमेंट खा रही है?.

girish pankaj said...

sundar aur sahasik vichar. prerak bhi hai nariyon ke liye. aapko samarpit do sher.
sundar komal kali ladakiyaan
hoti aksar bhali ladkiyaan
mat baandhon pairon mey bandhan
antariksh ko chalee ladkiyaan.

डॉ टी एस दराल said...

इनमे एक नाम और जोड़ दिया जाए --डॉ दिव्या ।
बहुत साहसी और सामयिक पोस्ट लिखी है दिव्या जी ।
बधाई।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सहज पके सो मीठा होय! प्रयास जारी रहें, सतत हों, संयुक्त हों, तो परिवर्तन हो के रहेगा, शायद मायावती को छोडकर, ऊपर जितने भी नाम हैं, उनकी प्रगति मैं उनके अपने श्रम के साथ-साथ उनके परिवार और परिस्थितियों का बहुत बडा योगदान रहा है.

S.M.MAsum said...

पुरुष नौकरी करे , घेर आ के आराम करे, औरत नौकरी भी करे, बच्चे भी पैदा करे, उनको दूध भी पिलाए, घेर मैं खाना भी पकाए. यह क्या ज़ुल्म नहीं? लेकिन यह ज़ुल्म कर कौन रहा है?

Avinash Chandra said...

bahut badhiya..ekdam jordar likha hai Divya ji.

You deserve a high five on this :)
Keep the spirit high

सम्वेदना के स्वर said...

बिल्कुल सही फरमाया… ख़ुद पर रहम खाना बंद करने की ज़रूरत है... दरसल बदलाव तो ये भी है कि अगर कोई औरत ज़ात को नीचा दिखाना चाहता है तो इसमें उसका इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स ज़्यादा दिखाई देता है… बजाए इसके के एक बड़ी लाइन खींचें, लोग औरत नाम वाली लाइन को छोटा कर ख़ुद को बड़ा साबित करने में लग जाते हैं... ज़रूरत यह समझने की है कि चाँद पर थूकने वाले के चेहरे पर ही थूक गिरता है...एक नया नज़रिया दिव्या!! शाबाश!!!

Arvind Mishra said...

यह एक साकारात्मक आह्वान है -लोगों को रोज रोज का रोना धोना छोड़कर सचमुच समाज की बेहतरी में योगदान के लिए जुट जाना चाहिए ...
आपने एक सकारात्मक पहल की है -क्या ही अच्छा होता अगर सभी ऐसे ही उत्साह और बिना पूर्वाग्रहों के समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझे और सर्वजन के सरोकारों से जुड़ें -निजी जीवन की रुदाली के बजाय कुछ सार्थक करें!

VICHAAR SHOONYA said...

स्त्रियों को संबोधित लेख पर ११ में से सिर्फ दो कोमेंट महिलाओं के बाकि सब कोमेंट पुरुषों के . क्या बात है.

प्रवीण पाण्डेय said...

इतना ओजस्वी संवाद पढ़ आनन्द आ गया।

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

This is a post which is so full of positivity that there can't be any non-concurrence here.

A society in which women are really treated as equals is always better off on every front. It is not that women cry on their fate by their choice.

Often situations are such that despite their will, they have to clip their ambition, postpone pursuing their dreams.

You represent a very select section of women who are extremely well-endowed with the passion to bring about the change.

You are indeed the true Trail-blazer, a genuine leader of the masses. To borrow Barack Obama's words as a contextual reference about your immense prowess for success, I would say with utmost confidence - I Have A Dream.

The force of your belief, the sincerity in your effort, the rock-solid confidence sets you apart from the rest.

The FIRE in you about FREEDOM reminds me of this powerful song of Independence which I somehow relate to your words

Kyaa Hind kaa zindaa kaanp rahaa hain
Kyaa goonj rahi hai taqbire
Uktaaye hain shaayad kuchh qaidi
Aur tod rahe hain zanzire

[Zindaa : Prison; Taqbire : Battle Cries)

Diwaaro ke niche aa-aakar
Yun jama huye hain zindaani
Sino mein talaatum bijli kaa
Aakho mein jhalakti shamshire

[Zindaani = Captives; Talaatum = Darkness; Shamshire = Swords]

Kyaa unko khabar thi hotho par
Jo Mohre lagaayaa karte thay
Ik roz isi khaamoshi se
Tapkegi dahakti takrire

[Mohre = Seals (of disapproval and sanctions); Takrire = Fierce Oratory]

Sambhaalo ke wo zindaa goonj uthaa
Jhapto ke wo qaidi chhut gaye
Uttho ke wo baithi diwaare
Daudo ke wo tooti zanzire

Just in case you wish to, hear is the link to it. It is Song # 10 on the page.

http://mohib.net/blog/2007/03/jagjit-singh-kahkashan-part-two/

Congratulations once again, on a Blazing Blog.


Arth kaa
Natmastak charansparsh

डा० अमर कुमार said...
This comment has been removed by the author.
boletobindas said...

बाह दिव्या जी। वाह वाह वाह वाह करने का मन कर रहा है सिर्फ।
पोस्ट खोलते ही दिल खुश हो गया। पूरी पोस्ट हिंदी में देखकर दिल कैसे खुश हुआ बयान नहीं कर सकता। और जो बात मैं अक्सर महिला मित्रों से कहता हूं उसे आपने अक्षरशः लिख दिया है। यही मैं कहते कहते कई नारिवादियों के निशाने पर आ गया हूं। जिनका कहना होता है कि आप क्या जाने महिलाओं का दर्द। बधाई बधाई ऐसा पोस्ट लिखने के लिए। पूरी पोस्ट हिंदी मे लिखने के लिए एक बार फिर बधाई। लिखा कीजिए हिंदी में भी अक्सर।

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक!!

