Friday, July 23, 2010

सावधान !---आभासी दुनिया का एक बदसूरत पहलू---

पुरुष एवं स्त्री दोनों के हित में.....

पिछले वर्ष अखबार में न्यूज़ आयी की बंगलोर में कुछ लडकियां , आभासी दुनिया के ज़रिये अमीर लड़कों को फंसा रही हैं, फिर उन पर इमोशनल अत्याचार करके उनसे पैसे ऐंठ रही हैं।

तुरंत पिताजी और भाई का फ़ोन आया कि इन्टरनेट यूस करना बंद करो, बहुत खतरा है।

हमने कहा ख़बरों में बताया गया है की लड़कों पे खतरा मंडरा रहा है , आप मुझे क्यूँ भयाक्रांत कर रहे हैं? पिताजी ने कहा, जब लड़के खतरें में हैं तो सोचो लड़कियों का क्या हाल होगा ?

खैर पुरुषों का तो नहीं जानती , लेकिन स्त्री होने के कारण जो अनुभव किया है वो व्यक्त कर रही हूँ॥

रियल लाइफ में तो ऐरे , गैरे , नत्थू खैरे किसी को मौका नहीं मिलता , अपने से बेहतर पुरुष अथवा स्त्री से बात का या फिर दोस्ती का। आभासी दुनिया ने आपस में दोस्ती और चर्चा को बहुत सुलभ बना दिया है। लेकिन ज्यादातर चीज़ों का गलत प्रयोग ही होता है , जो यहाँ भी देखने को मिलता है ।

कुछ पुरुष , ऊँगली पकड़कर पहुंचा पकड़ लेते हैं। पहले महिला कि घरेलु समस्याएं सुनते हैं, उसे मानसिक सपोर्ट देते हैं, फिर अपना दुखड़ा रोते हैं और महिला कि सहानुभूति लेते रहते हैं। धीरे धीरे उसपर अधिकार जमाने कि चेष्टा करते हैं , उसके वजूद का मालिक बनने कि कोशिश करतें हैं। महिला यदि मानवता के चलते , उस व्यक्ति से शराफत से पेश आती है, सहानुभूति रखती है, उसकी उलझनों को सुलझाने का एक सार्थक प्रयास करती है , एक अच्छी दोस्त का फर्ज निभाती है , तो पुरुष उसे फॉर ग्रांटेड ले लेता है तथा उसके भोलेपन का नाजायज़ फायदा उठता रहता है। स्त्री में बर्दाश करने कि क्षमता ज्यादा होने के कारण तथा स्वभाव से सहेनशील होने के कारण , वह पुरुष मित्र कि गैर -वाजिब बातों को बर्दाश्त करती रहती है।

जब बर्दाश्त कि हदें टूटने लडती हैं , तो घुटन से मजबूर होकर , वह स्त्री दूरी बना लेती है।

लेकिन यह दूरी पुरुष के स्वाभिमान [अहंकार] को चोट पहुंचती है और वह स्त्री का शिकार न कर पाने से आह़त होकर, तरह तरह से उसे प्रताड़ित करने लगता है। लेकिन बुद्धिमान स्त्री इस विषम परिस्थिति से बाहर आ जाती है।

संभवतः पुरुष भी आभासी मोहक सुन्दरता के शिकार होते होंगे । इसलिए पुरुष एवं स्त्री दोनों को आभासी मायाजाल से सावधान रहने कि जरूरत है।

कोई ऑथेंटिक बात तो नहीं है यह फिर भी मुझे लगता है है कि - पुरुष, पुरुष के साथ तथा स्त्री , स्त्री कि बेहतर मित्र हो सकती है । पुरुष और स्त्री के बीच दोस्ताना रिश्तों कि उम्र बहुत छोटी है।

दोस्ती का अर्थ जो स्त्री समझती है, वह पुरुष कि परिभाषा से मेल नहीं खाता। स्त्री समझती है , यह कितना मृदु स्वभाव का है, एक अच्छा मित्र है। जबकि पुरुष चाहता है कि यह सिर्फ मेरी होकर , मुझे ही समर्पित रहे। किसी दुसरे से बात ही न करे। लेकिन यही कोई स्त्री पुर्णतः समर्पित है , तो पुरुष उसको पाने के बाद अगले शिकार कि तलाश में निकल पड़ता है। ये सिलसिला चलता रहता है, कभी न थमने के लिए।

क्या इसका कोई हल है ?

जी हाँ इसका हल है ।

पिता , भाई , पति तथा पुत्र के अतिरिक्त स्त्री एवं पुरुष में यदि कोई रिश्ता मिठास के साथ जीवित रह सकता है तो वह सिर्फ भाईचारे का रिश्ता है।

विश्वबंधुत्व !

वैसे आपका क्या ख़याल है ?

87 comments:

arvind said...

पिता , भाई , पति तथा पुत्र के अतिरिक्त स्त्री एवं पुरुष में यदि कोई रिश्ता मिठास के साथ जीवित रह सकता है तो वह सिर्फ भाईचारे का रिश्ता है।
...bilkul sahee.

Coral said...

नहीं दिव्या जी, मुझे नहीं लगता इसका कोई हल हमारे समाज के पास है ... क्यू कि जहा स्त्री को एक भोगी तथा कनिष्ठ माना गया है वाह बराबरी का रिश्ता देना इस पुरुषी समाज के लिए बहुत कठिन बात है !

सुन्दर पोस्ट के लिए बधाई !

Gourav Agrawal said...

हल तो बिलकुल ठीक निकाला है "विश्वबंधुत्व"

Gourav Agrawal said...

@पुरुष और स्त्री के बीच दोस्ताना रिश्तों कि उम्र बहुत छोटी है।

ऐसा नहीं है वाक्य कुछ ये होना चाहिए छोटी उम्र ( या समझ ) से ये दोस्ताना छोटे समय के लिए टिकता है

एक बात तो ये की विवाह से पहले मित्रता ही खतरे का सिग्नल है
दूसरी बात ये की विवाह के २५ वर्ष बाद दोस्ती का सच्चा मतलब समझ आता होगा ( बड़ी उम्र में जा कर )

Gourav Agrawal said...

