Wednesday, July 21, 2010

आयुर्वेद


समाज में चिकित्सा की इन तीन पद्धतियों के बीच इतना सौतेला व्यवहार क्यूँ?

आयुर्वेद का प्रादुर्भाव, जो हमारे वेदों में भी वर्णित है , जिसके द्वारा देवों की भी चिकित्सा की जाती थी , वह ब्रम्हा जी के मुख से सृष्टि के समय हुआ। आज जिस आर्गन ट्रांसप्लांट को खोजा गया , वह युगों पूर्व ayuevedic सर्जन सुश्रुत द्वारा प्रक्टिस में था। बनारस विश्विद्यालय में चिकित्सा विभाग में सुश्रुत की प्रतिमा देख-कर ये जिज्ञासा हुई , तो जानकारी हासिल हुई की सुश्रुत ही ' father of surgery ' तथा धन्वन्तरी ' father of medicine ' हैं ।

यदि इंजीनियरिंग में विश्वकर्मा को इंजीनियरिंग का जन्मदाता कहा गया तो किसी को आपति नहीं हुई। १७ सितम्बर को बिना किसी व्यथा के लोग 'विश्वकर्मा पूजा ' मनाते हैं।

धन्वन्तरी जो समुद्र मंथन से निकने तथा काय चिकित्सा को जन्म दिया, लोग उस चिकित्सा, तथा तथ्यों को वेदों में लिखे मिथ [myth ] तथा कहानियां समझते हैं।

आज एड्स [AIDS] जैसे घातक बीमारियाँ भी आयुर्वेद में वर्णित हैं। कांजुन्क्टिवितिस [conjunctivitis] जैसी १९ वि शताब्दी के रोग आयुर्वेद में युगों पूर्व वर्णित हैं , जिनका निदान तथा चिकित्सा भी सदियों पहले लिखी जा चुकी है।

आज बाबा रामदेव योग के जरिये तक़रीबन ५० देशों में इलाज कर रहे हैं। ये अष्टांग योग भी तो , आयुर्वेद का ही हिस्सा है।

पथरी जैसे लाइलाज रोग भी होम्योपैथ से बिना किसी शल्य चिकित्सा के सुविधा से ठीक हो जाते हैं।

मेरी एक मित्र को गाल ब्लैडर स्टोन [cholelithiasis ] ,था जिसकी मोटाई १३.५ mm थी ! Leproscopy की राय को ठुकराकर उन्होंने distance healing का सहारा लिया । आज वह पूर्णतया स्वस्थ हैं।

पिताजी को BPH [ Benign prostatic hyperplasia] था . उन्होंने होम्योपैथ चिकित्सा से दोनों को ठीक कर लिया । वह अब केवल Diabetes से पीड़ित हैं क्यूंकि उसमे एलोपैथ की गोलियां चबाते हैं।

१९९६ में ऐसा जौंडिस [Jaundice] इतना फैला था की लोगों का बिलीरूबिन लेवल २० तक पहुँच गया। लिवर की कोई सार्थक दवा एलोपैथ में न होने के कारण , लोगों का ताँता लग गया आयुर्वेद विभाग में। हमारे ताऊ जी की अत्यंत नाजुक स्थिति थी, लेकिन वह भी आयुर्वेद की चिकित्सा [ पुनर्वादी क्वाथ ] से शीघ्र ही वह स्वस्थ्य हो गए।

हमारे समाज में यह भ्रान्ति है की एलोपैथ ही सब कुछ है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। समाज का double standard शर्मनाक है।

आज विज्ञान जो भी तरक्की करता है , वह एलोपैथ के खाते में चला जाता है । यदि यही वैज्ञानिक तरक्की आयुर्वेद तथा होम्योपैथ के साथ जोड़ दी जाए , तो ये पद्धतियाँ कहाँ की कहाँ पहुँच जायें। लेकिन पश्चिम के देशों में तो एक ही पद्धति है , इसलिए विज्ञानं के हर आविष्कार तथा अनुसंधान को वह अपनी पैथी से जोड़ देते हैं। और हम लोग पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए , उसे ही सही मानते हैं और अपनी ही धरोहर का निरंतर तिरस्कार करते जा रहे हैं।

चिकित्सक वही जो , रोगों का निवारण करे। जो चिकित्सक तीनों पैथियों का ज्ञान रखता है, निश्चय ही वह अन्य चिकित्सकों से श्रेष्ठ है। आज जरूरी है की हम अपनी जंग लगी मानसिकता को बदलें।

मैंने दो वर्ष तक डॉ श्यामा प्रसाद मुखेर्जी अस्पताल में नौकरी की.....वहां के medical superintendent को तीनों पैथियों का अद्भुत ज्ञान था। एक बार मैंने उनसे पुछा -आपको इतना ज्ञान कैसे है? उनहोंने कहा..मुझे इसमें रूचि है, मैं एलोपैथ के साथ साथ आयुर्वेद तथा होम्योपैथ की भी प्रक्टिस करता हूँ। इसके लाभ के हजारों प्रमाण है, फिर क्यूँ न इसे भी अपनाकर अपना ज्ञान असीमित कर लूँ । मेरा सर उनके लिए श्रद्धा से नतमस्तक हो गया ।

आज AFMC ने' चरक- संहिता' तथा 'सुश्रुत संहिता' भी अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर ली है।

105 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

दिव्या,
सत्य को निर्विवाद (किसी वाद में अटके बिना) अपनाने में कोई बुराई नहीं है. गलती वहां होती है जहां हम सत्य-असत्य को छोड़कर अपने-पराये के भेद में पड़ जाते हैं और अपनी परम्पराएं, वाद और संस्कार सिर्फ अपने होने के कारण सर्वश्रेष्ठ लगाने लगते हैं.

मित्र को पत्र का उत्तर भेज दिया क्या?

Divya said...

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अनुराग जी,

मित्र के पात्र का उत्तर ही है यह पोस्ट। जिसे जन-हित में सार्वजनिक कर दिया।
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वाणी गीत said...

अच्छे वैकल्पिक उपाय अपनाने में हर्ज़ ही क्या है ...

आयुर्वेद अपनाने के बाद मैं स्वयं में बहुत परिवर्तन देखती हूँ ...हालाँकि आपातकालीन स्थिति में एलोपैथी ही बेहतर होती होगी ...
कई एलोपैथी चिकित्सकों को स्वयं पर आयुर्वेद चिकित्सा को अपनाते देखा है तो कई बार आयुर्वेद चिकित्सक भी एलोपैथी का इलाज़ लेते नजर आ जाते हैं ...

Avinash Chandra said...

"उनहोंने कहा..मुझे इसमें रूचि है."

रूचि है, तभी तो ज्ञान है.
हम्मे से कितनो को रूचि होती है?
और फिर अपना है अपना है कहना भी जरुरी है....

सुन्दर आलेख, हमेशा की तरह...कुछ तो अवश्य सीखा मैंने.

रंजन said...

सही है.. we have to select best out of all the options we have.. regardless from where they come from...

Divya said...

वाणी जी,

आपकी बात से सहमत हूँ। मैं भी जरूरत के अनुसार तीनों चिकित्सा पद्धतियों पर निर्भर रहती हूँ।

संगीता पुरी said...

मैं आपसे सहमत हूं कि आज जरूरी है की हम अपनी जंग लगी मानसिकता को बदलेंसांसारिक रूप से सफल होने के लिए कभी कभी हम उन गुणों को भी अपने में समाविष्‍ट कर लेते हैं .. जिसकी गवाही अंतरात्‍मा नहीं देता .. आज हम एलोपैथी की दवाएं इसलिए ले रहे हैं .. क्‍यूंकि इसे आज इसमें किए जानेवाले खर्च के कारण इसकी पढाई और इसमें रिसर्च हद से अधिक हो रहा है .. और इसलिए तत्‍काल मनोनुकूल सफलता देने में सक्षम है .. जो आज की जीवनशैली के अनुरूप है .. पर यह पैथी मरनेवालों को भेले ही मरने नहीं दे रही हो .. पर जीनेवालों को जीने भी नहीं दे रही .. बचपन से जिन बच्‍चों को इतनी एंटीबॉयटिक दवाएं पडेंगी .. आगे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में असर आना ही है .. ऐसी हालत को देख यदि हम जैसे लोगों के मन में कसक हो कि .. काश इलाज की अन्‍य पद्धतियों का भी तरीके से अध्‍ययन कर उन्‍हें आज के अनुरूप विकसित किया गया होता .. गलत नहीं माना जा सकता !!

सतीश सक्सेना said...

शाबाश दिव्या !
मेरी शुभकामनायें है कि आप एलोपैथिक चिकित्सा में नए आयाम कायम करें !

मगर यह याद रहे कि विश्व में हज़ारों स्थान ऐसे हैं जहाँ अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ सफलता पूर्वक प्रयोग में लाई जाती हैं ! एलोपैथिक पद्धति की उपेक्षा करते इन लोगो ने अपनी पद्धतियों को कभी नहीं छोड़ा और अधिक स्वस्थ रहे ! अविष्कार सिर्फ पाश्चात्य जगत में ही नहीं हुए ...

हाँ पाश्चात्य जगत की चकाचौंध ने इन संस्कृतियों को भी अपनी और आकर्षित तेजी से किया ! जहाँ आधुनिक पद्धतियों का विज्ञापन इन्टरनेट पर हुआ वहीं साधनहीन वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों ने इसका विज्ञापन देने के लिए, पैदल घूम घूम कर, ढिंढोरा भी नहीं पिटवाया बल्कि अपनी तारीफ़ न करने की ताकीद भी की !

यह अफ़सोस जनक है कि नवीन विश्व की चकाचौंध में, इन शानदार चिकित्सा पद्धतियों पर साधनों के अभाव और प्रशासन की उपेक्षा के कारण शोध कार्य कम या न के बराबर रहा !

आयुर्वेद और होमिओपैथी आज के समय में मानवता के लिए वरदान हैं !

दुःख का विषय हैं कि इन विषयों के नितांत अज्ञानी बिना, इनकी जानकारी लिए, इसका विरोध करने में सबसे आगे रहते हैं ...

मैं उन्हें माफ़ करता हूँ जो सिर्फ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए विरोध करते हैं ...कम से कम इनका एक उद्देश्य तो है ..?
बहुत बढ़िया जा रही हो ! डॉ अमरकुमार का ध्यान भंग करा कर यहाँ बुला लेती हो....सो शक्ति अवतार तो हो ही ...

शुभकामनायें !

प्रवीण पाण्डेय said...