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

विनोद कुमार पांडेय said...

आत्मविश्वास से ओत-प्रोत एक बढ़िया प्रस्तुति....आलेख अच्छा लगा..धन्यवाद दिव्या जी

MUFLIS said...

bahut hi asardaar aalekh bn padaa hai...
aandolit kar paane mei salsham hai
abhivaadan svikaareiN .

मो सम कौन ? said...

ऐसा लेखन चलता रहे, कहीं तो कुछ न कुछ असर होगा ही।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

मायावती के अलावा बाकी सबके बारे में मैं आपसे सहमत हूँ ...
वैसे आपने सही लिखा है कि रोते रहने से कुछ नहीं होगा ... यदि समाज को बदलना है तो सबसे पहले खुदको बदलना है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सटीक आवाहन....जब तक स्त्री स्वयं स्त्री के उत्थान के बारे में नहीं सोचेगीं बदलाव आ भी नहीं सकता....

DR. PAWAN K MISHRA said...

u represent the voice of women

Himanshu Mohan said...

पूरी-पूरी पोस्ट हिन्दी में? मौलिक भी, अच्छी भी और विवेकपूर्ण भी।
आह्वान और प्रेरणा से भरपूर।
बहुत-बहुत बधाई।
समय ज़्यादा लगता होगा अभी, मगर प्रयास स्तुत्य है।
मैं यहाँ भी यही कहना चाहता हूँ - कि सहज रहना - न कमतर समझना ख़ुद को - न झूठे दम्भ में रहना - बड़प्पन की निशानी यही है।
मैं अक्सर कहता रहता हूँ - कि नारी को समानता नहीं, अपने स्थान के लिए प्रयास करना चाहिए। नारी का नारीत्व स्वयं में अतिगौरवमय है - और पूर्ण भी।
बधाई! दोनों हाथों से स्वागत है।
:)

दिगम्बर नासवा said...

सबसे पहला बदलाव तो औरतों को लाना है ..... वो है .... खुद को दूसरी औरत का मित्र मानना .... आज भी बहुत से अत्याचार औरतों द्वारा ही औरतों पर किया जाते हैं ... और ये बदलाव खुद वो ही ला सकतीं हैं अपने अंदर ...

पवन धीमान said...

बहुत ही सार्थक और सामयिक ..बधाई.

अमित शर्मा said...

@बदलाव की मांग मत करो , खुद को बदलो ! आखिर बदलाव चाहते किस्से हैं? कौन देगा हमे परिवर्तन? हम खुद ही इस समाज का हिस्सा हैं , हम बदल सकते हैं अपने समाज को!



लेकिन नारी को खुद को ही नहीं पता की उसे जाना किधर है, महिला-पुरुष बराबरी के नाम पे नारी क्या खुद ही पुरुष को श्रेष्ठ नहीं घोषित कर रही है उसकी हर बात की नक़ल को ही असली आजादी मानकर . क्योंकि अनुसरण तो उसीका किया जाता है जिसको हम ऊँचा माने . अब नारी खुद ही नारीत्व को हीन माने तो पुरुष बिचारे का क्या दोष की अपने पुरुषत्व के मद में नारी को हीन समझे .क्योंकि नारी ही तो खुद इस बात का बढावा खुद दे रही है.
एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ

ashish said...

बढ़िया पोस्ट. विद्वान ब्लोग्गेर्स बहुत कुछ लिख चुके है. आपके लेखनी का ये तेवर पसंद आया.

Manoj Bharti said...

एक सही नजरिया ।

अरे तो बनो न , रोका किसने है? क्यूँ मुफ्त में बेचारे पति को बदनाम करती हो ? सास को भी बिना जुर्म की सजा दिलाती हो?

पंकज मिश्रा said...

बहुत साहसी पोस्ट है दिव्या जी। तेवर पसंद आया।
बधाई।
पहले खुद को बदलना है ... सही है.

sanu shukla said...

सकारात्मक पोस्ट...!!

Anonymous said...

First be friends with woman around you so that they read you more . just read what vicharshunya has said

Shraddha said...

bhahut badhia laga padh kar.

Divya said...

@ annonymous,

I believe in equality. I have risen above gender. whatever i do , i do without any bias.

I have commented on each and every female blogger's post including, Dr Aruna, Rashmi prabha, rachna dixit, vandana, Shikha , Nirmala kapila, Vani, Rashmi Ravija, Ajit Gupta, Shobhana chaure, Mukti, Sadhna, Saumya, Ada, asha, Harshita and many more...

Only they know what stops them to visit my blog.

It is their misfortune , not mine.

I cannot go on begging to them. Those who are friendly they regularly visit my blog .

If some females do not want to visit my blog, then it is their choice and freedom.

I comment on their blogs but i cannot force them to read my posts.

an old saying goes thus--

" You can take the horse to the pond but you cannot make it drink"

regards,

ajit gupta said...

आज लगा कि कुछ बात बनी। अभी यही बात सोच रही थी और इस पोस्‍ट पर नजर पड़ी। पता नहीं कैसे छूट गयी थी? मैं हमेशा यही लिखती हूँ कि हम शोषित नहीं हैं। हम माँ है हमने पुरुष को जन्‍म दिया है। आपने जो सूची दी है उसके आगे भी ऐसी बहुत लम्‍बी सूची है जिन्‍होंने बिना किसी सहयोग के अपने झण्‍डे गाडे हैं। मुझे तो उन पर तरस आता है जो महिला को शोषित बताता है। भारत की नारी तो प्रारम्‍भ से ही कालिदास को बनाती रही हैं और आज तक बना रही हैं। बहुत अच्‍छा आलेख, बधाई।

sajid said...