@दोस्ती का अर्थ जो स्त्री समझती है, वह पुरुष कि परिभाषा से मेल नहीं खाता।

अगर ऐसा कुछ है की एक महत्वपूर्ण विषय(दोस्ती ) पर विचारधाराएँ मेल नहीं खा रहीं तो इसका सीधा सा मतलब है दोस्ती नहीं होनी चाहिए / करनी नहीं चाहिए

@स्त्री समझती है , यह कितना मृदु स्वभाव का है, एक अच्छा मित्र है।
@जबकि पुरुष चाहता है कि यह सिर्फ मेरी होकर , मुझे ही समर्पित रहे

ये जो स्वभाव आपने बताएं हैं ये आपके स्वयं किये गए सर्वे पर आधारित लगते है , पर ये ही जरूरी नहीं
अगर कोई ये कह दे तो .......

पुरुष समझता है , यह कितना मृदु स्वभाव की है, एक अच्छी मित्र है।
जबकि स्त्री चाहती है कि यह सिर्फ मेरा होकर , मुझे ही समर्पित रहे

Gourav Agrawal said...

तो मेरे अनुसार हल है की मित्रता का अगर उदाहरण लें तो मित्रता वाही है जो "हम दिल दे चुके सनम" में अजय देवगन और ऐश्वर्या राय के बीच दिखाई गयी थी. (नोट : दोनों विवाहित हैं ) किसी एक और से भी अगर सच्ची मित्रता हो तो मुश्किल ही है की मित्रता की उम्र कम हो ( चाहे मित्रों की उम्र कम ही हो ) दोनों और से है तो अच्छी बात है
जो रिश्ता निस्वार्थ है वही मित्रता जैसा है

Gourav Agrawal said...

अंत में सार मेरे अनुसार ये है
हर सकारत्मक रिश्ते में मित्रता होती है ( भाई , पति, पिता, )
पर मित्रता नाम का अपने आप में कोई रिश्ता नहीं होता
मित्रता तो सिर्फ सुंगंध है

@ दिव्या जी

ये पोस्ट सच में बहुत अच्छी है

प्रवीण पाण्डेय said...

बंगलोर को न लपेटा जाये, घर से बाहर निकलना बन्द हो जायेगा।
भाईचारा और बहनचारा दोनों ही हो।

Priya said...

har rishtey ki apni seemay aur maryadayein hoti hain...chahe wo stri ke saath stri ka rishta ho ya purush ke saath purush ka rishta ya fir stri aur purush ke beech rishta....kisi bhi rishte ki poornta ke liye mutual understanding bahut zaroori hai....iske bina koi rishta poorn nahi hota....Aur fir Dosti jaisa parvitra to koi risha hi nahi.....maaf kigiye is badalte yug mein aapki is vichaar se ham sahmat nahi hai

Gourav Agrawal said...

@आदरणीया प्रिया जी

मैं ये मानता हूँ की जो विचार जमाने के साथ बदल जाते हैं , वो धोखा देते हैं
जैसे हर विषय के बेसिक कंसेप्ट वही रहते हैं , राइटर , पब्लिशर बदल जाते हैं

@har rishtey ki apni seemay aur maryadayein hoti hain.

फिर ये समस्या भी तो है की हमारा समाजिक ढांचा अक्सर ये कह देता है की सारी सीमायें मर्यादाएं स्त्री पर ही लागू होती हैं
मेरा बताया विचार हर समय पर फिट बैठ रहा है

honesty project democracy said...

अच्छे बुरे लोग स्त्री व पुरुष दोनों रूप में हैं ,रही बात इन्सान होने की तो उसकी तलाश तो आपको ही करनी है क्योकि सामाजिक परिस्थितियाँ ऐसी हो गयी है की ज्यादातर लोग इंसानियत को भूल चुके हैं या भूलने को मजबूर किये जा रहें है ,फिर भी अगर सारे इन्सान एकजुट होकर इस समस्या का समाधान ढूंढें तो इंसानियत को पूरी तरह दुबारा जिन्दा किया जा सकता है जिसके लिए बहुत ही मेहनत ओर निःस्वार्थ भावना की जरूरत है ... साथ ही इसके लिए समय व साधन भी खर्च करने की जरूरत है जो शायद कोई नहीं करना चाहता है ?

ashish said...

मित्रता में लिंग भेद , तो वो सच्ची मित्रता नहीं हो सकती है. मुझे लगता है की रहीम की ये पंक्ति अभी भी प्रासंगिक है "विपति कसौटी जे कसे , ताहि सांचे मीत " वैसे ये , विश्वबंधु अच्छा लगा , साथ में विश्वभागिनी भी प्रासंगिक शब्द हो सकता है..

Divya said...

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विश्वबंधुत्व के साथ विश्वभागिनी का जोड़ अच्छा लगा।
आभार आशीष जी एवं प्रवीण जी।
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Divya said...

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दोस्ती से पवित्र रिश्ता कोई नहीं, ये सत्य है। इसीलिए शायद इसको निभा नहीं पाते लोग गरिमा के साथ।

प्रिया किस बात से असहमत है , समझ नहीं आया।
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rashmi ravija said...

दिव्या,यह बहुत कुछ स्त्री पर भी निर्भर है कि वह दोस्ती को किस तरह लेती है और कितनी लिबर्टी देती है...बहुत कुछ क्या ,सब-कुछ स्त्री पर ही निर्भर है....उसे ही मीठी बातों की परख होनी चाहिए...यहाँ कोई 16,18, साल की किशोरियां नहीं हैं...उन्हें इस दुनिया की पूरी समझ है.

जो महिलायें धोखा खाती हैं...वे इसका रास्ता खुद तैयार करती हैं. वे भी एक सीमा तक पुरुष को छूट देती हैं...और फिर जब Taken for granted ली जाती हैं तब ऑंखें खुलती हैं.

प्रारम्भ से ही एक स्वस्थ दोस्ती होनी चाहिए...

"स्त्री में बर्दाश करने कि क्षमता ज्यादा होने के कारण तथा स्वभाव से सहेनशील होने के कारण , वह पुरुष मित्र कि गैर -वाजिब बातों को बर्दाश्त करती रहती है।"

यह तो एक पल को भी नहीं होना चाहिए....जो गैर-वाजिब बात लगे ,उसका तत्क्षण विरोध करना चाहिए.

Divya said...