जिन्हे आधुनिक कहलाने का ज़ुनून है उन्हें किसी भी पुरानी चीज़ पर लात मारने से परहेज नहीं। कल पता नहीं अपने ही....।
आपसे शत प्रतिशत से भी अधिक सहमत। आपकी सोच में ताज़गी और शीतल बयार का समावेश है।

ashish said...

हम सहमत है . लेकिन इस बात से नहीं सहमत है की अभियांत्रिकी के जन्मदाता विश्वेश्वरैया थे. शायद आप विश्वकर्मा की बात कर रही है??

सतीश सक्सेना said...
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arvind said...

समाज में चिकित्सा की इन तीन पद्धतियों के बीच इतना सौतेला व्यवहार क्यूँ?
.....sachmuch yadi tino mil;kar kaam karen to bahut bhalaa hoga....aapke vichar bahut acche hai.

ajit gupta said...

मैंने अभी एक पोस्‍ट दी थी -
अमेरिका में घरेलू उपाय और आयुर्वेद का परामर्श देते हैं वहाँ के चिकित्‍सक
इसमें देखें कि अमेरिका में क्‍या हो रहा है। लिंक नहीं दे पा रही हूँ, कैसे देते हैं मुझे आता नहीं।

एक विचार said...

सतीश सक्सेना जी आप अपने कमेन्ट को लिख कर मिटा क्यों देते है
क्या आप को अपने पे विश्वाश नहीं है

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपकी बातों से पूर्ण सहमति।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल तो लखनऊ में भी है, क्या आप उसी की बात कर रही हैं?
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अथातो सर्प जिज्ञासा।
महिलाओं को क्यों गुजरना पड़ता है लिंग परीक्षण से?

डा० अमर कुमार said...
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डा. अरुणा कपूर. said...

सही कहा आपने दिव्या जी!.... डॉक्टर का ध्येय तो बिमार व्यक्ति को ठीक करना ही होना चाहिए!... इसके लिए यह जरुरी है एक डॉक्टर को अपनी शैक्षणिक चिकित्सा पद्धति के अलावा अन्य चिकित्सा पद्धतियों का भी ज्ञान होना आवश्यक है!.... आयुर्वेद विषयक आपकी जानकारी अच्छी होने का आपने संकेत दिया है....सुंदर लेख, बधाई!

rashmi ravija said...

दरअसल कुछ व्याधियां, एलोपैथ से ही ठीक हो सकती हैं, कुछ का समूल नाश होम्योपैथ द्वारा ही संभव है और कुछ में आयुर्वेद राहत पहुंचता है. पर किसी भी पद्धति का ये दावा कि सारे रोग सिर्फ उसी पद्धति से ठीक होगी,गलत है.
कई होम्योपैथ के डाक्टर्स को भी यह दावा करते देखा है, कि वे सारे रोग ठीक कर सकते हैं,पर प्रयोगों से रोग और बढ़ जाता है. चिकित्सक को ईमानदार होना चाहिए और अपनी चिकित्सा पद्धति की सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए.
@मेरी एक मित्र को गाल ब्लैडर स्टोन [cholelithiasis ] ,था जिसकी मोटाई १३.५ mm थी ! Leproscopy की राय को ठुकराकर उन्होंने distance healing का सहारा लिया । आज वह पूर्णतया स्वस्थ हैं।
ऐसी एक खबर मैने भी कहीं पढ़ी थी. लेकिन डाक्टर्स ने जब सोनोग्राफी की तो पता चला , पथरी ज्यूँ की त्यूँ है पर रोगी को दर्द, अनुभव नहीं होता. "distance healing " से रोगी का ध्यान उस तरफ से पूरी तरह हट जाता है. जैसे अब ये अफवाह है या सच, सुना था एक महापुरुष ने अपने ऑपरेशन के समय 'एनीस्थीसिया लेने से मना कर दिया और पूरे समय गीता पढ़ते रहें.
'distance healing' कारगर तो होती है,पर कितने समय तक?..प्रश्न यह है.
'रेकी ' से भी कई तरह के दर्द में आराम मिलता है पर रोग का पूरी तरह उपचार हो सकता है या नहीं? यह विचारणीय है

श्याम कोरी 'उदय' said...

...प्रभावशाली पोस्ट!!!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

हिन्‍दी में पोस्‍ट लिखने के लिए धन्‍यवाद दिव्‍या जी।

पूर्व टिप्‍पणीकारों नें इस पोस्‍ट के संबंध में आवश्‍यक टिप्‍पणियां दे दी है मुझे भी इसमें शामिल समझा जाए।

यह निर्विवाद सत्‍य है कि सभी चिकित्‍सा पद्धतियां आयुर्वेद की ही शाखायें हैं और यदि चिकित्‍सा पद्धति में पूर्ण ज्ञान प्राप्‍त करना है तो सभी शाखाओं सहित मूल का ज्ञान अर्जित करना एक चिकित्‍सक का धर्म है, भारतीय आस्‍था के कारण ही सही किन्‍तु आपने इस विचार को मान दिया इसके लिए धन्‍यवाद।

anshumala said...

मैं डिसकवरी पर एक कार्यक्रम देख रही थी जिसमे अमेरिका की डाक्टर उन माँओ को भारत से आई एक खास आयुर्वेदिक गोली खाने के लिए बोल रही थी जिनको दूध नहीं बन रहा था डाक्टर ने कैमरे पर कहा की ये गोली ( शायद मेथी ही कहा था ) मेथी से बना है मुझे नहीं मालूम की ये कैसे काम करता है पर इतना मालूम है की काम करता है और सुरक्षित भी है | अभी हाल में ही मैंने सुना की होम्योपैथ की अन्तराष्ट्रीय मान्यता रद्द की जाने वाली है (कुछ ऐसा ही टीवी पर देख था ) क्यों की वो इस पद्यति से होने वाले इलाज को समझ नहीं पाते है | मतलब ये की लोग इन पद्यतियो से इलाज का तरीका ही नहीं समझ पाते इस लिए इन पर भरोषा नहीं कर पाते | एक कारण और है की इन पद्यतियो से इलाज कराने में आराम मिलने में काफी समय लगता है और लोग इतने समय तक धैर्य नहीं रख पाते और उन्हें ये बेकार लगती है | पर अब काफी लोग इस चिकित्सा पद्यति की तरफ मुड रहे है |

डॉ टी एस दराल said...

दिव्या जी , कुछ मामलों में अपना अनुभव भी यही रहा कि आयुर्वेदिक और होमिओपेथिक दवाएं भी काम करती हैं ।
लेकिन कहीं कहीं । वार्ट्स में थूजा , ई एन टी इन्फेक्शन में septilin, मुहांसों में होमिओ दवाएं --कामयाब रहती हैं ।
लेकिन आपकी कई बातें चमत्कारिक ज्यादा लगती हैं ।

वैसे यहाँ तो एलोपेथिक डॉक्टर को दूसरी पद्धतियों की दवाएं लिखने पर रोक लगा दी गयी है।
अब क्या करें ?

Arvind Mishra said...

मेरे आल टाईम चैम्पियन डाक्टर अमर कुमार की टिप्पणी के इस अंश से भरपूर सहमति -
हम ज़ाहिलों के मध्य ऎसी ही ब्लॉगिंग की आवश्यकता है, बशर्ते यहाँ के पूरे ढाँचें की गँध को भी सहना होगा । इति शुभेस्तु !
सच्ची अब झेला नहीं जाता ..कपार फट जायेगा ! :)

Virendra Singh Chauhan said...

Main aapki adhikansh baaton se sahmat hun.Allopathy , Hpmeopathy , Unaani aur Aaurvade in sabhi ki apni- apni khoobiyan hain.

दीपक 'मशाल' said...

Divya ji, this is one of the best post that I have ever read about amalgam of various therapies.. the speciality is it's very simple language.. thanks

सम्वेदना के स्वर said...

दिव्या जी,
हमारे समाज में एक बड़ी समस्या यह है कि हमें जिस विषय का ज्ञान ना हो, हम उसे इधर उधर से सुन सुनाकर ख़ुद को ज्ञानी मान लेते हैं और उसपर अपना विशेष ज्ञान बघारने लगते हैं. यहाँ तक कि जजमेंटल भी हो जाते हैं... ज्योतिष का ज्ञान नहीं, पढाई नहीं की और इस शास्त्र को बकवास कह दिया… वैसे ही होमेओपैथी की गोलियों और लगभग शून्य सांद्रता वाले घोल को फालतू कहकर नाली में बहा दिया... मेरा होमेओपैथी में ज़रा भी विश्वास नहीं है, लेकिन मेरे मन में होमेओपैथी को लेकर प्रगाढ आस्था है, क्योंकि मेरे घर के बाकी सदस्यों को मैंने निरोग होते देखा है... हमारे देश में किसी को चोर कहने के पैसे नहीं लगते, क्योंकि साबित नहीं करना पड़ता..साबित तो उसे करना पड़ेगा कि वो बेचारा चोर नहीं है.
डॉ. अमर ने बिल्कुल सही कहा, इतनी अच्छी ब्लेंडिंग शायद ही कहीं देखने को मिले...ख़ैर कुछ ज़्यदा ही बोल गया बिना ज्ञान के.

डा० अमर कुमार said...
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Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

सच कहू तो मुझे भी ’योग’ की ताकत का अन्दाजा नही था। लखनऊ मे बाबा रामदेव का एक कैम्प लगना था.. मेरी ज़िन्दगी का एक डिप्रेसन का दौर था.. एक दोस्त ने रिकमेन्ड किया और मैने उनके कैम्प मे दाखिला लिया। सात दिन बाद मै एकदम तरोताजा था.. एक जोश और ज़िन्दगी जीने का उत्साह.. ऎलोपैथी की किसी दवा से शायद ये मुमकिन होता हो..

बाबा रामदेव आजकल योग पर रिसर्च करते है.. उनका एक बहुत बडा रिसर्च सेन्टर हरिद्वार मे है।

आपने आयुर्वेद की बात अच्छी की लेकिन आप जैसे डाक्टर्स को ही इन्हे आगे भी लाना होगा... आज योग घर घर मे है, आयुर्वेद पर लोग विश्वास कर रहे है लेकिन रामदेव जी के बनाये उत्पादो पर... उन्हे एक व्यापक मन्च चाहिये।

ऎसी बढिया पोस्ट्स तो आती रहनी चाहिये और ऎसे कर्म करने के मौके भी दूढने रहने चाहिये।

कुछ दिन के बाद आपकी किसी पोस्ट पर टिप्पणी कर रहा हू.. ऎसा नही कि उन्हे पढ नही पाया। पढकर ये नही ’समझ’ आया कि क्या टिप्पणी करू.. मेरे छोटे ’मगज’ मे शायद कभी कभी बहुत बडी बाते भी नही घुसती.. छोटी तो खैर नही ही घुसती।

Divya said...