बढ़िया पोस्ट...

राजकुमार सोनी said...

इसे कहते हैं अच्छी पोस्ट
एकदम झन्नाटेदार
बहुत हो अब ये लो वाला अन्दाज
पोस्ट को पढ़कर लगा क्रिकेट का कोई प्रशंसक अपने अपने प्रिय खिलाड़ी से चौके की उम्मीद कर रहा था लेकिन खिलाड़ी ने एक ने चार चौके जड़ दिए.
वाकई मजा आ गया. बोले तो झकास

संगीता पुरी said...

बदलाव की मांग मत करो , खुद को बदलो ! आखिर बदलाव चाहते किस्से हैं? कौन देगा हमे परिवर्तन? हम खुद ही इस समाज का हिस्सा हैं , हम बदल सकते हैं अपने समाज को!
क्‍या बात है !!

Anonymous said...

इसके बाद जो भी लिखा है वह मुझे समझ नहीं आया, की आखिर माजरा क्या है? मुझ जैसे कई हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, कृपया हिंदी में लिखें.

अंग्रेजी के भारतीय झंडाबरदार समझते हैं की सभी इनकी तरह अँगरेज़ हैं. या हिंदी ब्लॉग में भी अंग्रेजी लिखने से अच्छा रौब पड़ता है, लोग आपको ज्यादा महत्त्व देते हैं?

Anonymous said...

उपरवाली टिप्पणी
मैं एक भारतीय नारी हूँ-- आप और क्या जानना चाहते हैं?
के लिए है. गलती से यहाँ लग गई. पर फिर भी बात वाही है की भारतीय पुरुष और भारतीय नारी भारतीय भाषा को प्राथमिकता दें, आखिर जिनतक आप बात पहुंचा रही हैं वे भी तो भारतीय हैं, और उन्हें अंग्रेजी भले कम आती हो या न आती हो पर हिंदी अवश्य आती है.

Divya said...

@ anonymous-

Educate yourself !

How long will you crib that you do not know English ?

अजय कुमार said...

उत्साह और ऊर्जा से भरपूर रचना ,बधाई ।

Sanjeet Tripathi said...

divya jee, bas aakhiri se pahle wala comment dekha ki jisme aap kinhi anonymous sahab ko daant rahi hain ki " @ anonymous-

Educate yourself !

How long will you crib that you do not know English ? "

dar-asal mai to puri khushi ke sath ispost ko padh raha tha ki aapne pahli baar koi post puri hindi me likhi hai... lekin is anonymoous ke javab par comment me aapka javab dekh kar mann khinn ho gaya, so mai bhi jata hu pahle apne aap ko educate kar ke aata hu english ke mamle me taki lambe samay taki ye shikayat lambe samay tak na kar saku k mujhe hindi nahi aati. kal likhta hu is mudde par blog me. shukriya hindi ki maang karne wale ko aise jhidkne ke liye.....

डा० अमर कुमार said...
This comment has been removed by the author.
Divya said...

संजीत त्रिपाठी जी,

आपको मुझसे बहुत कष्ट है ऐसा लगता है। आपने कभी भी मेरे लेखन और विचार को नहीं सराहा। हमेशा मुझपर व्यक्तिगत कमेन्ट किया।

हम तो समय के साथ लगातार बदल रहे हैं । टिप्पणीकर्ता से लेखिका बन गए। इंग्लिश में लिखते थे , हिंदी में लिखना शुरू कर दिया। समय के साथ लगातार सीख रही हूँ। लेकिन आपने इस बदलाव को भी नहीं सराहा।

अभी ठीक से अंग्रेजी सीख भी नहीं पाई थी की हिंदी विरोधी होने का दाग लगा दिया गया। अपनी राष्ट्रभाषा से प्यार है , इसको प्रमाडित करने के लिए हिंदी में लिखना शुरू कर दिया। लेकिन आक्षेपों का कोई अंत नहीं है।

पाठकों की ख़ुशी के लिए ही हिंदी में लिख रही हूँ। और मैं भी खुश हूँ। शायद आपसे कम प्यार मुझे नहीं है मात्रभाषा / राष्ट्रभाषा से।

संजीत जी आप जैसे पाठकों से मेरा मन अवसाद से भर गया है । जो विषय पर टिपण्णी न करके , लेखक या लेखिका का मनोबल तोड़ने के लिए व्यक्तिगत आक्षेप करते हैं।

आप हिंदी की सेवा कर रहे हैं , अच्छी बात है। लेकिन इसके लिए आप मेरा बार-बार अपमान करते हैं मेरे ही ब्लॉग पर आकर, ये अच्छी बात नहीं है।

अगर आपको अच्छी हिंदी पढनी हो अमरेन्द्र के ब्लॉग पर जाइये, उनहोंने हिंदी में पी एच डी, की है। वहां आपको हिंदी और अवधी में अच्छी सामग्री मिलेगी पढने को।

मैं आपकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकती , इसलिए आपसे क्षमा मांगती हूँ।
.

Divya said...

@ Dr. Amar,

This is the misfortune of our country.

sigh !

Dr.J.P.Tiwari said...

