Sunday, September 25, 2011

सम्मान , मात्र बुज़ुर्ग होने से मिलता है या फिर हर व्यक्ति अपने कर्मों से सम्मान अर्जित करता है ?

सम्मान के हक़दार कौन होते हैं ? क्या बुज़ुर्ग होने साथ ही वे सम्मान के हक़दार जाते हैं ? क्या युवा और छोटे सम्मान के हक़दार नहीं होते ? क्या सम्मान उम्र देखकर दिया जाता है ? या फिर इंसान अपने कर्मों से "सम्मान" अर्जित करता है ?

अनुराग शर्मा ने मेरे आलेख "मरणोपरांत" पर एक टिप्पणी की जिसमें उन्होंने मुझपर आरोप लगाया की मैं केवल सद्वचन करती हूँ। सत्कर्म नहीं। दुसरे उन्होंने "अंतिम प्रणाम " शब्द का इस्तेमाल किया तीसरे उन्होंने यह भी इल्जाम लगाया की मैंने "बुजुर्गों के आशीर्वचन " को गाली समझकर अपने दरवाज़े बंद कर लिए

इनकी उपरोक्त टिप्पणी को मैंने " व्यंगात्मक बदबूदार टिप्पणी" कहा , जिसके कारण निम्न हैं--

  • इनकी टिप्पणी विषय से इतर लेखिका पर व्यक्तिगत आक्षेप थी।
  • इन्होने मुझ पर इल्जाम लगाया की मैं बुजुर्गों का आदर नहीं करती। अब यह भी स्पष्टीकरण देना पड़ेगा मुझे की मैं बुजुर्गों का सम्मान करती हूँ ?
  • तीसरे इन्होने "अंतिम प्रणाम" वाली बात लिखकर डेढ़ वर्ष पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश की।
  • उपरोक्त टिप्पणी में अनुराग शर्मा ने लेखिका को अपमानित करने और नीचा दिखाने के उद्देश्य से यह टिप्पणी की ताकि यह मेरे मेरे ब्लौग पर विवाद पैदा कर सके और मुझे लेखन छोड़ने को मजबूर कर सके।


"अंतिम प्रणाम सम्बन्धी स्पष्टीकरण -- फ़रवरी २०१० से हिंदी ब्लॉग्स पर टिप्पणियां लिखना आरम्भ किया था , तब ब्लॉग्स नहीं लिखती थी ज्ञान जी के ब्लौग पर सर्वाधिक टिप्पणी लिखी उनके हर एक आलेख पर ५-टिप्पणी रहती थी मेरी। फिर जून २०१० से मैंने अपना ब्लौग लिखना शुरू किया। एक साधारण इंसान की तरह मेरे मन में एक ख्वाहिश थी की जिस ज्ञान जी के आलेख पर मैंने इतनी टिप्पणियां लिखी हैं वे भी एक बार मेरे ब्लौग पर आये और मुझे 'आशीर्वाद ' दें, जैसे कोई बच्चा एक बेकार सी पेंटिंग बनाने पर भी अपने बड़ों से शाबाशी की उम्मीद रखता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ मैं एक नवोदित ब्लॉगर , इस व्यर्थ की शाबाशी पाने की लालच में उनके ब्लौग पर जाकर अपनेपन और अपेक्षा से भरी शिकायत कर बैठी की वे कभी क्यूँ नहीं आये और उनको "अंतिम प्रणाम" लिख दिया। उन्हें अपना समझकर बचकानी नाराजगी दिखा रही थी मैं

यहाँ अंतिम प्रणाम से मेरा तात्पर्य था की अब कभी नहीं आउंगी आपके ब्लौग पर। नहीं जानती थी तब ब्लौग जगत के नियमों को

इस शब्द का "अर्थ का अनर्थ " करके ज्ञान जी ने अगले ही दिन मेरे खिलाफ एक आलेख लिखकर अपने ब्लौग पर लगा दिया वो मेरे खिलाफ पहला आलेख था ब्लौग जगत में ज्ञान जी के उस आलेख पर एक सैकड़ा वरिष्ठ और विद्वान् जनों ने मेरी भर्त्सना की

नयी-नयी थी , ज्ञान जी से बहुत छोटी हूँ। बहुत रोई थी उस घटना और अपमान पर। पहली बार जाना था की बुज़ुर्ग भी अपमानित करते हैं अपने से बहुत छोटों को।

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अनुराग शर्मा द्वारा लगाये गए दुसरे आरोप का स्पष्टीकरण -- इनका कहना है की मैंने डॉ अमर के लिए अपने दरवाज़े बंद किये और बुज़ुर्ग के आशीर्वाद की अवहेलना की