@-दूसरी बात ये की विवाह के २५ वर्ष बाद दोस्ती का सच्चा मतलब समझ आता होगा ( बड़ी उम्र में जा कर ) ....

गौरव जी,

'समझ' का उम्र से कम ही वास्ता लगता है।

" Habits get married after 20 years of age "

People often grow rigid and stubborn with aging.
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Divya said...

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@-honesty project democracy -

बिलकुल नया पहलु दिखाया आपने। यदि इंसानियत को प्राथमिकता दी जाए तो दोस्ती कायम रह सकती है । लेकिन अफ़सोस, लोग स्वार्थवश, इंसानियत को भुला देते हैं।

रश्मि जी की बात से पूर्णतया सहमत हूँ।
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shikha varshney said...

दिव्या जी !९०% आपकी बात से आज मैं सहमत हूँ :) काफी कुछ ठीक कहा आपने ..मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी कुछ पंक्तियाँ एकदम ठीक लगी मुझे .
पर ये बात भी एक हद तक ठीक लगती है मुझे.वाकई आपका इस्तेमाल कोई तब तक नहीं कर सकता जब तक आप उसे इस्तेमाल करने न देना चाहे ..कई बार भावनाओं के तहत कमजोर होकर महिलाएं ही बढ़ावा दे देती हैं और उसके चलते जैसा कि आपने कहा गलत समझ ली जाती हैं ..और परिणाम पुरुष और महिला दोनों के लिए ही कष्टकारी होता है ....
जहाँ तक रही बात कि पुरुष - महिला की दोस्ती नहीं हो सकती ..ऐसा मुझे नहीं लगता ..बिलकुल हो सकती अगर रिश्तों में सुलझाव और पारदर्शिता हो .

वन्दना said...

जब तक स्त्री नही चाहे कोई उसका फ़ायदा नही उठा सकता……………मित्रता का यदि कोई गलत अर्थ निकाले तो उसे वहीं छोडा जा सकता है ये हर स्त्री और पुरुष के हाथ मे होता है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपकी बातें विचारणीय हैं।
………….
ये ब्लॉगर हैं वीर साहसी, इनको मेरा प्रणाम

डॉ टी एस दराल said...

आभासी दुनिया के रिश्ते भी आभासी ही होते हैं । इसलिए सावधानी की तो ज़रुरत रहती है ।
पर स्त्री और पर पुरुष के रिश्तों में साधुवाद ढूंढना खुद का छलावा है।

VICHAAR SHOONYA said...

दिव्या जी स्त्री व पुरुष के मध्य मित्रता वाले मुद्दे पर मैं अपने विचार प्रकट करता रहता हूँ जो कि बिलकुल ही आपकी बातों से मेल खाते हैं. मेरा मानना तो यह है कि स्त्री व पुरुष के मध्य सिर्फ मित्रता नहीं हो सकती हा अगर आप किसी विपरीत लिंगी से मित्रता करना ही चाहते हैं तो अपने पति या पत्नी को अपना प्रिय मित्र बनाइये. वो मित्रता आजीवन निभेगी.

shailendra said...

BAKI SAB SAMBANDH(RELATION) HAI
MATLAB YE KI THORA/KUCHH(A LITTLE)
BANDHAN HAI
L E K I N
MITRATA ME KOI BANDHAN NAHI HAI
AUR JAB BHI KOI BANDHAN KI BAT AATI
HAI TO "MITRATA" GAYAB HO JATI HAI

"PHOOL AUR USKE SUGANDH ME
CHAND AUR USKE CHANDNI ME
JO FIRK HAI OHI PHIRK BAKI
SAMBANDH AUR MITRATA ME HAI"

aur hann ye kisi umra, ling, jati, dharm ka
mohtaz nahi hai.
jahan sahisnuta, sahridayata, vichar, sansakar ki kami hogi wahan mitrata sirf ek
sabd hi hoga,bhaw nahi ban payega.

SKJHA
CHD.

ajit gupta said...

सै‍द्धान्तिक रूप से हम चाहे कितनी भी और कैसी भी व्‍याख्‍या कर लें लेकिन व्‍यवहार में तो ऐसा ही होता है। नौकरीपेशा स्त्रियां तो सब कुछ जानती हैं। इसलिए प्रत्‍येक रिश्‍ते में एक दूरी जरूरी है। हमें तो उम्र की इस पड़ाव पर जाकर कहीं चैन मिला है, नहीं तो लोग पास सरकने का ही बहाना ढूंढते रहते हैं। महिलाओं के लिए सच में बुढापा काम की चीज है। ह‍ा हा हा हा। बहुत ही सटीक व्‍याख्‍या की है तुमने, बधाई।

anshumala said...

मित्रता की आयु इस बात पर टिकी होती है की जो दो लोग मित्र बन रहे है उनके लिए मित्रता की क्या परिभाषा है कुछ लोगों के लिए मित्रता बस मौज मस्ती करने स्कुल कालेज या आफिस तक सिमित होता हो तो कुछ लोगों के लिए एक गहरा जीवन भर का रिश्ता इनकी मित्रता हमेशा जीवित रहती है जबकि पहली वाले की आयु बहुत छोटी होती है | पर आप ने स्त्री पुरुष के जिस रिश्ते की बात की है उसे मित्रता दोस्ती का नाम मत दीजिये ये दोस्ती शब्द को गाली देने जैसा है | जिस रिश्ते की आप बात कर रही है उसे आज के युवा उसे टाइम पास कहते है | कभी कभी ये दोनों एक दुसरे को टाइम पास मान कर चलते है परेशानी तब हो जाती है जब दोनों में से कोई एक इसे गंम्भीरता से लेने लगता है | रही बात नारी का फायदा उठाने की तो उसे तो हमेसा सतर्क रहना चाहिए फायदा उठाने वाले तो बस मौका देखते है वो किसी भी रूप में आप के पास आ सकते है |

'अदा' said...

दिव्या जी,
इसमें कोई शक नहीं ..कि जिन ऐरे गैरों को कोई नहीं पूछता ...उनकी यहाँ पूछ हो जाती है...
हम किसी से अपने स्वस्थ्य सम्बन्ध तब तक रखते हैं ..जब तक वो अपनी औकात में रहते हैं .....जहाँ उन्होंने अपनी जात दिखाई हम लात मार देते हैं...
हाँ नहीं तो...!!