लेकिन मूल रूप में इस प्रश्न पर नारी जगत को ही सोचना होगा. हित उनका किसमे है? कहाँ है? उन्हें चाहिए क्या? मिल क्या रहा? और नारी मुक्ति आन्दोलन धारा, सशक्तिकरण के नाम पर किधर जा रहा? हमें और भी गर्व होगा, यदि इन्हीं की भांति भारतीय संस्कृति की सम्वाहिकाएं ही संसद में बैठे; ३३ % नहीं भाई, ५०% की संख्या में बैठे. परन्तु अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित और संरक्षित रखें. "अर्ध-नारीश्वर" की सत्ता में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति में, पुरुष और नारी का भेद कहाँ - "नारी पुरुष पुरुष सब नारी, सब एको पुरुष मुरारी".
Reply
Forward
yuggarima is not available to chat

Divya said...

@--"अर्ध-नारीश्वर" की सत्ता में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति में, पुरुष और नारी का भेद कहाँ - "नारी पुरुष पुरुष सब नारी, सब एको पुरुष मुरारी"...

Dr. J P Tiwari,

बहुत सही बात कही आपने , यही तो समझना है हमें ! एक-एक नारी यदि खुद को सक्षम करती चले तो नारी-सशक्तिकरण खुद ही हो जायेगा !

और ऐसा हो भी रहा है !

जनसँख्या इतनी ज्यादा है इसलिए समय तो लगेगा ही , लेकिन अब दिल्ली दूर नहीं !

Gourav Agrawal said...

दिव्या जीजी
या तो घणी चोखी पोस्ट छ और बिलाग भी घनो चोखो छ
असा बिलाग तो राजस्थानी में ही चोखा लागे , म्हारी अरज भी सुनजो
थां तो राजस्थानी में ही लिख्या करो :))

Gourav Agrawal said...

सच में बहुत अच्छी पोस्ट है और टाइटल से ही पता लग रहा है "ये रोना -धोना बंद करो - खुद पर गर्व करना सीखो !"

मेरा मानना है की ... अपने आप को पीड़ित मानने से ( चाहे हो या नहीं ) उस वर्ग से जुड़ी आने वाली पीढीयाँ या तो दब्बू स्वभाव की हो जाती है या बेवजह की क्रांति दिमाग में भर लेती है , दोनों ही परिस्थितिया भयानक हैं , लाभकारी तो बिलकुल नहीं

इस पोस्ट के लिए धन्यवाद

ऊपर मेरे भाषा परिवर्तन के आग्रह को सीरियसली मत लीजियेगा:))

Divya said...

Gaurav ji,

aaj hi se rajasthaani seekni shuru kar rahi hun....jaldi hi prakashit karungi.

lekin rajasthani gujjaron se darr lagta hai...kahin spelling mistake ho gayee to?

Sanjeet Tripathi said...

दिव्या जी,

मुझे आपसे कोई कष्ट नहीं। आपके लेखन और विचारों को सराहा नहीं शब्दों के माध्यम से, लेकिन मेरा लौट-लौट कर आपके ब्लॉग पर आना
यही साबित करता है कि यह सराहना ही है।

ब्यक्तिगट कमेंट नहीं किया कभी, सिर्फ भाषा के मुद्दे पर किया हमेशा।

हां, यह देखता आया हूं कि आप समय के साथ बदलीं हैं। टिप्पणीकर्ता से ब्लॉगर बन गईं। यह होता ही है। अधिकांश ब्लॉगर पहले सिर्फ पाठक होते हैं पढ़ते पढ़ते ही अपना ब्लॉग बना लेते हैं।
क्या हम किसी की इस बात को सराहें कि वह अपनी ही मातृभाषा/राष्ट्रभाषा में लिख रहा है?
यह तो होना ही चाहिए न?

मेरे जैसे पाठकों से आपका मन अवसाद से भर गया……
बतौर लेखक/लेखिका आलोचनाओं के लिए तो तैयार रहना ही होगा न? ब्लॉग भले ही एक डायरी कही जाए लेकिन है तो सार्वजनिक, जो पढ़ेगा वह कमेंट तो करेगा।

मैं कोई हिंदी की सेवा का उद्घोष नहीं कर रहा न ही करता। मैने आपका अपमान किया है ऐसा आपको प्रतीत होता है तो मुआफी। अगर
अगर किसी भारतीय/ हिंदी भाषा के जानकार से हिंदी में लिखे जाने की मांग करना अपमान है तो मुआफी।

अमरेंद्र जी और बहुतेरे ब्लॉग हैं जिन्होंने भाषा पर पीएचडी की हो या न की हो लेकिन सामग्री अच्छी मिलती है।
सामग्री आपके ब्लॉग की भी अच्छी है इसलिए ही आपसे हिंदी में लिखे जाने की मांग करता आया हूं।

सबसे मूल बात यह कि इस उपरोक्त पोस्ट को आपने आज पूरे तौर पर हिंदी में कर दिया। कल यह आधी अंग्रेजी में थी इसीलिए ही
उपर किसी ने आपसे कहा कि इसे हिंदी में लिखने कहा,

उस पर आपका जवाब क्या था, मैं फिर से दुहराता हूं,
"@ anonymous-

Educate yourself !

How long will you crib that you do not know English ? "

अब ये बताइए यहां पर कौन किसका अपमान कर रहा है?
क्या यह लहजा अपमान का नहीं?


