Monday, September 19, 2011

पराजित और अपमानित होना स्त्री की नियति है

कोई लाख कहे हम इक्कीसवीं सदी में गए हैं और चाँद पर भी पहुँच गए हैं , लेकिन सच तो ये है की हम शताब्दियों पीछे जा रहे हैं। स्त्री का समाज में स्थान , ग्रंथों में वर्णित उसके स्थान से पूर्णतया विपरीत है।

ज्यादातर लेखकों का कहना है की ब्लॉग लेखन स्वान्तः सुखाय होता है , लेकिन मैंने अपनी ख़ुशी के लिए कभी नहीं लिखा। एक उद्देश्य को लेकर शुरू किया था। कहाँ तक सफल हो सकी हूँ नहीं जानती , लेकिन अब तो विदाई की बेला भी गयी। जाना ही होगा। बेटियां तो निर्मोही होती ही हैं। माता-पिता को छोड़कर ससुराल चली जाती हैं , तो फिर कहीं अन्य किसी जगह से मोह भला कैसे हो सकता है।

अनुराग शर्मा उर्फ़ 'स्मार्ट-इंडियन' नामक ब्लॉगर ने मुझे अपमानित करने के लिए जो आलेख लिखा है और उसमें मेरे अधिकाँश आलेखों का जिस प्रकार मखौल बनाया है, उससे तिरस्कृत होकर यहाँ से सदा के लिए चले जाने का निर्णय लिया है।

पाबला जी ने लिखा -- "छील कर रख दिया"......

अनुराग शर्मा जी ने सचमुच छील कर रख दिया और कुछ अपनों ने उस छिले हुए रिसते घावों पर नमक डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेखक और उस आलेख पर आये सभी टिप्पणीकारों का आभार जिन्होंने मुझे हिंदीBulleted List ब्लोगिंग के मोह को ख़तम कर पाने में मदद की।

जाते-जाते कुछ लोगों का उल्लेख जिन्हें अपने दिल में रखकर साथ ले जा रही हूँ...


  • शोभना चौरे जी (मेरी माँ)
  • प्रतिभा सक्सेना जी (मेरी माँ)
  • डॉ कृष्णा जी (मेरी माँ)
  • राजेश कुमारी जी (माँ)
  • डॉ अरुणा कपूर (माँ )
  • रश्मि प्रभा जी
  • साधना वैद्य जी
  • आशा जोगलेकर जी
  • JC जी (मेरे पिता)
  • विश्वनाथ जी (मेरे पिता)
  • मंसूर अली जी (पिता)
  • भूषण जी (मेरे पिता)
  • डॉ कौशलेन्द्र (मेरे पिता)
  • डॉ भोला (मेरे पिता)
  • डॉ एम् एल वर्मा 'क्रांत'(पिता)
  • श्री अशोक सलूजा (पिता)
  • डॉ रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (पिता)
  • चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी (पिता)

कुछ
सखियाँ सहेलियां और बहनें-

  • सीमा जी
  • मुनव्वर सुल्ताना जी
  • रेखा जी
  • रजनी जी
  • प्रेरणा जी
  • मनीषा दीदी
  • निवेदिता दीदी
  • संगीता स्वरुप जी
  • वंदना जी
    मृदुला जी
  • सपना निगम जी
  • क्षमा जी
  • माहेश्वरी कनेरी
  • जेन्नी शबनम जी
  • निशाजी
  • ज्योति मिश्र जी

मेरे
भाई --

  • डॉ रुपेश श्रीवास्तव
  • प्रतुल भैया
  • दिवस दिनेश गौड़
  • विश्वजीत

मेरे शुभचिंतक एवं परम प्रिय मित्र--

  • महेंद्र वर्मा जी
  • कुश्वंश जी
  • Bikram जी
  • भारतीय नागरिक जी
  • aarkay जी
  • आशीष जी
  • मदन शर्मा जी
  • डॉ राजेन्द्र तेला
  • अलबेला खत्री जी
  • राकेश कुमार जी
  • सुरेन्द्र सिंह झंझट जी
  • जयकृष्ण तुषार जी
  • अमित श्रीवास्तव जी
  • अरुण कुमार निगम जी
  • दिलबाग विर्क जी
  • मनोज कुमार जी
  • मनोज भारती
  • अतुल श्रीवास्तव जी
  • अरुण साथी जी
  • अरुण चन्द्र राय जी
  • कुंवर कुसुमेश

बहुत
से अन्य महिला एवं पुरुष ब्लॉगर जिनके सानिध्य में हिंदी-ब्लॉगिंग का मेरा सफ़र अत्यंत सुखकर रहा उन सभी का आभार। मेरी यात्रा यहीं तक थी अब आज्ञा दीजिये। आप सभी को नमस्कार

Zeal

120 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

सामना किये बिना हार मान ली,

नहीं आप को ऐसे ही आयरन लेडी नहीं कहा जाता है।

करारा जवाब दो।

Tarun Sharma said...

Sorry, commenting in English, but it's not the language but thoughts that matter.
Did you come here to be pleased, then why feel insulted?
Do you write to please people, then why worry about the reaction?
You said, you write for some purpose, is that goal achieved, then why stop?
Trouble with trying to be too sociable is you trying to get affected by the thoughts and actions of others too much.
But individually we all have lot of power.
It's time to stand and show what you're made of. What Divya is made of? Is she a real Iron person as she declared or just dome cardboard?
At the end what matters is you as a person yourself and your promises (including promises to yourself), which I think you're not fulfilling and thus doing injustice to yourself.
There're always two ways, easy or difficult. Choice is yours which one to follow.
Would you like to be remembered as a battered and bruised Divya or having satisfaction of achieving what you've promised yourself.
Choice is yours.
Hey, just a final quote:
"When getting gets tough, tough one gets going".

अरूण साथी said...

दिव्या जी, दुखद है आपका जाना, पर आप अपने फैसले पर अडिग रहिए.. क्यांेकि हर किसी का अपना अपना बजूद होता है, अस्तीत्व भी। मैं हमेशा से मानता हूं समाज में अच्छे और बुरे दो प्रकार के लोग होते है और इनको न किसी जाति से बांधा जा सकता है और नहीं किसी लिंग से।
ओशो ने कहा है कि कुछ लोग कथित सत्यवादी का रूप धर कर इसलिए सच बोलने का ढांेग करते है कि उनको दूसरों को पीड़ा पहूंचाने में आनन्द मिलती है।

और सबसे बड़ी बात यह जो ओशो ने ही कही है कि जब अच्छे लोग घर बैठ जाएगें तो बुरे लोग उस रिक्तता को भर देगें।

आगे आपका निर्णय...स्वीकार्यकृ

अन्त में
गीत का यह बोल आपको समर्पित

कुछ तो लोग कहेगें, लोगों का काम है कहना.....

हमको जो ताने देेते है हम खोये हैं इन रंग रलियों में
उनको भी छुप छुप कर आते देखा इन गलियों

तू कौन है तेरा नाम है क्या सीता भी यहां बदनाम हुई....

आपका भाई
अरूण साथी

दर्शन लाल बवेजा said...

कमजोर पड़ना शायद इसी को कहते हैं ?
खैर!! आना और जाना फिर आना फिर जाना .........

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी, ये आपने फिर से ऐसा क्यों किया???
नहीं ये सही नहीं है...
आपके निर्णय से बहुत आघात पहुंचा है, please ऐसा मत कीजिये| इन दुष्टों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा|
आज ब्लॉग जगत से घृणा हो रही है| जिसे देखो, केवल एक के पीछे पडा है| एक बार तो ऐसा लगा कि डॉ. दिव्या श्रीवास्तव के बिना ये हिंदी ब्लॉग जगत चल ही नहीं सकता| जिसे देखो उसके पास लिखने के लिए एक ही विषय रह गया है| दिव्या के नाम पर एक पोस्ट लगा दो और अपनी TRP बढाओ|
बड़े मर्द बने फिरते हैं| क्या औकात है इनकी? अरविन्द मिश्र, अमरेन्द्र, संतोष त्रिवेदी और अब अनुराग उर्फ़ स्मार्ट इंडियन, कैसे मर्द हैं? एक स्त्री से ऐसा घबरा गए जैसे इसने इनकी नाक में दम कर रखा हो| बड़ी मर्दानगी समझ रहे हैं अपनी|
स्मार्ट इंडियन ने ऐसी कौनसी स्मार्टनेस दिखाई है ऐसी घटिया पोस्ट लगाकर| क्यों इंडियंस को बदनाम कर रहे हो भाई? क्या स्मार्ट इंडियंस ऐसे ही होते हैं? क्या इसीलिए स्मार्ट इनियंस नाम का ब्लॉग बनाया था कि एक महिला का अपमान करेंगे और अपनी स्मार्टनेस (?) दिखाएंगे|
क्या स्मार्ट इंडियंस के उद्देश्य इतने क्षुद्र होते हैं?
बताइये ऐसा क्या बिगड़ लिया आपका दिव्या दीदी ने? शर्म आनी चाहिए|
और इनसे भी ज्यादा शर्म आनी चाहिए उन्हें जो न केवल मूक बने यह सब देखते रहे, बल्कि स्मार्ट (?) की स्मार्टनेस (?) बढाने के लिए दो चार शब्द अपनी ओर से भी जोड आए| अनुराग की यह पोस्ट पढ़कर कोई मुर्ख भी इसका क्षुद्र उद्देश्य समझ सकता था| किसको फुद्दू बना रहा है ऐसी पोस्ट लिखकर?
ओर क्या ब्लॉग जगत के लोग इतने मुर्ख हैं कि इतनी सी बात भी नहीं समझ सके?
ओर तो ओर महिलाएं भी आगे रही इस स्मार्ट (?) की स्मार्टनेस(?) में इजाफा करने|
बहिष्कार तो इन सब का भी होना चाहिए|

दिव्या दीदी, आपके इस निर्णय से बहुत दुःख पहुंचा है| ब्लॉग जगत के लगभग सभी लोगों ने अपने नैतिक मूल्य खो दिए हैं| please आप ऐसा मत कीजिये|
अपने निर्णय पर पुन: विचार कीजिये| यह सही नहीं है| आपसे प्रार्थना है|

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

forget and go ahead with greater ZEAL intolerance has to be tolerated at times

वर्ज्य नारी स्वर said...

ओह !

Prem Prakash said...

दिव्या...मेरा आपसे कोई बहुत प्रत्यक्ष परिचय नहीं...पर अभिव्यक्ति की दुनिया को यों अलविदा कहना ठीक नहीं लगा...एक बड़ा संघर्ष है यह...कवयित्री काल्यायनी के शब्दों में कहें तो 'इस पौरुषपूर्ण समय में' महिला अस्मिता की लड़ाई खुद महिलाओं ने छेड़ तो दी है पर यह लड़ाई पुरुषों की नंगई के आगे कई बार झेंप खाकर ठहर सी जाती है...इस जंग को ऐसी विचलित कर देने वाली स्थिति में जारी रख पाना एक महिला के लिए वैसा ही मुश्किल है...जैसा आपको महसूस हो रहा होगा...पर इसका हल भी यही है कि बगैर हिले आैर विचलित हुए इनका सामना किया जाए...आपकी संवेदना आैर अभिव्यक्ति की हिमायत में अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियां...
'नमक किसी मिठाई की बेटी नहीं
हाथ और पांव का गासा-गासा गला चुके
मजदूरों की रोटी है
साल के चुनिंदा दिनों में
खुशियों की काजल आंज कर
केक के साथ चाकूमारी से पहले
मोमबत्तियां बुझाने वाली आंखें
खारे पानी से भींगकर
पहले भी हो चुकी हैं नंगी...'
(...तो खारी नहीं मीठी होती! )
http://puravia.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

Sunil Kumar said...

यह पोस्ट क्या किसी लौह स्त्री की है ? कदापि नहीं .....दिव्या जी आपने काम से मतलब रखिये
छोडिये इन बातों को ....

DR. ANWER JAMAL said...

आपका यह निर्णय अति सुविचारित एवं फलप्रद है ।
इस बार इसी ब्लॉग के माध्यम से आपके लौटने की संभावनाएं क्षीण दिखती हैं लेकिन ...

दीपक बाबा said...

हरी अनंत हरी कथा अनंता |
कहहि सुनहिं बहु बिधि सब संता

Prem Prakash said...

"...बहस हंसकर करें या डूबकर
गर्दन की नाप तो लेनी होगी
उन छोकरों की ही
जिनके माइक्रोसॉफ्टी दिमाग के
खुले विंडो पर
बालिगाना खेल के लिए
तैयार हैं कई गेमप्लान
समय से ऊंची मचान
तीखे तीर शातिर कमान"
http://angikaa.blogspot.com/2011/07/blog-post_27.html

संतोष त्रिवेदी said...

Divyaji,aap aisa na karen yah kayartaa hogi,aap apne lekhan se logon ko prabhavit karen na ki bhavnaon se !aap vyangya ya tanz ka bhi bura na maane....koi vyaktigat roop se aapke khilaaf nahi hai !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

छीलना अनुराग शर्मा की (?) आदत है। एक इस्पाती स्त्री को उस के कारण पलायन नहीं करना चाहिए। मेरी राय है कि आप को डटे रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में ये परिस्थितियाँ तो अनेक बार उत्पन्न होती हैं, इन्हें पायदान समझ कर पद्दलित करते हुए आगे की सीढ़ी पर चले जाना चाहिए। मुझे आशा है कि इस ब्लाग पर नियमित रूप से आप की पोस्टें पढ़ने को मिलती रहेंगी।

रश्मि प्रभा... said...