Arvind Mishra said...

वाकई आपका इस्तेमाल कोई तब तक नहीं कर सकता जब तक आप उसे इस्तेमाल करने न देना चाहे ..कई बार भावनाओं के तहत कमजोर होकर महिलाएं ही बढ़ावा दे देती हैं और उसके चलते जैसा कि आपने कहा गलत समझ ली जाती हैं ..और परिणाम पुरुष और महिला दोनों के लिए ही कष्टकारी होता है ....

महिलाओं के लिए सच में बुढापा काम की चीज है। ह‍ा हा हा हा।
शिखा वार्ष्णेय जी और डॉ अजित गुप्ता जी से शब्दशः सहमत!

Virendra Singh Chauhan said...

Divya ji......I think, it depends person to person. I may be wrong.

By the way your post was a good one.

Mayurji said...

divya ji
yeh sab mahila aur purush ki personality par nirbhar karta hai. Vese adhilansh vahi hota hai jo aapne likha hai. purush aur mahila ek dusre ke rishte ko kis tarah lete hai yeh us par nirbhar hai.

vaise dosti se badhkar koi tohfa ho nahi sakta. vaise bahut satik likha hai aapne.... shukriya

jate jate ek chhota sa sher

Izhaar e Ishque unse na karna tha e Galib
Ye kya kiya ki dost ko dushman bana liya.

Mayur

http://mayurji.blogspot.com/

Priya said...

Divya..ham sirf itna kahna chachte they ki achcha-bura to koi bhi ho sakta hai....ek certain age ke baad hamein ye abhaas ho jaata hai ki samne waale ka intention kya hai...aur waise bhi striyon ki sixth sense prakriti ne bahut teevr kari hui hain so unhe bahut jald aabhaas hot hain....mera virodh aapke is vaktavya se hai "पिता , भाई , पति तथा पुत्र के अतिरिक्त स्त्री एवं पुरुष में यदि कोई रिश्ता मिठास के साथ जीवित रह सकता है तो वह सिर्फ भाईचारे का रिश्ता है। ghar se mile sanskaar dono ko maryadaon mein rakhna jaante hain......aur Dosti jaisa pawan shayad kuch bhi nahi....Jismein bandhan nahi hota Vicharon ko vyakt karne ki poorn swatantrata hoti hai ......kai baar shayad pati-patni bhi ek doosre se khul kar baat nahi kar paate....so Dosti par aisi soch ke khilaaf hoon main.... agar chunaav achcha hai to umra bhar chalta hai ye rishta .....wo bhi poorn pavitrata ke saath

Udan Tashtari said...

अच्छे बुरे हर तरह के लोग हर तरफ है. जीवन में सर्तक रहते हुए खुशहाली से रहना होता है, बस और क्या!!

P.N. Subramanian said...

"बुढापा काम की चीज है" क्योंकि आपकी हरकत क्षम्य हो जाती है. परन्तु नीयत तो नहीं बदलती!

डा० अमर कुमार said...
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Mithilesh dubey said...

badhiya laga padhkar, abhashi duniyan to hai khatnark, esme do ray nahi hai

सम्वेदना के स्वर said...

दिव्या जी, सही हो सकती है आपकी बात..सही होगी भी..या सच ही है, क्योंकि इतनी भारी संख्या में ये सारे उदाहरण समाज में बिखरे पड़े हैं कि आपकी बात को सच मान ही लेना पड़ता है... लेकिन मन कहता है कि इस बात को जेनेरलाईज़ नहीं किया जा सकता... कई लोग ये भी कहते हैं कि यह रिश्ता आग और पेट्रोल के जैसा होता है... प्रकृति ने जब अलग अलग बनाया है तो दोनोंआग या दोनों पेट्रोल तो हो नहीं सकते… लेकिन सवाल इन सम्बंधों के स्वस्थ होने पर है जो कि मानसिक रूप से स्वस्थ एवम् मच्योर होने से ही सम्भव है... चुँकि हम समझते हैं कि उम्र के साथ मच्योरिटी आ जाती है इसलिए मान सकते हैं कि अधिक उम्र के सम्बंध हेल्दी होते हैं, आग और पेट्रोल जैसे नहीं. जबकि इसके अपवाद भी मैंने देखे हैं...
स्वयम् मेरी कई महिला मित्र हैं और कई बरसों से हैं, जिनके साथ मेरे बहुत अच्छे सम्बंध हैं, क्योंकि हम दोनों ही मर्यादाओं को समझते हैं.वैसे वसुधैव कुटुम्बकम का रिश्ता तो है ही सबसे मधुर!!

singhsdm said...

इस पूरे मामले में दोनों पक्षों की समझदारी की जरूरत है.....पूरे पहलू को एक ही चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए....असहमति के लिए माफ़ी चाहूँगा.

nilesh mathur said...

अपना अपना नजरिया है, आप ने अपने विचार रखे हैं, लेकिन हम इनसे सहमत नहीं हैं, हो सकता है की आप को कोई सच्चा पुरुष मित्र नहीं मिला हो!

nilesh mathur said...

दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जो इंसान खुद चुनता है, बस आपका चुनाव सही होना चाहिए, जिसके मन में आपके बारे में गलत विचार आये वो आपका दोस्त है ही नहीं, और फिर हर पुरुष और हर स्त्री एक जैसे नहीं होते, अच्छा दोस्त तो इश्वर की देन होता है और दोस्ती ईस्वर का तोहफा, कृपया अपना नजरिया बदलें, माफ़ कीजिएगा!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

सौ बातों में भारी यह बात पुरुष और स्त्री के बीच दोस्ताना रिश्तों कि उम्र बहुत छोटी है।

धन्‍यवाद।

sanu shukla said...

"जिन्दगी मे
दोस्त से बढ़कर कही
कुछ भी नही
कुछ भी नही,
जन्म यदि वरदान है तो,
इसलिये ही इसलिये
मोह से मोहक सुगन्धित
प्राण है तो इसलिये
जिन्दगी मे
दोस्त से सुखकर कही
कुछ भी नही कुछ भी नही..!!"