डॉ अमर मेरे आलेखों पर विशेष तौर पर आलोचना किया करते थे। चाहे राजनीति पर लिखूं , चाहे चिकिसा सम्बन्धी लिखूं , चाहे अन्य किसी विषय पर, वे सदा मेरी आलोचना ही करते थे। किसी भी आलेख पर सामान्य कमेन्ट ना करने की तो उन्होंने जैसे कसम खा रखी थी। ऐसा लगता था मनो अपनी नकारात्मक और आलोचनात्मक टिप्पणियों से वे मुझे छलनी कर देना चाहते हों। उनके इस आशय को मेरे ब्लौग पर आने वाले सभी लोग बखूबी समझते थे।

आलेख और विषय से असहमत होना एक बात है लेकिन डॉ अमर तो बिना पढ़े ही आलोचना कर देते थे , कई बार मेरे आलेखों पर उन्होंने माफ़ी भी मांगी है। कोई एक दो आलेख या फिर दस बीस आलेखों पर आलोचना करे लेकिन , हर आलेख पर नीचा दिखाना और अपमान करना कहाँ का बड़प्पन है ?

डॉ अमर द्वारा नियमित रूप से आलोचना किये जाने से मेरा मन बहुत उदास रहता था। तब मैं दुखी होकर " निंदक नियरे राखिये " शीर्षक से आलेख लिखा। इस आलेख को पढ़कर डॉ अमर को बहुत बुरा लगा , उन्हें समझ में आया की अनावश्यक आलोचना से किसी का ह्रदय कैसे छलनी होता है तब उन्होंने मेरे पिछले १०० आलेखों पर से अपनी लिखी टिप्पणी डिलीट कर दी उनका उद्देश्य था मुझे दुःख पहुँचाना। और वे उसमें भी सफल हुए। टिप्पणी डिलीट किये जाने पर मुझे बेहद दुःख पहुंचा था।

फिर भी डॉ अमर ने मेरे ब्लौग पर आना नहीं छोड़ा और पुरजोर आलोचना करना जारी रखा। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा फिर उनको चैन नहीं पड़ा तो एल आलेख पर उन्होंने फिर विवाद खड़ा करने की कोशिश की तब मैंने पोस्ट पर ही लिखा की - " आपने मेरे १०० आलेखों पर से जो टिप्पणियां मुझे दुःख पहुँचाने के उद्देश्य डिलीट की हैं उसमें आप सफल तो हुए हैं , लेकिन आपकी यह हरकत बहुत ही बचकानी है "

उस दिन डॉ साहब ने मुझे थाईलैंड फोन किया और मुझसे माफ़ी मांगी - उन्होंने कहा की उनसे गलती हुयी है , टिप्पणियां उन्हें नहीं मिटानी चाहिए थींलेकिन उनके पास सभी टिप्पणियां सुरक्षित हैं और वे उन्हें मेरे आलेखों पर एक-एक करके वापस लगायेंगे "

लेकिन ज़िन्दगी इतना वक़्त किसी को नहीं देती की भूलें सुधारी जा सकें इसलिए भूल करने से पहले ही सोचना चाहिए की हम क्या करने जा रहे हैं। उनकी मृत्यु के उपरान्त लोग उन्हें लाख "खरा-खरा" कहें लेकिन मुझे किसी के आलेखों की अनावश्यक आलोचना मन में द्वेष रखकर किया जाना कभी भी "बडप्पन " की निशानी नहीं लगी

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बड़ों से अपेक्षा होती है की वे अपने से छोटों को प्यार दें , स्नेह दें। बदले में उन्हें इफरात प्यार और सम्मान दोनों स्वतः ही मिल जाता है। लेकिन छोटों को अपमानित करके कोई किसी के दिल में कभी जगह नहीं बना सकता

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अनुराग शर्मा का कहना है की मैं "बुजुर्गों पर आलेख " केवल लिखती हूँ, उनका सम्मान नहीं करती।

उपरोक्त आलेख मैंने निम्न वजहों से प्रेरित होकर लिखा था ---

  • एक तो डॉ साहब की मृत्यु से मन पहले ही बहुत उदास था
  • दुसरे विश्वानाथ जी की तबियत बहुत खराब थी
  • भोला जी और कृष्ण जी भी बेहद अस्वस्थ चल रहे थे


इन लोगों के मेल पढ़कर उनकी अस्वस्थता से व्यथित होकर बुजुर्गों के लिए वह आलेख लिखा था और ईश्वर से प्रार्थना की थी की पृथ्वी पर समस्त "बुज़ुर्ग" स्वस्थ रहे और दीर्घायु हों। जिसमें मेरे ब्लौग परिवार के माता-पिता सामान बुज़ुर्ग और मुझे जन्म देने वाले पिता जो अकेले रहते हैं , जिनकी देख भाल करने वाला कोई नहीं है।