जैसे आलेख आपने लिखे , उसके मध्य आपका यह पलायनवादी रूप स्वीकार नहीं .... किसी के आलेख को पढ़ने से बेहतर हम जानते हैं कि कमल कीचड़ के मध्य अपना सौन्दर्य, अपने खिलने की प्रवृति नहीं छोड़ता ... बेटियाँ विदा होती हैं , पर जिस घर को तिनके तिनके वे सजाती हैं , उसका दायित्व उनपर है

रश्मि प्रभा... said...

an iron lady - change your mind .कोई किसी का क्या अपमान करेगा , ... आप अपनी कलम पर भरोसा रखें और अपनी जीवटता पर

shilpa mehta said...

नहीं दिव्या जी - पराजित और अपमानित होना स्त्री की नियति कदापि नहीं है | आप अभी क्षणिक भावावेश में हैं -परन्तु यह सिर्फ एक बदलाव का phase है | बदलाव जीवन का अभिन्न अंग है , सहमती भी होती है कई विषयों पर और असहमति भी | इतना hurt मत हों |आपको काफी समय से पढ़ती आ रही हूँ | टिप्पणी नहीं करती | कुछ समय का break ले कर फिर एक नयी zeal के साथ पोस्ट लिखना शुरू करिए |aapka mail id nahi hai - to majbooran yah sab yahaan kah rahi hoon |

prerna argal said...

ये क्या दिव्याजी आप ये क्या रह रही हैं आपने मुझे अपनी बहन कहा है और यहाँ आपके कितने ब्लोगर्स साथी माँ के सामान हैं ,पिता सामान हैं.बहनें हैं,भाई हैं इतना बढ़ा आपका परिवार है आप हम सब को छोड़ कर कैसे जा सकतीं हैं /केवल कुछ लोगों के गलत ब्यवहार की वजह से आप हम सबका साथ कैसे छोड़ सकती हैं /आप तो जानती हैं की आज भी हमारे समाज मेंकुछ पुरुषों की सोच नारियों के प्रति नहीं बदली हैं और ख़ास कर तब जब वो किसी नारी को आगे बढ़ते और प्रसिद्द होते देखते हैं तो उनका पुरुष अहम् ये सहन नहीं कर पाता /और वो उसकी बेकद्री करके उसको नीचा दिखा कर अपना अहम् संतुस्ट करते हैं और वो तो चाहते ही हैं की महिला घबराकर सब छोढ़कर चुपचाप अपने घर बैठ जाए /और वही आप करने जा रहीं हैं /आप एक बहुत अच्छी लेखिका हैं आपके लेख सब लोग बहुत ध्यान से पढ़ते हैं और अपनी टिप्पड़ी देते हैं /काफी लोग उन्हें पसंद करते हैं / मेरी राय से तो आपको कुछ लोगों के कारण अपने इस लिखने के गुण को बंद नहीं करना चाहिए /और ना ही अपने ब्लोगर्स साथियों का साथ छोड़ना चाहिए/ आपकी यहाँ एक अच्छी छवि हम सबके दिल में अंकित है/उसे कुछ लोगों की अनर्गल बातें धूमिल नहीं कर सकतीं बल्कि ऐसी बातें करने वाले लोगों की छवि ही धूमिल होती है /अपनी इस बहन की बात मानिए और कृपया अपना निर्णय बदल दीजिये /हम सब हमेशा आपके साथ हैं /आशा है मेरी बात पर ध्यान देंगी और लिखना हमेशा जारी रखेंगी / आभार /

Rajesh Kumari said...

pahle laga koi Divya ne prank khela hai kintu poora padhne par ek aaghaat sa laga tum to itni kamjor ho nahi sakti????what is this????vishvaas nahi hota jiske lekh me hume ek ujjaval jyoti,sachchai himmat dikhaai deti thi sirf ek shakhs(still i don't know what he has written about you i will try to know the matter)ke ulta seedha kahne par itne logon ki judi hui bhaavnaon ko sakte me daal degi.Divya pls think again.mujhe bahut garv mahsoos ho raha hai ki tumne mujhe apni maa ki shreni me rakha.god bless you.meri duvaayen humesha tumhare saath rahengi.really jab beti ko vida kiya tha vahi ehsaas aaj tumne dubara karva diya......wht to say just speechless.....god bless you.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बिटिया दिव्या!
हमें आपका यह आलेख अच्छा नहीं लगा!
पिता मानती हो तो अपने निर्णय को बदल दीजिए न!
--
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

यादें said...

दिव्या , खुश और स्वस्थ रहो ....चलती रहो ...


"दूसरों को इतनी जल्दी माफ़ कर दो
जितनी जल्दी आप उपर वाले से अपने
लिए माफ़ी की उम्मीद रखते हैं"

शुभकामनाएँ!

Poorviya said...

?????????????????????

jai baba banaras.....

nilesh mathur said...

अभी ना जाओ छोड़ कर
अभी ये दिल भरा नहीं ।
इस तरह कुछ लोगों के चलते बाकी सभी का दिल तोड़ कर जाना उचित नहीं है।

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं ? आप नकारात्मक विचारों वालों से ज्यादा क्यों प्रभावित हो गई ? जिन ब्लोगर्स के नाम आपने ने लिखे हैं, उन सभी पर वो चंद ब्लोगर्स कैसे भरी पड़ गए जिन्होंने आप के ख़िलाफ़ लिखा! एक कहावत है कि जब लोग आप पर कीचड़ उछाले तो समझो आप सही जा रहे हो! कोई भी ब्लोगर ऐसा नहीं लिख सकता कि उसे सब पसंद करें! आपके लिखे को तो फिर भी सबसे ज्यादा ब्लोगर्स ने पढ़ा! इतनी सारे लेख/पोस्ट, अलग -२ विषयों पर इतनी जल्दी -२ लिखना किस के बूते की बात है? हिंदी ब्लॉगिंग को आज भी आप जैसे ब्लोगर की ज़रुरत है! जब मैं कुछ ऐसे मीडिया वालों से मिला जो आपके ब्लॉग को नियमित पढ़ते हैं तो एक वारगी तो मैं हैंरान रह गया! हालाँकि उनके खुद के पास ब्लॉग लिखने का समय नहीं होता अन्यथा वो आपको टिप्पड़ी के माध्यम से जरूर बताते ! ऐसे न जाने कितने और भी लोग आप के लिखे को पढने वाले होंगे! ये निश्चित हैं ! इसीलिए अगर आप अपना निर्णय बदल लें तो इससे ज्यादा ख़ुशी की बात और क्या होगी? मेरा तो ऐसा मानना है कि जो लोग हमारे काम को पसंद नहीं करते, उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण वो लोग होते हैं जो हमारे काम को पसंद करते हैं! इसलिए अपने से घृणा करने वाले लोगों की परवाह ही क्या करना?

nilesh mathur said...

....और इतने बड़े परिवार को छोड़कर जाना तो बिलकुल भी उचित नहीं है।

mahendra verma said...

त्रासद, दुखद !

Bhushan said...

किसी सम्मानित महिला या पुरुष का अपमान नहीं होगा इसकी गारंटी न तो समाज देता है और न धर्म. डॉ दिव्या अपने दिल को क्यों दुखा रहीं हैं. इसका दूसरा पक्ष भी है. मान-सम्मान एक नकली चीज़ न होती तो धर्म इनसे ऊपर उठने की सलाह क्यों देता. इस पर विचार करें. आपकी नई पोस्ट हम सभी कल फिर देखना चाहेंगे. Come on !!

उन्मुक्त said...

मेरे विचार में कोई क्या कहता है इसलिये चिट्ठाकारी छोड़ना ठीक नहीं। आप वह लिखिये जो आपको अच्छा लगा है। जिसे जो ठीक लगता है वह लिखेगा।

Rakesh Kumar said...

हारिये न हिम्मत,बिसारिये न हरि नाम

आप तन मन से स्वस्थ हो फिर से नवीन
उत्साह के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़ें
यही दुआ और कामना है.

Maheshwari kaneri said...

आप की यात्रा अभी पूरी नही हुई अभी तो आप को बहुत कुछ करना है..

Dilbag Virk said...

आप दुखी हैं , इससे मैं सहमत हूँ , लेकिन लोगों के कहने पर हार मान जाना अच्छा नहीं लगा , काश आप उनका मुकाबला करती

फिर दिल दुखाने वाले तो कुछ लोग होंगे आपके शुभचिंतकों की सूची निस्संदेह आप द्वारा दी गई सूची से काफी लम्बी होगी

मेरी विरासत said...

Purush apna paurush kisi nari ko jalil karne me hi samajhta hai. Samay-samay par aisi kutsit mansikta dekhne ko mil hi jati hai. Apke sath jo kuchh bhi hua vo isi ki ek jhalak matr hai. Apki narajgi evam dukh mai samajh sakti hu.

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

अरे यह क्या...आप ऐसा कैसे कर सकती हैं...मुझे माफ करें..थोड़ा देर से आया...चंद ही लोग थे जिन्हें मैं महसूस कर पाया था..अब हमेशा के लिए ब्लाग बंद करने का मतलब समझ में नहीं आता। कितने अच्छे लोग आपसे जुड़े, इसका ध्यान नहीं रjहा आपको। फेहरिस्त तो गिना डाली, परंतु उनसे जुड़ाव कत्तई न रखा आपने...

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले सोचा जरूर होगा...परंतु यह गलत है। पूरा का पूरा निर्णय गलत है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ऐसा कैसे हो गया। किनकी गलतियों से हुआ..परंतु बुरा है। ब्लाग बंद करने का मतलब क्या है....। अरे नहीं...

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

शायद मैं कुछ भावुक हो रहा हूं...एक अच्छे विचारों से भरे समुच्चय की मौत अच्छी नहीं लग रही...क्या टिप्पणी का विकल्प बंद है...क्या आप मुझे सुन पा रही हैं...

मनोज कुमार said...

स्त्री दुर्बल नहीं होतीं और न ही पराजित होना उनकी नियति है। वो शक्तिरूपा हैं और दुष्टों का संहार करने के लिए चण्डी का रूप धारण करती हैं।

शक्ति का पर्व आने ही वाला है।

मिशन को अधूरा छोड़ कर जाना उचित प्रतीत नहीं होता।

प्रतुल वशिष्ठ said...

"आप यदि जायेंगे इस तरह.. हमें तब देगा श्वासें कौन?..."
मैंने भी दोषी हूँ.... वहाँ मैंने अनुराग जी के उत्कृष्ट व्यंग्य(?) को काफी दमदार बताया ... वह इतना दमदार आघात था कि जिससे उनको कुछ मौलिक लिख पाने की संतुष्टि मिली... मुझे उनसे अपेक्षा थी कि वे ब्लॉग लेखन को केवल एक वर्ग विशेष की बपौती बनने से रोकेंगे... किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ...

मैंने आज़ जाने-माने साहित्यकार अजित कुमार की रचना पढी ...
_______________
मैं हूँ थोड़ा बातूनी
तुम भी थोड़ी बातूनी
इसीलिए तो प्यार हमारा
बना हुआ अफलातूनी.

हम दिमाग के मारे हैं
हम किताब से हारे हैं
इसीलिए तो अपने मन को
बाँधे हुए बिचारे हैं.

तुम भी छूट नहीं लोगी
मुझे नहीं लेने दोगी
इसीलिए तो लगता – दूरी
अपनी कभी न कम होगी.

कुछ तो कम हो जाने दो
बहसों को खो जाने दो
कब से लगी हुई हो, पल-भर
अपने को सो जाने दो!

उठ, पंछी कहलाएँगे
क्षितिजों तक हो आएँगे
चोंच चोंच से मिला
पंख से पंखों को सहलाएँगे.

मन से मन की बात कहें
संबंधों को जियें, सहें
जितना गहरा प्यार करें,
उतना ही आज़ाद रहें.

प्रतुल वशिष्ठ said...

मैं भी दोषी हूँ....
इस अपराध का ... क्या प्रायश्चित हो ... समझ नहीं आ रहा.

Rahul Singh said...

आश्‍चर्य कि अब तक कोई टिप्‍पणी नहीं.

G.N.SHAW said...

हिम्मत हार गयी ? ऐसा नहीं करते ! समुद्र की लहरों को देख आगे नहीं बढ़ने वाला , कभी भी शिखर तक नहीं जा सकता ! अभी शिखर दूर है ! हिम्मत न हारे ! कलम की ताकत अभी बाक़ी है ! आशा है - अपने निर्णय को बदल देंगी !

कौशलेन्द्र said...

हूँ ऊँ....!
एक ब्लोगर की निर्मम ह्त्या कर दी गयी ... .......मैं श्मशान में अकेला खड़ा हूँ ........कोई शुभचिन्तक दिखाई नहीं दे रहा ? कहाँ चले गए सब ?
चलो ठीक है ...एक भ्रम तो टूटा.
रंगमंच से सारे कलाकार जा चुके हैं....
नहीं, अभी तो वे रंगकक्ष के भीतर बैठकर लगाया हुआ मेकप उतार रहे हैं. मेकप सदा नहीं रहता. कभी तो उतारना ही पड़ता है. यह भी अच्छा ही है.... मेकप के नीचे का वास्तविक चेहरा कभी तो देखने को मिलता है. बिना मेकप के रंगमंच पर आने की प्रथा नहीं है. अभिनय के लिए आवश्यक है ....वास्तविकता को छिपाकर वास्तविकता का प्रदर्शन . सुनने में कुछ विचित्र सा प्रतीत होता है ...पर यही तो कला है. और इस कला में जो जितना कुशल है जीवन में भी वह उतना ही सफल है.
पर मैं ब्लोगार के शव को ठिकाने लगाने की बात कर रहा था. ...अंतिम संस्कार तो करना ही पडेगा न !
चेहरा धुल गया हो तो आ जाइये सब लोग .....अंतिम संस्कार करना है. ....अभिनय की सफलता का जश्न फिर मना लेंगे.

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

सवाल यह है कि आप जाना क्यों चाहती है।

तू बस अपना काम किए जा
तेरी तकदीर रचेंगे राम..... कवि प्रदीप

ana said...

jaldbazi me nirnay na le

देवेन्द्र said...

