लेखन कार्य भी समाज का एक आम नागरिक ही करता है। अतः लेखकों और टिप्पणीकारों के विचार ही हमारे समाज का दर्पण हैं। जो चुप रहते हैं और तटस्थ रहते हैं , वे सबसे बड़े अपराधी हैं और तटस्थ रहने का गुनाह अक्षम्य है। वे स्वयं को शांतिप्रिय की श्रेणी में रखते हैं , लेकिन सच तो यह है वे भीरु हैं। सत्य की परख करने की क्षमता ही नहीं है उनमें। सत्य को जान लेने बाद भी किसी को खो देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। इनसे भी बना के रखो , उनसे भी बना के रखो । कहीं कोई टिप्पणीकार खो न जाए, इसी उलझन में रहते हैं।
एक साधे सब सधै , सब साधे सब जाए।
- ब्लॉगजगत में कुछ लोग विचारों के न मिल पाने की दशा में लेखक के साथ व्यक्तिगत द्वेष पाल लेते हैं। अनायास ईर्ष्या करने लगते हैं और अनावश्यक आलोचना में लिप्त हो जाते हैं। ऐसी मानसिकता कमज़ोर चरित्र को इंगित करती है। उनके विष-वमन से उनका ही भेद खुलता है , अन्य किसी की कोई हानि नहीं होती।
- दुसरे वे जो अपने अन्दर की ईर्ष्या और द्वेष को मार नहीं पाते और निरंतर उसे पोषित करते रहते हैं। जैसे ही कोई मौका मिलता है , सूंघते हुए वहां पहुँच जाते हैं और संचित द्वेष का विष-वमन कर आते हैं । ऐसे लोग 'भाड़े के टट्टू' श्रेणी में आते हैं। इनका कोई चरित्र नहीं होता। ऐसे लोग टिप्पणी विषय पर नहीं करते अपितु व्यक्तिगत भड़ास निकालकर अपने अहम् की पुष्टि करते हैं।
- कुछ महान लेखकों के पास जब विषय चुक जाते हैं तो वे दूसरों के ऊपर आलेख लिखते हैं, जैसे-- " टंकी आरोहण" अथवा बिना सन्दर्भ के दूसरों को तिरस्कृत करने के तुच्छ उद्देश्य से आलेख लिखकर टिप्पणी पाने की लालसा रखते हैं। ऐसे लोग सिर्फ 'मसाला' ढूंढते हैं और औने-पौने में लेख लिखकर instant popularity पा जाना चाहते हैं।
- कुछ लोग इस भरम में जीते हैं की वे नायकों पर पोस्ट लिखते हैं , भले ही वे अपने देश की बहन- बेटियों को 'schizophrenic' और 'paranoid' कहने में ही अपना बडप्पन समझते हों। ऐसे लोगों की बुद्धि पर केवल तरफ खाया जा सकता है । इनका कोई इलाज नहीं है। और वे लोग और भी ज्यादा तरस के पात्र हैं जो सब कुछ जानते समझते हुए भी ऐसे कृत्यों की भर्त्सना नहीं करते ।
- कुछ लोग संतों पर लघु कथा अनुवादित करते-करते खुद को ही संत समझ बैठते हैं। प्रवचन करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए बहुत ज़रूरी है की वे इस झूठे भुलावे से बाहर निकलें।
- कुछ लोग अपनी टिप्पणियों में बेशर्मी से भड़ास निकालते हैं और अपेक्षा रखते हैं की उनकी टिप्पणी प्रकाशित कर दी जाए। ऐसे लोग स्नेह के पात्र ही नहीं होते। सच्चाई सामने आने पर इनसे दूरी बना लेना ही बेहतर विकल्प है।
- कुछ लोग बेहद छुई-मुई टाइप के होते हैं । हर दूसरी पोस्ट के बाद बुरा मानकर नाराज़ हो जाते हैं और आपके आलेखों पर आना बंद कर देते हैं। बस चोरी-चोरी पढ़ते रहते हैं आपको। ऐसे लोगों की संवेदनशीलता का सम्मान किया जाना चाहिए , और उनका नाज़ुक दिल कहीं दुःख न जाए , इसलिए उनके आलेखों पर आपको भी अनुपस्थित ही रहना चाहिए। ताकि वे शान्ति से जी सकें।
