Monday, September 12, 2011

हिंदी भाषा के साथ अन्याय करते चंद हिंदी ब्लॉगर.

हम देश-विदेश के मुद्दों पर अटकें रहे और अपने ब्लॉगजगत में क्या हो रहा है , इसको नज़रंदाज़ करते चलें तो "चिराग तले अँधेरा" वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी। जहाँ देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने एकजुटता दिखाई वहीँ हिंदी-ब्लौगिंग में व्याप्त अभद्रता के खिलाफ एकता क्यूँ नहीं है। क्या डर है लेखकों को कि वे एक टिप्पणीकार खो देंगे और इसी डर से वे अभद्रता और अशिष्टता के खिलाफ आवाज़ उठाने से कतराते हैं। देश का भ्रष्टाचार तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक प्रत्येक इकाई स्वयं को नहीं सुधारेगी। महिलाओं को उनका हक मात्र महिला दिवस मनाने से नहीं मिलेगा अपितु उन्हें भी अपने समान ही भावनाओं एवं संवेदनाओं से युक्त इंसान समझने कि आवश्यकता है। इसी तरह हिंदी भाषा भी अपमानित होती रहेगी जब तक स्वयं हिंदी भाषी ही इसका दुरुपयोग करना बंद नहीं करेंगे।

हिंदी पत्र-पत्रिकाओं से इतर यदि हिंदी-भाषा का कहीं सर्वाधिक प्रयोग हो रहा है तो वह है हिंदी-ब्लॉगिंग। जहाँ कुछ ब्लॉगर साहित्य सृजन कर रहे तो कुछ लोग विभिन्न मुद्दों और विषयों पर लिखने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय एवं मिठास-युक्त हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस तो यह है कि चंद ब्लॉग्स पर हिंदी जैसी पवित्र भाषा का उपयोग स्त्रियों को गाली देने के लिए किया जा रहा है और इसी अभद्रता और अशालीनता के ज़रिये ये लोग खुद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं।

और सबसे ज्यादा अफ़सोस तो तब होता है जब स्थापित , वरिष्ठ एवं उम्रदराज ब्लॉगर (Arvind Mishra) इस तरह कि घिनौनी हरकत करते हैं। पराई-स्त्री को अपनी बपौती समझ गाली देकर ये स्वयं को जन्म देने वाली कोख का अपमान करते हैं। कैसे मुंह दिखाते हैं ये अपनी संतानों को और कैसे आँख मिलाते होंगे अपने घर कि लक्ष्मी से। यदि इनकी बातों का विरोध करो तो अनेकों लोगों का तुर्रा ये होता है कि बड़ों का सम्मान नहीं हो रहा।

बड़ों को सम्मान तब मिलता है जब वे छोटों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। छोटों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं , उनसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते और छोटों के प्रति स्नेह दृष्टि रखते हैं। ना कि जहाँ देखी स्त्री , वहीँ अपमानित करने के लिए उपस्थित हो गए। इन लोगों को ब्लॉगजगत के अन्य वरिष्ठ एवं बुज़ुर्ग ब्लॉगर्स से भी कुछ सीखना चाहिए। बिना दूसरों को मान दिए कोई भी सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता। प्यार और सम्मान माँगा नहीं जाता अर्जित किया जाता है।

अभद्रता का एक नमूना यहाँ देखिये-

"...... हम गाँव गिराव के आदमी बिच विच नहीं जानते -हम परेशां करने वाली कुतिया का दो रूप जानते हैं -एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही दोनों हो .. ...मुझे तो लगता है ऐसे ज्यादातर मामलों में कुत्ते कुत्तियाँ इन मनुष्यों से बेहतर हैं और जग जानता है वे वफादार भी ज्यादा है ....."

अब देखिये Arvind Mishra, के विचार देखिये स्त्रियों के बारे में। यदि इनके हाथ कोई स्त्री नहीं आई तो वह कटही आदि बना दी जायेगी। और इनसे कोई पूछे कि पशु ही बेहतर हैं तो ब्लॉगिंग क्यूँ कर रहे हैं ? वफादार प्राणी तो इन्हें पढ़ नहीं रहे। और इनके परिवार कि स्त्रियों को किस श्रेणी में रखा जाए? खेद होता है इन्हें शिक्षित कहते हुए।

उपरोक्त भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर्स। उस पर आपत्ति जताने वाले तो कोई नहीं दिखे अपितु उनकी भाषा शैली कि प्रशंसा करते बहुतेरे नज़र आये। धन्य हैं ऐसे चाटुकार मित्र।