ऐसै कैसे हो सकता है दिव्या जी, भला आप लिखना क्यों छोड़ रही है। ऐसा होगा तो सचमुच मुझे बहुत निराशा होगी। इत्तपाकन मैंने कल ही अपने ब्लाग पर नई पोष्ट लेखन व तनावमुक्ति डाली है। कृपया अवश्य पढ़े और लिखना जारी रखें, यह मेरा आपसे विशेष आग्रह है।

upendra shukla said...

कहने वाले कहते है !पर् आपको उन लोगो से क्या
आप हमारे ब्लॉग जगत की शान है !आपको यु नहीं जाना चाईए

AK said...

पीछे तो हम कदापि नहीं जा रहे हैं . पीछे तो गार्गी वाचक्नवी , मत्रेयी , जैसी वेद की विदुषियां थी - गार्गी संहिता भी इनके नाम पर है , और महान विद्वान याज्ञवल्क्य को गार्गी ने अपने प्रश्नों से निरुत्तर कर दिया था ( उस वक़्त - हिला दिया या छील दिया जैसे सस्ते कमेंट्स देने वाले लोग नहीं थे ) अपाला , लोपामुद्रा और घोषा जैसी वेद की ऋचा रचने वाली महान हस्तियाँ थी . भारती मिश्र जैसी शंकराचार्य को शास्त्रर्थ में मात देनी वाली , अकबर की सेना से टक्कर लेने वाली चाँद बीबी , अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाली लक्ष्मी बाई सरीखी महिला होती थी . प्रथम अखिल भारतीय सम्राट अशोक की राजधानी में काफी संख्या में महिला सैनिक राजधानी की सुरक्षा में तैनात रहती थी और तो और .. पाणिनि की अष्टाध्यायी में ... महिला गुरु ( आचार्या ) और गुरु की पत्नी ( आचार्यानी ) : उपाध्याया (महिला शिक्षक) और उपाध्यायिनी ( शिक्षक की पत्नी ) इतने सूक्ष्म अर्थ भेद के लिए अलग अलग शब्द हैं जो अंग्रेजी में भी नहीं हैं. इतनी प्रगतिशील और समानता वाली थी हमारी प्राचीन व्यव्यस्था .
आप ने जो लिखा है , जिस लेखन का जिक्र किया है - वो तो तालिबानी संस्कृति का नमूना है . सहिष्णुता की कमी , जिन में हो वो ही एसा पोस्ट लिखेंगे .
भारतीय संस्कृति में कहा जाता है - तारीफ सब के सामने करो , आलोचना नहीं . स्वाभाविक है - जिनको अपना तखल्लुस , भारतीय नहीं रख कर उसका अंग्रेजी संस्करण रखना अच्छा लगता हो - वो इस भारतीय संस्कृति के बारे में क्या जाने .

आदमी तो आदमियत कब का खो चुका
उस से आदमी होने की जिद क्यों करते हो

वैसे भी युद्ध में सैनिक और वीर सीने पे कवच पहनते हैं , सामने; पीछे नहीं , क्योंकि मर्द सामने से वार करते हैं , पीछे से नहीं . पीठ पीछे वार करना तो कायरों की निशानी है . पर अफ़सोस , कायर को अपने वीर होने की ग़लतफहमी और मुगालता सब से ज्यादा रहता है . पीठ पीछे कहना सुनना , चुगली नमक पंछी को चुगलाना - ये सब तो किन्जरी मानसिकता का द्योतक है . पता नहीं , आजकल किंजर सा फैशन करना , वैसा बर्ताव करना ही स्मार्ट कहलाता हो .... इसके लिए इन्हें माफ़ करने पर विचार कर सकती हैं .. न ना माफ़ी नहीं ... ignore कर आगे का लेखन का सफ़र जारी रखने पर विचार तो कर ही सकती हैं . वैसे भी हिन्दुस्तान में शिखंडियों की कमी नहीं है .
एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं , दूर नहीं पास मिलते हैं
काम कायरों का पर मर्द के ताव सारे मिलते हैं

कहते हैं न - अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है . ब्लॉग शब्दावली में ये क्या होगा - सभी सुधी पाठक जरूर समझ गए होंगे , न समझे वो ... वो ....
पुराने ज्ञानि लोग इसी लिए परायी गलियों का रुख ही नहीं करते थे और करते थे तो हाथ में एक मोटा डंडा जरूर रखते थे .

वैसे मैंने USA के एक पोस्ट में पढ़ा - किसी की व्यंग्यात्माक टिप्पणी थी - अच्छा है इसी बहाने हिन्दुस्तान में शेरों की तायदाद तो बढ़ रही है . शेर लुप्त होती प्रजाति की सूची से निकल जायेगा . कितना बड़ा काम होगा ये... कितनी बड़ी उपलब्धि ..सोचिये जरा .
जो काम करोड़ रुपये खर्च कर प्रोजेक्ट lion से नहीं हो पाया , वो आप की पोस्ट की बदलौत मुफ्त में हो रही है . अब देश सेवा के लिए इतनी कुर्बानी पर तनिक विचार कीजिये . आप के निर्णय पर पुनर्विचार की आशा है .



बक्शा तो उसने भगवान् को भी नहीं
उसके वार से हत प्रभ क्यों होते हो
हज़ार लोगों ने पलके बिछाई हर कहीं
कुछ काँटों से चुभ राह छोड़ क्यों देते हो
ज़िन्दगी ए दोस्त है आग की दरिया
तप के आज कुंदन क्यों नहीं हो लेते हो

manu shrivastav said...

मैंने अनुराग शर्मा का ब्लॉग पढ़ा नहीं और पढ़ना भी नहीं.
आप ब्लोगिंग को छोड़ रही हो तो निश्चय ही बहुत ही निम्न दर्जे को बात हुई होगी . जिससे आपके दिल में असह्य पीड़ा हुई होगी और होती ही है पीड़ा जब आछेप लगते हैं तो.
ब्लोगिंग जगत में मैं अनुभव हिन् हूँ . और बहुत से लोगो से मेरा परिचय होना बाकि है. मैं आपके ब्लॉग का अनियमित पाठक हूँ. फिर भी मैं सिर्फ आपसे इतना कहूँगा की एक आयरन लेडी को एक आयरन लेडी ही रहना चाहिए.
सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं.

जयकृष्ण राय तुषार said...

डॉ० दिव्या जी भागो नहीं भाग्य को बदलो |जिसमें दम है वो विरोधों में और चमकेगा /किसी दिये पे अँधेरा उछाल कर देखो डॉ० कुंवर बैचैन जी यह शेर अपने साथ हमेशा रखिये |भागना डर कर दुनिया में इससे आसान कोई काम नहीं है मुकाबला करिये समाज में हर काल में असभ्य लोगों का बोलबाला रहा है |राम का चरित्र भी न होता अगर उनके सामने रावण नहीं होता |आप जानती है मालवीय जी निज़ाम हैदराबाद से चंदा मांगने गए तो उसने जूता फेंक दिया था ,लेकिन मालवीय जी ने अपने कौशल से प्रचारित करा दिया की निज़ाम दरिद्र हो गया |निज़ाम लज्जित हो गया |आप उनको बिलकुल न पढ़िए जो आपको लज्जित करना चाहते हैं आप उनके लिए लिखिए जो आपको पढ़ना चाहते हैं कुछ निर्दोष पाठक भी होते हैं जो ब्लोगर नहीं होते उनके लिए लिखिए |समन्दर में खारा जल और मोती दोनों होते हैं |keep writting have a nice day

अमित श्रीवास्तव said...

strictly "no".

एक साधारण सा उदाहरण...

यदि बहुत सारे लोग आपके पीछे दौड रहे हों, आपको अपमानित करने हेतु, आप भागते भागते अचानक ठिठक के पीछे मुड़ कर खड़े हो जाएँ.आप पाएंगे कि आप तो शीर्ष कोटि की नेत्री हो गईं है ,और बाकी सब आपके विरोधी होते हुए भी समर्थक ही सिद्ध होंगे ।
इससे एक बात तो अवश्य सिद्ध होती है कि आप अपने आलोचकों के दिलो-दिमाग पे भी छाई रहती हैं...

Udan Tashtari said...

खुश रहिये...उचित निर्णय है पलायन का.....हलचल का मानक काफी उपर था...जो कि यूँ भी उचित नहीं...जीवन शांतिपूर्ण होना च्चाहिये...और जीवन को शांतिपूर्ण रहने देना चाहिये...दोनों में से एक भू न निभ पाये...तो ऐसे निर्णय स्वागत योग्य हैं...


शुभकामनाएँ...अगर यह मात्र ब्लॉगरीय हथकंडा नहीं है तो शायद कभी अन्यथा मुलाकात हो....अलविदा!!


पुनः कहता हूँ....अच्छा निर्णय है और बदलने की कोई आवश्यक्ता नहीं....

ashish said...

मैंने कभी नहीं सुना की ईर्ष्या कभी लौह में जंग का कारण बन सकती है . आगे बढ़ो और बढ़ते रहो.

रचना दीक्षित said...

शायद यह उचित निर्णय नहीं है. लेकिन कोई भाषण नहीं.

कुश्वंश said...

दिव्या जी ..पलायनवादी प्रवृति का त्याग करे ,कुछ कतिपय लोग अगर आपको इस हिंदी ब्लॉग जगत से रुखसत करना चाहते है तो आप उनकी चाल को समझे, उनके बिछाये जाल को समझे और उससे निकले.आपके फालोवार्स की संख्या , आपकी पोस्ट पर मिलने वाली टिप्पणियाँ , आपको सराहने वाले लोग ..ही शायद है इस ईर्ष्या का कारण हैं इसे समझे. इन अमर्यादित लोगो को जवाब तभी मिल सकता है जब आप ब्लॉग जगत में सक्रीय रहे और मुह तोड़ जवाब दर जवाब .. की परिभाषा की प्रवृति इन्ही लोगों के लिए छोड़े. आप बस शालीनता से बेहतरीन पोस्ट लिखे . व्यंग और कार्टून तो उन्ही के बनाये जाते है जो .. उपलब्धी की उन ऊचाईयों पर होते है जहा पर पहुचना तो सभी चाहते है मगर .. अपनी लकीर बड़ी कर नहीं वरन उस लकीर को काट कर .ये सास्वत नियम है. एक बार फिर कहना चाहूँगा ...आपका पलायनवादी निर्णय किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं.. एक पेड़ को चंद लोग यदि सुखाना चाहते है तो उस पेड़ को अनगिनित लोग हरा भरा रखना चाहते है .. क्योकि उस पेड़ से खुशबूदार फूल और मीठे फल की उम्मीद है .. अब निर्णय आपका है .. शुभकामनाये उत्तम स्वस्थ के लिए और चित्त को शांती के लिए.

Sadhana Vaid said...

दिव्या जी ! यूँ किसीकी भूलों का दण्ड उन्हें मत दीजिए जो आपके लेखन को पढ़ते हैं, सराहते हैं और आपके विचारों के कायल हैं ! आप ऐसे लोगों का बहिष्कार कर दीजिए, उन्हें कोई तवज्जो मत दीजिए जिन्होंने आपका दिल दुखाया है ! बस उनका ध्यान कर अपना निर्णय बदल दीजिए जिन्हें आपकी पोस्ट्स का इंतज़ार रहता है और जिनसे आपको भी जुड़ाव महसूस होता है और उन्हें भी आपसे बहुत प्यार है ! क्या चंद गलत लोग इतने सारे अच्छे लोगों पर भारी पड़ गये ? अपने निर्णय पर पुनर्विचार ज़रूर करिये !

कौशलेन्द्र said...

आ गए ! अच्छा किया ! अभी कुछ और रूदालाओं की भी प्रतीक्षा है. निर्मम ..नृशंस ह्त्या में शामिल लोग यहाँ भी आ आरहे हैं ...अश्रुपात करने. बधायी हो डॉक्टर रूपचंद्र शास्त्री जी! आपने ह्त्या को इतना प्रभावशाली मान की उसकी चर्चा आवश्यक समझी और अब शव यात्रा की भी चर्चा करना चाहते हैं. चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद, भारतीय नागरिक ....किस-किस का नाम लूं. जो हर पोस्ट पर आ कर दिव्या की मिथ्या प्रशंसा के पुल बांधते रहे उनमें से अधिकाँश नृशंस ह्त्या में भी शामिल रहे . उन्हें चैन अभी भी नहीं है अब यहाँ भी आना शुरू कर दिया रुदन समारोह का आनंद लेने के लिए. पितृ तुल्य माना था दिव्या ने शास्त्री को. क्या बेहतरीन आदर्श चरित्र प्रदर्शित किया है. अजित गुप्त के प्रति कितना सम्मान था दिव्या के मन में...क्या सिला दिया ? दिव्या के लेखन में कोई कमी थी तो आप सभी बड़े थे ..अनुभवी थे ..क्यों नहीं कभी समालोचना की ? तब क्यों सभी लोग मिथ्या स्तुति करते रहे ? ब्लॉगमंच पर ऐसा घृणित षड्यंत्र ?
नहीं दिव्या ! अब वापस आने की आवश्यकता नहीं. दुश्चक्रों से भरे इस जगत में ....तथाकथित बुद्धिजीवियों के इस घृणित संसार में तुम्हारी कहीं जगह नहीं है.
अजित गुप्ता जी ! देखिये .....पीट्सबर्ग में आपकी टिप्पणी के बाद भी इस लड़की ने माँ का दर्ज़ा दिया है आपने. आपने उस माँ की भी ह्त्या कर दी !
मेरा विनम्र निवेदन है ह्त्या में शामिल उन सभी लोगों से जो यहाँ अश्रुपात करने की प्रतिस्पर्धा में शामिल होने आ रहे हैं कि दिव्या को शान्ति से जाने दो. वह अपराधी नहीं है, उसने कोई घोटाला नहीं किया, मंत्री बनकर जनता को नहीं ठगा, कोई उच्चाधिकारी बनकर करोड़ों रुपयों की रिश्वत नहीं ली है.....दिव्या उन सबसे अधिक बुरी तो नहीं है न ? जाने दो उसे ......
और यह भी कि ऐसे दोहरे चरित्र वालों से विनम्र अनुरोध है कि मेरे ब्लॉग पर भी.... कृपया तशरीफ न लायें. मुझे झूठी टिप्पणियाँ नहीं चाहिए....बिलकुल भी नहीं ...मैं ऐसे लोगों के लिए लिखता ही नहीं हूँ.
प्रतुल जी ! एक महिला ब्लोगर की निर्मम ह्त्या के लिए कई सेनानी लोग वर्षों से प्रयास रत थे..... अंततः सफल हो गए ...सबने मिलकर मार दिया दिव्या को. चलिए, हम आप मिलकर शवयात्रा की तैयारी करते हैं.
रूपचन्द्र जी और चन्द्र मौलेश्वर जी ! कृपया आप लोग मत आइयेगा इस शव यात्रा में.
हमें अकेला छोड़ दीजिये ....चैन से दुःख तो मना लेने दीजिये.