- दूल्हा बिकता है बोलो खरीदोगे? -- SORRY , SORRY -- ब्लॉगर बिकता है बोलो खरीदोगे ? ......एक-एक टिप्पणी से ब्लॉगर्स की खरीद-फरोख्त आसानी से की जा सकती है। ( बेहद अफसोसजनक है ये)
- कुछ उम्रदराज़ ब्लॉगर्स को अनायास ही अपना सिंघासन डोलता हुआ लगता है और वे अपने से कमउम्र लेखकों को लेखन छोड़ने के लिए बाध्य करके अपनी कलुषित मानसिकता को उजागर करते हैं। ऐसे लोगों के लिए बस इतना ही की थोडा सा बडप्पन लायें खुद में। इनके 'भय' का कोई इलाज नहीं।
- कुछ लोग पल में तोला , पल में माशा ...क्या कहें ऐसों को ?
- कुछ लोग ( so called शांतिप्रिय) , इतने confused रहते हैं की कभी सत्य के आस-पास फटकते ही नहीं , उन्हें डर होता है की वे कहीं इस अग्नि में भस्म ही ना हो जाएँ। अजी जनाब , हवन करने में उँगलियाँ तो जलती ही हैं। वे सोचते हैं, टिप्पणी करूँ की न करूँ ?अच्छा चलो कोई चाँद -सितारे वाला आलेख आएगा तो टिप्पणी कर देंगे ताकि अमुक ब्लॉगर मेरे आलेखों पर आता रहे। धिक्कार है !...हो सके तो सत्य को पहचान कर अच्छाई की रक्षा के लिए आवाज़ बुलंद कीजिये। किसी को खो देने के फेर में मत पड़िए। कुछ भी शाश्वत नहीं है । जन्म देने वाले माता-पिता भी छोड़ कर चले जाते हैं , इस कर्मभूमि पर संघर्षरत रहने के लिए।
- कुछ लोग एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। आस-पास देश और समाज में क्या घट रहा है इससे कोई सरोकार नहीं होता है उन्हें। वे बस लिखे जा रहे हैं । ऐसे आलेखों में विचारों की शून्यता होती है। दिल और दिमाग को जो मथ दे , उसका अभाव दिखता है वहां।
- अंत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सत्य ही बोलते हैं , सत्य ही लिखते हैं और सत्य की पहचान करने में सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्तियों में विशिष्ट चारित्रिक दृढ़ता होती है । ऐसे लोग निर्भय और निर्भीक होते हैं । ऐसे लोग सत्य के मार्ग पर चलते हुए अच्छाई का ही साथ देते हैं।
सीने में एक आग जलनी चाहिए। ये आग ही हमें मन से , वचन से और कर्म से शुद्द करती है। यदि ह्रदय में कोई आंच ही न होगी तो तप कर कुंदन होने का अवसर नहीं मिलेगा। यही आग हमें सत्य के मार्ग पर आगे ले जाती है। यही आग सत्य जैसे कठिनतम मार्ग पर हमारी मुलाक़ात सत्यवादियों से करवाती है।
कमज़ोर पड़ना, व्यथित होना , पलायन के विचारों से घिर जाना आदि मानवीय कमजोरियां हैं । यही हमें मनुष्य बने रहने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन ऐसे पलों में हमारे शुभचिंतक और हमारे अराध्य हमारे साथ होते हैं । हमें उसी ऊर्जा से वापस बुलाते हैं और अपने बड़प्पन का परिचय देते हैं।
गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में ,
जो उठकर खड़ा हो जाए उसे "ब्लॉगर" कहते हैं।
Zeal