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@ अंशुमाला-

उस दवा का नाम 'सतावारेक्स' Satavarex है , इसका मुख्या घटक शतावरी है , जो एक Natural galactogogue है [भावमिश्र , चरक तथा वाग्भट ने इसे galactogogue सदियों पहले बता दिया था।] । इसका प्रयोग lactation के लिए होता है । इस medicine की डिमांड इतनी ज्यादा है , की ज्यादातर , आउट ऑफ़ स्टॉक ही रहती है। बहुत से डॉक्टर तो prescribe करते समय यह भी नहीं जानते की वो आयुर्वेदिक दवा लिख रहे है, और मरीज भी नहीं जानता की वह आयुर्वेदिक दवा ले रहा है।
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honesty project democracy said...

दिव्या जी खूबियों को कहीं भी देखो उसे अपने में समाहित करने का प्रयास जरूर करना चाहिए ,यही एक अच्छे इन्सान की पहचान है | आयुर्वेद का हिमायती मैं इसलिए भी हूँ की उसमे सत्य की अधिकता है जबकि एलोपैथ अंग्रेजी की ही तरह चार सौ बीसी के ज्यादा करीब है |

Divya said...

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कुछ शब्दों की हिंदी ज्ञात न होने के कारण इंग्लिश शब्द इस्तेमाल करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

@ अरविन्द मिश्र जी,
किस बात से कपार फट रहा है ?
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Divya said...

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An honest confession !

चूँकि मैं भी बहुत सी बीमारियों में आयुर्वेदिक medicine prescribe kaरती हूँ और उसके चमत्कारिक लाभ से भी अवगत हूँ, इसलिए इस पद्धति का ऋण अदा कर कर रही हूँ ।

कोई भी व्यक्ति अपनी खोजों को मुफ्त में सार्वजनिक नहीं करना चाहता, हर कोई उसका पटेंट या क्रेडिट पाना चाहता है। मैंने भी सात वर्षों की प्रक्टिस में कुछ लाइलाज बीमारियों का अचूक इलाज ढूंढ लिया है। जिसमें allopath और Ayurved का combination है।

मैं यह honest confession करना चाहती हूँ की मैं जरूरत के अनुसार आयुर्वेदिक medicine को भी prescribe करती हूँ , जिससे अद्भुत तथा शीघ्र लाभ देखने को मिला है।

अपनी चिकित्सकीय सफलता का पूरा श्रेय Allopath को नहीं दे सकती।

man mein ek chori ka ehsaas na reh jaye isliye yah confess kar rahi hun.
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Divya said...

लोग कहते हैं की emergency में allopath ही काम आता है, मेरा कहना है , जो emergency में काम आता है वो विज्ञानं की शोध एवं तराक्की है , न की modern medicine की ।

विज्ञानं जो भी अनुसंधान और आविष्कार करता है वो अपने आप ही Allopath से जोड़ दिया जाता है।

हल्दी और नीम , सर्पगंधा, शंखपुष्पी, शतावरी, मुस्ली तथा जिस पर भी थोडा सा शोध होता है उसे विज्ञानं पटेंट कर Allopath के साथ जोड़ देता है।

कालान्तर में यदि पुंसवन संस्कार भी प्रक्टिस में आ गया तो , उसे भी modern medicine का हिस्सा करार कर दिया जायेगा। और बेचारा आयुर्वेद मुंह ताकता रह जाएगा।

आयुर्वेद में शोध से क्या फायदा ? शोध के नतीजे तो पटेंट होने के बाद Allopath का अंग बन जायेंगे।

CDRI , Lucknow has patented 'bramhi' and 'Shankhpushpi' in year 2002.

America has parented 'Haldi' and ' Neem ' recently.

We Indians are not aware what a huge loss we are at !

sab kuchh loot le jayeinge ye log [western countries ] ek din !

It's high time to unite.
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Divya said...

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आशीष जी,

correction कर दिया है ।
आपका आभार।
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ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

Wo dil-nawaaz hain lekin nazar-shanaas nahi
Meraa ilaaj mere chaaraagar ke paas nahi
[Chaaraagar = Doctor]

The modern day world is no more about the general practice of a profession - be it any. More and more intensely and in the right direction of progress, it is tending towards super-specialization.

Be it teachers or be it lawyers or be it engineers or be it doctors - every practitioner is going into nano-specializations in their field of education.

Specialization is the buzz word, not generalization.

And I would surely not get my home constructed by a person who has been awarded the degree for mechanical engineering in college but who says he has knowledge of civil engineering too.

Wo keehte hain naa.....

Neem hakim, khatraa-e-jaan

And life is the most precious thing.

Doctors who are qualified in one form of medicine and who try and practice the alternate forms of it esseentially are using pataients as guinea-pigs.

The very patient who comes with utmost faith to him / her of getting cured.

I firmly endorse the ban on such practices and believe any offener to this must be stripped of his/her licence to practice.

If I were to go to an Ayurvedic Doctor, I would be blindly trusting him/her to remedy my ailment using the knowledge that was imparted to him/her in the proper course of education.

But, God forbid and if he/she were to prescribe me medicine from any other stream, I would be appalled and mortally scared. Moving out of that particular clinic, I would simply say to myself -

Jaan bachi so laakho paaye
Laut ke buddhu ghar ko aaye

People may have their view-point on assimilation of various doctrines [and thereby taking recourse to live-wire experimentation on unsuspecting patients] but I have very strong reservations about the morality of the same.

Why only the best of the best students get admission into medical stream? Simply because they are to protect life - at any cost. The selection of the best is done for that because being a doctor puts an immense responsibility towards society at large on them. The highest echleon of learners are thought of to be aware of this faith which is reposed in them.

Yaas jab chhaai ummide haath mal kar reh gayi
Dil ki nabze chhut gayi aur chaaraagar dekhaa kiye
[Yaas = Despair]

Doctors are the closest to God if one were to so akin them. The reason being they cure and thereby they give life (back) to people. I would want doctors to engage more and more in their own area of specializatin so that all humanity gets an upliftment from their efforts.

Curiosity to know something has its own place and curiosity is indeed the precursor to knowledge. But, where is the validation of such acquired knowledge [owing to curiosity] by mere reading or observation or hear-say? In a nut-shell, its improper usage could prove fatal to some guinea pig, er, I mean, patient who may have come in for a Homeopathic medicine and his/her relatives end up gettting an Allopathic Death Certificate.

I wonder - Is such acuquired knowledge of any worth? Will not just one such death haunt the doctor all his/her life about having tried something on the patient which he/she had not been taught in the course of education?

As to the people in favor of your line of thought in this particular matter, I can only lament ruefully that

Yeh kahaan ki dosti hain ke bane hain dost naaseeh
Koi chaaraagar hotaa, koi gam-gusaar hotaa
[Naaseeh = Advisor, Gam-Gusaar = One Who Allevaites Sorrows]


Arth kaa
Natmastak charansparsh

Divya said...

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@- अर्थ देसाई-

चिकित्सकों का अपमान करने के पहले , दो बार सोचा तो होता।
खैर, अपनी अपनी समझ है।

बात यहाँ विभिन्न पद्धतियों की हो रही है। नीम-हकीमों की नहीं।

और यदि आपको Allopath के सिवा सभी नीम हकीम लगते हैं तो हमें आपकी सोच पर तरस आता है।
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प्रवीण शाह said...

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दिव्या जी,

तो एलोपैथ की डिग्री रखकर आयुर्वेद तथा होम्योपैथ की खूबियों को क्यूँ नहीं अपना सकती ? जितना ज्यादा जानकारी होगी , डॉक्टर का व्यक्तित्व उतना ही निखरेगा।

जहाँ तक व्यक्तिगत विश्वासों की बात है तो आप को पूरी आजादी है अपने मन की करने की... आप ऐलोपैथी की परास्नातक होकर भी होमियोपैथी व आयुर्वेद की दवाइयां भी प्रयोग करती हैं...अच्छा है... मैं तो कुछ ऐसे डॉक्टरों को भी जानता हूँ जो इस से भी आगे जाकर टोने टोटके, एकाध रत्न, कुछेक मंत्र, कुछ खास ग्रहों को शान्त करने के उपाय व सप्ताह के हरेक दिन पहनने के लिये कपड़ों के रंग भी सुझा देते हैं...बेचारे मरीज(???) को...दुनिया बहुत बड़ी है और उतने विचित्र व्यक्तित्व भी भरे पड़े हैं यहाँ...

पर आप जब लिखती हैं...

"आयुर्वेद का प्रादुर्भाव, जो हमारे वेदों में भी वर्णित है , जिसके द्वारा देवों की भी चिकित्सा की जाती थी , वह ब्रम्हा जी के मुख से सृष्टि के समय हुआ। आज जिस आर्गन ट्रांसप्लांट को खोजा गया , वह युगों पूर्व ayuevedic सर्जन सुश्रुत द्वारा प्रक्टिस में था।"

क्या सृष्टि की उत्पत्ति के समय वाकई कोई बाहर खड़ा 'आयुर्वेद' रच रहा था... इतना ज्ञानी था तो उसकी रचनाओं(जीवों) में रोग क्यों हुऐ... और क्यों बहुत से रोगों का कोई इलाज तक नहीं दिया गया उस द्वारा... कौन से आर्गन ट्रांसप्लांट की बात कर रही हैं आप... जो सुश्रुत ने किया ?