Jyoti Mishra said...

Hello Dr. Divya I'm too young to give u any kind of advice but I believe in one thing that people are born to talk..
in good, in best, in bad, in worse, in worst.... ppl do just one thing they talk/write.

So don't give a shit about those psychopaths.
they r not even equal to a speck of dust in universe. There existence or non-existence doesn't make any difference.

I'd love to see more from u....

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
पुन: प्रार्थना करता हों, मत जाइए| देखिये कितने लोग हैं आपको चाहने वाले, जो आपको सदैव यहाँ देखना चाहते हैं|
दिव्या दीदी, कुछ चंद "चिन्दी छाप ब्लोगर" इन पर भारी नहीं पड़ सकते| कुछ ने अपमान किया है तो बहुतों ने सम्मान भी तो दिया है| उनके सम्मान की खातिर, please रुक जाइए, मत जाइए|
एक बार दुबारा आराम से सोच लीजिये| आपके दुबारा लौटने से आपका आत्मसम्मान आहत नहीं होगा| क्योंकि जो लोग आपको यहाँ देखना चाहते हैं, वे सब आपका सम्मान करते हैं| जिनको आपके यहाँ होने से तकलीफ है, उनकी परवाह आप क्यों करती हो|
इसलिए दिव्या दीदी, हमे एक और मौका दीजिये, इस बार शिकायत का मौका नहीं देंगे| मत जाइए|

ajit gupta said...

मैं एक सप्‍ताह के लिए प्रवास पर क्‍या रही कि बड़ी उथल-पुथल हो गयी। अनुराग शर्मा जी के आलेख पर टिप्‍पणी तो मैंने भी की थी लेकिन मुझे इसका रंच मात्र भी आभास नहीं था कि वह दिव्‍या के लिए पोस्‍ट है। अनुराग शर्मा जी सुलझे हुए व्‍यक्ति हैं, कहीं जरूर ही कोई गलतफहमी हो गयी है। संवाद द्वारा दूर कर ली जाएगी। लेखन क्षेत्र चुनौती भरा क्षेत्र है, इसमें पलायन, कर्म के प्रति पलायन है। क्‍या दुनिया में एक ही विचार रहेगा? दूसरे विचार को हम भगा देंगे या इतना परेशान करेंगे कि वह स्‍वयं भाग जाएगा! नहीं इस पलायन को बर्दास्‍त नहीं किया जा स‍कता है। एक कंकरी से ही आहत हो गयी? हमने तो पत्‍थर खाए हैं और यदि नरेन्‍द्र मोदी के शब्‍दों में कहूं तो इन्‍हीं पत्‍थरों पर आज खड़े होकर यहाँ तक पहुंचे हैं। किसी दिन मेरी किताब के पन्‍ने पलटना, पलायन करने की सोवोगी भी नहीं। यहाँ तो महिनों तक अखबार रंग दिए गए थे। फिर भी ना प्रतिक्रिया की और ना ही क्रिया करने से कभी चूकी। इतने सारे लोग साथ खड़े हो तो उनका ध्‍यान नहीं और किसी एक ने क्‍या लिख दिया उसका इतना ध्‍यान? वाह!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दिव्या ,

यह निर्णय स्वागत के योग्य नहीं है ..
गौतम बुद्ध ने कहा था कि यदि कोई गाली देता है और आप उसे ग्रहण नहीं करते तो वो उसीके पास रह जाती हैं ... आपके इस निर्णय से लग रहा है कि आपने लोगों की बात को स्वीकार कर लिया है ...

माना कि मन आहत होता है , पर यह तो पलायन है ..व्यर्थ के विवाद में न उलझ कर अपना सार्थक लेखन करें ... जिसकी जैसी प्रवर्ति है उसको बदला नहीं जा सकता ..
आपके जब इतने शुभेच्छु हैं तो आप नि:शंक हो कर लिखें ..बस एक सलाह देना चाहूंगी कि गड़े मुर्दे उखाडने से वातावरण दूषित होगा ..उससे बचें ..
शुभकामनाओं के साथ

इमरान अंसारी said...

अरे आपकी ये पोस्ट तो अभी पढ़ी मैंने.........पहली टिप्पणी कर चुकने के बाद........ऐसे जग से भाग के किसने कब कहाँ कुछ पाया है.........'जिब्रान' साहब के शब्दों में मुक्ति तो यही है सब बन्धनों के बावजूद इनसे ऊपर उठ जाओ......अहं के हटते ही कोई दुश्मन नहीं रह जाता......हम उम्मीद करेंगे आप ज़रूर लौटें और पहले से कहीं बेहतर और मजबूत होकर|

इमरान अंसारी said...

आपने हमे अपना मित्र समझा इसके लिए तहेदिल से शुक्रिया आपका...........मैं बस यही कहूँगा की नफरत, इर्ष्या को अगर किसी चीज़ से जीता जा सकता है तो वह है सिर्फ प्रेम और क्षमा|.........आप ज़रूर वापस आये.....और हो सके तो अपने लक्ष्य पर ध्यान रखें जो आपने ब्लॉग के माध्यम से सोचा है उसे ज़रूर पूरा करें........बहसों से बचे.......मेरी शुभकामनायें आपके साथ है मेरी पहली टिप्पणी में अगर मुझसे कोई गलती हुई हो तो मैं आपसे माफ़ी चाहता हूँ|

aarkay said...

दिव्या जी, अपने पूर्व टिपण्णी कारों के स्वर में स्वर मिला कर कहना चाहूँगा ,( ब्लॉग जगत को ) कभी अलविदा न कहना . बड़ी न्मुश्किल से संदर्भित पोस्ट को ढूँढने के बाद पढ़ा तो दुःख हुआ . ब्लॉग पोस्ट का कथ्य का कथानक जो था सो तो था ही पर उस से भी आश्चर्य जनक थी पीठ ठोकने और थपथपाने वाली टिप्पणियां . मानो कुछ सोचे समझे बिना प्रशंसात्मक टिप्पणियां कॉपी पेस्ट करने के लिए पहले से ही तैयार थीं. इतनी संवेदनहीनता या संवेदनशीलता का अभाव वास्तव में ही शोचनीय है. विश्वास है कि उक्त पोस्ट से आपको हुई पीड़ा का अनुमान लगा कर कुछ टिप्पणीकार अवश्य पछता रहे होंगे .
दिव्या जी अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार कर दुबारा ब्लॉग की दुनिया में आपका आगमन स्वागत योग्य होगा . आपने अपना शुभ चिन्तक और परम मित्र कह कर जो०म सम्मान दिया है उसके लिए आभारी हूँ. आपके पठनीय , विचारणीय तथा परिपक्व आलेखों की प्रतीक्षा रहेगी. अन्यथा कुछ विशेष अवसरों पर आपको शुभकामनयें दे सकूं, इसकी सुविधा के लिए यदि आप ,ई मेल ID से अवगत कटवाएं तो अच्छा लगेगा. मेरा ई-मेल पता है : 19aarkay54 @gmail .com .
हार्दिक शुभकामनाएं !

JC said...

गीता सम्पूर्ण संसार में किसी भी काल और किसी भी स्थान में उपस्थित मानव हित में योगियों द्वारा बोले अथवा लिखे गए शब्द हैं...हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति किन्तु अपने मन के झुकाव के अनुसार इनका विश्लेषण कर इनका पालन करता है - अथवा किसी गुरु को पकड़ लेता है और भेड़-बकरी समान उसके पीछे चल पड़ता है, बिना सोचे समझे (गीता के अनुसार 'अज्ञानतावश')... वर्तमान कलियुग है और जो इस युग की प्रकृति को नहीं जानता, संभव है गुरु के साथ साथ, भेड़-बकरी समान, पहाड़ी से नीचे छलांग लगा सकता है... टीवी चैनल आजकल दिखाते ही रहते हैं कई बाबाओं / गुरुओं की 'काली करतूत'...

इसी गीता में 'योगेश्वर कृष्ण' कहते दर्शाए गए हैं कि संसार में केवल दो प्रकार के मानव हैं - देवता और राक्षस... राक्षसों के गुण भी विशेषकर सोलहवें अध्याय (XVI) में दिए हैं...
कटु सत्य, 'कडवा चौथ' है, "हे पृथापुत्र! दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता, तथा अज्ञान - ये आसुरी स्वभाव वालों के गुण हैं "!

और कर्म की त्रिगुणात्मक प्रकृति के विषय में कहा गया है कि जो आत्मा काल-चक्र में प्रवेश पाती है उसे इन तीनों प्रकार के कर्म करने ही होंगे, किन्तु जो ज्ञानी है वो कर्म कर, उनको कृष्ण में समर्पित कर, इनसे लिप्त नहीं होता,,, आदि आदि... अध्याय '३' (संकेत, ॐ ? - ब्रह्मा, का कार्य क्षेत्र, साकार ब्रह्माण्ड की रचना; विष्णु का उनका पालन; और शिव का संहार, विभिन्न साकार का उनके सीमित काल और उस दौरान निरंतर परिवर्तनशील प्रकृति की समय समय पर आवश्यकतानुसार... जिस कारण यदि 'मैं' यहाँ हूँ, या कभी किसी कलियुग में था नाटक, कृष्णलीला, का एक पात्र, अर्थात निराकार प्रभु, विष्णु/ शिव (श्मशान निवासी!), की इच्छानुसार उनके निकटतम प्रतिरूप कृष्ण द्वारा पृथ्वी रुपी स्टेज पर रची गयी माया के माध्यम से अपना अनादी-अनंत काल के ड्रामा का आनंद ही नहीं अपितु परमानन्द उठाने हेतु :)

Mansoor Ali said...

आप लिखना, और इसी शीर्षक के अंतर्गत, हरगिज़ नहीं छोड़ेगी. जिस रिश्ते के तहत मुझे याद किया है उसी नाते इसे मेरा आदेश मान कर पालन करे.

Dr. shyam gupta said...

छिले बिना कौन खुद को व खुदी को जान पाया है जी.....
--सही कहा ऐ के ने...हम पीछे नहीं आवश्यकता से अधिक तीजी से आगे जारहे हैं तभी तो मुंह के बल गिराने के करीब हैं....
--- हर किसी को माँ, पिता, भाई, बहन ..बनाया ही क्यों...निर्लिप्त- स्वयं में स्वयं को सिर्फ स्वयं बन् कर रहना चाहिए... तभी तो कष्ट होरहा है जाने में ...तभी तो कह कर जाते हैं.... नहीं तो अपना काम करते जाओ...हाथी मस्त चला जाता है कुत्ते भूंकते रहते हैं....
...उत्तिष्ठ कौन्तेय ...

रेखा said...

आपसे तो हमसब को काफी उम्मीदें हैं ,अभी तो बहुत कुछ करना शेष है,अभी तो बहुत कुछ लिखना शेष है ......आप ऐसे सबकुछ अधुरा छोड़कर नहीं जा सकतीं हैं .कृपया अपना ये विचार त्याग दें....

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

मैं तुम्हारी चुटिया खींच कर कम्प्यूटर पर बैठा सकता कि ऐसे नीच और क्षुद्र लोगों से हार कर बैठ जाने के लिये लिखना शुरू करा था तो शुरू ही क्यों करा? क्या तुम अनभिज्ञ थीं कि दुनिया में ऐसे पातकियों की कमी नहीं है। मैं इस वैश्विक मंच पर इस बात को कहने में जरा भी नहीं हिचकिचाउंगा और न ही खुद को गुंडा कहलवाने के लिये परेशानी महसूस करूंगा कि यदि ये वैचारिक षंढ यदि मेरे हाथ आ जाएं तो मैं इनका फैसला ऑफ़लाइन कर दूं और सड़क पर घसीट-घसीट कर मारूं। इन चिरकुटों को क्या लगने लगा है कि ये जो चाहें लिखें इन्हें कोई रोक नहीं सकता?मैं हाथ पैर मुंह तोड़ कर जेल जाने को तैयार हूं। बहना तुम लिखो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। मुझे यदि कोई स्वयंभू शराफ़तअली गुंडा कहना चाहे तो वो स्वतंत्र है मैं ऐसा ही हूं।
हृदय से प्रेम व स्नेह सहित
भइया

निवेदिता said...

प्रिय दिव्या ,तुमने अगर ऐसा सोचा है तो वाकई बहुत दग्ध हुई होगी कुछ लोगों की बातों से। कई बार मुझे ऐसा लगता है कि कभी इन विवादों में तथाकथित नारीवादी चेतना के वाहक चुप्पी क्यों साधे रहते हैं ... तुम्हारे पास विषय है इसलिये लिखती हो जिनके पास लिखने की विषय-वस्तु का अभाव हो वो औरों पर विष वमन ही करेगा .... तुम्हारा जो भी निर्णय होगा उसका मैं सम्मान करूंगी ,पर मुझे अभी भी लगता है कि इस दुनिया के अपने इतने सारे अभिन्न जन का साथ नहीं छोड़ना चाहिये ... शुभकामनायें!