अपना और सामने वाले का मन साफ़ होना चाहिये बाकी ये इतना महत्व नही रख्ता कि सामने स्त्री है या पुरुस.....!! रही बात दोस्ती की तो कई बार देखने मे आता है कि पुरुश पुरुश कि भी नही निभती और महिला महिला की नही निभती...जब्कि कही पुरुश और महिला की दोस्ती इतनी परवान चढ़ती है कि आस पास के लोगो को खलने लगती है..! पर अगर मर्यादा नही रही तो भाई-भाई के रिश्ते नही चलते ये तो दोस्ती है...!

sanu shukla said...

"जिन्दगी मे
दोस्त से बढ़कर कही
कुछ भी नही
कुछ भी नही,
जन्म यदि वरदान है तो,
इसलिये ही इसलिये
मोह से मोहक सुगन्धित
प्राण है तो इसलिये
जिन्दगी मे
दोस्त से सुखकर कही
कुछ भी नही कुछ भी नही..!!"


अपना और सामने वाले का मन साफ़ होना चाहिये बाकी ये इतना महत्व नही रख्ता कि सामने स्त्री है या पुरुस.....!! रही बात दोस्ती की तो कई बार देखने मे आता है कि पुरुश पुरुश कि भी नही निभती और महिला महिला की नही निभती...जब्कि कही पुरुश और महिला की दोस्ती इतनी परवान चढ़ती है कि आस पास के लोगो को खलने लगती है..! पर अगर मर्यादा नही रही तो भाई-भाई के रिश्ते नही चलते ये तो दोस्ती है...!

शिवम् मिश्रा said...

बढ़िया आलेख .......माफ़ कीजियेगा पहले नहीं आ पाया ! शायद आप जानती है क्यों ! आपकी शुभकामनायो के लिए बहुत बहुत आभार !

sanu shukla said...
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राम त्यागी said...

वैसे सच्ची दोस्ती में स्त्री पुरुष का क्या भेदभाव ....जहाँ सच्चाई नहीं उधर तो हर चीज की उम्र कम होती है !!

वाणी गीत said...
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वाणी गीत said...

जहाँ तक ब्लॉगजगत की बात है यहाँ सिर्फ औपचारिक मित्रता होती है ....यहाँ हम पढने लिखें के लिए इकठ्ठा होते हैं ..डेटिंग के लिए नहीं ...इसलिए जो भी बातचीत होती है इससे सम्बंधित विषयों पर ही होती है ...हां जो इसके बाहर भी रिश्ता बधन चाहते है ये उन व्यक्तियों पर ही निर्भर करता है ...

ईमानदार और पारदर्शी रिश्ते ही मित्रता का लम्बा सफ़र तय करते हैं ...वो चाहे पुरुष का पुरुष से हो या स्त्री का स्त्री से ...यह पर्सन से पर्सन पर निर्भर करता है ...एकाधिकार जताने , जलन , ईर्ष्या जैसा भावनात्मक दबाव स्त्री से स्त्री और पुरुष से पुरुष के रिश्तों में भी होता है...

आभासी दुनिया में मित्रता तो क्या भाई -बहन के रिश्तों की गारंटी ही कौन ले सकता है ..आभासी ही क्यों वास्तविक दुनिया में भी ...धर्म भाई और बहनों द्वारा धोखे दिए जाने के अनगिनत किस्सों से अखबार पत्रिकाएं भरी होती है ...

रक्त सम्बन्धियों में मित्रता अच्छी और मजबूत हो सकती है , बहुत ही अच्छा हो यदि ऐसा हो तो ..मगर ऐसा होता नही है ...किसी भी पत्रिका या अखबार का " मन की उलझन " कॉलम पढ़ कर देख लें , इस रिश्तों की असलियत सामने आ जाती है ...जमीन ज्यदाद और धोखाधड़ी , हत्या जैसे किस्से रक्तसम्बन्धियों के बीच ही ज्यादा हैं ..

हाँ ..आजकल का बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड जैसा चलन मेरी समझ से बाहर है ...इन रिशोत्न ने और फिल्मों में पेश इसके विकृत रूप ने दुनिया के इस सबसे खूबसूरत रिश्ते को भ्रष्ट करने में अहम् भूमिका निभायी है ...
बुढ़ापा महिलाओं के लिए सुरक्षित समय है .....सचमुच ..!
मगर अभी एक दो दिन पहले ही पढ़ा कि अमीर उम्रदराज़ महिलाएं अपने लिए कम उम्र के मजबूर और गरीब शौहर खरीद रही हैं ...पुरुषों , अमीर महिलाओं से जरा बच के ....:):)

Gourav Agrawal said...

@'समझ' का उम्र से कम ही वास्ता लगता है।

@दिव्या जी
जब तक इंसान उर्जावान रहता है (मतलब कम उम्र से है ) तब तक उसके मौजूद मित्रों में उसे ये पता नहीं होता की कितने लोग किसी स्वार्थ विशेष से जुड़े हैं जब उम्र ढलने लगती है तो रिश्तों की भीड़ छंटने लगती है
( उन परिस्थितियों में जब निर्भरता बढ़ रही हो, आर्थिक , शारीरिक )

एक लम्बे समय बाद मानव की समझ सही मायनों विकसित होती होगी

Gourav Agrawal said...

अपनी तो श्रद्दा मुह बोले रिश्तों में तब से है जब से हुमायूँ को भेजी गयी राखी के बारे पढ़ा है

ये रचना पढ़ें अभी बनाई है

कैसे कहें की रिश्तों में
हो असली या आभासी
कोई बात नहीं होती
फर्क तो पड़ता है इस बात से
की रिश्ते निभाने वाला कौन है
रिश्तों के अपमान पर
ये वक्त कब से मौन है
फिर भी आजतक रिश्तों को
बचाता आया कौन है ??
वो है संस्कार या विशवास
पता नहीं हमें
पर जो भी है
उम्मीद करता हूँ हमेशा बना रहे

sada said...