बस यही कारण था कि मैने पहले इतनी लंबी और कड़ी टिप्पणी की। और अभी यह प्रतिटिप्पणी भी।

आज आपका ब्लॉग देखकर खुशी हुई कि अब पोस्ट हिंदी में हैं।
एक बात और, जब हम लेखन के क्षेत्र में आते हैं तो आलोचनाओं को व्यक्तिगत अपमान नहीं मानना चाहिए। यह हमारा अहं ही प्रदर्शित करता है और कुछ नहीं।

अंत में फिर एक बार और मुआफी, इस बात के साथ कि मैं कोई हिंदी सेवा का उद्घोष करता नहीं फिरता। बस मुझे प्यार है हिंदी से।

Divya said...

.
Sanjeet ji,

aalochna vishay ki kijiye , lekhak ya lekhika ki nahi.

dhanyawaad.

Divya said...

waise aalochna se jyada protsahan ki awashyakta hoti hai,

Divya said...

sanjeet,

Do not comment as anonymous in future. Is that clear?

Sanjeet Tripathi said...

दिव्या जी,
आलोचना लेखक या लेखिका की की ही नहीं गई है। आपकी व्यक्तिगत आलोचना वही करेगा जो आपको जानता होगा,
आपसे परिचित होगा। मैं नहीं जानता आपको।

हां आलोचना से ज्यादा प्रोत्साहन जरुरी होता है। हिंदी में लिखिए, प्रोत्साहन से लेकर मदद भी करने वाले मिलेंगे ब्लॉगजगत में।

और हां एनॉनिमस कमेंट करने की जरुरत मुझे आज तक नहीं पड़ी।
शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी।
मैं तो पहले से ही क्लीयर हूं, आप भी हो जाएं।

Gourav Agrawal said...

बेनामी कमेन्ट करने वाले के सम्मान की इतनी चिंता और नामधारी लेखक के सम्मान (प्रोत्साहन) की बिलकुल नहीं
आश्चर्यजनक

Divya said...

.
संजीत जी ,

आप जीत गए ... मैं हार गयी !

आप अपनी जीत की ख़ुशी मना सकते हैं।

मैं अपनी हार स्वीकार करती हूँ

आप खुश रहिये !
.

Sanjeet Tripathi said...

इसलिए गौरव जी कि बात हिंदी की है जो कि मुझसे, लेखक से या आपसे और इन एनॉनिमस साहब/ साहिबा से भी बड़ी है।
नहीं?

Divya said...

Gaurav,

I am proud of you. Be my brother in all my births.

I was thinking how the people watch the free shows, when a man comes to humiliate a woman in public.

Women are surviving because we have brothers like you, who's blood boil when they see their sisters being insulted like this.

Thanks Bhai.

Gourav Agrawal said...

संजीत जी
कोई भाषा.... किसी भावना से बड़ी हो सकती है ?? ये तो सिर्फ विभाजन है , अंग्रेज कहेंगे मेरी भाषा बड़ी है , हम कहेंगे हिंदी

सोचिये ....

द्रश्य ०१
विवेकानंद शिकागो में हिंदी में बोल रहे हैं (और आधे लोग समझ रहे हैं, बाकी बस चेरा निहार रहे हैं )

अब सोचिये

द्रश्य ०2
विवेकानंद शिकागो में अंग्रेजी में बोल रहे हैं

आपको बेहतर क्या लगता है ज्ञान या भाषा ???

Gourav Agrawal said...

जैसे पानी पर लकीर खीचने भर से वो विभाजित नहीं हो जाता वैसे ही आप भाषा पर लकीर नहीं खीच सकते
अगर भावना सच्ची है तो अंग्रेज को भी भगवन दर्शन देंगे और अगर झूठी है भारतीय कितने ही मन्त्र पढ़ ले भगवन तो सब जानते हैं
इसीलिए कहा जाता है भगवान् भावना से मोहित होते हैं
मानव भी ब्रम्ह ही होता है , बस ये छोटे मोटे विभाजन की इच्छा से वह मानव बना रह जाता है

Sanjeet Tripathi said...

ओह-ओह, दिव्या जी, बात को कहां से कहां ले जा रही हैं, सार्वजनिक रुप से महिला उत्पीड़न???

त्राहिमाम देवी त्राहिमाम्।

गौरव जी, बात वही है विवेकानंद जी भी हिंदी में क्यों बोले थे आप जानते ही हैं। अगर ज्ञान आधारित बात करें जैसा कि आप कह रहे हैं तो विवेकानंद जी भी अंग्रेजी में ही बोलते वहां।

खैर, दिव्या जी बात को किसी और अर्थ में ले जा रही हैं। इसलिए बात ही खत्म करता हूं अब।

Gourav Agrawal said...

typing mistake

"चेरा निहार रहे हैं"
को
"चेहरा निहार रहे हैं" पढ़े

Gourav Agrawal said...

तो विवेकानंद जी भी अंग्रेजी में ही बोलते वहां। ??

i just don't understand ??

Gourav Agrawal said...

@ .... जैसा कि आप कह रहे हैं तो विवेकानंद जी भी अंग्रेजी में ही बोलते वहां।

मित्र संजीत,
मैं आपकी बात नहीं समझ पा रहा हूँ

Gourav Agrawal said...

बात यहीं समाप्त करते हैं , अंत में बस यही कहूँगा की मुझे लगता है की अगर हमें हिंदी को बड़ा बताना है ( मेरा भी यही उद्देश्य है ) तो हमें अंग्रेजी भी सीखनी ही होगी ( और अन्य सभी विदेशी भाषाएँ जितनी संभव हों ) अब इसे मजबूरी समझे या रचनात्मकता वैसे भी भाषा तो स्टेटिक होती है मस्तिष्क डायनेमिक (सीखने की दृष्टि से ) होता है . मैं तो उसी दिन से अंग्रेजी को सामान महत्त्व देता हूँ जब से विवेकानंद जी की बातों को अंगेजी में पढ़ा है , अगर वो भी पूरा हिंदी में बोल आते तो आज पता नहीं लोग हमें ( देश और धर्म दोनों को ) पता नहीं किस स्तर पर मानते या समझते

Gourav Agrawal said...