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय अजीत गुप्ता जी
आपकी टिप्पणी में बाद में की गयी सारी बातें एक तरफ करते हुए मैं केवल अनुराग शर्मा पर ध्यान केन्द्रित करूँगा|
सबसे पहले तो मैं आपकी इज्ज़त करता हूँ| आप खुद एक समझदार ब्लोगर हैं और दिव्या दीदी की पिछली लगभग सभी पोस्ट भी आपने पढीं हैं| क्या सच में अनुराग की उस पोस्ट में आपने कुछ भी गलत नहीं देखा? मैं तो उस पोस्ट की एक एक पंक्ति के निहितार्थ समझ गया| ज़रा एक बार पुन: ध्यान से पढ़ें|
मैं कोई साहित्यकार तो नहीं किन्तु आप चाहें तो उस पोस्ट का पूरा भावार्थ भी यहाँ रख सकता हूँ|
जहां तक सवाल है, अनुराग शर्मा के सुलझे हुए व्यक्तित्व का, तो बता दूं कि पहले मैं भी इसी भ्रम में जी रहा था| उस सन्दर्भ में मैंने उस पोस्ट पर टिप्पणी भी की है, जिसका अनुराग शर्मा ने यह टिप्पणी लिखने तक तो कोई उत्तर नहीं दिया| मुझे तो अभी तक यह समझ नहीं आया कि उसकी दिव्या दीदी से शत्रुता क्या है?
एक विनती आपसे करता हूँ "कृपया आप अनुराग शर्मा उर्फ़ स्मार्ट इन्डियन (?) के सुलझे हुए व्यक्तित्व अर्थात स्मार्टनेस (?) की ओर निर्देश करेंगी|"
आज दाढ़ी बनानी ज़रूरी है क्या, आज साड़ी धो लूं क्या, कुछ सीनियर डॉक्टर ब्लोगर, पिछले 250 आलेखों की तरह इस आलेख को भी हमारा अंतिम आलेख समझा जाये
क्या इन सब पंक्तियों पर आपको आपत्ति नहीं है?

आखिर ऐसी क्या सुलझन है उसके व्यक्तित्व में???

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

@उड़न तश्तरी

सर जी सही है, सारी शांती का ठेका यहीं फोड़ दीजिये|
मुझे एक बात समझ नहीं आती कि सारे उपदेश एक ही व्यक्ति को देने के लिए क्यों हैं? जो बुरा करे, उसे तो कोई कुछ नहीं कहेगा और यहाँ शान्ति बनाए रखने के उपदेश दिए जा रहे हैं|

ब्लोगरिय हथकंडे तक तो कभी सोच पहुंची भी नहीं| पता नहीं आप ऐसे कडवे आरोप कैसे मढ़ देते हैं???
थोड़ी सी शान्ति का पाठ ज़रा औरों को भी पढ़ा आइये ज़रा, वहाँ तो हमने आपके प्रवचन सुने नहीं...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

आपका यह निर्णय जानकर, मुझे व्यक्तिगत तौर पर बड़ा दुःख हो रहा है |
दिव्या जी ,
यदि संभव हो तो इस तरह मत जाइए | कोई कुछ भी लिखे मगर आपके निर्भीक और खरे-खरे लेखन का कोई विकल्प नहीं |
'पाबला जी 'जैसे ब्लॉगर जब ऐसी अभद्र टिप्पड़ियां करने लगें तो क्या कहा जाए | मगर आपके लेखन को सराहने और पसंद करने वाले
ब्लागरों की संख्या भी कोई मायने रखती है |
अंत में आपसे 'अन्ना हजारे ' जी के पाँच जीवन सूत्रों में से एक ...'अपमान को पियो' की याद दिलाना चाहूँगा |
अन्ना जी ने कहा ;' पत्थर उसी पेड़ पर लोग मारते हैं ,जिस पर फल होते हैं , बाँझ पेड़ पर कोई पत्थर नहीं मारता |'

shilpa mehta said...

Dear Divya - please dont hurt yourself - please...PLEASE | Take a break, and come back with full zeal .... and let people call you names - dont bother about them . Mr Arvind Mishra naming you names doesnt make you those things. If you allow people to hurt you - there always will be people who will be ready to use your weakness. Dont give up what you love just because people dont agree with you . So what if everyone doesn't like you - or your writing style for that matter? There are so many who do like you . Those who don't - can always stop visiting this blog. Who is universally liked? - Rama?- Seeta ? - Krishna ? Jesus ? Mohammad? anyone?

If these people were also found faults with - then how can you and me expect to be universally approved of? of course some people will like and some will dislike us - so what? Should we stop living?

कौशलेन्द्र सर - प्लीज़ ऐसा मत कहिये | दिव्या वापस आएगी - and with a bang !!!
दिवस भैया - ऐसा मत करो | बात को सुलझने दो | दिव्या भी अभी परेशान है और अधिकतर लोगों ने वहां भी light hearted mood से टिप्पणियां की होंगी | सबसे मत लड़ो - क्योंकि अधिकतर लोग खुद अपने से लड़ रहे हैं |

अनुराग जी के और दिव्या जी के बीच शायद ऐसी कोई बड़ी बात रही भी न हो - क्योंकि दिव्या जी और अनुराग जी दोनों के ही अधिकतर लेख आपके लेखों की ही तरह हमारे देश की अधिकाधिक शुभेच्छा से ही लिखे होते हैं | ग़लतफ़हमी होगी - तो सुलझ जायेगी | नहीं सुलझे - तो भी क्या हुआ ? इस दुनिया में करोड़ों लोग हैं - क्या हमारी हर एक से दोस्ती ही हो यह ज़रूरी है? एक दोस्त इस दुनिया में काम ही सही - क्या हुआ ? यह भी हो सकता है कि शायद उन्होंने इतना बुरा सोच कर न लिखा हो - ऐसे ही light hearted मूड से लिखा हो ? जो "शहीदों ...." "नायक ..." जैसी शृंखला लिखते हैं, वे दिव्या जी जैसी अच्छी रायटर से शत्रुवत भाव से ऐसा करेंगे?

किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है said...

जल्दी ही हमारे ब्लॉग की रचनाओं का एक संकलन प्रकाशित हो रहा है.

आपको सादर आमंत्रण, कि आप अपनी कोई एक रचना जिसे आप प्रकाशन योग्य मानते हों हमें भेजें ताकि लोग हमारे इस प्रकाशन के द्वारा आपकी किसी एक सर्वश्रेष्ट रचना को हमेशा के लिए संजो कर रख सकें और सदैव लाभान्वित हो सकें.

यदि संभव हो सके तो इस प्रयास मे आपका सार्थक साथ पाकर, आपके शब्दों को पुस्तिकाबद्ध रूप में देखकर, हमें प्रसन्नता होगी.

अपनी टिपण्णी से हमारा मार्गदर्शन कीजिये.

जन सुनवाई jansunwai@in.com
www.jan-sunwai.blogspot.com

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

@उड़न तश्तरी
सर जी, गजब की घबराहट है आपकी| इतना डर कि कहीं दिव्या वापस न आजाए...
दिव्या दीदी ने तो अपने ब्लॉग को शहीद कर ही दिया है, किन्तु आपका डर अभी तक बरकरार है|
इतने भी क्या व्याकुल हैं आप कि पहले तो कभी यहाँ दर्शन दिए नहीं और आज आए तो इतनी बवासीर पेल गए| और तो और जाकर स्मार्ट इन्डियन से भी याराना बना लिया| वहां भी गंदगी छोड़ आए|
बड़े पेड़ों की छाया में छोटे पौधों को तो पनपते देखा था, किन्तु आज तो बड़े बड़े वरिष्ठ मठाधीश भी दिव्या से घबरा गए|

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय रुपेश भैया
मैं भी इस पुनीत कार्य में आपके साथ हूँ| अपनी बहन के लिए मैं भी गुंडा बनने के लिए तैयार हूँ|

rashmi ravija said...

दिव्या,
पराजित और अपमानित होना स्त्री की नियति बिलकुल भी नहीं है....अनदेखा करना जरूर है.
क्यूंकि शान्ति से जीने के लिए यह जरूरी है. बस, जिन्हें तुमसे परेशानी है या...तुम जिनसे परेशान हो..उनका अस्त्तिव ही भूल जाओ.
वे अपनी दुनिया में खुश रहें तुम अपनी दुनिया में....इतने सारे विषय हैं लिखने को...उनपर लिखो..और मॉडरेशन रहने दो...ये तुम्हारा ब्लॉग है...तुम्हारी मर्जी होनी चाहिए...जो लोग विषय से इतर टिप्पणी करें...या अपमानित करने की कोशिश करें...उनकी टिप्पणी पूरी तरह पढ़े बिना...डिलीट कर दो...और अगर वे इसकी पोस्ट बनाते हैं....(उसे भी पढ़ने की जरूरत नहीं)...तो ये उनकी मर्जी..इतना आहत होने की जरूरत नहीं है.

जिंदगी का हर दिन और हर पल महत्वपूर्ण है...उसे जितना हो सके...बिना किसी विवाद में पड़े...बिना मन उदास किए जीने की कोशिश करनी चाहिए.
किसी को इतना महत्त्व देने की जरूरत ही नहीं कि वह आपके मन को चोट पहुंचाने की जुर्रत कर सके.

(और अगर इसे लोग टंकी आरोहण का नाटक कह रहे हैं, तो कहने दो....यहाँ,ब्लोगर्स की लम्बी लिस्ट है...जो कई बार ब्लॉगजगत छोड़ने की घोषणा करने के बाद भी वापस आये हैं...हर पल मनस्थिति एक सी नहीं रहती...कदम बढाने के बाद हज़ार बार पीछे लेकर नई शुरुआत करने की गुंजाईश हमेशा बनी रहती है)

कौशलेन्द्र said...

@ "लेकिन मुझे इसका रंच मात्र भी आभास नहीं था कि वह दिव्‍या के लिए पोस्‍ट है।"

अजित जी ! इस बार कई लोगों के प्रति मेरे भ्रम टूटे हैं......आप भी उनमें से एक हैं. मैं व्यक्तिगत आक्षेप करना नहीं चाहता था पर विवश हो गया हूँ. आप जैसा व्यक्ति यह कहे की आपको रंच मात्र भी आभास नहीं था ...अविश्वसनीय है. सब कुछ शीशे जैसा साफ़ है. जैसे चीनियों के बारे में यह प्रसिद्द है कि वे केवल छूकर रंग को पहचान लेते हैं उसी तरह कोई भी व्यक्ति उस पोस्ट को पढ़कर सहज ही जान सकता है कि यह दिव्या को आघात पहुंचाने के लिए लिखी गयी है. अजित जी कोई गलत फहमी नहीं हुयी है ....दिव्या की सामाजिक ह्त्या करने वालों की लम्बी सूची में से आप अपनी भागीदारी से बच नहीं सकतीं.

मैं इस पूरे प्रकरण से बहुत दुखी हूँ. एक ने दिव्या के निर्णय का स्वागत करते हुए विदाई नमस्कार किया तो दूसरे को शंका हुयी कहीं दिव्या वापस न आ जाय ...उन्होंने सलाह दे दी कि वापस मत आना निर्णय पर अडिग रहना. समीर लाल जी ! आप किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगाने वाले कौन हैं ? आप वरिष्ठ ब्लोगर हैं...आपकी सहृदयता की प्रशंसा भी सुनी है पर इसी कारण आपको किसी के लेखन पर अंकुश लगाने का अधिकार तो नहीं मिल जाता. दिव्या के लेखन की समालोचना की जा सकती है ....उसे साहित्य मानना न मानना विद्वतजनों के निर्णय पर निर्भर है. पर उसे कभी वापस न आने के लिए कैसे कहा जा सकता है ? वैसे भी ब्लॉग में बहुत से लोग केवल बतकही के लिए आते हैं...उनकी बातें अच्छी लगती हैं तो लोग उन्हें पढ़ते हैं ......कोई आवश्यक नहीं कि वह साहित्य की श्रेणी में हो. अभी तक मैंने जो पाया है उसके अनुसार तो ब्लॉग एक चौराहे पर रखा पट है जिस पर लोग अपनी स्वतन्त्र अभिव्यक्ति करते हैं. आपको अच्छा लगे तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं. क्या दिव्या उस अभिव्यक्ति की पात्र नहीं है ? किसी का लेखन अच्छा नहीं है तो कोई क्यों पढ़ता है उसे ? बुद्धिजीवियों का क्या सुन्दर चरित्र है ...दिव्या के लेखन की तारीफ़ भी करते हैं और बद दुआयें भी देते हैं. वितृष्णा हो रही है मुझे इन सबसे.

मैं चाहता हूँ कि दिव्या के साथ-साथ आप सब मेरा भी बहिष्कार करें. मैं आपके फ्रेम में फिट नहीं हो सकता. दोहरे चरित्र वालों से तो वे ठीक हैं जो केवल दिव्या की आलोचना ही करते हैं.

रचना दीक्षित जी ! आपके विचारों में इतनी जल्दी परिवर्तन कैसे हो गया ?

मैं तो दिव्या से बहुत बाद में जुडा हूँ, लोग तो वर्षों से जुड़े हैं ......दिव्या यदि शिज़ोफ्रेनिक है तो क्यों जुड़े आप लोग ? कमाल है, जो मेडिकल साइंस का हर्फ़ नहीं जानता वह डायग्नोसिस कर रहा है.

"भारतीय वैचारिक वमन में कुशल हैं..." -पश्चिमी लोगों की दृष्टि में हमारे प्रति यह जो धारणा बनी है अकारण ही नहीं बन गयी होगी. उपदेश देने और खुद के जीवन चरित्र में उसे जी पाने में बहुत अंतर है. आम जीवन में पश्चिम के लोग इतने मुखौटे नहीं पहनते. मुझे सर्वाधिक आघात इसी बात से लगा है कि हम दोहरे चरित्रों के साथ विद्वान और आदर्शवादी होने का अभिनय कर रहे हैं.

shilpa mehta said...