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  • अनुराग जी आपने अपनी टिप्पणी में मुझ पर व्यंग किया
  • गड़े मुर्दे उखाड़े
  • मुझ पर व्यक्तिगत आक्षेप किया।
  • मुझे अपमानित करके लेखन छोड़ने को मजबूर किया
  • इन टिप्पणियों से भी आपका मन नहीं भरा तब आपने मुझ पर आलेख लिखकर मेरे तकरीबन सभी आलेखों का मखौल बनाया
  • मुझे गाली दी "schizophenic" और "paranoid" कहकर


किसने दिया आपको ये हक की आप मिझे गाली दें ?

अनुराग जी क्या आपको तब नहीं दीखता जब मुझे ब्लौग पर अनायास ही लोग भद्दी गाली देते हैं , खेमेबाजी करके घेरकर अपमानित करते हैं क्या केवल उम्र में छोटी हूँ , इस कारण हर कोई मुझे अपमानित करने का हक़दार हो गया ?

आपने जो-जो किया क्या मुझसे बड़े होने के कारण मात्र से आप सम्मान के हक़दार हो गए ? मैं आपकी बहन-बेटी नहीं इसलिए आप जितना चाहे कीचड मुझपर उछलने में ही अपना बडप्पन समझते हैं ? आपसे तो मेरा एक औपचारिक रिश्ता ही था। कभी-कधार भूले भटके आप मेरे आलेख पर जाते थे और मैं लौटकर आपके आलेख पर टिप्पणी कर देती थी फिर आपने अपने मन में इतने लम्बे समय से ,इतना द्वेष क्यूँ पाला ?

सम्मान अर्जित किया जाता है अपने कर्मों से , उम्र से नहीं !

मुझे एक बात से बहुत ज्यादा चकित हूँ की के ब्लॉग जगत में कुछ लोग मुझसे अनावश्यक द्वेष क्यूँ पाले हुए हैं , जबकि मेरा सभी के साथ मात्र एक औपचारिक रिश्ता ही है कभी किसी के आलेख पर व्यंगात्मक अथवा आलोचनात्मक अथवा व्यक्तिगत टिपण्णी नहीं लिखती हूँ, फिर भी लोग साबुन से हाथ धोकर क्यूँ केवल मेरे ही पीछे क्यूँ पड़े रहते हैं ? इस ईर्ष्या की वजह क्या है ?

अनुराग शर्मा जी , यदि मुझसे इतनी ही नफरत थी तो मेरे आलेख पर टिप्पणी क्यूँ की थी ? विषय पर आपको लिखना नहीं थाकेवल व्यक्तिगत आक्षेप लगाना ही आपका मंतव्य था जो लोग नापसंद हों उनसे दूर रहा कीजिये , जबरदस्ती नीचा दिखाने के लिए टिप्पणी करने की आवश्यकता क्या है भला ?

मेरा अपमान करके आपने कौन सा सम्मान अर्जित किया है ?

Live and let live !

Zeal

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बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।

......................



31 comments:

JC said...

हमारे ज्ञानी-ध्यानी पूर्वज कह गए कि जीवन - हमारी (विष्णु / कृष्ण के सुदर्शन-चक्र समान) बीच में मोटी और किनारे की ओर पतली प्लेट समान गैलेक्सी के भीतर समाई पृथ्वी में सौर-मंडल द्वारा रचित अनादी काल से अनंत काल-चक्र में - ब्रह्मा के अनंत में से एक नए दिन से फिर से चल पड़ता है... सब आत्माओं को पुराने स्तर से साथ ले कर...
जिससे मुक्ति पाने का एक और मौका उपलब्ध हो जाता है हरेक आत्माओं को, जो सत्य है और शरीर असत्य... किन्तु यह शरीर, क्यूंकि दीखता है, हमें (आत्माओं को) भटकाता है, विपरीत माया द्वारा जनित अनुभूतियों के माध्यम से... लिखित, अथवा बोले गए शब्द तीर समान है जो एक बार छूट गए जिव्हा से तो वो तुरंत वापिस नहीं लिए जा सकते,,, इस कारण सुनने / पढने वाल उनको अपने मानसिक रुझान से, और प्राकृतिक क्षमता से, विश्लेषण कर 'बात का बतंगड़ बना' देता / सकता है... इस कारण कितनी भी सफाई दो वो नाकाफी हो सकती है... पूर्वज कह गए की यदि आपने झाडी के पीछे शेर समझ तीर छोड़ दिया धनुष से, तो फिर यदि जान भी लिया की वो शेर नहीं गाय है तो आपके हाथ में कोई उपाय नहीं है... उस गलती का अंजाम तो आपको ही भुगतना होगा... इत्यादि इत्यादि...