@ दिव्या जी
अगले जन्म में आप जापानी भाषा में ब्लॉग लिखने की कोशिश कीजियेगा :))

Divya said...

Gaurav,

Ye chhoti-moti mushkilein mujhe mere marg se vimukh nahi kar saktein.

When we dream big, then we should be prepared for such trivialities.

I am focused at my vision. Few good people are with me always.

The weeds will perish with the passage of time.

I believe in..

Survival of the fittest !

सर्वोत्तम की उत्तरजीविता !

.

ashish said...

आश्चर्य होता है की इस ब्लॉग दुनिया के लोग जोकि आपने आप को लेखक बोलते है और हमारे जैसे सामान्य पाठको को कुछ सिख देने के बाते करते है वो कैसे एक छोटी से बात , हिंदी अंग्रेजी पर बिना मतलब की बहस में अपनी उर्जा खोते है जो की उन्हें समाज के बेहतरी पर खर्च करना चाहिए. अगर लेखिका अपने आप की आंग्ल भाषा में ठीक से संप्रेषित कर सकती है तो उसमे क्या बुराई है?? कुछ लोग हिंदी के तथाकथि देकेदार बनकर बस ये दर्शाना चाहते है की वो हिंदी के सच्चे सेवक है लेकिन उनके बच्चे कॉन्वेंट में पढ़ते है. मुझे लगता है उनके बच्चे भी उनको पापा या डैड नहीं बाबूजी बुलाते होगे. इस बेसिर पैर की बातो को केवल हिंदी के सेवक कहलाने के लिए, अमल में लाना, मेरा हिसाब से मूर्खतापूर्ण है. मै गौरव अग्रवाल से सहमत हूँ.

Gourav Agrawal said...

@ सर्वोत्तम की उत्तरजीविता !
सहमत हूँ आपसे
एक बार फिर से वही बात "भाषा परिवर्तन की बात को सीरियसली मत लीजियेगा " लिखना भूल गया :))

I am so proud of you as well

Gourav Agrawal said...

@Be my brother in all my births.

इस पर अपनी भावना व्यक्त करने के लिए किसी भी भाषा में शब्द नहीं मिल रहे
क्या किया जाये ??
जो भी शब्द हैं वो थोड़े अपर्याप्त से लग रहे हैं (कभी कभी डिक्शनरी छोटी पड़ जाती है )
सारे शब्द आँखों से पानी बन के बाहर आते हैं , कभी कम कम कभी ज्यादा ( पता नहीं कौनसी भाषा के होते है या आंसू )

Gourav Agrawal said...

thanks a lot ashish ji

Divya said...

@ Ashish ,

Glad to read your views. I still believe earth has more wonderful people as compared to the mean ones.

Am thankful for your kind support.

Now i firmly believe that i will succeed in my mission to do something good and worthwhile.

With the support and encouragement of nice people like you , mountains can be moved easily.

Thanks .

Divya said...

@-सारे शब्द आँखों से पानी बन के बाहर आते हैं , कभी कम कम कभी ज्यादा ( पता नहीं कौनसी भाषा के होते है या आंसू ) ..

Gaurav,

This is called language of-

-Love
-care
-concern
-affection
-faith
-equality
-humanity
-modesty

and so on...

antakshari said...

दिव्याजी, बहुत खूब
यह तो मानना ही पडेगा कि आपने अपनी बातों को पंच देने के लिए जगह-जगह पैराग्राफ का जोरदार प्रयोग किया है लेकिन हवा-हवा में आप क्या कह गयीं, कुछ पल्ले नहीं पड़ा ! कुछ टिप्पणीकारों ने लिखा, 'सर्वोत्तम की उत्तरजीविता' ! उनका भी प्रयास शायद इस दफा निरर्थक ही जाएगा क्योंकि आप यह स्पष्ट करने में असफल रही हैं कि आपका आह्वान किन महिलाओं के लिए है? किसे आप आत्मविस्श्वास से ओत-प्रोत करना चाहती हैं? क्या बेंगलूर या जालंधर की वह युवती किरण बेदी का नाम सुनकर ही आत्मविश्वास से लबरेज हो जायेगी जिसको अपने शराबी पति का कोटा पूरा करने के लिए दर्जी की दुकानों में कटु परिस्थितियाँ सहकर भी दैनिक काम करना पड़ता है? कभी बात करें उस वर्ग की युवतियों, महिलाओं से ! आपकी आँखें खुल जाएँगी क्योंकि प्रकृति ने उन्हें स्वाभाविक रूप से इतना मज़बूत बनाया है कि किरण बेदी, लता मंगेशकर और कई सफलतम महिलाएं उनके आगे खुद को बौनी महसूस करने लगें! इन युवतियों और महिलाओं की आँखों में अपने जीवन का निर्माण स्वतः करने की जो ज्वाला दिखती है, उसे आपने देखा होता तो आपका जीवन यह दो कौड़ी का आह्वान लिखने से अधिक सार्थक होता! आप तो क्या, जो मर्द खुद को स्वतः निर्मित मानते हैं, वे भी इनके सामने नत-मस्तक हो जाएं! भला इनके लिए किसी आह्वान की ज़रुरत ही कहाँ है? यदि आह्वान की ज़रुरत है तो संसद जाकर हंगामा बरपाने वाली महिलाओं को है! क्या उन तक आपकी आवाज़ पहुंचेगी?