Dear Divya - please dont hurt yourself - please...PLEASE | Take a break, and come back with full zeal .... and let people call you names - dont bother about them . Mr Arvind Mishra naming you names doesnt make you those things. If you allow people to hurt you - there always will be people who will be ready to use your weakness. Dont give up what you love just because people dont agree with you . So what if everyone doesn't like you - or your writing style for that matter? There are so many who do like you . Those who don't - can always stop visiting this blog. Who is universally liked? - Rama?- Seeta ? - Krishna ? Jesus ? Mohammad? anyone?

If these people were also found faults with - then how can you and me expect to be universally approved of? of course some people will like and some will dislike us - so what? Should we stop living?

कौशलेन्द्र सर - प्लीज़ ऐसा मत कहिये | दिव्या वापस आएगी - and with a bang !!!
दिवस भैया - ऐसा मत करो | बात को सुलझने दो | दिव्या भी अभी परेशान है और अधिकतर लोगों ने वहां भी light hearted mood से टिप्पणियां की होंगी | सबसे मत लड़ो - क्योंकि अधिकतर लोग खुद अपने से लड़ रहे हैं |

अनुराग जी के और दिव्या जी के बीच शायद ऐसी कोई बड़ी बात रही भी न हो - क्योंकि दिव्या जी और अनुराग जी दोनों के ही अधिकतर लेख आपके लेखों की ही तरह हमारे देश की अधिकाधिक शुभेच्छा से ही लिखे होते हैं | ग़लतफ़हमी होगी - तो सुलझ जायेगी | नहीं सुलझे - तो भी क्या हुआ ? इस दुनिया में करोड़ों लोग हैं - क्या हमारी हर एक से दोस्ती ही हो यह ज़रूरी है? एक दोस्त इस दुनिया में कम ही सही - क्या हुआ ? यह भी हो सकता है कि शायद उन्होंने इतना बुरा सोच कर न लिखा हो - ऐसे ही light hearted मूड से लिखा हो ?

मुनव्वर सुल्ताना Munawwar Sultana منور سلطانہ said...

दिवस दिनेश गौर भाई,यकीनन हर वो भाई जो अपनी बहन के अपमान के विरोध में मुट्ठियाँ बाँध कर सामने आ जाए डॉ.रूपेश जी और आपकी तरह ही होगा। दिव्या बहन, आप समझ सकती हैं कि मुझे कितना विरोध झेलना पड़ा होगा लेकिन सौभाग्य है कि भाई साथ हैं। आप लिखना जारी रखिये अब हम सब घोषित बुरे लोग इन लीचड़ों के खिलाफ़ अपनी पगलाहट को भड़ास पर दिखाने जा रहे हैं जल्द ही ये लोग अपनी बौद्धिक रिरियाहट के पीछे छिप जाएंगे। मनीषा दीदी भी मेरे साथ बैठी हैं और आपसे यही कह रही हैं कि इन बौद्धिक षंढों के लिये तो वे ही काफ़ी हैं। उड़न तश्तरी नाम से लिखने वाला बंदा तो परग्रहीय "एलियन" है उसे धरती के विवादों में उपदेश नहीं देने चाहिये
जय जय भड़ास

DR. ANWER JAMAL said...

'शिकायत जिस से हो उसी से बात कि जाये . इधर उधर शिकायतें करने वालों का मकसद शिकायत करना नहीं बल्कि बेइज्ज़त करना हुआ करता है.'

जो आसान नहीं है.अत्यंत विचारणीय विषय को सामने रखने के लिए बधाई .
यदि हमारी बातों या व्यवहार से किसी को चोट पहुंची हो तो अहसास होते ही तुरंत क्षमा मांग लेनी चाहिए। यह तनाव को दूर रखने का एकमात्र तरीका है। यदि समय रहते क्षमा याचना न की जाए तो यह तनावपूर्ण हो सकता है। हमें अपनी गलतियों से सबक लेकर उनसे ऊपर उठना चाहिए। अपने जीवन व कार्यों के प्रति उत्तरदायी होने का यही एक तरीका है, परंतु इस राह में अहं हमारी सबसे बड़ी समस्या है, जो अक्सर हमारे व भूल को स्वीकारने के बीच आ जाता है। यदि आप सोचते हैं कि जीवन में कोई व्यक्ति भूलें किए बिना रह सकता है तो यह आपका भ्रम है। यदि हम भूलों से सबक नहीं लेते तो इसका अर्थ होगा कि हम एक और अवसर गंवा रहे हैं। गलतियों व संभावित गलत कदमों का निरंतर मूल्यांकन ही उनसे कुछ सीखने व भविष्य में उन्हें अनदेखा करने का तरीका है।
ब्लॉगर्स अपनी भूल कैसे सुधारें? Hindi Blogging Guide (17)

mahendra verma said...

@उड़न तश्तरी

आपकी टिप्पणी पर मुझे घोर आपत्ति है। आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।
अभी केवल इतना ही...।

सत्य गौतम said...

चंद व्यंग्य बाण क्षण मात्र न झेल पाने वालो,
अब सोचो हमने हजारों वर्ष क्या क्या झेला है ?
और न्याय की आशा आज भी पूरी नहीं हो पा रही है।

mannbikram said...

NOT GOOOD.. NO i dont agree with this at all .. I would request and plead you not to take this step .. NO WAY , you let a IDIOT win over something that he has written.

How can one individual make us change what we like .. NO This is not right, YOU STAY HERE and YOU FIGHT... look at the people who all have been with you ...

Regarding someone writing about you , well i have been through that , A prolific blogger once wrote a post ON ME too and a few people who visit me now did post replies on that post but i am assuming they did not know it was on me..
THAT did not make me run away I AM STILL here and writing and with the grace of GOd i have met such lovely people as you and rather then losing i have gained ...

I dont follow many people who comment on your blog So i am not sure who said what or why , but I would really say again DONT let someone change the way you think or what you do.

SO please dont say bye ..or leave this like this , It would mean giving in to these so called intelligent people who will do anything for a bit of publicity and anything... I jsut ownder all those who have written about you do they talk about the women in there household also like that in the same way.. jsut shows their mentality ...

So please I will not say forgive them NO NEVER one thing i have learned in life NEVER forgive your enemies , every dog has his day is a famous proverb ... SO it was their days the ones who wrote about you an the ones who commented about you.. Not a problem HAMARA BHI DIN AYEGA .. and then
when on the Run the field is AS LONG FOR EVERYONE ... so no worries .. DOnt give up .. Rest is upto you i respect your decision But will say please change it ...

LEts teach these people how ot behave
Bikram's

DR. ANWER JAMAL said...

हवा से उलझे कभी सायों से लड़े हैं लोग
बहुत अज़ीम हैं यारों बहुत बड़े हैं लोग

इसी तरह से बुझे जिस्म जल उठें शायद
सुलगती रेत पे ये सोच कर पड़े हैं लोग

shilpa mehta said...

डॉ रुपेश , मैं भी दीदी ही हूँ - तो छोटी बहन की चुटिया खींच कर "कर्म" पथ पर खींच लाने में मेरा भी साथ जोड़ लीजियेगा - :)

dear divya - अब दीदी कहा है - तो बात भी मानो - आ जाओ वापस | देखो हम सब कितने प्यार से बुला रहे हैं तुम्हे :) .... जो कह रहे हैं कि यह "टंकी आरोहन" है - उन्हें मैं बताना चाहूंगी कि गीता कहने वाले श्री कृष्ण का एक नाम "रणछोड़" इसलिए है कि वे समय की मांग पर रण छोड़ भी देते थे | और एक नहीं - कई बार | it just shows that you are a normal human - with human emotions and sentiments - nothing wrong with that.

and rashmi is absolutely right - i agree to every word she says . Dont bother about everyone's opinion and live your life at your terms. मोडरेशन भी नहीं हटाना अब |

वैसे मेरी पिछली दो टिप्पणियां नहीं आयीं - क्या मेरी kisi बात से चोट पहुंची कुछ ? यदि हाँ - तो it was unintentional - i ask you to forgive me ...|

kshama said...

Oh! Ye kya kah rahee hain aap? Nahee, aisa mat keejiye....kitne hee bloggers aapke saath hain!

vishwajeetsingh said...

आदरणीय दिव्या दीदी जी सर्वप्रथम प्रणाम स्वीकार करें ।
दीदी कल शाम भाई दिवस दिनेश गौड़ जी से फोन पर बात हुई , उन्होंने ब्लॉग जगत से आपके सन्यास के बारे में बताया , जिसे सुनकर दिल वास्तव में भर आया । दीदी आपने मुझे भी भाई कहा है , दिवस भाई जैसे सच्चे भाई व प्रेरणा अर्गल जैसी बहने और डॉ. कौशलेन्द्र जैसे पिता आपके पास पहले से है तो कुछ दुष्टों के कारण भरा पूरा परिवार छोड़कर जाने की बात क्यों ! दीदी नारी शक्ति का अवतार है , यदि शक्ति अर्थात आयरन लेडी ही अपने कदम पीछे खिंच लेगी तो दुष्टों को मुँह तौड़ जबाब कौन देगा ?
दीदी आध्यात्मिक अर्थो में सन्यास का अर्थ तो अपने केन्द्र में स्थित होना होता है तो यह पलायनवादी विचार क्यों ! दीदी भाई होने के नाते एक विनती अवश्य करता हूँ कि सन्यास को ग्रहण कर , अर्थात अपनी ऊर्जा शक्ति को अपने पवित्र लक्ष्य के प्रति एकाग्र कर शीघ्र लौट आओं , जिस प्रकार देश को नरेन्द्र भाई मोदी की जरूरत है , उसी प्रकार हिन्दी ब्लॉग जगत को आपकी जरूरत है ।
आपकी आगामी पोस्ट की प्रतिक्षा में आपका भाई ।

निर्दोष दीक्षित said...

आप आये,बैठे भी न चंद लम्हे सुकूं से
तबस्सुम लबों पे आई,तआर्रुफ़ भी हो न सका
बस आपने जाने की ज़िद कर ली.....
बस हम आपसे इतना कहेंगे...
पराजित और अपमानित होना स्त्री की नियति नहीं है,ये नियति है क्योंकि स्त्री है,हम हैं क्योंकि स्त्री है,ये क़ायनात है क्योंकि स्त्री है...
यही कहूँगा जाना उचित न होगा...

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

अधिकतर टिप्पणीकारों से यही कहना चाहता हूँ कि तटस्थ रहकर यहाँ हमदर्दी बांटने का कोई लाभ नहीं| हमदर्दी की आवश्यकता दिव्या दीदी को नहीं| एक निर्भीक और निडर महिला ब्लोगर को किस बात की सांत्वना दी जा रही है?
दिव्या दीदी मरी नहीं हैं, उन्होंने अपने ब्लॉग को शहीद कर दिया है| ताकि कभी किसी अन्य को ऐसी यातनाएं न सहनी पड़ें जो इन्होने सही हैं|
ये पोस्ट कोई संन्यास नही अपितु एक करारा मूंह तोड़ जवाब है उन लोगों के लिए जो क्षुद्र उद्देश्यों के लिए ब्लोगिंग करते हैं, जो हिंदी ब्लोगिंग के नाम पर हिंदी के साथ घात कर रहे हैं, जो महिला ब्लोगर का अपमान करने में स्वयं को मर्द समझ रहे हैं, जो मुद्दे से भटक कर व्यक्तिगत वार करते हैं और तो और जो चित भी मेरी और पट भी मेरी को चरितार्थ कर रहे हैं|
अधिकतर तो अंतिम श्रेणी में ही आते हैं| जो यहाँ भी प्रेम बरसा रहे हैं और वहाँ भी आग लगा रहे हैं| शर्म तो तब आती है जब महिला ब्लोगर भी किसी स्त्री का अपमान होने का तमाशा देखती हैं| और तमाशे के साथ तालियाँ भी पीटती हैं| शायद वे स्वयं के अपमानित होने की प्रतीक्षा में कतार लगाए खड़ी हैं|

मुझे समझ नहीं आता कि सभी उपदेश यहीं क्यों निकलते हैं? क्या किसी में साहस नहीं दुष्टों की जबान खींच लेने का? हिम्मत है तो उन दुष्टों के सामने उपदेश झाडिये जो ऐसे घृणित कार्यों में लिप्त हैं|
और यदि हिम्मत नहीं है तो थामे रहिये प्रेम का तम्बूरा अपने हाथों में| सज्जनों की इसी निष्क्रियता के कारण दुर्जन सक्रीय होते हैं|
आन्दोलन आप न करें कोई बात नहीं, किन्तु कम से कम अन्ना और बाबा का साथ तो दिया जाना चाहिए| इसी प्रकार जब एक महिला ब्लोगर ने स्वयं को दांव पर लगाकर लड़ाई छेड़ी तो कम से कम उनका साथ तो दीजिये|
यदि हिंदी ब्लोगिंग को एक सार्थक दिशा देनी है तो कुछ कड़े कदम उठाने पड़ेंगे|

आदरणीय कौशलेन्द्र जी, आपके अन्दर धधक रहे ज्वालामुखी कि गर्मी महसूस कर सकता हूँ| ऐसी ही गर्मी मुझे भी जला रही है| मैं भी ऐसे निष्क्रीय लोगों द्वारा स्वयं का बहिष्कार चाहता हूँ|

आदरणीय दिव्या दीदी, नमन आपके साहस को, आपकी हिम्मत को| इतना बड़ा ब्लॉग छोड़कर चले जाना कोई सरल कार्य नहीं है|

Bhola-Krishna said...