Rajesh Kumari said...

Divya shayad main pahli hoon jo yeh post padh rahi hoon.kafi baaton ki jaankari mili aapki naarajgi ka kaaran pata chala achcha kiya man me rakhne se achcha yah shikayten bahar nikhal di.man me jvala mukhi nahi banne dena chahiye...bura hota hai.duniya me sabhi tarah ke log hote hain koi jaanboojh kar galti karta hai kisi se anjaane me ho jaati hai...par koi vaqt rahte apni galti ki shama maang le to doosre ko maaf kar dena chahiye isme koi chota nahi hota lekin aur mahaan ho jaata hai.bahut achcha ho jaldi se jaldi yah kadvaahat dil se nikal jaaye.

नीरज जाट said...

दिव्या जी,
मैं आपके लेखन का शुरू से ही फैन रहा हूं। और उससे भी बडी बात ये है कि आप अपनी आलोचनाओं वाली टिप्पणियों को प्रकाशित भी करती हैं। आलोचनाओं को प्रकाशित करना कम हिम्मत की बात नहीं है।

प्रतुल वशिष्ठ said...

बहुत ही भावुक कर देने वाले विचार... हृदय विदारक पीड़ा को स्वर देते आपके भाव आपके पक्ष में खड़ा कर देते हैं... क्योंकि आपने भोगा है.. और बाक़ी केवल तमाशबीन ही हैं... कोई भी गुनेहगार की गुरबान नहीं पकड़ सकता... केवल शब्दों से अपने आक्रोश को व्यक्त कर सकता है... कोई भद्दी गालियाँ निकाल लेगा तो कोई आप द्वारा प्रतिबंधित टिप्पणियाँ करेगा.... आखिर किया क्या जाये...
कैसे भावों के उबाल में ठंडे पानी के छीटे दिये जाएँ.... अनुराग में अनुराग की कमी आ गयी है.... दिव्या में दिव्यता क्षीण हो रही है... अमर जी अपने आलोच्य स्वर के कारण अमर हो गये...
हतप्रभ कर देने वाले को दिव्या कहते हैं... चकाचौंध कर देने वाले को दिव्या कहते हैं... अपने विषय-विस्तार से आप दोनों कार्य करते रहे हैं... यदि कोई वास्तव में अनुरागी हुआ तो आपसे क्षमा जरूर कहेगा.
आपने अपना पक्ष बड़े तार्किक ढंग से रखा... स्पष्ट किया एक-एक बात को.
हमारे लेखन में धीरे-धीरे ही मेच्योरिटी आती है.... किन्तु हम अपने बड़ों से यही अपेक्षा रखते हैं कि वे प्रोत्साहित करने के लिये हमारे पीठ भी थाप्थापायें.. ज्ञान जी जैसे ब्लोगर यदि अपने अंतिम समय तक यही चाहते रहें कि सारी सराहना वाली टिप्पणियाँ उनके लिये ही हों ... तो ऐसे व्यक्ति अच्छी ब्लॉग्गिंग नहीं कर रहे... खेमेबाजी... गुटबाजी या फिर मठाधीसी से हमें दूरी बनाकर रखनी होगी... तभी सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग्गिंग हो सकती है... न कि सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग सूची बनाकर.

mridula pradhan said...

mujhe aapke likhne ka tareeka,visay ka chunav prabhawit karta hai aur yahi karan hai ki main aapke blog ki niyamit pathak hoon......meri shubhkamnayen hamesha aapke saath hain.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 26-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

Suresh kumar said...

दिव्या जी नमस्कार ,
अगर देखा जाये तो बुजुर्ग आदमी सम्मान के हक़दार होते हैं | लेकिन युवा और छोटे भी अगर अच्छे कर्म करते हैं तो वो भी सम्मान के हकदार होते हैं | आपकी कहानी पढ़कर पता चला की आप के साथ बहुत ही गलत हुआ है और हो रहा है | आशा करता हूँ की बहुत जल्द सब कुछ ठीक हो जायेगा |

Rakesh Kumar said...

आपने अपनी पोस्ट में जो पहले हिदायतें दी थीं,उससे मैं खुद में नीर क्षीर विवेक की खोज में लगा था.

आपने अपने मन की बात कह दी है,जिसका हमें पता नहीं था.
मुझे तो अब यही लगता है 'बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेई'.

बात कहना सरल है,अमल करना कठिन,
फिर भी बहुत पहले पढा एक दोहा याद आ रहा है

जो तो को काँटा बोये ,वा को बो तू फूल
तो को फूल के फूल हैं,वा को है त्रिसूल.