हाँ एक वरिष्ठ ब्लॉगर (श्री अनूप शुक्ल) ऐसे भी मिले जिसने परिवेश में फैली गन्दगी के खिलाफ आवाज़ निडर होकर उठायी -- ----
"....................एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही किसके लिये आप कह रहे हैं यह आप भले न जानते हों लेकिन ब्लागजगत में जो आपको पढ़ता रहा है वह जानता है कि आपने किसके लिये यह कहा! जिसके लिये कहा कभी आप उसकी मानसिक क्षमताओं के प्रशंसक हुआ करते थे। आपसे बहुत छोटी उमर की उस महिला के लिये यह सब कहकर आप पता नहीं कौन ऊंचाई हासिल कर रहे हैं। यह निहायत खराब बात है। घटिया घराने की। निम्नकोटि की। मिसिरजी, सोचिये क्या करते हैं आप! सुधर जाइये! बड़े बनिये। उदार बनिये। "

कुछ हिंदी-भाषा के विद्वान् तो दूसरों के ब्लॉग से सामग्री चुराकर उस पर अश्लील साहित्य रचकर बड़ा बनना चाहते हैं। स्त्रियों को अपमानित करना कोई इस हिंदी-सेवी के ब्लॉग पर जाकर देखे। शर्म आती है इनके परिवार में माँ-बहन नहीं है क्या ? और हिन्दी-भाषा को कलंकित ही करना था तो हिंदी में स्नातक क्यूँ किया ?

हिन्दी-ब्लॉगिंग में ऐसी अभद्रता और अश्लीलता के खिलाफ आवाज़ न उठाना हमारी मानसिक नपुंसकता का दोत्तक है। रक्त जम चुका है, आत्मा सो चुकी है, नैतिकता मर चुकी है। होने दो अपमानित यदि होती है नारी और हमारी राष्ट्रभाषा तो । रोने दो भारत-माता को। उनके बेटे ही कपूत बनकर , उनकी बेटियों का अपमान कर रहे हैं तो कौन रक्षा करेगा भला।

चल रही है गुटबाजी , खेमेबाजी , हमारी अपनी हिन्दी-ब्लॉगिंग में। मठाधीशों का ही वर्चस्व है। भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। हिन्दी-ब्लॉगिंग भी अब आजाद नहीं। गुलामी में जकड ये सिसकने लगे इससे पहले इसे बचाना होगा।

दुयोधनों कि महासभाएं अब भी होती हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी विराजते भी हैं लेकिन बलि-वेदी पर चढ़ती स्त्री को बचाने अब कृष्ण अवतरित नहीं होते क्यूंकि मानसिकता नपुंसकता व्यक्ति को पुरुषार्थ करने से रोकती है। दुर्जन अपनी जात भले ही न छोडें लेकिन सज्जनों को निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। कभी-कभी देश के प्रति , स्त्री के प्रति , राष्ट्र-भाषा के प्रति भी उदारता दिखानी चाहिए। ये हमारा नैतिक दायित्व भी है।

तटस्थ रहने वालों से बड़ा गुनाहगार कोई नहीं है।

Zeal

118 comments:

G.N.SHAW said...

सही और सार्थक अभिव्यक्ति ! इसमे कुछ भी संदेह नहीं है ! जिसके पास जो रहेगा वही देगा - ऐसी ही आदत इस ब्लॉग जगत की हो गयी है ! जाने दीजिये कुत्ते भुकते रहेंगे और हाथी जाती रहेगी ! आप अपने मन से संदेह और कटुता निकल दे -सिर्फ आगे लिखते रहें ! गलती करने वालो को भी पछताने के दिन आयेंगे ! बधाई दिव्या जी !

Ankit pandey said...

हकीकत बयान करती यह पोस्ट अच्छी लगी...शुभकामनायें !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

लोगों की मानसिकता को उजागर करती सार्थक पोस्ट ... पुरुष किस बात का दंभ भरते हैं ? मुझे आज तक समझ नहीं आया ..जबकि उनका खुद का वजूद एक स्त्री के द्वारा ही है ..यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा है ..

सतीश पंचम said...

यह पोस्ट संबंधित व्यक्ति/व्यक्तियों को सीधे इंगित करते हुए भी लिखी जा सकती थी। निजी मतभेदों को हिन्दी भाषा के न्याय, अन्याय, उत्थान और पतन आदि से जोड़ना उचित नहीं।

JC said...

अपनी कहानियों में संकेत देखें तो दिव्या जी, जब घोर कलियुग था तो केवल शिव ही सक्षम थे विषपान हेतु...इस कारण निराकार अमृत शिव, त्रिनेत्र धारी 'जगदम्बा' (जगत की माँ) का मन्त्र का जाप करें "ॐ त्रेयाम्बकम यजामहे / आदि" , कह गए ज्ञानी-ध्यानी - जैसा श्री शौ जी ने भी कहा प्रकृति में संकेत को समझ कि हाथी (अमृत दायिनी सती पार्वती पुत्र, गणेश) विचलित नहीं होता कुत्तों (धर्मराज यमराज के दूतों) के भौंकने से...

aarkay said...