दिव्या बेटा , पराजय किसका? अपमानित कौन ?
तुम्हारा आलेख अभी देखा ! हमारी लौह सन्तान इतनी जल्दी हथियार डाल देगी ,यकींन नहीं होता ! बेटा हम स्वयम तो अज्ञानी हैं , लेकिन हमारे इष्ट ने हमे आज ही इस विषय में एक सूत्र सुझा दिया (बेटा ये है प्यारे प्रभु की हमारे ऊपर सामयिक कृपा )
आज प्रातः ही एक महापुरुष का प्रवचन सुना उन्होंने कहा था " आलोचना यदि आत्मा को आनंदित करे , उससे प्रेम मूलक कोई शुभ सन्देश प्राप्त हो तो उसे नत मस्तक हो स्वीकार करलो ! पर आलोचना यदि द्वेश्मूलक हो , ईर्षा और अनैतिक भाव से अपमानित करने के लिए की गयी हो तो उससे उदासीन रहो !" बेटा उन अनगरल वचनों को कोई महत्व न दो ,भूल जाओ उन्हें और गार्बेज में डाल दो ! अपना कर्म न त्यागो ! एक के पीछे अपने सैकड़ों स्नेहियों को निराश न करो ! लिखती रहो !शुभाकांक्षी - "भोला कृष्णा"

अजय कुमार said...

ये क्या हो रहा है ब्लाग जगत में ? अभी तो हिंदी ब्लागिंग शैशव काल में है और ये हाल ।
मैं सिर्फ यही कहुंगा कि सुनिये सबकी लेकिन करिये मन की ,वो भी सिर्फ और सिर्फ शांत मन की , क्योंकि अशांत मन से लिया गया निर्णय उचित नहीं हो सकता ।

ajit gupta said...

दिवस दिनेश गौर जी
मुझे रत्तीभर भी अंदेशा होता कि यह सारी पोस्‍ट दिव्‍या पर लिखी गयी है तो मैं कभी भी वहाँ टिप्‍पणी नहीं करती। मैं एक सप्‍ताह से बाहर थी और उसके पीछे ही यह सब कुछ हुआ। दिव्‍या का ब्‍लोगिंग छोड़ने का निर्णय आदि आदि। यदि अनुरागजी ने इसे जानबूझकर लिखा है, या यूं कहूं कि अब शेष टिप्‍पणियों से लग रहा है कि जानबूझकर ही लिखा है तो मुझे बंहद दुख है। मेरा यह कसूर बनता है कि मै बहुत गहरे तक नहीं उतरती हूँ।
इस सारे प्रकरण से यह बात समझ आ रही है कि कुछ लोग दिव्‍या की ब्‍लागिंग छुड़ाना चाहते हैं और दिव्‍या ने छोड़कर उनकी मंशा पूर्ण की है। यह मुझे उचित नहीं लगता है। हम हमारे उद्देश्‍य में असफल हो गए और हमारे दुश्‍मन अपने उद्देश्‍य में सफल हुए। जब इतने सारे लोग दिव्‍या के साथ खड़े हैं तो फिर ऐसे प्रहारों से क्‍या डरना?

ajit gupta said...

कौशलेन्‍द्र जी
मुझे बहुत दुख है कि मेरी थोड़ी सी लापरवाही भ्रम का कारण बन गयी। आप सभी का गुस्‍सा जायज है, मैं उसका प्रतिवाद नहीं कर रही। लेकिन इतना अवश्‍य कहना चाहूंगी कि मेरे जैसे व्‍यक्ति को आप भी नहीं पहचान पा रहे हैं। मैं पूर्व में भी लिख चुकी हूँ कि एक सप्‍ताह से मैं प्रवास पर थी इसलिए इस बीच क्‍या हुआ मुझ विदित नहीं था। अनुराग शर्मा ने किसे आधार बनाया मैंने उसपर ध्‍यान ही नहीं दिया। यदि मेरा ध्‍यान इस ओर जाता तो क्‍या मैं अपनी प्रतिक्रिया नहीं करती? क्‍या आप मुझे इतना कायर और हाँ में हाँ मिलाने वाला समझते हैं?

Vivek Jain said...

Please dont leave for a stupid person,
Vivek Jain vivj2000.blogspot.com

प्रतिभा सक्सेना said...

दिव्या जी ,
मुझे आपका जाना उचित नहीं लग रहा है .
आप यहीं रहिये और लिखिये .'लौह-नारी' क्या यों विचलित हो जायेगी? मैं तो समझ नहीं पा रही हूँ कि ये सब क्यों हो रहा है.हम सब लोग इतनी दूर-दूर हैं सिर्फ़ शब्दों का साथ है ,और उसमें भी कटुता! दुखदायी होता है - लेकिन थोड़ी प्रतीक्षा कीजिये .शायद कोई गलतफ़हमी हो .मैं मना रही हूँ कि सब ठीक हो जाय .मुझे आशा भी है .

सदा said...

दिव्‍या, आपका लेखन बेहद सशक्‍त है, और आपका कोई क्‍या अपमान करेगा ..जो करेगा वो अपना ही अपमान करेगा जो सही होता है उसे तो इन सब बातों से गुजरना ही पड़ता है लेकिन सच्‍चाई तो सबके सामने आ ही जाती है ...आप बहुत हिम्‍मती भी हैं यह हम सब जानते हैं .. अपना साहस बनाये रखिये और आप लेखन जारी रखिये ... शुभकामनाएं ... ।

ZEAL said...

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आदरणीय अजीत गुप्ता जी ,

कोई आपका यकीन करे या न करे , मुझे आपकी बात पर पूरा यकीन है । आपका व्यक्तित्व इतना ओछा नहीं है की आप किसी स्त्री को अपमानित होते हुए देखेंगी तो वहां गलत टिप्पणी दे आयेंगी।

निसंदेह आपने आलेख को ध्यान से नहीं पढ़ा था इसीलिए त्रुटिवश आपसे वहाँ ऐसी टिप्पणी हो गयी।

आप कसूरवार नहीं है। मेरी माँ को स्पष्टीकरण देना पड़े, ऐसी नौबत कभी नहीं आने दूँगी।

आपने अपनी बात यहाँ स्पष्ट करके किसी के भी मन में आये संशय को दूर कर दिया है। आप व्यथित न हों माँ । हमें आप पर पूरा यकीन है।

.

JC said...

दिव्या जी, हमारे पूर्वज हमसे अधिक गहराई में गए हैं, इस पर किसी को भी कोई भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए,,, ओर उनके अनुसार काल सतयुग से कलियुग की ओर चलता है, जिस कारण भौतिक संसार में जहां लोहे में जंग लग जाती है, और दीमक आदि लकड़ी को खोकला कर देते हैं और इस प्रकार उनका जीवन काल घट जाता है... उनकी आयु बढाने हेतु प्रयास करने होते हैं, वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न वस्तुओं के विषय में ज्ञानोपार्जन कर, जैसे डॉक्टर भी उसी प्रकार मानव के बीमार शरीर / मन को स्वस्थ रखने, सुधारने के लिए, सदैव प्रयासरत दीखते हैं...

रॉबर्ट ब्राउनिंग ने व्यक्ति की अपनी दिन चर्या के सम्बन्ध में कहा कि हर व्यक्ति अपने चारों ओर कागज़ की दीवारें बना लेता है, और वो इन्हें तोड़ने से डरता है... आदि... जबकि, दूसरी ओर हमारे पूर्वज इन्हें तोड़, स्वयं को जान, मानव के विभिन्न कार्य-कलापों का अध्ययन कर मानव के माध्यम से ही परमात्मा तक पहुँच गए!

और, योगी, सिद्ध पुरुष, आदि इसी ज्ञान के आधार पर गीता में कह गए कि मानव का उद्देश्य केवल निराकार परमात्मा को और उसके साकार रूपों को जानना है!

किन्तु, हिन्दू मान्यतानुसार, परमात्मा (निराकार नादबिन्दू) की माया अथवा योगमाया के कारण मानव शरीर एक मिटटी का पुतला (नवग्रह के सार से बना) होने और डिजाइन के अनुसार यद्यपि सम्पूर्ण ज्ञान अपने भीतर (आठ चक्रों में) उपलब्ध होते हुए भी अपने लक्ष्य में केवल तपस्या / साधन द्वारा ही पहुँच सकता है,,, क्यूंकि मानव को, भले ही वो स्त्री हो अथवा पुरुष, उसे 'अपस्मरा पुरुष' कहा गया... अर्थात जैसे शिशु जन्म के पश्चात अपने जीवन काल में शारीरिक रूप से उत्पत्ति करते हुए अपनी चरम सीमा में - किसी आयु विशेष में - पहुँच भी जाए, किन्तु संभव है कि उसकी मानसिक उत्पत्ति, विभिन्न संभावित कारणों से अपने जीवन-काल में चरम सीमा में संभव ही न हो, और वो मानसिक रूप से बौना ही रह जाए...
कलियुग में 'हम' सभी बौने हैं, छोटे, क्षुद्र हो गए प्रतीत होते हैं...
जबकि दूसरी ओर हमारी परम ज्ञानी आत्मा हमें बोध कराती रहती है सत्य का, हमारी कथा-कहानियों के माध्यम से हमें प्रेरणा देते हुए... ओर वर्तमान में जैसे इसकी झलक भी मिलती है हिमालय की विभिन्न ऊंची से ऊंची चोटियाँ चढ़ आनंद प्राप्ति का अनुभव करते, जहां हमारे पूर्वज पहले ही मंदिर बना गए निशानी के तौर पर...अर्थात हम कुछ नया नहीं कर रहे हैं!

ZEAL said...

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@-वैसे मेरी पिछली दो टिप्पणियां नहीं आयीं - क्या मेरी kisi बात से चोट पहुंची कुछ ? यदि हाँ - तो it was unintentional - i ask you to forgive me ...|

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शिल्पा दीदी ,

हाँ आपसे नाराज़ हूँ। क्यूंकि एक आप ही तो थीं जिसने अनुराग शर्मा के उस आलेख का जिसमें उसने मेरा मखौल बनाया , उस पर ऐतराज़ किया था , लेकिन अफ़सोस की बात तो यह कि कहीं आप अनुराग शर्मा को खो न दें , इस भय से आपने पलक झपकते अपनी टिप्पणी वहां से डिलीट कर दी। स्त्रियों को इतना कमज़ोर नहीं होना चाहिए। एक बहन को छलनी होते हुए चैन से देखा आपने। आप अपनी दृढ़ता बना कर नहीं रख सकीं। आपने वहां पर अपनी टिप्पणी डिलीट करके सबसे बड़ी गलती कि है।

By the way I have published all your comments.

शेष बातें रचना दीदी के पत्र के जवाब में स्पष्ट करूंगी।
आभार।

.

रचना said...

ये ना इंसाफी हैं दिव्या मैडम
मेरा कमेन्ट भी देखो वहाँ उस पोस्ट पर
खाली शिल्पा की तारीफ़ करने से नहीं चलेगा

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

दिव्याजी, मेरे ख्याल से आपको इस तरह से नाराज़ होकर लिखना नहीं छोडना चाहिए ...
यदि आपका उद्देश्य पूर्ति हो गई हो तो छोड़ सकते हैं या आप इसमें समय न दे पा रही हो तो छोड़ दीजिए .. पर नाराज़ होकर छोड़ने का तुक समझ में नहीं आ रहा है ...
यदि ब्लॉग जगत में कोई आपसे नाराज़ है तो कई लोग आपके लेखों के कायल भी तो हैं ... है न ?

ZEAL said...

रचना जी ,
मैंने आपका कमेन्ट पढ़ा है वहां । निसंदेह एक उत्कृष्ट कमेन्ट है। आपने बिंदास अपना विरोध दर्शाया है , इसके लिए आप प्रशंसा की पात्र हैं . आपके अतिरिक्त "भारतीय नागरिक" जी ने भी बहुत ही शिष्टता से अपनी आपत्ति दर्ज की है।अन्यथा तो वहां गुट्बाजों की (अरविन्द मिश्र, अमरेन्द्र त्रिपाठी, आदि की ही जमात ज्यादा थी)।

वो कहते हैं न --"Birds of the same feather flock together"

.

रचना said...

"Birds of the same feather flock together"
common cheer up

you have your own flock and you are happy there and they with you

just accept every thing and everyone

if we have to change something it has to be us
my last comment

get well soon
bye

कौशलेन्द्र said...

अजित जी ! आपके प्रति मेरे कठोर व्यवहार से लज्जित हूँ. परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी थीं. कल को कोई ( ईश्वर न करे ) आपका अपमान करेगा तो मैं उसे भी सह नहीं पाऊंगा. मेरा आपसे व्यक्तिगत कोई सम्बन्ध नहीं है. ब्लॉग की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में आते जाते अन्य लोगों की तरह आपकी भी टिप्पणियों से रू-ब-रू होता रहा. बस इतना ही सम्बन्ध है आपसे. इतना भी सम्बन्ध न होता ...तो भी केवल स्त्री के सम्मान की हमारी प्राचीन गौरवमयी परम्परा की रक्षा करने के लिए किसी सम्बन्ध के होने की आवश्यकता नहीं समझता मैं. जो जानबूझ कर दिव्या के अपमान में शामिल नहीं हुए उनके प्रति मेरे कठोर आचरण से उन्हें पहुँची पीड़ा के लिए लज्जित हूँ. क्षमा याचना नहीं करूंगा ....किये कर्मों के परिणामों की स्वीकार्यता में कोई शिथिलता नहीं चाहता. यदि मैं इस अपराध के लिए दंड का भागी हूँ तो उसे निर्विकार भाव से स्वीकार करूंगा. किन्तु जानबूझ कर जो इस षड्यंत्र में शामिल हुए या जिन्होंने इस पूरे प्रकरण में दोहरे चरित्र का प्रदर्शन किया है वे अक्षम्य हैं.
मुझे बहुत दुःख होता है जब मैं ब्लोगर्स के बीच इस प्रकार के कटु प्रसंगों से रूबरू होता हूँ. ब्लॉग एक बृहद परिवार की तरह हमारे बीच कब स्वीकार्य हो पायेगा ? क्या हम एक-दूसरे के प्रति इतने उदार और सहज नहीं हो सकते ? यह बात हर किसी के लिए है ....चाहे वह दिव्या हों या कौशलेन्द्र.