आप इसको मेरा कोई उपदेश न समझे,प्लीज.
मेरे मन में ऐसा आया तो लिख दिया.

सुबीर रावत said...

ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे जो आपको मानसिक आघात पहुंचा रहे हैं. और कामना है कि आप बिना रुके, बिना थके पूरी ऊर्जा के साथ निरंतर लिखती रहें.

आशा जोगळेकर said...

दिव्या जी इस बात की बधाई कि आपने किसी के कहने से ब्लॉगिंग नही छोडी । आपकी पोस्ट पर ७० से १०० तक टिप्पणियां आती हैं तो कुछ तो नकारात्मक होंगी हीं । सबसे बढिया है उन्हें अनदेखा करना और लिखते रहना । जितना आप उन्हें तरजीह देंगी उतना ही वे छेडेंगे और आपको दुख पहुंचायेंगे । वैसे भी जिस मुश्किल से हम पार नही पा सकते उससे बच के निकलना ही उचित है । हम प्रार्थना करेंगे कि सभी ब्लॉगर भाई बंधू इस ब्लॉग जगत में सद्भावना से रहें ।

NISHA MAHARANA said...

बिल्कुल सही कहा आपने ।
वास्तव में बडों में बडप्पन
होनी चाहिये जिससे
वे छोटों की गलतियों को
नजरअंदाज कर सके
बदले में उन्हें छोटों से प्यार
एवं सम्मान अवश्य मिलेगा।

Atul Shrivastava said...

छोटे तब बडों का सम्‍मान करते हैं जब बडे बडप्‍पन दिखाते हैं....
अच्‍छी प्रस्‍त‍ुति..........

Arvind Jangid said...

बड़ा या बुजुर्ग यदि इज्जत के काबिल नहीं है तो सीधी सी बात है की उसे कोई सम्मान नहीं मिलेगा...वो अगर बुजुर्ग है तो किसी पर कोई एहसान तो नहीं कर रहा है, लेकिन ये सामने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है की किसी को तौलने के मापदंड क्या हैं. अब ये भी सच है की यदि मेरे मापदंड ही सही नहीं है तो मैं किसी भी व्यक्ति का निष्पक्ष अवलोकन नहीं कर सकता. कुछ तो हमारे मापदंडों में भी त्रुटि आ ही गयी हैं. जहाँ पर स्वंय के स्वार्थ मानवता से ऊपर उठ जाते हैं वहीँ पर results में घाल मेल होने लगता है, ... सुन्दर आलेख आभार.

JC said...

'भारत' में वैदिक काल वर्तमान में क्रिस्चियन युग के आरंभ से छः सदी पूर्व समाप्त हुआ और बौद्ध और जैन धर्म का आरम्भ हुआ...

'भगवान्' बुद्ध, अर्थात राजकुमार सिद्धार्थ को - (राज कुमार राम के समान, जो बनवास के दौरान पंचवटी में वटवृक्ष की छाया में निवास किये, किन्तु धर्मपत्नी सहित?) - सोने की राजगद्दी को छोड़, किन्तु परिवार का त्याग कर (वटवृक्ष की जाति के), 'बोधी वृक्ष' की छाया में वर्षों (आठ वर्ष?) बैठ 'सत्य' का बोध हो गया!

बौद्ध धर्म 'भारत' से आरम्भ कर भारत के चारों फ़ैल गया, और क्या यह आश्चर्यजनक / संकेत नहीं लगता कि वटवृक्ष समान बौद्ध धर्म भारत में कम हो यहाँ 'हिन्दू', अर्थात 'सनातन धर्म' का फिर से जन्म हो गया जबकि यह अन्य देशों में फैला रहा?..

और शायद इसका 'पतन' हिमालय के तिबत से दलाई लामा के चीन के दबाव से भारत पलायन से आरम्भ कर, हिन्दुकुश पहाड़ में 'बामयान बुद्ध' की विशाल प्रतिमाओं के खंडन से सांकेतिक रूप से आरम्भ हो गया...और पूर्व में म्यांमार में वहाँ कि सरकार और बौद्ध भिक्षुओं के बीच युद्ध और 'भारत' की सरकार के एक मूक दृष्टा समान चुप रहना, जापान में पूर्वी फुकुशीमा क्षेत्र में भूचाल और सुनामी से हुई हानि ने हिला के रख दिया :( इत्यादि इत्यादि, दक्षिण में श्री लंका को भी युद्ध से हिन्दुओं और बौद्धों के बीच!)...

और, गीता में योगेश्वर कृष्ण ने मानव को उल्टा वृक्ष बताया, जिसकी जड़ किन्तु पृथ्वी में न हो आकाश में हैं (चंद्रमा में जो शिव के मस्तक पर दिखाया जाता है पवित्र, माँ, गंगा के साथ?)...