आपमें आत्मविश्वास हो तो इस बात का जवाब दें कि आपका पोस्ट किसके लिए है?

Divya said...

.
अन्ताक्षरी जी,

मेरा ये लेख संमाज की हर महिला और पुरुष को संबोधित है। जो लोग मुझे पढ़ रहे हैं, ये उनकी नैतिक जिम्मेदारी है की वो इस बात को , जहाँ तक संभव हो ,जन जन तक पहुचाएं। और उन्हें आत्मनिर्भर और जागरूक होने में मदद करें। मैं खुद भी इस कार्य को यथा संभव करती हूँ। बहुतों का भला हुआ है, और कुछ और का भी हो जायेगा।

मेरी तरह यही प्रत्येक इकाई कोशिश करे तो संमाज की बहुत सी महिलाओं का उद्धार हो सकेगा ! जो महिला एवं पुरुष समर्थ हैं, वो अपने से कमतर लोगों को संबल प्रदान कर समर्थ बना सकते हैं।

जिन महिलाओं का आपने जिक्र किया है , उनकी तेजस्विता को नमन करती हूँ।

हर कोई किसी न किसी से प्रेरणा लेता है । मेरी प्रेरणा का स्रोत किरण बेदी और बहुत सी जागरूक महिलाएं हैं।

मैं बहुत समर्थ तो नहीं हूँ। लेकिन जितना मुझसे संभव है, उतना प्रयास कर रही हूँ। आखिर कोशिश करना ही तो हमारे हाथ में है। मेरा लेख , मेरी एक छोटी सी 'कोशिश' है।

मुझे लगता है ऐसी छोटी छोटी कोशिशें संमाज का उत्थान कर सकती हैं। कहतें हैं न - "बिंदु-बिंदु से सिन्धु बना है"

आपने कहा की मैंने हवा में लिखा जो आपको समझ नहीं आया- इसके लिए आपसे क्षमाप्रार्थी हूँ। लिखना वास्तव में नहीं आता। इसीलिए संकोचवश अभी तक नहीं लिखती थी ।

कोशिश करुँगी बेहतर लिख सकूँ , जो सुग्राह्य हो तथा समाज के हित में हो ।
.

Gourav Agrawal said...

@क्या बेंगलूर या जालंधर की वह युवती किरण बेदी का नाम सुनकर ही आत्मविश्वास से लबरेज हो जायेगी जिसको अपने शराबी पति का कोटा पूरा करने के लिए दर्जी की दुकानों में कटु परिस्थितियाँ सहकर भी दैनिक काम करना पड़ता है?

ये नाम बड़े बड़े लगते होंगे ..पर मित्र जीवन के हर स्तर पर वैसा ही तनाव झेलना पड़ता है (अभी तनाव नापने के लिए कोई पैमाना नहीं बना है ना इसलिए ऐसा कह रहा हूँ ) अब ये बात अलग है हर किसी को अपना तनाव बड़ा लगता है ......किसी को शराबी पति का ...किसी को ऑफिस का .... किसी को बिजनेस का
अब किसका तनाव या तकलीफ बड़ी है ये तो इश्वर ही जाने .. अब ये बात भी देखने वाली होगी की किस महिला का नाम लिया जाये जिसे कोई जानता भी न हो , वो मशहूर भी हो

Gourav Agrawal said...

@आपमें आत्मविश्वास हो तो इस बात का जवाब दें कि आपका पोस्ट किसके लिए है

ये नेगेटिव कमेन्ट करके आपने किस वर्ग के पक्ष में काम किया है मित्र ??

Gourav Agrawal said...

@इन युवतियों और महिलाओं की आँखों में अपने जीवन का निर्माण स्वतः करने की जो ज्वाला दिखती है, उसे आपने देखा होता तो आपका जीवन यह दो कौड़ी का आह्वान लिखने से अधिक सार्थक होता
अब मुझे ये बताइये अगर आप को ये आव्हान दो कौड़ी का लगता है तो इसे सौ कौड़ी का कैसे बनाया जाये ये बताने की जगह आप
बस एक नेगेटिव कमेन्ट करके पता नहीं कौनसी संतुष्टि प्राप्त कर रहे हैं ???
अगर इस आव्हान की कीमत दौ कौड़ी है तो इस कमेन्ट की भी कीमत बताइये मित्र , क्योंकि मुझे अभी ये हिसाब किताब आता नहीं है ठीक से

Gourav Agrawal said...

कहते हैं गांधी ने राजा हरिश्चंद्र पर एक नाटक देखा और उन्होंने फैसला किया की वो हमेशा सच बोलेंगे , अब उस हरिश्चंद्र का अभिनय करने वाले को क्या पता था की उसका अभिनय कहीं किसी महा पुरुष का निर्माण कर रहा है पर मुझे पूरी उम्मीद है उस समय वो बड़ी तल्लीनता से अभिनय कर रहा होगा .. ईसलिए हम सभी को अपने काम में लगे रहना चहिये बिना ये सोचे की इसका कितना कम या ज्यादा फर्क पड़ेगा .. और अगर किसी की दिशा सही न लग रही हो तो उसे सलाह देने में भे कोई बुराई नहीं हो सकता हैं सलाह देने वाले को ही नयी दिशा मिल जाये या दोनों को

Gourav Agrawal said...

वैसे "मछली जल की रानी है..." लिखना कैसा रहेगा ??
या
"नन्हा मुन्ना राही हूँ .. देश का सिपाही हूँ" ???