धन्वन्तरी जो समुद्र मंथन से निकने तथा काय चिकित्सा को जन्म दिया, लोग उस चिकित्सा, तथा तथ्यों को वेदों में लिखे मिथ [myth ] तथा कहानियां समझते हैं।

समुद्र मंथन में कछुए की पीठ पर पर्वत की मथानी और शेषनाग की डोरी डाल कर समुद्र को 'मथा' गया... और निकले 'धन्वन्तरि जी महाराज'... यह आदमी थे या मछली... आदमी तो समु्द्र की गहराइयों में जिन्दा रह नहीं पाता... फिर समुद्र यानी जल के अथाह भंडार के पास क्या ऐसे कोई अंग थे... जिनसे वह एक पुरूष को जन पाता ?... यह मिथक ही है और यही इसे कहा भी जायेगा।

१९९६ में ऐसा जौंडिस [Jaundice] इतना फैला था की लोगों का बिलीरूबिन लेवल २० तक पहुँच गया। लिवर की कोई सार्थक दवा एलोपैथ में न होने के कारण , लोगों का ताँता लग गया आयुर्वेद विभाग में।

Obstructive Jaundice को छोड़कर अन्य मामलों में पीलिया तभी होता है जब किसी इन्फेक्शन या केमिकल पदार्थ द्वारा लिवर को Injury होती है... इसका इलाज सीधा सा है और वह है लिवर को पुन: ठीक होने के लिये समय और आराम देना... कोई भी दवा यदि न भी दी जाये... तो भी एकाध माह के आराम से मरीज अधिकांश मामलों में स्वत: ठीक हो जाता है... और पूरी तरह से क्षतिग्रस्त लिवर (Cirrhosis)को कोई भी पद्धति आज की तारीख में ठीक नहीं कर पाती है।

जो चिकित्सक तीनों पैथियों का ज्ञान रखता है, निश्चय ही वह अन्य चिकित्सकों से श्रेष्ठ है।

यदि मैं किसी Modern Evidence Based Medicine के प्रैक्टिशनर के पास जाउँगा तो मैं उसी चिकित्सक को श्रेष्ठ मानूंगा जो एक Clutter Free Mind रखता हो और Evidence Based इलाज ही मुझे दे, आखिर यही आस लेकर मैं उसके पास गया था...वरना होम्योपैथों या वैद्मों के पास न जाता?

आप जो लिखें, पहले उसे वैज्ञानिक दॄष्टिकोण से देखें... तार्किकता को लोप न होने दें...एवम् यथार्थ के कठोर धरातल पर उसे परखें... तभी शायद आप समझ पायेंगी कि आदरणीय अरविन्द मिश्र जी क्यों यह कह रहे हैं कि:-

सच्ची अब झेला नहीं जाता ..कपार फट जायेगा ! :)


आभार!


...

महफूज़ अली said...

Very intellectually crafted post....

पंकज मिश्रा said...

दिव्या जी,
एलोपैथ अंग्रेजी की ही तरह 420 के करीब है|
आपका आभार।

Arvind Mishra said...

@प्रवीण जी ,दिव्या जी ,
बस एक बात -सुश्रुत को वाकई पूरी दुनिया में प्लास्टिक सर्जरी का जनक माना जाता है उन्होंने रिह्नोप्लास्टी -कटी नाक को दूसरी जगह से चमड़ी लेकर जोड़ा था -और इसमें मदद ली थी काले च्यूटों (black ants ) की जबड़ों की मजबूत और स्थायी पकड़ की ...
बाकी दिव्या जी ध्यान से प्रवीण शाह की बातों को सुने गुने ,जल्दीबाजी में जवाब न दें -आप एक मेडिकल ग्रेजुएट हैं !और हाँ जडी बूटियों (ethnobotany ) की लोक चिकित्सा कई मामलों में कारगर है और आयुर्वेद इस ज्ञान का ऋणी है मगर क्या विषैले सांप के काटने की अंटीवेनम के अलावा भी कोई किसी भी पैथी मे कोई कारगर दवा है ? यही लिटमस टेस्ट ले लेते हैं ! सांप सूघ गया न ? देखिये अलोपैथी के आनुषांगिक दुष्प्रभाव तो हैं मगर यह वैज्ञानिक विधि -साईंस मेथोड़ोलोजी पर आश्रित है -यही इसकी बड़ी खूबी है ! मेरा कपार ही नहीं कहीं ब्रह्माण्ड ही न फट जाए ...हा हा !

अजय कुमार said...

आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत ।

ajit gupta said...

डा० अमर कुमार जी
शतावरी और मूसली दोनों अलग-अलग हैं। शतावरी की बेल होती है और मूसली की खेती की जाती है, इसका भी कंद होता है।

Divya said...

.
@ अजित गुप्ता-
आपने सही कहा , शतावरी और मुस्ली दोनों पृथक द्रव्य हैं।

@ अरविन्द मिश्र,-
जो लोग अपनी बुद्धि पर पर जरा भी बोझ सहेन नहीं कर पाते , उनकी कपार फट जाते हैं। आप हो सके तो migrain का इलाज कराएं, लेकिन ईर्ष्या-वश अपना कपार न फाड़ें।
.

Divya said...

.@ प्रवीण शाह-
आपको एक biased mentality रखते हैं। आपकी विचारधारा तनिक भी वैज्ञानिक नहीं है। जो लोग मखौल उड़ाते हैं, उनसे तर्क-वितर्क संभव नहीं है। आपने अपने ब्लॉग पर जो घटिया पोस्ट लगाई है, वह आपकी मानसिकता परिलक्षित करती है। आयुर्वेद का इतिहास पढ़िए, आपको अपने प्रश् के उत्तर खुद मिल जायेंगे। मेरा आयुर्वेद में विश्वास तथा होम्योपैथ में विश्वास उसको काफी पढने सुनने के बाद ही हुआ है।

इतने बड़े-बड़े ग्रन्थ वृहद्त्रयी [ चरक, सुश्रुत था अष्टांग संहिता ] इनको पढ़िए तब ही आप जानेंगे आयुर्वेद की सच्चाई । आप जैसे लोगों को टिप्पणियों द्वारा समझाना , संभव नहीं है। आप सोचते हैं , आपके प्रश्नों का जवाब दो चार लाइनों में समां जाएगा। जी नहीं...कुछ प्रयास खुद भी कीजिये .....ग्रंथों का अध्ययन कीजिये , फिर किसी की बात का खंडन कीजिये।

बिना subject का ज्ञान रखे आप जिस प्रकार चर्चा कर रहे हैं, वो hostile discussion होता है।
.
वैसे भी नास्तिकों से इश्वर चर्चा नहीं की जाती। नास्तिक तो इश्वर का अपमान ही करेगा।

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

सतीश सक्सेना said...

@ प्रवीण शाह, एवं दिव्या जी !
भाई प्रवीण शाह की टिप्पणी को नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता , आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में मिथक और पौराणिक पात्रों का महत्व नहीं होना चाहिए , पौराणिक कहानिया धार्मिक आस्था का पात्र हो सकती हैं मगर वास्तविकता के धरातल पर नहीं टिक सकती ! काय चिकित्सा पर उपलब्ध हमारी धरोहर और सुश्रुत संहिता की बात करें तो उचित है मगर धन्वन्तरी और सुश्रुत कौन थे ? यह प्रमाण कहाँ से लायेंगे ?? जो प्राचीन विद्या उपलब्ध है उस पर शोध हो, बहस हो मगर उसका उदगम क्या था ? उसके कितने रचनाकार थे ? कितने हाथों से होकर गुजरी ? यह हमारी पुरातन किताबें कितनी बार संपादित हुईं, बदली गयीं, कौन जानता है ?
सो दैवीय हाथो से जन्म लिया हो इस पर अविश्वास ही होगा ! शायद अमित शर्मा, सुरेश चिपलूनकर जैसे विद्वान् कुछ अधिक बता सकें !

भाई प्रवीण शाह , होमिओपैथी को टोना टुटका मानते हैं, मैं इनके एक लेख पर हुई बहस में शामिल था ! मेरा अभी भी उनसे यही कहना है कि पहले होमिओपैथी को एक बार समझ लें फिर इसकी प्रमाणिकता पर संदेह करें ! मैं लगभग २५ साल से होमिओपैथी को पढ़ रहा हूँ मुझे विश्वास है कि यह मानवता के लिए वरदान है !
मगर आनंद तो तभी आएगा जब प्रवीण शाह और अरविन्द मिश्र जी इसे स्वीकार लें !

Divya said...

.
राजभाषा जी ,

हम तो प्रयास यही करेंगे की हिंदी के साथ-साथ , हमारी संस्कृति, तथा अतुलनीय धरोहर का भी प्रचार-प्रसार हो सके।

भले ही इसमें किसी का कपार फटता हो तो फटा करे।

व्यक्ति से कई गुना बड़ा होता है समाज। एक- दो की चिंता करें की अपने समाज की ?

आपका आभार।
.

Divya said...

.
सतीश जी,

यही तो अफ़सोस है, सदियों पूर्व वर्णित चिकित्सा पद्धति तथा उसमें प्रयुक्त विधियाँ एवं द्रव्य लोगों को दन्त-कथाएँ लगती हैं। दुर्भाग्यवश जब ऐसे बातें विज्ञानं प्रमाडित करता है तो तुरंत वह एल्लोपैथ के खाते में जुड़ जाता है।

आप भी बदके ब्लोगरों की हाँ में हाँ के चक्कर में कुछ dar-dar के बतिया रहे हैं।
.

Divya said...

.
शास्त्रों में वर्णित 'पुंसवन संस्कार ' को जब तथागत अवतार तुलसी के पिता ने प्रमाडित कर दिया तो यह कथा-कहानी और myth कहाँ रह गयी ?

कुछ दिनों में अमेरिका इस पर शोध कर पटेंट कर लेगा, और बड़के ब्लॉगर अमेरिका को गरियाने के लिए पोस्ट लिखेंगे।
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Divya said...

.
लोग कहते हैं , औरत ही औरत की दुश्मन होती है। ..मुझे तो ऐसी कोई औरत नहीं मिली आज तक।
हाँ, भारतीय जरूर भारतीयता औr अपनी धरोहर के दुश्मन लगे।
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प्रवीण पाण्डेय said...

दिव्या जी ने एक प्रश्न उठाया है कि हमें अपने अतीत पर गर्व होना चाहिये कि नहीं? हमारी उपलब्धियाँ भले ही शतप्रतिशत इस युग में अनुकरणीय न हो पर क्या यह आश्चर्य नहीं कि एक बाँस से इतनी सूक्ष्म खगोलीय गणना की गयी थीं।
हम अभिभूत हैं पश्चिम से, हम अभिभूत हैं उनकी विचारधारा से, हम अभिभूत हैं उनके नकारात्मक कॉलोनियल प्रयासों से जिन्होने हमें हमारी उपलब्धियों पर गर्व करना तो दूर वरन उन पर हँसना सिखा दिया।
लिटमस टेस्ट उन उपलब्धियों को देखना हो जो उस समय किसी और देश में संभव ही न थीं।
यदि आर्थिक मंदी का हल चाणक्य का अर्थशास्त्र नहीं दे सकता तो आज की आर्थिक मंदी भी आधुनिक अर्थशास्त्रियों के मुँह पर जोरदार झन्नाटा हुआ तमाचा है। संभवतः अर्थशास्त्र के नियमों के पालन से उससे बचा जा सकता था।
चरक और सुश्रुत पर अभिमान न करने का औरों का व्यक्तिगत कारण हो सकता है पर निसन्देह दोनो ही चिकित्सा के क्षेत्र के पुरोधा व पितामह हैं। हर चिकित्सालय में उनकी मूर्ति होनी चाहिये।
आर्यभट्ट का लोहा पश्चिमी भी मान चुके हैं। हमारे ज्ञानचक्षु अपने आकाओं के साथ तो खुल जायें।

Divya said...