जिस कारण पृथ्वी झटके देती रहती है समय समय पर, बौद्ध धर्म को मानने वाले सिक्किम में हाल ही में भी - याद दिलाने को कि यात्रा मूल से मूल तक की है, सो अपने मूल को याद करो, सभी जीव की माँ,जगदम्बा, को, महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती को !

सत्य का बोध वर्तमान जीवन में व्यक्ति विशेष की आयु पर निर्भर नहीं करता, जैसे 'प्रहलाद', और 'ध्रुव' के माध्यम से अपनी कथा-कहानियों के माध्यम से जाना सकता है... किन्तु यह सब चिकने घड़े पर जैसे पानी की बूँदें फिसल जाती हैं, वैसे ही 'आधुनिक भारतीय' के मस्तिष्क में ठहर नहीं पातीं - कलियुग के प्रभाव से?!

ashish said...

मै प्रवचन में विश्वास करता था लेकिन ये प्रवचन नहीं है.

आपने सुँदर सटीक शब्दों में बहुत सी बातों को रख दिया . अब भी लोग अगर नुक्श निकाले तो . आप लिखती रहो , मस्त रहो

JC said...

दिव्या, प्रकृति में अनेक संकेत हैं... जैसे किसी ज़माने में जब हम आनंद उठा रहे होते थे और अचानक ग्रामाफोन पर कोई रिकॉर्ड में सुई अड़ जाती थी, और वही लाइन सुनाई पड़ती थी, तो हम सुई को उठा उसे रिकॉर्ड पे आगे रख देते थे जिस से हम गीत (गीता?!) का आनंद फिर से उठा सकें!...

अथवा घडी की सुइयां रुक जातीं थीं और हम को उसका बोध न होने के कारण किसी मीटिंग में देर से पहुंच शर्मसार होना पड़ता था... (शायद ये संकेत था हमारे अज्ञानतावश 'सत्य' का आभास न होने के कारण इस जीवन में मुक्ति का मौक़ा गँवा देना और आत्मा का शर्मिंदा होना! "कारवां गुजर गया / गुब्बार देखते रहे..." :(... इत्यादि इत्यादि

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

सही-सही बातें , दिल की बातें .... बड़ी सरलता से सामने रख दिया आपने |
बुजुर्गों को सम्मान देना चाहिए ........इसका मतलब यह कदापि नहीं की कम उम्र वाले गुणीजनों का अपमान किया जाए |
व्यक्ति सम्मान और अपमान का हकदार अपने कर्मों के आधार पर बनता है ...........उम्र कुछ भी हो |

aarkay said...

Divya ji, from day one, i.e. when I started reading your posts , I have carried the impression that you have an " old head on young shoulders ". So you have the best of both the worlds !
Need one say or want more !
Best wishes !

सदा said...

आपने एक बार फिर अपने सदवचनों से सार्थक व सटीक बात कही है ...।

Kunwar Kusumesh said...

Forget the past. I am happy to find you still active in blogging. Carry on with utmost zeal.

Maheshwari kaneri said...

बिल्कुल सही कहा ....बडॊ़ में बड़प्पन होना चाहिये तभी वे सम्मान के पात्र होते हैं.......सटीक आलेख...

Mansoor Ali said...

बहुत गहराई है इस 'झील' में तो,
अनुरागी तो अब शर्माएंगे ही !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दिव्या जी ,
बड़ी ख़ुशी हो रही है , यह देखकर कि आपने धीरे-धीरे स्वयं को सामान्य और संयत कर लिया है और पूर्व की भाँति लिखना भी प्रारंभ कर दिया है |
कुछ दुराग्रही स्वयंभू क्यों आपको भावनात्मक चोट पहुंचाते रहते हैं , यह तो मैं नहीं जानता किन्तु इस कृत्य को कायराना जरूर मानता हूँ | आपको
सलाह है कि ऐसे लोगों से या तो दूरी बनाए रखें अथवा 'एक का दस' जवाब उसी निर्भीकता से देती रहें , जिस निर्भीकता से आप कलम चलाती हैं |
हाँ , भविष्य में इस तरह ब्लॉग लेखन बंद करने की बात तो बिलकुल ही न करें | आप जिस भी विषय को चुनती हैं, बड़ी बेबाकी से उसका विश्लेषण करती हैं |
आपके लेखन को पसंद करने वालों की संख्या, इन बेवजह नापसंद करने वालों से कई गुना ज्यादा है |
बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ......

Bikramjit said...