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

अभी क्या फैसला है...आप एक बार फिर से लिखना शुरू करतीं तो हम जमकर लड़ते। मुझे तकलीफ है कि आपने कुतर्कियों की तो सुन ली.दिल जलाने वालों की सुन ली...दुखाने वालों की सुन ली...जो बहला रहे हैं, हर घाव सहला रहे हैं क्या उनकी न सुनी जाएगी...या फिर रूपेश की तरह कोई चुटइया पकड़कर बिठानेवाला ही चाहिए...

हरकीरत ' हीर' said...

दिव्या जी ,
भले ही आप मेरे ब्लॉग पे कभी नहीं आयीं या मैं आपके ब्लॉग पे कभी नहीं आई ...
पर आज जब किसी मित्र से इस बात का पता चला तो आपका जाना बिलकुल उचित नहीं लगा ....
इतने चाहने वालों के बीच किसी एक के विचारों से घबरा गईं .....?
ये तो कायरता हुई ....
आप हरगिज नहीं जायेंगी ....
बल्कि आपको ऐसी पोस्टों की परवाह करनी ही नहीं चाहिए ....

ab मुस्कुरा कर agli post की taiyaari kijiye .....:))

JC said...

गीता का थोडा सा ज्ञान हो जाये!??

(गीता का सार) अध्याय २, श्लोक १३, १४, और ५७
"जिस प्रकार शरीरधारी आत्मा इस (वर्तमान) शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरंतर अग्रसर होता रहता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है / धीर व्यक्ति ऐसे पारिवर्तन से मोह को प्राप्त नहीं होता // हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुःख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है / हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे //"... "इस भौतिक जगत में जो व्यक्ति न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न अशुभ के प्राप्त होने पर उस से घृणा करता है, वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है //"

(श्री भगवान् का ऐश्वर्य) अध्याय १० (३) एवं १० (१०)
"जो मुझे अजन्मा, अनादि, समस्त लोकों के स्वामी के रूप में जानता है, मनुष्यों में केवल वही मोहरहित और समस्त पापों से मुक्त होता है //"... "जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने में निरंतर लगे रहते हैं, उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं //"

G Vishwanath said...

Hello Divya,

I just now saw this post and read all the comments.
Sorry for being late.
I am a little confused by this controversy.

I have not read the offending blog post that has prompted this decision.
Have you considered discussing this matter directly with Anurag Sharma before taking this decision? May be he can offer a clarification, or apologise if he also feels that he has crossed the limit ? Or maybe he feels that he has done no wrong and that it was a light hearted post which he expected you to take sportingly? Whatever it is, the right thing to do is to have a direct dialogue and come to an amicable understanding. Tell him that you are deeply hurt. Either he says "sorry" or you simply ignore, forgive and forget. That would be better than allowing this unfortunate issue to become a public spectacle.


Like most others , I too feel you are not taking the right decision about giving up blogging because of this incident.
You cannot please everyone and you need not even try to do so.
I suggest you ignore those who attack you and continue your writings.
Don't read those blogs which attack you personally.
Develop a thick skin, and be the iron Lady that you claim to be.
Hoping that this is a tentative decision and that you will soon become active again, and with regards,
GV

अशोक कुमार शुक्ला said...

Good luck mam.
Waise maine bhi yahi chahaa hai ki aapki dhardaar lekhani chalti rahe.
Meri tippani ka koi jawaab. Nahi sujha piarburgs me shyaad!
Once agaim good luck.
Desi kahawat hai ki ju ke dar se sir ganja nahi karwaaya. Karte.

G Vishwanath said...

After posting my comment above I looked up Anurag Sharma's post under reference.
I suggest you simply ignore it.
I know there is some ill feeling between you and some particular bloggers but I am not aware of any past friction between you and Anurag Sharma. I hope there is none.
I am unable to detect any malice directed only at you in his post.

In this particular post, he has not singled you out.
He has picked on others too.
The mature response is to either ignore it or give a fitting reply with a similar humorous counter blog post.

I wanted to post a comment on his blog but he has blocked further comments.

I don't wish to comment on the merits of this particular blog post but I definitely feel too much importance need not be given to it and your reaction is rather extreme.
I will reiterate my hope that you will forget this matter and resume your wrtings.

Regards
GV

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

व्यथित मन से लिये गये निर्णय सदा सही नहीं होते.मेरा मन जब भी व्यथित हुआ-छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय कवि,गायक और गीतकार श्री लक्ष्मण मस्तुरिया के इन मुक्तकों ने मुझे सम्बल दिया है :

बढ़ते कदम हों तो उत्कर्ष जीवन
भटके कदम तब तो अपकर्ष जीवन
मिल जाये ध्येय तो है हर्ष जीवन
विपदायें हों तो है संघर्ष जीवन.
*
अकेले चलो मन महोत्सव है जीवन
मिलकर चलो तो जगोत्सव है जीवन
रोते चलोगे मृत्युत्सव है जीवन
गाते चलो आनंदोत्सव है जीवन.
*
सभी की खुशी के लिये विश्वास है कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगी.

मुन्नी बदनाम said...

दिव्या बहन, मेरा कमेंट क्यों नही छापा? क्या मैं आईटम डांसर हूं इसलिये?:(

मुन्नी बदनाम

ZEAL said...

.

मुन्नी बहन ,
आपका कमेन्ट प्रकाशित न करने का खेद है , लेकिन आप अपनी टिप्पणी पुनः पढ़ें आप शायद समझें कि आपसे क्या भूल हुयी है।

.

sanjay said...

एक पत्र आपके नाम लिखा है जिसमें शायद कहीं हमारे वैचारिक मतभेद के बावजूद भी आपसी स्नेह को मैंने महसूस करा और लिखा है। यदि इन चांडालों में से कोई भी अपनी हरकत दोहराएगा तो उसे भड़ास पर हम गंवार, अशिष्ट और जाहिल लोग अवश्य देखेंगे।
सस्नेह
संजय कटारनवरे
मुंबई

Atul Shrivastava said...

अपने शुभचिंतकों में स्‍थान देने के लिए पहले तो शुक्रिया.... पर यदि आप भाई की जगह नाम देतीं तो शायद ज्‍यादा खुशी होती।
ज्‍यादा कुछ नहीं सिर्फ इतना ही कहना है कि किसी एक दो लोगों के दुर्व्‍यव्‍हार के कारण अनेकों प्रिय लोगों को छोडकर जाने का आपका फैसला उचित नहीं। इस पर फिर से विचार करना चाहिए आपको।

अशोक कुमार शुक्ला said...

Welcomee back
mera yeh coment aapki 22september ki post ke liye hai.
Comment option waha band hone se aapko yaha se welcome kar raha hu.
Once again welcomee.
Rachanaaji ke blog par jaakar yeh pata laga ki kuch log aapko aur rachana ji ko eak hi samajhate hai.
Unke liye kahnaa chahunga ki
is sansar me koi bhi 'rachana'. Bina. 'zeal' ke ho hi nahi sakti aur jab kuch 'rachana' hoti hai to woh 'divya' hi hoti hai.
Thanks kuch jyaada pakaau to nahi laga?

राजीव थेपड़ा said...

"जील"उर्फ़ "दिव्या"(आज जी लगाकर बात नहीं करूंगा)....दिव्या...ऐसे कोई हार जाएगा ना....तो समझो मर ही जाएगा....दिव्या....अच्छी संभावनाओं का अंत ना....अच्छे माहौल के की मौत के समान है.....दिव्या....क्या यह कहावत नहीं सुनी तुमने....हाथी चले बाज़ार,कुत्ते भूंके हज़ार....?...दिव्या बहुत से लोग बहुत तरह के होते हैं....हम सब में से बहुत से लोग इस माहौल के शिकार हैं....कि वे कुछ ऐसे पर-पीडकों के साथ जीने को विवश हैं,मगर मुहं खोलकर आवाज़ नहीं उठा पाते....क्योंकि वो कलह को और ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहते....और इस स्थिति का भी ऐसे कपटपूर्ण लोग और ज्यादा लाभ उठा लेते हैं....जिनका काम ही तमाम समय धूर्तता करना है....ओ जील....संघर्ष में हम सब तपकर खरे होते हैं,निखारते हैं....बहुत बार अपनी स्थिति स्पष्ट कर पाते हैं....और कई बार नहीं भी.....मगर हमारा जीना तो कभी खत्म नहीं होता....नहीं होता ना दिव्या....??ओ जील....हमारे आस-पास सांप भी हैं बिच्छू भी....और इनका जो स्वभाव है....वाही तो वो करते हैं,करेंगे....हमारा तुम्हारा काम क्या है....आगे बढना....अच्छा सोचना....अच्छा कहना....और एक अच्छी दुनिया बनाने का महत्ती प्रयास करना....है ना जील....??एक बताऊँ दिव्या....यह धरती मात्र दस फीसदी लोगों के सद्प्रयासों द्वारा जीने लायक बनी रहती हैं....बाकी के नब्बे में तो अस्सी फीसदी लोग गुमनाम,अनाम,विवश लोग हैं....और बाकी के दस फीसदी असुर जाती के हैं....बस दस या अधिक से अधिक बीस फीसदी ही होंगे ऐसे लोग.....इसलिए ओ जील....तुम्हारे जैसे लौह-लोगों का पीछे हटने का तात्पर्य क्या यह नहीं....कि असुर लोगों से हार गए तुम सब....??क्या धरती पर कभी असुर जाति को जीतते हुए देखा भी है तुमने....??अरे उनको मार डालने हेतु तो अवतार तक जन्म ले डालते हैं....इस धरती पर....जिनके साथ होते हैं....तुम सब जैसे लोग.....ओ पगली....पीछे हटना....मौत को अपने हाथों से अपने नजदीक लाना है...पीछे हटना... . गलत लोगों के हाथों में सत्ता देना है....पीछे हटना आदमी पर असुर को हावी होने देना है....अगर तुम यही चाहती हो ओ दिव्या....तो तुम्हारी मर्ज़ी...बाकी मैंने तो इसलिए अपनी उंगलियाँ चटकाई हैं यहाँ....कि तुम और ताकतवर महसूस कर सको खुद को....और मुझसे पहले शायद एक सौ नौ लोगों ने भी यही किया है....वो कोई पागल तो नहीं हैं ना....और पीछे हटने का एक और भी मतलब है यहाँ....अनुराग जैसों के हाथ में इस बाज़ार को सौंप देना...!!..वैसे मैं तो यह नाम तक लेना नहीं चाहता था....मगर लेना ही पडा कि तुम और गुस्सा हो सको.....मगर यह गुस्सा तुम्हारे हारने के लिए नहीं....तुम्हारी जीत का रास्ता प्रशस्त करने में सहायक हो.....तुम वही करोगी ना दिव्या....जैसा कि हम सब चाहते हैं....??बाकी तुम्हारी अपनी मर्ज़ी....आखिर तुम्हारी भी तो कोई मर्ज़ी है ना.....खुद के साथ....हज़ारों औरतों के असम्मान करते हुए लोगों से हार जाने की.....!!

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aaderniya divya ji..hamarivani per eun hi search karte karte achanak aapke maata pita ka aapko preshit patra padhte padhte main jigyasa bash aapki tamam poston se gujar gaya.kuch dino purv aapki kisi post per bhi main comment karna chahta tha per comment option band tha..aaj bhi kuch post per option band hain...main baharhaal yahan tak pahunch hi gaya..aapki isi post per likh raha hoon ki mujhe behad khushi hai ki aapne apna nirnay badal liya...aapka blog aaur aapne jin logon ko is post me apne behad karib bataya hai ..wo mujhse parichit nahi hain per un sabhi ke lekh hindi blogging ki mahatwapurna uplabdhi hain..ham log to bahut stariya lekhak nahi hain na sahitya per utni acchi pakad hai per acche aaur bure aadmi ke sahitya aaur lekhan ko dekhakar main uski parikalpna bakhoobi kar leta hoon....aap . rashmiji, sangeetaji, kunwar saheb, nasaji jaise tamam acche log naye logon ko protsahit karne me koi kasar nahi chodte..maine pahli baar aapke blog per visit kiya tha to aapse bhi apne blog per aane ka nimantran kiya tha..mujhe laga tha aap blog jagat me sthapit hain badi lekhika hain...mere blog per shayad hee aayein ..per aap aayeein hi nahi apitu aapne sabse pahle mera blog join kiya aaaur mujh jaise sadharan sa likhne wale bloggar ko bhi prerna ke do shabd likhar protsahit kiya...likhne ko bahut kuch hai..shabdon ka sailab rukne wala nahi hai..kuch log chahte hain sahitya aasmaan chuye...aaur kuch log chahte hain wo apne hantho se aasman chuyein chahein sahitya ka janaja nikla jaye..main aapko aaur aapki lekhni ko sadar naman ke sath

Anonymous said...

This piece of writing will assist the internet viewers for setting
up new web site or even a blog from start to end.

my webpage; source

Manu Tyagi said...

दिव्या जी मै केवल आपका ब्लाग पढता हूं टिप्पणी कभी नही करता क्योंकि मै अक्सर किसी के भी ब्लाग पर नही करता हूं पर आज इस पोस्ट पर इसलिये कर रहा हूं क्योंकि हम ब्लाग लिखने आये हैं किसी और के लिये नही ​बल्कि खुद के लिये । किसी को खुश देखने या नाराज देखने को नही । हमें जो सही लगता है वही कहना है वही करना है दुनिया चाहे कुछ भी करे या कहे
बाकी आप खुद समझदार हैं