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प्रवीण जी,

आपके विचारो को जानकार बहुत अच्छा लगा। कम में kam कुछ तो लोग हैं इस दुनिया में जिन्हें नाज़ है अपनी धरोहर पर , जिन्हें विश्वास है अपने पूर्वजों के ज्ञान पर। जिन्हें श्रद्धा है अपने वेदों पर , जिन्हें सम्मान करना आता है अपनी भारत भूमि की परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों पर।

आर्यभट ने शुन्य के साथ गडित [maths]को जिन बुलंदियों पर पहुँचाया , वह लोग भूल चुके हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने आज Bharat जैसे गरीब देश को भी recession की मार से बचाए रखा।

हम कितने अक्रिताग्य [ungrateful ] हैं जो इन विद्वानों को सम्मान न देकर उनका मखौल बनाने में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं।
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सतीश सक्सेना said...

"आप भी बदके ब्लोगरों की हाँ में हाँ के चक्कर में कुछ dar-dar के बतिया रहे हैं।"

हा...हा...हा...हा...
आनंद आ गया आपकी इस लाइन पर , खैर !

यहाँ हम और आप केवल एक दुसरे के लेख पढ़ और विचार जानकार ही दोस्त और दुश्मन है ! जब किसी मित्र के विचार अच्छे लगते है तो तारीफ की ही जाती है ...

अगर इशारा प्रवीण शाह की और है तो मैं इनकी होमिओपैथी के प्रति विद्वेष भावना का विरोधी रहा हूँ ! विद्वेष रख कर कोई व्यक्ति उस विषय विशेष पर बहस का अधिकारी नहीं होना चाहिए !

यही बात मैं डॉ अरविन्द मिश्र के लिए कहूँगा मगर यह विद्वान् हैं इसमें कौन संदेह करेगा ? सो इनकी कही बात सुननी तो पड़ेगी ... वही यहाँ हो रहा है !

मगर मुझे विश्वास है आप निपटने में समर्थ हैं सो आनंद ले रहा हूँ !
सादर

प्रवीण शाह said...

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.
.

दिव्या जी,

'biased mentality' व 'घटिया' दो धार वाले शब्द हैं... यही सब कुछ मैं 'आपकी मानसिकता' व 'आपकी पोस्ट' के बारे में भी कह सकता हूँ... पर कहूँगा नहीं... यही फर्क है आप में व मुझ में ... :)

इतने बड़े-बड़े ग्रन्थ वृहद्त्रयी [ चरक, सुश्रुत था अष्टांग संहिता ] इनको पढ़िए...

चलिये आप ही पढ़िये और बताइये नाड़ी-शास्त्र के बारे में दुनिया को... यानी मात्र Pulse (नब्ज) महसूस कर रोग की पहचान करने वाले शास्त्र के बारे में... मैं तो बहुत से आयुर्वेद स्नातक- परास्नातकों से पूछ चुका हूँ और वे कहते हैं लिखा तो है कुछ ऐसा ग्रंथों में... पर कुछ समझ नहीं आता!

"बिना subject का ज्ञान रखे आप जिस प्रकार चर्चा कर रहे हैं, वो hostile discussion होता है।"

यह आरोप तो मैं लगा रहा हूँ आप पर इसी जगह... आप को यह भी भान नहीं कि लिख क्या रही हैं...मेरी पूर्व की टिप्पणी में स्पष्ट सीधे-साफ सवाल पूछे गये हैं... 'ज्ञानी' हैं तो जवाब दें!

वैसे भी नास्तिकों से इश्वर चर्चा नहीं की जाती। नास्तिक तो इश्वर का अपमान ही करेगा।

ईश्वर चर्चा आपसे कौन कर रहा है यहाँ पर... यह करनी होगी तो मैं आस्तिकों के ब्लॉग पर जाउंगा... जो कम से कम यह तो मानते हैं कि 'वह' हर मान अपमान से परे है।


आभार!


...

Divya said...

.
एक चिकित्सक ये चाहता है की सब कुछ सीख ले। मैं भी यही चाहती हूँ। इसी आकांशा के चलते इन अनछुए पहलुओं पर नज़र गयी । इन्हें धीरे धीरे पढने की कोशिश और जिज्ञासा ने मुझे बहुत कुछ दे दिया और आगे भी मेरे लिए तो अपार भण्डार है सीखने और जानने के लिए।

सच कहूँ तो मेरी knowledge शुन्य के बराबर है इन ग्रंथों पर चर्चा करने के लिए। लेकिन मेरे अन्दर की जिज्ञासा एवं विश्वास अथक है अपने पूर्वजों के ज्ञान पर।

इसीलिए उम्मीद है की न्याय कर सकूँगी इन विषयों के साथ।

थाईलैंड में अच्छी पुस्तकें अनुपलब्ध होने के कारण , पठन में मुश्किलें आती हैं लेकिन दुःख इस बात का है की जिन्हें ये सुविधा आसानी से मिल सकती है वो क्यूँ इनसे वंचित हैं।

इस बार भारत आने पर कुछ ऐसे ही ग्रंथों को लाने की अभिलाषा है।
.

Divya said...

.सतीश जी ,

१-डर डर के जीना तो हमने कभी सीखा नहीं ।
२-चापलूसी करना मुझे गुनाह लगता है।
३-अरविन्द मिश्र से ज्यादा विद्वान् लोग इस हिंदी ब्लॉग जगत में हैं। बस अफ़सोस यही है की पोपुलर उतने नहीं हैं।
४-आप मजे ले रहे हैं तो लीजिये , लेकिन एक बात बता दूँ, मैं बहुत संजीदा व्यक्तित्व की हूँ। जिंदगी में कभी भी कुछ मजे लेने के लिए नहीं किया।
५- मुझे निपटारा करना ही नहीं है, लोग खुद ही निपट जायेंगे।
६-" सर्वोत्तम की उत्तरजीविता " [ Survival of the fittest ] में विश्वास रखती हूँ।
७-मेरी पोस्ट पर वही लोग बचेंगे जो मेरे साथ बढ़ने का दम -ख़म रखते हैं। वर्ना ईर्ष्या के चलते एक-एक करके निपट जायेंगे।
८-लेकिन एक बात बता दूँ, एक दिन होगा जब मेरी पोस्ट पर कोई कमेन्ट नहीं करेगा, लेकिन उस दिन तक मुझे पढने वाले असंख्य होंगे।
९- चापलूसी न करती हूँ, न ही पसंद करती हूँ।
.

सतीश सक्सेना said...

@अरविन्द मिश्र
"मगर क्या विषैले सांप के काटने की अंटीवेनम के अलावा भी कोई किसी भी पैथी मे कोई कारगर दवा है ? यही लिटमस टेस्ट ले लेते हैं ! सांप सूघ गया न ? देखिये अलोपैथी के आनुषांगिक दुष्प्रभाव तो हैं मगर यह वैज्ञानिक विधि -साईंस मेथोड़ोलोजी पर आश्रित है -यही इसकी बड़ी खूबी है ! मेरा कपार ही नहीं कहीं ब्रह्माण्ड ही न फट जाए ...हा हा !"

अरविन्द जी,
मुझे विश्वास है कि आपको होमिओपैथी के सिद्धांतों के बारे में अंदाजा नहीं है , क्योंकि होमिओपैथी के बारे में ऐसे प्रश्न सिर्फ कोई नासमझ और विद्वेष भावना युक्त लोग ही कर सकते हैं !

होमिओपैथी में रोग के नाम का महत्व नहीं है न ही रोग का इलाज़ किया जाता है ! होमिओपैथी सीखने की इच्छा लेकर आये विद्वान् को भी समझाने के लिए बहुत समय चाहिए, आप और प्रवीण जी जैसे विद्वान् को समझाया नहीं जा सकता !
सादर

Divya said...

.
प्रवीण शाह जी-

'नास्तिक' शब्द एक उपमा की तरह प्रयोग किया है। जब आपको श्रद्धा ही नहीं तो आपको कष्ट क्यूँ दिया जाये।

परन्तु अभी तक पिछली तीन पोस्ट्स पर मैंने जितनी बातें रखीं शायद आपने पढ़ी नहीं। हो सके तो पढ़िए। अपने ग्रंथों में वर्णित बात को जानना है या फिर खंडन करना है...दोनों के लिए ही आपको उन ग्रंथों का अध्यन करने की आवश्यकता है।.
.

Dr Prabhat Tandon said...

यह सत्य है कि तीनों पद्दतियों के बीच समन्वय अकसर रोगी के हित मे ही दिखई पडता है । बहुत से ऐसे रोग हैं जहाँ emergency conditions मे modern medicine त्वरित गति से काम करती है लेकिन वही condition जब बार -२ repeat होने लगती है तो ऐलोपैथी लगभग असहाय सी दिखती है .. अब चाहे वह त्वचा की समस्या हों या फ़िर श्वास संबधित समस्यायें या फ़िर कोई और । क्लीनिकल प्रैकिट्स मे अगर समुचित तालमेल इन पद्दतियों के चिकितसकों के बीच रहता है तो रोगी को अपने कष्ट से छुट्कारा पाने मे समस्या नही रहती ।
लेकिन बात होम्योपैथी की ... होम्योपैथी पद्दति के प्रति विरोध आज से नही बल्कि हैनिमैन के समय से ही रहे है  लेकिन इसके वावजूद इस पद्दति मे लोगों का विशवास सिर्फ़ आशवसन और भ्रम से नही बल्कि समय –२ पर मिल रहे अनगिनत परिणामों से  है । तथ्यों की बात करें तो नैदानिक परीक्षणॊं ( clinical trials ) मे होम्योपैथी की विशव्सीयनता को सिद्ध करना बहुत मुशकिल है क्योंकि यह एक व्यक्तिपरक चिकित्सा पद्दति है ( individualized therapy ) , एक ही समय मे एक ही रोग मे दस विबिन्न रोगियों मे दवायें अलग-२ निकलती हैं , सिर्फ़ एक ही दवा एक रोग मे कारगर नही हो सकतॊ , रोग की उत्पति, उसके कारण , रोगी की मन: स्थिति , रोग किन कारणॊ  से बढ रहा है या घट रहा है , दवा के सेलेक्शन मे इन कई बातों का ध्यान रखना बहुत आवशयक है जो नैदानिक परीक्षणॊ मे एक  ही दवा को लेकर नही की जा सकती लेकिन इसके बावजूद ऐसे कई परीक्षणॊं मे होम्योपैथी कारगर भी सिद्ध होती  रही है देखें अवशय :

http://hpathy.com/homeopathy-scientific-research/

http://homeopathyresearches.blogspot.com

होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ

http://avilian.co.uk/category/homeopathy/research/

http://homeopathytorrents.blogspot.com/2009/08/vastly-incomplete-list-of-scientific.html

प्रभात
http://drprabhattandon.wordpress.com/
Homeopathy Torrents
Homeopathy-A New Approach

संगीता पुरी said...