What I am trying ot figure is that who is this Anurag sharma ... .. sharma ji Sharam karen thodi ..

and WHat I will like to ask you is why are you getting so sad on someone who is jsut making comments .. and this is how he is gaining publicity .. his idea of gaining mileage and you writing about him again and again are giving full chance fo that .. See it made me curious who is this Sharma..

Regarding the question Well AGE Is not a criteria to get respect what and how one behaves also needs to be taken in consideration...

Take care and Smile ..

Bikram's

Bikramjit said...

Sorry I wanted to add .. People talking of respect for elders , same goes for MEN respecting the Ladies and That is also required .. to respect each other ...

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

दिव्या, एक खूंखार टिप्पणी करने जा रहा हूं...दिल संभालकर पढ़ना। पोस्ट तो करना ही पड़ेगा। तीन पोस्ट लगातार पढ़ीं...मोटी चमड़ी/नामुराद दिव्या और एक यह जिसपर टिप्पणी करूंगा...चमड़ी मोटी करने में तो िकसी का फायदा नहीं...न स्त्रीजाति का न पुरुषजाति का। चमड़ी मोटी हो भी जाए तो कोई बात नहीं...खतरा तो बुद्धि मोटी होने पर होता है। संस्कार धारदार हों...आदर्श उच्च हों तो चमड़ी का क्या फर्क पड़ता है। चमड़ी तो वैसे भी भस्म होगी...​
​दूसरा-दिव्या..मतलब...दिव्य ही। कुछ और नहीं...ऐसे में नामुराद का कोई संबंध नहीं। हां अब सबकी मुराद दिव्या होगी तो कितने दिल टूटेंगे, कोई सोच भी न सकेगा क्योंकि दिव्या तो एक ही है। लिहाजा नामुराद होने से मतलब सबकी मुराद होना ही अर्थ करना चाहिए...​
​तीसरा...तीनों पोस्ट बताती हैं कि यह लेडी तो आयरन है, पर इसका दिल फूल है। फूल बोले तो अंग्रेजी वाला फूल नहीं। (जस्ट लाफिंग)। जितना दिल टूटा और रोया है, वो बताता है कि दिल तो बच्चा है जी। यूं तो यू आर लुकिंग स्टाइलिश...सम टाइम्स आयरन आलसो...खासकर जब पुरुषों पर कटाक्ष करना हो परंतु आखिरकार दिलवाली हो...दिल टूटता है कचोटता है रोता है...अब मुझे लगता है कि आयरन लिखने का कोई मतलब नहीं/न लेडी लिखने का मतलब है क्योंकि वो तो स्वयंसिद्ध है...जहां तक अस्तित्व की बात है तो वो तुम्हारे होने भर से प्रमाणित है...लिहाजा अब अपने बारे में अपनी सोच बदलो। इन राग-अनुराग से विराग ले लो...तो मजा आ जाए...​तभी तो पता लगे कि दिव्य हो...दिव्या हो...और...हर राग कष्ट का कारण है...जितने कष्ट से तुमने ब्लाग लिखना छोड़ा था, उसका कई गुना श्रम करके तुम्हें लाया गया....जितना तुम्हारा दिल टूटा था, उससे कई गुणा दिल तुमने तोड़े-मरोड़े-निचोड़े। अपनत्व का यह सघन अहसास संभवतः कम ही लोगों को मिला होगा.. अब जब आ गई हो तो गाना गाओ...इतने लोगों का प्यार तो मिला है...(गाना इसलिए गाओ क्योंकि हर दिल जो प्यार करेगा गाना गाएगा) अगेन मस्ती..मसखरी...स्टार्टस नाउ​

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अंतिम बात पते की है...जब निंदक नियरे राखिए वाली बात कबीर ने कही थी तो उन्हें बाद में गलती का अहसास हो गया था। फिर उन्होंने बहुत मंथन के बाद लिखा-​
​कबिरा निंदक न मिलो, पापी मिलो हजार।​
​इक निंदक के शीश पर, कोटि पापिन को भार।।
लिहाजा, अब भलाई निंदकों की खटिया खड़ी करने में, उनकी गर्दन उतार देने में अथवा उनसे बच लेने में है। जय हो !!!

neel pardeep said...