दिव्‍या जी, आपकी पोस्‍ट और उस पर होती प्रतिक्रियाएं दोनो ही प्रशंसनीय हैं क्‍योंकि आपका विषय ही ऐसा है, फिर चाहे वह पुरूष हो या स्‍त्री दोनो की अपनी-अपनी मर्यादाएं होती है कुछ लोग मर्यादा में रहते हैं और कुछ उसके बाहर हो जाते हैं, दोनो को अपनी सुरक्षा के दायरे स्‍वयं निर्धारित करने होते हैं ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दिव्या ,
बहुत सटीक और बेबाक लिखा है....इस लेख पर काफी कुछ कह दिया गया है...सच तो यही है कि स्त्रियों को ही परख करनी होती है कि मित्रता कितनी और कैसे रखनी है...ताली एक हाथ से नहीं बजती...लेकिन तुमने नारी और पुरुष का सही मनोविज्ञान लिखा है...विचारणीय पोस्ट

Deepak Shukla said...

Hi...

Rishta abhaasi ho ya fir..
rishta jeevan ka ho sang..
har rishte ki maryaada hai..
alag ho chahe koi rang..

Maryada ko chhod ke koi...
rishta agar banata hai..
nibhta nahi hai aisa rishta...
toot wo ek din jaata hai..

Matlab ke sab rishte rakhte..
es duniya main log...
kuch sachche enme mil jaate..
gar hota sanjog..

aapne ek samyik aur tarksangt aalekh likha hai..
main aapki baat se purntaya sahmant hun...

Par main ye avashya kahunga taali kabhi ek haath se nahin bajti..

aap bhale to jag bhala...

Rishte koi bhi hon, agar apni maryada main rahte hain to panapte hain varna toot jaate hain...aur har rishte main lakshman rekha kahan par honi chahiye ye to vyakti vishesh par nirbhar karta hai.. Jeevan main jisne bhi Lakshman rekha ko laangha hai use koi na koi Raavan awashya mila hai, fir wo chae Seeta hi kyon na ho...niyati ne kisi ko nahin baksha..

Sundar aalekh...

Deepak...

Please Note: agar aap apne blog ki font kuchh bada kar dengi to behtar hoga...

शोभना चौरे said...

दिव्याजी
मै आपकी इस बात से पूर्णत सहमत हूँ की स्त्री ही स्त्री सबसे अच्छी मित्र हो सकती है |कितु आभासी दुनिया क्या ?प्रत्येक जगह महिला को खुद ही अपनी सीमाए तय करनी चहिये |क्योकि वह बहुत अच्छी तरह से जानती है और जान सकती है
की सामने वाले की निगाहों में कैसी भावना है ?बाकि तो सबने अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से कही है |

अमित शर्मा said...

आपकी हर एक पोस्ट पे विचार-मंथन से काफी अमृत निकलता है, जिसका काफी लाब मिलता है. पर इस मंथन में कुछ विष भी निकल पड़ता है. आप जिस विषय को अपनी पोस्ट में उठाती है, कभी कभी वह पीछे छूट जाता है और कुछ विषयांतर करने वाले विचार प्रकट हो जाते है ------
@ विश्वभागिनी भी प्रासंगिक शब्द हो सकता है..
@ विश्वबंधुत्व के साथ विश्वभागिनी का जोड़ अच्छा लगा।

हर शब्द की अपनी पहचान होती है उनके पुल्लिंग \ स्त्रीलिंग स्वरुप को हम नर \ नारी के स्वरुप से नहीं जोड़ सकते है. जैसे भारत का राष्ट्राध्यक्ष चाहे स्त्री हो या पुरुष राष्ट्रपति ही कहलायेगा राष्ट्रपत्नी नहीं. उसी तरह जिन भावों के प्रकटीकरण के लिए विश्वबंधुत्व शब्द का प्रयोग होता है, उसके समानार्थी रूप में विश्वभगिनी का प्रयोग शायद असंगत है.

बंधु शब्द बना है संस्कृत की बंध धातु से जिसमे कसने, समेटने, बांधने आदि का भाव है. बांध, बंधु, बंदी, बंधन आदि शब्द इसी मूल से पैदा हुए हैं।
जबकि
भगिनी शब्द भगिन् शब्द से बना है. भगिन् शब्द का अर्थ फलना और फूलना है.

तो सारे विश्व को एक सूत्र में बांधने के भाव में "विश्वबंधुत्व" ही प्रयुक्त होगा "विश्वभगिनी" कैसे

अल्पना वर्मा said...

एक लंबी बहस पढ़ी.
विषय बड़ा ही जटिल है ,एक राय नहीं बन सकती.
एक ही बात है कि स्त्री और पुरुष दोनों को ही सावधानी पूर्वक अपनी सीमायें तय करते हुए रिश्ते बनाने चाहिए.
आज के आधुनिक समय में आभासी दुनिया के धोकों में अगर आप सिर्फ पुरुष को दोष देते हैं तो यह गलत है आज के आभासी जगत में स्त्रियां भी कम खतरनाक नहीं हैं.यहाँ तक कि स्त्री की स्त्री से दोस्ती या पुरुष की पुरुष से दोस्ती को भी धोखे मिले हैं.यहीं किसी ब्लॉग पर एक बार पढ़ा था जहाँ दूसरे धर्म का एक ब्लॉगर हिंदू नाम रखे था , दूसरे हिंदू ब्लॉगर का दोस्त बना ,आभासी दुनिया से बाहर दोनों मिले दोस्ती हुई और कुछ ऐसा हुआ जिस से उसका भेद बहुत बाद में खुला और जिस के घर आ कर वह बहुरुपिया रहा उसने ये सारी बातें
अपने ब्लॉग पर अपने लेख में लिखी थीं और उससे मिले धोखे का जिक्र भी किया था.उस पोस्ट से जानकारी हमें मिली,याद नहीं किस पोस्ट पर था.
लेकिन अपने २ साल के अनुभव में यहाँ बहुत कुछ समझा है.और यही जाना है कि...बड़े धोखे हैं इस राह में ...इसलिए ज़रा संभल कर सभी को रहना चाहिए ,चाहे स्त्री हों या पुरुष.
अगर दो लोग दोस्ती करते हैं तो हर तरह के परिणाम के लिए तैयार भी रहना चाहिए.
ब्लॉग जगत की आभासी दुनिया में तो ये भी डर रहता है न जाने कब कौन किस की चेट.किस की ईमेल ,फोन नंबर ,तस्वीरें मूल रूप में बिगड़े रूप में सार्वजनिक कर दे ,किसे मालूम.
यहाँ अतिरिक्त सावधानी की आवश्कयता तो है ही.

सुधीर said...