यहां तीनो पैथी को जोडकर ही इलाज किए जाने की बात की जा रही है तो इतना विवाद हो रहा है .. और उसमें मैं ज्‍योतिष को भी जोडकर कहूं कि चारो पैथी मिलकर और बेहतर कर सकते हैं तो विवाद कितना बढ जाएगा .. हा हा हा !!

sada said...

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

डा० अमर कुमार said...
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डा० अमर कुमार said...
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सतीश सक्सेना said...

@ डॉ अमर कुमार ,
होमिओपैथी के बारे में छोड़ आपका कहा सब कुछ कहा स्वीकार्य है और ठीक है ! होमिओपैथी के बारे में जो कुछ कहें भली भांति समझ कर कहें !
सादर

डा० अमर कुमार said...
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Udan Tashtari said...

ये बहुत अच्छा किया कि मित्र का जबाब जनहित में सार्वजनिक कर दिया.

अब इतना कुछ तो सब लोग कह गये. हम सिर्फ सुन गुन लेते हैं बस!

vinay said...

दिव्या जी आपने बिलकुल सही लिखा है,जब तक हम अपनी घर का जोगी,जोगड़ा बाहर का सिद्ध वाली नहीं बदलेगें,तब तक आयुर्वेद का सही लाभ नहीं उठा पायेगें,मेरी पत्नी को दोनो आँखो में,मोतिया था,और मेरा समस्त वाली अलका जी ने देसी जड़ी बुटी द्वारा बिना ओपरेशन के इलाज बताया था,लेकिन मेरी पत्नी ने ओपरेशन ही करवाया,अब मेरे को दायीं ओर हरनिया हो गया है,और अलका जी से इस का इलाज पूछूगाँ,आपके लेख के बारे में संगीता जी के लेख पर मेने टिप्पणी भी दी है,आपको एलोपैथ के होने के बाद भी आयुर्वेद के बारे में ज्ञान है, और जानने की उत्सुअक्ता है,गर्व की बात है ।

प्रवीण पाण्डेय said...

मैं संभवतः बहस को पूरे परिप्रेक्ष्य में देख नहीं पाया और संदर्भों से इर्द गिर्द टिप्पणी कर गया। मैंने तर्कसंगतकता से कभी मना नहीं किया है और कदाचित यही कारण हो कि इतनी सुदृढ़ वैज्ञानिक और आर्थिक उपलब्धियों के बाद भी हम सामाजिकता में पिछड़ गये। सिद्धान्त सुदृढ़ थे और उन्हे स्थापित बनाये रखने के लिये उतना ही तार्किक प्रयास आवश्यक होता है। एक महल को महल बनाये रखने के प्रयास साधारण नहीं हो सकते। यदि वैज्ञानिक तरीके से उपलब्धियों को सहेज कर उसे परिमार्जित किया गया होता तो आज इस बहस की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
निश्चय ही संस्कृति पर गर्व के नाम पर अंधविश्वासों को प्रश्रय न मिले और साथ ही साथ विद्वेष के कारण हम घर का कंगन भी न दान कर बैठें।

DR RK SINGH,LKO said...

यह निर्विवादित रूप से कहा जा सकता है की वर्तमान युग में जब तक सारी चिकित्सा विधायों में समन्वय नहीं होगा, तब तक मानव जाति का भला नहीं हो सकता है और ऐसे में सभी की यह जिम्मेदारी बनती है की मिल जुल कर कम करे और अपने अहंकार की दीवारों से बाहर झांके. आज एल्लोपथिक जगत कभी Homeopathy के पीछे पड़ जाता है और सारी उर्जा उसे प्लेसिबो सिद्ध करने में खर्च करता है तो कभी आयुर्वेद की दवा में शीशा ढूँढने में . यह सब तमाम दवा कंपनियों के लाभ हानि के आधार पैर होता है और उसमे मरीज कही नहीं होता

Dr.Ravi Singh said...

बड़ा ही आश्चर्यजनक है डॉक्टर अमर कुमार जी
आप लाख लाख बार होम्योपैथी को समझ चुके हैं और हम पढ़ते पढ़ते थक गए और अभी थोडा ही जान पाए हैं , पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर किसी चिकित्सा पद्धति के बारे में सोचने से ऐसे ही विचार सामने आएंगे.
आपको बताना चाहूँगा की होम्योपैथी और अलोपैथी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग डॉ हैनेमान ने ही किया था .

Gourav Agrawal said...

चंदा मामा के सामने पेन्सिल के छिलके और दूध रखने से अच्छा है की हम शरद पूनम के दिन खीर रख दें , जो शरीर को निरोग मन को प्रसन्न और आयु में वृद्धि करती है .....

Gourav Agrawal said...

ओह .. ये क्या मैं तो वैज्ञानिक तथ्य देना भूल गया
शरद पूर्णिमा के दिन सभी ग्रह की आवृत्ति एक हो जाती है। इससे पृथ्वी में आंतरिक कंपन होने से वृक्ष, पौधों और बीजों पर अनुकूल असर पड़ता है|
( पीपल्स फॉर एग्रीकल्चर एंड ग्लोबल एजुकेशन एंड इनवायरमेंट के डायरेक्टर समीर जी )
शरद पूर्णिमा के वक्त कास्मेटिक ऊर्जा बढ़ जाती है, इसका प्रभाव, वनस्पति और कृषि पर सकारात्मक रहता है।
(पर्यावरणविद् विनीत भटनागर)
शरदपूर्णिमा के दिन मध्यरात्रि को चंद्रकिरणों से ‘अमृत’ बरसता है। वनस्पति में भी चंद्रकिरणों से अमृतरूपी वर्षा होती
(डॉ. नारायणदत्त शास्त्री)
अब समझ में आ रहा है क्यों विश्वास उठ गया है आपका , सब कुछ मिथक नजर क्यों आता है
http://praveenshah.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.html

Gourav Agrawal said...

ओह .. ये क्या मैं तो वैज्ञानिक तथ्य देना भूल गया
शरद पूर्णिमा के दिन सभी ग्रह की आवृत्ति एक हो जाती है। इससे पृथ्वी में आंतरिक कंपन होने से वृक्ष, पौधों और बीजों पर अनुकूल असर पड़ता है|
( पीपल्स फॉर एग्रीकल्चर एंड ग्लोबल एजुकेशन एंड इनवायरमेंट के डायरेक्टर समीर जी )
शरद पूर्णिमा के वक्त कास्मेटिक ऊर्जा बढ़ जाती है, इसका प्रभाव, वनस्पति और कृषि पर सकारात्मक रहता है।
(पर्यावरणविद् विनीत भटनागर)
शरदपूर्णिमा के दिन मध्यरात्रि को चंद्रकिरणों से ‘अमृत’ बरसता है। वनस्पति में भी चंद्रकिरणों से अमृतरूपी वर्षा होती
(डॉ. नारायणदत्त शास्त्री)
अब समझ में आ रहा है क्यों विश्वास उठ गया है आपका , सब कुछ मिथक नजर क्यों आता है
http://praveenshah.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.html

Gourav Agrawal said...

मुझे किसी भी फेंकू संस्कृति का नाम बता दे कोई
जिसमे ऐसी बनावटी कहानियाँ हो जिसमें बताई गए स्थान आदि
मौजूदा परिस्थितियों खोजी गयी हो
जैसे राम सेतु वो भी भारत और लंका ( मेरा मतलब श्रीलंका ) के बीच में
कमाल हो गया ना ??
ये सिर्फ एक उदाहरण है

Gourav Agrawal said...

मैं तो मानता हूँ की ये अच्छा है की अन्य चिकित्सा पद्दतियों का भी एवरेज से अच्छा ज्ञान हो किसी चिकित्सक को ( अपनी पद्दति में सिद्धस्त होने के साथ साथ )
कारण ??? : जहां आप हो वहां केमिस्ट की दुकान न हुई तो ???
कभी कभी जड़ी बूटियों का भी सहारा ले लेना चाहिए इसे प्रतिष्टा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए

Gourav Agrawal said...

मैं सोच रहा था इतना सारा ज्ञान कहाँ से आ रहा है सभी के पास की "सबकुछ मिथक" बन कर रह गया है
तो पिछली पोस्ट पर आये एक कमेन्ट ने मेरी दुविधा का हल कर दिया

Gourav Agrawal said...

अगर ग्रंथों का ओरिजिनल वर्जन सीख कर भी कोई सुधर जाता तो रावण जैसे पात्र नहीं होते उस ज़माने में
सीधी सी बात है "ज्ञान किसके पास है" उस पर निर्भर करता है की "नतीजे कैसे आने है" ??
कितने ही लोग पूरी रामायण को सिर्फ कमी निकलने के उद्देश्य से पढ़ते हैं
पूरी रामायण याद होती फिर भी वही हाल है

Gourav Agrawal said...

मैं ये भी मानता हूँ कोई भी चिकित्सा पद्दति या धर्म बुरे नहीं होते
अगर परेशानी में आते है तो अपने फोलोवर्स के कारण ही आते हैं
किसी भी एक का एकाधिकार नहीं होना चाहिए

Gourav Agrawal said...

@आदरणीय अमर जी
मैं भी आपको "आल टाइम चेम्पियन" ही मानता हूँ
इस ब्लॉग पर मौजूद सभी बुद्धिजीवियों (सही मायनों में ) में आपकी बात में सबसे अधिक मात्रा में सही तर्क होते हैं
और साथ ही कुछ नया सीखने को मिलता है वो भी आप अपनी ही एक खास शैली में लिखते हैं जो अच्छा लगता है
और इस बात के लिए मैं आपका आभारी हूँ .

Gourav Agrawal said...

@दिव्या जी
इस पोस्ट के लिए आपका हार्दिक आभार
मैं आपकी बात से सहमत हूँ .... इस पोस्ट के लिए भी धन्यवाद

Gourav Agrawal said...