मुझे ये समझ में नहीं आता इस आव्हान से तकलीफ किस किस वर्ग को और क्यों है ??
चलिए आप ही बताएं क्या किया जाना चाहिए मित्र

Gourav Agrawal said...

@अन्ताक्षरी,
मित्र मैं आपका विरोध नहीं कर रहा हूँ आप से एक सीधा सा प्रश्न पूछ रहा हूँ
ब्लॉग पर ऐसा क्या लिखा जाये जो ज्यादा सार्थक हो ज्यादा प्रेरक और प्रेक्टिकल हो आप अवश्य बताएं

आपके विचारों का स्वागत है

Gourav Agrawal said...

स्पष्टीकरण : ये जरूरी नहीं है की दिव्या जी के विचार मेरे विचारों से मेल करते हों (जब तक वो स्वयं न कह दें )

Gourav Agrawal said...

@दिव्या जी
मैं तो इस विभाजन से बड़ा व्यथित हूँ
कभी महिला ब्लोगर / पुरुष ब्लोगर
कभी हिंदी ब्लोगर / नॉन हिंदी ब्लोगर
अब ये नया विभाजन है .... ये वाला महिलाओं के बीच ही है
शराबी पति वाली महिलाऐं / बिना शराबी पति वाली महिलाएं

Divya said...

@-वैसे "मछली जल की रानी है..." लिखना कैसा रहेगा ??
या
"नन्हा मुन्ना राही हूँ .. देश का सिपाही हूँ" ???

shaandar kataksh !

Gourav Agrawal said...

@ दिव्या जी
मेरा तो ब्लोगिंग से मन उठता जा रहा है

Divya said...

Gaurav ji,

logon ka vyaktitva ubhar kar saamne aa raha hai.

hume madad milegi samaaj sudhaarne mein.

aise log hi to disha nirdeshan karte hain.

waise har ek ka apna prayojan hota hai...kuchh log yahan sirf popular hone hi aa jate hain.

Divya said...

गौरव जी ,

सत्य की विजय होने दीजिये। विजयदशमी मनायेंगे । लड़ते रहना ही भागवद गीता का उपदेश है ।

निराश होने की जरूरत नहीं है !

Gourav Agrawal said...

अब समझ में आता है अर्जुन की व्यथा क्या रही होगी
ये सब अपने ही तो हैं .... इनसे युद्ध (शब्दों का) करके क्या फायदा, मैं हथियार (शब्दों के) क्यों न डाल दूँ
इन अपनों (देशवासियों) पर कटाक्ष करके (या ऐसा किया ये महसूस होने पर) अपना ही दिल चीरा हुआ महसूस होता है
इश्वर करे सब एक दूसरे का विरोध करने के स्थान पर सहयोग दें ( सलाह के रूप में ही सही )

Gourav Agrawal said...

@hume madad milegi samaaj sudhaarne mein.

इश्वर हमारी पुकार सुन ले

Divya said...

@ Gaurav ,

Hathiyaar uthaane ke baad, hathiyaar dale nahi jate.

sarfaroshi ki tammanna....

Gourav Agrawal said...

मित्रों
हो सके तो सहयोग दो , सलाह दो , निर्देश दो , विचार विमर्श करो..
विचार दो ही भागों में विभाजित हो सकते हैं सकारात्मक या नकारात्मक
हो सके तो कुछ ऐसा प्रयास करो की सकारात्मक वातावरण बन जाए

बस इतनी ही विनती है
धन्यवाद

Gourav Agrawal said...

@Hathiyaar uthaane ke baad, hathiyaar dale nahi jate.

बिलकुल ठीक कहा है
फिर भी एक अपील तो जरूरी है दिव्या जी
शायद किसी का अपनापन जाग जाए
हर दिल में रब रहता है ....हो सकता है ...दूसरे की पुकार सुन ले

Suresh Chiplunkar said...

Excellent... 95 कमेण्ट्स!!!! क्या ब्ब्बात है… छा गईं आप :)

प्रतुल कहानीवाला said...

कलम-कुल में भी हुई कलह!
................सुधामय सुविचारों की लय
................हुई तो फ़ैल गई अतिशय
................गंध, मलयाचल से जैसे
................चली आई हो मरुत-मौन.

................सभी को भली लगी लेकिन
................कुछों ने मुख टेड़ा कर लिया
................कहा — हम इन्द्रजीत हैं और
................हमीं ने गंधी को भेजा.

Divya said...

प्रतुल जी , शुक्रिया !

यही है... यही है...यही है रंग रूप !
ये जीवन है...
इस जीवन का...
यही है रंग रूप ..

संजय भास्कर said...

बिल्कुल सही फरमाया… ख़ुद पर रहम खाना बंद करने की ज़रूरत है

संजय भास्कर said...

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

Century yet again!

Wonderful performance.

Extremely proud of your success.


Arth kaa
Natmastak charansparsh

Divya said...

Hi Arth,

I am fortunate to have many well wishers.

Thanks to you and all.

dr. ashok priyaranjan said...

अच्छा लिखा है आपने। विषय का विवेचन और भाषिक संवेदना प्रभावित करती है।
मेरे ब्लाग पर राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के संदर्भ में अपील है। उसे पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया देकर बताएं कि राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने की दिशा में और क्या प्रयास किए जाएं।
मेरा ब्लाग है-
http://www.ashokvichar.blogspot.com

Devi Chand said...

Khudi kar Buland itna ke khuda bhi aakar puche bata tere razaa kya hai

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