भय आदमी का गुण भी है और अवगुण भी। बुरे लोग इसका दोहन करते हैं और अच्छे लोग इससे डरते हैं। जो बुराई से डरते हैं, वे अच्छे होते हैं। मां-बाप इसलिए ही सचेत करते हैं क्योंकि वे अच्छे होते हैं। कम से कम अपने बच्चों के लिए तो।

श्याम कोरी 'उदय' said...

...प्रसंशनीय अभिव्यक्ति!!!

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

दिगम्बर नासवा said...

कभी इस बारे में सोचा नही ... जब जब जैसा जैसा समय आया उसी अनुसार करते गये हम तो ..... पर मुझे लगता है सहज रिश्ते ... एक दूसरे को समझ कर बनाए रिश्ते लंबे चलते हैं ... स्त्री पुरुष के अनुसार रिश्तों को विभाजित करना ठीक नही है ...

राजेश उत्‍साही said...

दिव्‍या अन्‍यथा न लें। पर आपकी इस पोस्‍ट का शीर्षक ही भ्रम पैदा कर रहा है। आपने शीर्षक के अंत में दिव्‍या कुछ इस अंदाज में लिखा है कि जैसे आप अपनी ही बात कर रही हैं। बहरहाल मुझे पता है कि कुछ दिन पहले ही आपने अपने बारे में सारी जानकारी यहां सार्वजनिक की थी।
बहरहाल बात आपकी सही है। पर हम एक संतुलन बनाकर चलें तो सब कुछ संभव है।

boletobindas said...
This comment has been removed by the author.
boletobindas said...

.......बकि पुरुष चाहता है कि यह सिर्फ मेरी होकर , मुझे ही समर्पित रहे। किसी दुसरे से बात ही न करे। लेकिन यही कोई स्त्री पुर्णतः समर्पित है , तो पुरुष उसको पाने के बाद अगले शिकार कि तलाश में निकल पड़ता है..........

दिव्या जी प्लीज .... इसमें आप सब पुरुषों पर न लपेटें। अपन कम से कम शिकारी जानवर नहीं हैं.....

वैसे दिव्या जी .. पुरष हो या स्त्री. आज दोनो के सामने समान अवसर हैं तो दोनो ही एकदुसरे को धोखा दे रहे हैं. चाहे दोस्ती में हो या फिर वैवाहिक जीवन में। दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव, हैदराबाद, बैगुलुरु कौन सा शहर गिनाउं, जहां अपने परिवेश से निकलते ही मिली आजादी का नाजायज फायदा पुरुष और स्त्री दोनो नहीं उठा रहे हैं। मां बाप की नजरों से दूर होते ही लाड़ले औऱ लाड़लियां बिल्कुल उल्टा आचरण करने लगते हैं। पर मैं इसे उनकी व्यक्तिगत जिंदगी मानकर उसमें दखल को उचित नहीं मानता। आज हो यह रहा है कि मौका मिलने पर कई महिलाएं वही काम कर रही हैं जो गलत काम पुरष करता था। तो बुराई का बदला बुराई क्यों।

मेरा केवल इतना सा ही छोटा सा सवाल है कि क्या सबको लगता है कि कोई पुरुष जो आम जीवन बीता रहा हो, स्त्री से मित्रता के दौरान अपने पर काबू नहीं रख पाता। ये सोचना आखिर क्यों सही है कि हर पुरष स्त्री को पाना ही चाहता है। और स्त्री किसी को धोखा नहीं देती।

Avinash Chandra said...

सबसे पहले तो माफी चाहूँगा, बहुत देर से आया...

खैर पुरुषों का तो नहीं जानती , लेकिन स्त्री होने के कारण जो अनुभव किया है वो व्यक्त कर रही हूँ॥

ये ईमानदारी बहुत ज्यादा अच्छी है...बाकी जो लिखा है वो सच है.

विश्वबंधुत्व !

ये भी..बिलकुल ठीक. विचारणीय

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर पोस्ट है ... कई विचारणीय बातों पर लिखी हुई ... और कुछ बातें और थी जो टिप्पणियों द्वारा सामने आई है ...
मैं तो यह मानता हूँ कि इंसान को कुछ बातों में लचीलापन दिखाना चाहिए तो कुछ बातों में दृढ़ता ...
बधाई !

पंकज मिश्रा said...

देखिए साहब मेरा तो साफ मानना है कि हर कोई अच्छा होता है और हर कोई बुरा। हर व्यक्ति में राम भी है और रावण भी। कब कौन सा रूप जाग्रत हो जाए कहा नहीं जा सकता। एक बात और है वह यह कि एक लड़के और लड़की की दोस्ती कब तक दोस्ती रह सकती है, सभी में कुछ चाहत होती है उसकी भरपाई अगर कोई नजदीकी कर दे तो फिर क्या बात है।
वैसे आलेख अच्छा बन पड़ा है आपको बहुत बहुत बधाई।

Voice of youths said...

दिव्या जी, हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि लड़कियों या महिलाओं ने खुद की मानसिकता ऐसी बना ली है कि उसका काम सिर्फ ससुराल और परिवारवालों की सेवा करना है| जबतक इस मानसिकता से वो खुद बाहर नहीं निकलेंगी तबतक क्या समाधान हो पायेगा? मैंने कई लड़कियों को जों मेरी दोस्त हैं यह कहते हुए सुना है कि मैं तो लड़की हूँ!!! अब लडकियां खुद अगर लड़कों के साथ कदम मिलकर चलने झिझके तो फिर कुछ नहीं हो सकता|भले ही इसके लिए पुरुष प्रधान मानसिकता वाली सामाजिक व्यवस्था ही क्यों न जिम्मेदार हो?

hem pandey said...

आभासी मित्रता को आभासी मित्रता तक ही सीमित रहने देना चाहिए.इसे वास्तविक जीवन में अत्यंत विशेष परिस्थितियों में और बहुत सोच समझ कर ही अमल में लाना चाहिए.

आज की परिस्थितयों में ' स्त्री की मित्रता स्त्री से और पुरुष की पुरुष से' को पूरी तरह लागू करना सम्भव नहीं.

sandhyagupta said...

आपकी बात सोचने को मजबूर करती है.

mukti said...