@ अरविन्द मिश्र जी से ज्यादा विद्वान् लोग इस हिंदी ब्लॉग जगत में हैं। बस अफ़सोस यही है की पोपुलर उतने नहीं हैं।
@दिव्या जी
पोपुलर होंगे तो भी क्या होगा ??
इससे उनके तर्क कथित लेटेस्ट वर्जन का ज्ञान लेने वालों द्वारा स्वीकारे जायेंगे ये भी तो जरूरी नहीं है ना
अभी कुछ समय पहले भी एक विद्वान्( सही मायनों में ) द्वारा समुद्र मंथन पर दिए लेख को भी तो नकारने की कोशिश की गयी थी

Gourav Agrawal said...

@ दिव्या जी
लगता है..... मुझे आने में कुछ ज्यादा ही देरी हो गयी है
कोई जवाब नहीं आ रहा .... देर से आने के लिए माफ़ी
कुछ टिप्पणियाँ लेख के विषय से बाहर लग सकती हैं उसके लिए भी क्षमाप्रार्थी हूँ

Gourav Agrawal said...

वैसे जब जब मैं अनाकोंडा मूवी देखता हूँ मेरी आस्था समुद्र मंथन के बारे में बढ़ जाती है :))
लगता है अभी हमारे देश में वैसी मस्त टेक्निक नहीं है की सच को सच भी दिखा पाए :))

Gourav Agrawal said...

ओह .. मुझे अकेले में बातें करने जैसा लग रहा है
मैं तो जा रहा हूँ
बस ये टिप्पणियाँ बार बार आपके ब्लॉग पर बुला लेती हैं

ethereal_infinia said...

Dr. Amar:


Point on point response to your mentions:


1. ( Isn't it better than allowing themselves to be guinea-pig of their own half-cooked self-knowledge ? )

Enlightening to know that a doctor like you advocates patients to be treated as guinea-pig. Zmiles. God save your patients.


2. ( Faith cures.. as it is said. If true then why this hulla-bol on any pathy.. does n't such adaptation has some element of our empathy ? )

Faith is in the degree the doctor holds the certificate of. Not necessarily in his/her experiments with other forms of medicine.


3. (Take an example of China.. the meritorious students only are allowed to study Traditional Chinese Medicine, wherein Allopathy has a third place )

READ MY STATEMENT PROPERLY. I said 'medical stream'; did not state any one stream in particular. Is that clear, Dr. Over-smart?


4. ( No Doctor in the world has ever claimed such a position of being an alibi to God.. Please quote a reference, if anyone has it ! )

I am not sure which is poorer - your comprehension of English or my linguistic capability to express? Laughz. Will go with the latter and try to explain it again. My statement meant - If anyone were to be placed next to God in terms of importance of nurturing life, it is the Doctors. Is it clear or do you still need to be quoted a reference?


5. Yes, it is worth, because such doctors have sufficient knowledge of Human anatomy and physiology to rationale any adaptation, if he is concerned to provide relief to a precious ailing life ! फिर तो , होम्योपैथी का अविष्कार एक ऍलोपैथ के जिज्ञासाओं के चलते कभी न हो पाता ।
It is better to die in hands of a qualified fool than by follies of an ignorant fool ! If a skilled person, who is supposed to be a friend and philosopher in hard times, offer wisdom of ignorance, it becomes unpardonable !

What can one say when as a doctor you with all your vain arrogance declare that "it is better to die at the hands of a qualified fool." I pity your patients whom you attend to with such an attitude. But then, I trust you on both the counts - the adjective and the noun you used for yourself. Very befitting for doctors like you. Zmiles.


6. ( Be it... which would be comfortable for him in joining herd of quackes ! Can anyone recall the case of Dr. Shri Ram Lagu, who was stripped of his degree for advertising Vicks Lozenges , it is height of hypocratic reservations ! ) Dr. Lagu survived it, So is Vicks Logenzes ! ).

So you want a license to play with lives in the garb of experimentation of other forms of medicine. Very convenient! When you can not cure someone with your licensed medical stream's knowledge, you seek umbrage of liberty to try on that poor soul your 'knowledge' of other medical streams!! Damn pathetic.

7. ( You are right here, it is our curiosity which compell to inquisit into a promising proccess ! )

To inquire into a promising process is no excuse to play with life of patients. The pharmaceutical companies do a lot of research and testing before releasing the drug in the market. They have FDA to regulate them. Can you document such a formal, established research methodology when you are advocating usage of other streams of medicine? Or you simply try on the patient - Lagaa to tir, nahi to tukkaa.


As I conclude, I would categorically state that every form of medicine is respectable. But the usage of any other form of medicine apart from the one the doctor is educated properly and holds a degree for, is simply UNETHICAL and absolutely IMMORAL.


Arth Desai

डा० अमर कुमार said...


Answer To,
ethereal_what ?
Dr. Over-smart is presently in Jhabua, your neighborhood perhaps, on a bi-yearly visit.
Dr. Over-smar shall extend a warm welcome to YOU even, the person incognito ( allow Dr. Over-smart to retaliate ) if one bothers to see him. ( Seeing is believing )
Dr. Over-smart advises you to learn to accept realities of masses, not of classes !
Dr. Over-smart has a passion to serve the tribal populace, where even a Blood Count is unimaginable, what to say upon other issues .
Dr. Over-smart is least concerned about your FATWA on mortality rate in his patients bcause he still is digging grass for last 29 years, yet strive a perfection.
Dr. Over-smart can pity only on fictious faceless characters, roaming on web !
Dr. Over-smart refused comfort of serving in alien nation only for his own comforts !
Dr. Over-smart prefers to not to come in way of any infatuated faceless fool on the web.
Dr. Over-smart can teach various doctrines to fellas like you for next 25 years, believe me or spit on me !
Please accept my bold immoral blessings
- Dr. Over-smart
( as you prefered to call me )


Sorry Divya for being indecent at your blog, but the discussions here has started an unhealthy turn. I must resign from this site.
Keep your lamp lit!

ethereal_infinia said...

Part 01 of 02


Dr. Amar:

Good Morning!


When people run out of logical and topical arguments, they stoop to personal slander. Zmiles. You current post aptly shows the same.

But, rest assured, you can not offend me by your prejudices.

Now onto the answers to your snide remarks:


ethereal_what ?

It is not "what", READ PROPERLY. It is Infinia. And I guess you are aware of the concept of an id and a name. To make matters easy for you to understand, I state that ethereal_infinia is my id and Arth Desai is my name.


Dr. Over-smart is presently in Jhabua, your neighborhood perhaps, on a bi-yearly visit.

I do not visit biennially but stay perennially in Mumbai and as far as I know, Jhabua is a bit farther from here.


Dr. Over-smar shall extend a warm welcome to YOU even, the person incognito ( allow Dr. Over-smart to retaliate ) if one bothers to see him. ( Seeing is believing )

There is a name to me and if that is still incognito to you, well, you are free to your presumptions. As to seeing you, I have seen enough of your vain arrogance. Avarice has to have a cap. Else sky is the limit.


Dr. Over-smart advises you to learn to accept realities of masses, not of classes !

Advises are given by fools and taken by idiots. I can't accept it as I do not subscribe to that adjective for myself. You may have given it because you believe in the adage. [Did you not yourself spoke of 'qualified fool' in the previous comment?]Zmiles.

ethereal_infinia said...

Part 02 of 02



Dr. Over-smart has a passion to serve the tribal populace, where even a Blood Count is unimaginable, what to say upon other issues .

Your passion is appreciated.


Dr. Over-smart is least concerned about your FATWA on mortality rate in his patients bcause he still is digging grass for last 29 years, yet strive a perfection.

Either I do not know what Fatwaa is or again my linguistic capability has fallen short to get across my point to you. I guess, you know what Fatwaa is.


Dr. Over-smart can pity only on fictious faceless characters, roaming on web !

You can't provoke to me publish my address by such a childish act, can you? Try a better trigger.


Dr. Over-smart refused comfort of serving in alien nation only for his own comforts !

That is your personal preference. No need to blow bugles on it here without any context unless you are using this as a lash to whip other doctors who are abroad. Zmiles. Ek teer, do nishaan? Or shall I sing - Kahi pe nighaahe, kahi pe nishaanaa.......


Dr. Over-smart prefers to not to come in way of any infatuated faceless fool on the web.

The 'faceless' gripe is already addressed with the name being given from the very start. Doctor, tell me, you call fool to all and sundry when you are irked? Yesterday you called your own self so and now today, it is me. Laughz. As to 'infatuated', theory of relativity talks of a frame of reference. Biases often color our vision adversely.


Dr. Over-smart can teach various doctrines to fellas like you for next 25 years, believe me or spit on me !
Please accept my bold immoral blessings
- Dr. Over-smart
( as you prefered to call me )

This is the only point you have been topical. Same question again - Are you qualified to teach various doctrines by way of accreditation from recognized bodies. You are a doctor so in one particular medical stream, I fully accept your supremacy. But what about the rest?


When the blessings are ill-intended and openly called 'immoral', am I a fool to accept them? Zmiles.

Incidentally, my parents have given me a nice upbringing which would not make me spit on anyone.



Arth Desai

Divya said...

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@ अर्थ देसाई -

आपने विचार रखे, आपका आभार । डॉक्टर और जनता ये दोनों क्या सोचते हैं , यह जानना बहुत जरूरी है। आपके विचार जानने के बाद डॉक्टर अमर ने आपके विचारों का समाधान दिया , आपको अपनी असहमति बिना उन्हें offend किये जतानी चाहिए थी। जब उनका नाम डॉ अमर है तो आपको उन्हें डॉ ओवर स्मार्ट कहकर अपमानित नहीं करना चाहिए।

आपका कहना है , एक पैथी के डॉक्टर को अपनी ही पैथी में चिकित्सा करनी चाहिए। सही कहा आपने , लेकिन ज्ञान वर्धन की कामना रखने वाले लोग सभी पैथियों को जानना चाहते हैं , तथा उसके उपयोग से यदि मरीज का लाभ होता है तो यह अच्छा ही है। चिकित्सक का कार्य रोग निवारण है ।

यदि तीनों पैथियों का समन्वय कर दिया जाए तो समाज में चिकित्सकों के प्रति सौतेला व्यवहार भी बंद हो जाएगा तथा रोगियों को भी इसका लाभ मिलेगा।
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Divya said...

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डॉ अमर -

आपने अपनी बात बहुत अच्छे तरीके से रखी है इसके लिए आपका आभार । आपने कहा आगे से आप इस ब्लॉग साईट पर नहीं आयेंगे। क्या आप इतने कमज़ोर हैं ? या फिर मेरी कोई दोष है जिसकी सजा दे रहे हैं ?
आपका यहाँ आना , और जाना दोनों आपका व्यक्तिगत निर्णय तथा आपकी स्वतंत्रता है , लेकिन आपके बहुमूल्य विचारों से वन्चित रहने का खेद रहेगा।
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Divya said...