Dear Zeal,
you are upset ? Why waste your time and energy for the people,you can find everywhere.
You always give positive radiations,plz keep on giving.
Are such people or incidents worth paying attention?
NO
waiting for a good article from the core of your heart or left side of the brain.
Thanks and regards

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

बिलकुल नहीं|
जन्म का क्रम योग्यता का मापदंड कदापि नहीं हो सकता| यह कोई जबरदस्ती तो कि जो बुज़ुर्ग है वह महान ही होगा| यदि ऐसा ही है तो सोनिया गांधी का सम्मान करो, मनमोहन का सम्मान करो, चिदंबरम, प्रणव मुखर्जी यहाँ तक कि दिग्गी सिंह का भी सम्मान करो| इन सभी बूढ़े बागड़ बिल्लों का सम्मान करो|
आज भी कुछ अंग्रेज़ अधिकारी जीवित होंगे जिन्होंने कभी हम पर अत्याचार किया होगा| बुजुर्गियत की श्रेणी में इनसे ऊपर तो कोई शायद ही होगा| बुजुर्गियत का ही सम्मान करना है तो जाकर इनके चरण धोकर पियो|

दिव्या दीदी, आपकी बातों से सौ प्रतिशत सहमत हूँ|
ये एक अजीब सा भ्रम समाज में फैला दिया गया है| इस व्यवस्था में आप और मैं तो सम्मान के हकदार ही नहीं हैं, चाहे समाज को हमारा कितना ही योगदान क्यों न हो| मर भी जाएं तो भी सम्मान नहीं मिलेगा| ठीक वैसे ही जैसे पहले हुआ था|
इसी व्यवस्था के कारण भगत सिंह जो इतनी कम आयु में ही देश के नाम बलि चढ़ गए, वो सम्मान न पा सके जिसके वे हकदार थे| क्योंकि सम्मान पाने का ठेका गांधी जी के पास था, क्योंकि वे बुज़ुर्ग थे|
खुदीराम बोस, जो केवल सोलह वर्ष की आयु में फांसी चढ़ गए थे, बहुत से लोगों ने उनका नाम भी नही सुना होगा, क्योंकि वे बुज़ुर्ग नही थे|
कुल मिलाकर ऐसी ढकोसली व्यवस्था का नियम यही है कि युवा देश व समाज के लिए मर खप जाए, कट जाए, जल जाए, अपना जीवन बर्बाद कर ले, अपने सारे ऐशों आराम त्याग दे, सुख की इच्छा त्याग दे, पल पल मुसीबतों का सामना करे, मर मिटने को तत्पर रहे, किन्तु सम्मान का अधिकारी नही है| वहीँ कोई बुज़ुर्ग केवल उपदेश पिलाए, अपने जीवन में उसका पालन भी न करे, योगदान के नाम पर जीरो पर आउट हो जाए तो भी सम्मान पाएगा|
सोचता हूँ, कहीं गलती से कल ही मर गया तो मेरे नाम के आगे असम्मान्नीय लगा दिया जाएगा, क्योंकि बुजुर्गियत तो मैंने भोगी ही नहीं है न|

ठीक इसी कारण मैं ब्लॉगजगत के कुछ बुजुर्गों (या कहें मुझसे बड़ी उम्र के) का भी सम्मान नहीं कर पा रहा| सम्मान के लायक काम जब तक नहीं किया जाएगा, सम्मान नहीं मिलेगा|

दिव्या दीदी, आपने पुराने पन्नो को यहाँ खोल कर रखा| बहुत सही किया| इन बातों का आगे आना ज़रूरी था| छुपे सन्दर्भों के चलते एक दुश्चक्र को बढ़ावा दिया जा रहा था| इन दुश्चक्रों से बचने के लिए इन सन्दर्भों को सामने लाना बहुत ज़रूरी था| अब देख लीजिये बुजुर्गों की मुर्खता के चलते ही यह सब बखेड़ा खड़ा हुआ है| अब भले कोई कितनी ही शहीदों व नायकों के नाम पर श्रृंखला लिख डाले, जब तक वह un शहीदों व नायकों को ही न समझ पाए, सम्मान पाने का अधिकारी नहीं हो सकता|

दिव्या दीदी, बेहतरीन पोस्ट, इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी|

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सरलता और सार्थकता से अपने भाव और उदगार शब्दबद्ध किये हैं आपने... यही सही रास्ता है...
सादर...

कुश्वंश said...

अच्छा आलेख , अनुराग जी को सौम्यता से यथोचित उत्तर के साथ प्रश्न भी है आपका ये आलेख. लिखा ठीक लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं थी दिव्या को. लोग दिव्या को जानते है समझते है पुराने लेखों की श्रख्लायें काफी है दिव्या जी को समझने के लिए. लिखे और भरपूर लिखे , शुभकामनाएं और ब्लॉग जगत में जारी सक्रियता के लिए आभार

कौशलेन्द्र said...

यह सच है कि कोई भी केवल उम्र के कारण ही सम्मान का पात्र नहीं बन जाता, सम्मान की पात्रता अनिवार्य है.
जहाँ तक छोटों को सम्मान दिए जाने की बात है तो उनके प्रति बड़ों का स्नेह और उनके प्रति कल्याणभाव का होना ही बड़ों द्वारा छोटों का सम्मान है.