इस विषय पर मैं रश्मि दी से सहमत हूँ. कोई आपको तब तक बरगला नहीं सकता जब तक कि आप मौका ना दें... कोई भी अगर अपनी सीमा से आगे बढ़कर छूट लेता है, तो उसको तुरंत टोक देना चाहिए.
आपकी अंतिम बात से सर्वथा सहमत हूँ. सबसे अच्छा रिश्ता है, मानवता या विश्वबंधुत्व का रिश्ता.

boletobindas said...

कहां हैं दिव्या जी..??????????????????????

Vijay Pratap Singh Rajput said...

बहुत सुंदर जी

RAJAN said...

mahilaon ke man me ye jo purushon ki chavi ban gai hai uske liye bhi purush hi jimmedar hai jo use is tarah ki hidaytein di jati hai.
aisa lagta hai purush koi hinsak jaanwar ho jisse mahila ko bachne ki salaah dee ja rahi hai
lekin dukh ki baat ye hai ki purush ko khud hi apni is nakaratmak chavi ki koi chinta nahi hai.isse achche purush bhi badnaam hote hai.

SUKESH KUMAR said...

good post.

Dr.R.Ramkumar said...

nobody wants to be used..this is the question of security and existence.
Vales never die.

Bravo Divya g!

Dr.R.Ramkumar said...

Vales = values

PKSingh said...

sab kuchh najariye par tikta hai...sansar mein bura bhi hai achha bhi hai..is tarah ke masle mein aap koi ek nischit niskarsh nahi nikal sakte..kewal bahas lambi hoti jayegi ki kaun achha kaun bura?

..........phir bhi aapne achhi baate rakhi dhanyawad!

visit also www.gaurtalab.blogspot.com

Gourav Agrawal said...

दिव्या जी,
आप कहाँ हो ???
दिव्या दीदी को अभी से ही कह देते हैं "वेरी वेरी हेप्पी रक्षा बंधन "

Divya said...

.
@ गौरव -
रक्षाबंधन की अग्रिम बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! इश्वर करे हमारे आपके बीच भाई-बहेन का रिश्ता खूब फूले-फले ! इस मौके पर आपको बहुत सारी शुभकामनायें , मिठाइयां एवं प्यार !

I Love you brother. I care for you .

May heaven's choicest blessings be showered on you.

Wish you a very happy Raksha-Bandhan .

Divya said...

.
इस पोस्ट पर कमेंट्स अभी पढ़े , बहुत अच्छे विचार हैं सभी के ! आप सभी को बहुत - बहुत आभार !

Gourav Agrawal said...

मेरे लिए तो आज ही रक्षा बंधन हो गया दिव्या जी

आभार आपका

ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा आपकी तरह भावनाओं को शब्दों में बांधना नहीं आता मुझे :)

G Vishwanath said...

Divyajee,

Dangers lurking in the the virtual world are well recorded.

All of us who are intelligent enough to use the internet are also capable of knowing how to avoid the pitfalls.

Common precautions are:

Don't give out your address or telephone number in a public forum.

Don't give too many personal details in a public forum. Somebody may misuse them later.

Have a special email id for social networking on the web. Don't use your primary email id for this purpose.

If you must meet a net friend face to face for the first time be sure it is at a neutral place and not at your home or at his/her home.

Allow enough time to judge a person before you convert net friendship to real life friendship. How much is "enough" time? No rigid rules here. Each one must determine this for himself/herself.

The dangers of becoming too familiar with netizens are more for the young and innocent particularly teenaged girls.(I am an orthodox fellow. Pardon me for still believing that young teenaged girls are innocent.)

Most of us are mature adults and we all know where to draw the line.

And finally, in answer to the question whether it is possible to have a platonic relationship between a man and a woman, I say yes it is. It depends on the age difference. Over the internet it is even easier as one does not know how the other person looks.

Over the net, your appeal lies in the way you write, in the way you express yourself, in the quality and credibility of your views, not on how beautiful or handsome you are or on your complexion/religion/caste/race/native tongue.

I say platonic friendships have the best chances of success over the internet rather than in real life.

I have innumerable such friends gained over the past few years and in many cases I know them only by their user names or blogger names and I sometimes even wonder if they are men or women but have never cared to find out.

Hopefully you will be the latest such friend.

Thanks for an opportunity to express my thoughts on an interesting issue.

Regards
G Vishwanath

(Bye for the present. Will be busy henceforth. No more comments from me for the next few days. Keep blogging. Will return to your blog sometime next week)

Divya said...

Vishwanath ji,

Thanks for wonderful and honest comment . The points mentioned are really helpful. I definitely will be careful by the monsters roaming on net .

Regards,

अजीत said...

ऐरे,गैरे,नत्थू खैरे किसी को मौका नहीं दिया? फिर किन खास को मौक़ा दिया?

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

Nice, sharp post.


Arth kaa
Natmastak charansparsh

kaafir said...

दिव्या जी .. आपने मुझे सोचने पर विवश कर दिया...
शायद ये सच है की एक स्त्री और पुरुष कभी लम्बे समय तक मित्र नहीं रह सकते.. एक कोरी मित्रता बस और कुछ नहीं.. शयद दोनों के बीच ये संभव नहीं..
पर इस लेख को पढने के बाद.. मुझे ये समझने में मदद मिली की आखिर वो (स्त्री) किसी पुरष से क्या अपेक्षा रखती है ... और कम से कम मैं तो इस बात की कोशिश करूँगा.. की किसी स्त्री को बस अपना एक मित्र रहने दूं.. और कुछ न कर बैठू..
इस लेख के लिए आपका धन्यवाद..
काफ़िर.

ZEAL said...

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काफिर जी ...आपका स्वागत है । !

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Dr. shyam gupta said...

---भाईचारा हो या बहनचारा....चारा तो दोनों तरफ़ ही है जी...
--तभी तो...ये ब्लोग पर रिश्ते/ दोस्ती/ग्रुपबाज़ी/प्रशंसाबाज़ी क्यों...सार्थक बात, विचार रखिये और अपनी-अपनी राह लीजिये...
----"पुरुष और स्त्री के बीच दोस्ताना रिश्तों कि उम्र बहुत छोटी है।" सही कहा दिव्या पर लम्बा भी होसकता है यदि---क्रष्ण जैसा हो ....

प्रतुल वशिष्ठ said...

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मैंने अभी पढ़ा, अच्छा लगा.

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