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प्रवीण शाह जी-

आपके बहुत से प्रश्नों का उत्तर यहाँ शीघ्र ही रखूंगी। किसी बात को प्रमाडित करने अथवा उसके खंडन , दोनों के लिए विषय को अच्छी तरह समझना जरूरी है । विषय के साथ न्याय कर सकूँ इसके लिए अध्ययन का थोडा समय चाहती हूँ। चूँकि आयुर्वेद या होम्योपैथ में जानकारी कम है ,इसलिए जो भी साक्ष्य रखूंगी, उसे पढने के बाढ़ ही रखूंगी ।
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Divya said...

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@ गौरव-

आपने शरद पूर्णिमा से संबधित जो तथ्य रखा , वह बिलकुल वैज्ञानिक तथा मेरे लिए जानकारी से पूर्ण है। आपके इस प्रयास का आभार।
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Divya said...

डॉ अरुणा,

आप आयुर्वेद की चिकित्सक हैं, यही मुझसे कोई तथ्य या साक्ष्य को रखने में गलती हो जाए तो कृपया मार्गदर्शन कीजियेगा ।

आपकी आभारी रहूंगी।

Divya said...

.Dr R K Singh,

I completely agree with your views. Thanks for visiting here and sharing your valuable opinion in this regard.
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ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

The Doctor has a noble desire in his/her heart to cure the patient and it is a natural craving to increase knowledge in everyone.

But the moot point is - How creditable it is to experiment on patients with other forms of medicine which the doctor has learnt owing to the interests in other streams of medicine?

Is the doctor not aware that a life can be at stake, if his/her experiment backfires for any reason?

For a doctor, it is easy to wash away his/her hands with a polite Death Certificate owing to a failed experiment, but does the doctor think of the family who stand to lose a person just because the doctor wanted to 'try out' alternate medicinal stream on him/her?

All you doctors have your point and I have my point. The blog is just a ground for debate. Nor are you all going to stop what you are doing nor my fears are going to be allayed about it.

You [as in, all the doctors] are just as staunchly convinced on your 'right' to try other forms [though each one of you is not qualified/licensed/registered to practice that] as I am fiercely adamant about my stand that it is not the right thing to do.

No offense intended. None taken.


Arth kaa
Natmastak charansparsh

Divya said...

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@ Arth Desai,

Do not live in misnotion that doctors experiment with their patients.

Only a doctor knows what a patient means to him or her.

It's a sick mentality to criticize doctors every now and then.

When a doctor prescribes something , he knows very well what he is suggesting or prescribing.

Without the certainty of the medicine and it's results , no one prescribes anything.

Doctors are not fools nor butchers to play with precious lives of patients.
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सतीश सक्सेना said...

@डॉ अमर कुमार,
मुझे लगता है आपने मेरे लिए अपने कमेंट्स बिना मेरे विचार पढ़े ही लिख दिए ! मैं फिर कहता हूँ आपको होमिओपैथी की समझ नहीं है तो उसके बारे में कमेंट्स क्यों ? कष्ट क्यों ?
आपके कमेंट्स एलोपैथी पर ही होने चाहिए जहाँ आप विद्वान् हैं !
@"बस यही न कि, एक ऍलोपैथ को फ़ादर ऑफ़ होम्योपैथ कहे जाना आपको ग़वारा नहीं ?"
मैं सिर्फ आश्चर्य प्रकट कर रहा हूँ आपके कमेंट्स पर ?

सतीश सक्सेना said...

@ डॉ अमर
आपकी निष्पक्षता और विभिन्न विषयों पर आपके विषद ज्ञान के कारण आपको अक्सर गुरुवर कहता रहा हूँ, वह कभी भी दिखावे में अथवा हलके में नहीं कहा है ! आप मेरे इस सम्मान के सर्वथा योग्य थे और रहेंगे ! चूंकि आप एक प्रतिष्ठित एलोपैथिक डाक्टर हैं और आपने होमिओपैथी का अध्ययन नहीं किया है , इस बात को परिप्रेक्ष्य में रख कर, उक्त कमेंट्स किये गए हैं ! आपकी जगह कोई और होता तो मैं उस तरफ ध्यान भी न देता मगर डॉ अमर कुमार के व्यक्तित्व से मैं बहुत अपेक्षा रखता हूँ की वे न्याय करेंगे अतः बोला गया !
फिर भी आपके साथ साथ मेरा खुद का दिल भी दुखा है अतः मैं बिना किसी शर्त आपसे क्षमा चाहता हूँ !
आशा है अपने सतीश यार को दिल से माफ़ करोगे
सादर

Dr. shyam gupta said...

दिव्या जी, आपने बहुत अच्छा प्रसंग छेडा है, बहुत सी विवेचनाएं पढीं, कुछ पाश्चात्य ग्यान(अधूरा वैग्यानिक ग्यान= अग्यान ) से मिश्रित/ भ्रमित...
---यह प्रश्न ही गलत है, चिकित्सक तो सदैव श्रेष्ठ ही होता है, हां वह व्यक्ति जो उसके अन्दर है वह श्रेष्ठ है या नहीं इस पर ही अब कुछ आधारित होता है---योद्धा के हाथ तलवार अच्छा कार्य करती है, बन्दर के हाथ अनर्थ..अतः सिस्टम, संस्था, पद्धतियां, सभी जड वस्तु हैं श्रेष्ठ या बुरा होना उनका गुण नहीं है, उनमें कार्यरत/स्थित/ सम्बद्ध व्यक्ति जीवित वस्तु है वही अच्छा या बुरा होता है। अतः चिकित्सक यदि अच्छा व्यक्ति है तो वह अच्छा चिकित्सक , यदि लालची,(चिकित्सा को अर्थोपार्ज़न हेतु समझने वाला ) दंभी, व्यसनी, स्वार्थी, स्थानीय , देशज व जन जन की समझ न रखने वाला इत्यादि, मानवीय गुणों से हीन है तो बुरा चिकित्सक होगा। उसे चिकित्सक कहना ही चिकित्सा का अपमान है।
---जहां तक विभिन्न पेथियों का सवाल है---सभी पेथियां समान है बस नाक को पकडने का तरीका, समय के साथ अनुभवों के खजाने, मानवीयता का सम्मिश्रण एवं गरीब से गरीब को भी उपलब्धता के आधार पर उनकी श्रेष्ठता आंकनी व उनका प्रयोग करना व करलेना चाहिये विना किसी पूर्वाग्रह के।

Dr. shyam gupta said...

मैं स्वयम एलोपेथिक चिकित्सक/ सर्जन हूं, परन्तु होम्योपथिक, आयुर्वेदिक( कुछ कुछ यूनानी / नेचुरोपथी/ प्राणिक हीलिन्ग आदि भी )भी पढा है एवं मैं सभी का आवश्यकतानुसार प्रयोग करता हूं। वस्तुतः रोग का नहीं रोगी का उपचार किया जाना चाहिये।
---अपने अनुभव से मैं भी इसी नतीजे पर हूं कि--आयुर्वेद सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति है---एलोपथी की समस्त विधायें इसमें किसी न किसी रूप में सन्निहित हैं । हां एडवान्स्मेन्ट तो समय के साथ होते हैं जो अन्य क्षेत्रों मे विकास के साथ आते हैं।
---अन्ततः जो पैसे को अलग रखकर कार्य करे वही श्रेष्ठ चिकित्सक----
---अब बहस श्रेष्ठता व कुशलता में भी होनी चाहिये??

Jay said...

मेरे गुरु का कथन है कि "कोई भी ज्ञान होने का अर्थ ही यह है कि अब तक हम उस विषय विशेष के कितने मूर्ख थे।"
परन्तु ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती आप अपनी अन्तर्मात्मा से पूछ कर देखें भीतर से आवाज आयेगी आप अपने ही विषय के पूर्ण ज्ञानी नहीं, इस धरा पर ऐसा कोई नहीं, इस स्थिति में बेहतर विकल्प तो यह है कि अपने ही विषय का अध्ययन/प्रयोग किया जाए।
अब रही बात चिकित्सा पद्धतियों की तो आयुर्वेद में कुछ निश्चित सिद्धांत होते हैं। जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।
होम्योपैथी में भी एक निश्चित सिद्धांत (समान समान को ठीक करता है) है, हैनीमन द्वारा होम्योपैथी शब्द इसी सिद्धांत के आधार पर दिया। ऐलोपैथी शब्द हैनीमन की देन है जिसका अर्थ है विपरीत चिकित्सा पद्धति। हैनीमन जो कि मूलतः एक ऐलोपैथ ही थे, को एक तरफ अपनी पद्धति के दोष व सीमाऐं दिखी दूसरी ओर होम्योपैथी के गुण व विस्तार उन्हें जो बेहतर लगा उसमें अपना जीवन लगा दिया।
संभातः वर्तमान में कुछ ऐलोपैथिक चिकित्सकों के पास हैनीमन की वह दृष्टि ही नहीं जिससे वह होम्योपैथी ऐलोपैथी की निष्पक्ष तुलना कर सकें, यदि कर पाते तो सभी होम्योपैथ बन चुके होते। कुछ के लिए सरकारी नियम आड़े आते हैं पर याद रखें नियम बनाने वाले भी ऐलोपैथ ही है आयुर्वेद या होम्योपैथिक चिकित्सक नहीं। नतीजा एक खिचड़ी चिकित्सक।

Divya said...

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Jay,

Thanks for your wonderful comment.I admire your thinking. I wish everyone can have a clear vision like you.
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एस.एम.मासूम said...

मैं आयुर्वेद पे अधिक विश्वास करता हूँ लेकिन १० दिन पहले मैं अपने एक मित्र को शुगर की बीमारी के कारण, एक आयुर्वेद के पास ले के गया. उस डॉ ने इलाज से मना कर दिया और कहा , ऐलोपैथिक चिकित्सकों के पास जाओ.

ZEAL said...

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मासूम जी ,

कई बार डाक्टर , केसेज़ को रेफेर करते हैं। इसमें चिकित्सा पद्धति का दोष नहीं, चिकित्सक का व्यक्तिगत मामला है की वो क्या समझ सकता है और क्या नहीं। एक ही चिकित्सक , सभी प्रकार के रोगों का इलाज करने में सक्षम नहीं होता ।

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Anonymous said...

keinem befriedigenden Resultate gefuhrt.