भाषा के आविष्कार के पीछे मकसद गालीगलौज अथवा अपशब्दों का प्रयोग तो नहीं ही रहा होगा , ऐसा मेरा मानना है. आप द्वारा दिए गए उद्धरण केवल लिखने वाले की बीमार मानसिकता का ही परिचय देते हैं. आम पढने वाला ही जब आहत होता है तो जिसे इंगित किया गया हो उसकी मनोदशा का क्या वर्णन हो सकता है !
सार्थक लेख के लिए बहुत बहुत बधाई !

एस.एम.मासूम said...

गुटबाजी, खेमे बाज़ी इत्यादि बातें इस समाज मैं जैसे मजूद हैं वैसे ही ब्लॉगजगत मैं भी हैं. अपने फायदे के लिए हर इंसान यही करता दिखाई देता है. इसे ग़लत तो कहा जा सकता है लेकिन इस से छुटकारा आसान नहीं क्यों कि हर गुट खुद कि फ़िक्र को अपने अंदाज़ को ही सही कहता है. बड़े लोग हैं यहाँ ब्लॉगजगत मैं जो लिखने से अधिक , ताल्लुकात बनाने मैं यकीन रखते हैं. अब जब तालुकात ही बनाने मैं तो वाह वाह भी करनी होगी.
गुटबाजी का अंत आवश्यक है और यह हिंदी ब्लॉगजगत के दायरे के बढ़ने के साथ स्वम ख़त्म हो जाएगा.
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स्त्री का अपमान करना सही नहीं.
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इस ब्लॉगजगत मैं ऐसी टिप्पणी करने वालों को भी देखा जा सकता है जो आप के विचारों से भी सहमत होते दिखेंगे और आप के विचारों के खिलाफ लिखने वालों से भी सहमत दिखेंगे. इनको किस गिनती मैं रेखा जाए? ना काहू से दूस्ती ना काहू से बैर का यह भी मतलब नहीं कि ज़ुल्म होते देख चुप बैठा जाए.

वन्दना said...

divya ji
bimar mansikta wale aapko har jagah mil jayenge .........aapka kahna sahi hai lekin iske liye ya to stri ko khud aage aakar moonhtod jawab dena hoga ya phir use ignore karna hoga...........kuch logon ki prakriti kabhi nahi badalti isliye aise logon ki baton par dhyan na dekar sirf apna karm karti rahiye vo prabhavit nahi hona chaiye.

Dr.Deepak Acharya said...

Good

सदा said...

बेहद सटीक व सार्थक प्रस्‍तुति ... आभार ।

smshindi By Sonu said...

बहुत सही लिखा है आपने

अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से 1 ब्लॉग सबका

P.N. Subramanian said...

आपकी लेखनी स्वयं सशक्त है. किंचित भी विचलित न हों. जेसी जी ने अच्छी उक्ति सुझाई है.

DR. ANWER JAMAL said...

Agree .

You are invited -

ब्लॉगर्स मीट वीकली (8)

http://hbfint.blogspot.com/2011/09/8.html

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी, बहुत सही किया आपने| ऐसों को इसी प्रकार तेल में छड़ी तेल में भिगोकर सूतना चाहिए|
हिंदी ब्लोगोंग में होने वाले इन कुकृत्यों को भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए|
सबसे पहले तो शर्म आनी चाहिए उन बागड़ बिल्लों को जो इस नीचता तक उतर आए कि सरेआम किसी स्त्री को गालियाँ दे रहे हैं| खुद को मर्द समझने वाले इन नामर्दों से बड़ा कोई नपुंसक नही है| अपने घरों में बैठकर किसी स्त्री पर अश्लील व अभद्र बकवास पेलना बहुत आसान है| और समझते हैं खुद को मर्द|
ज्यादा मर्दानगी फूट रही है तो आइये कभी मैदान में| कम से कम किसी स्त्री का अपमान तो हम नही सहेंगे|
वहीँ माँ और बहन का संबोधन देकर भी उसे जलील करने वाले दरअसल अपनी माँ-बहन को ही भरे बाज़ार नंगा कर रहे हैं| इनसे बड़ा पापी कौन होगा?
शर्म तो तब आती है जब नारी मुक्ति के नाम का झुनझुना खेलने वाली ब्लॉग जगत की कुछ नारियां इन नपुंसकों की प्रेरणा स्त्रोत बनी हुई हैं| क्या इन्हें एक स्त्री को पड़ने वाली गालियाँ दिखाई नही दे रही थीं? और यदि दिख रही थीं तो क्यों नही इसके विरोध में आवाज़ उठाई? किस बात की प्रतीक्षा थी? क्या खुद के ब्लॉग पर टिप्पणियाँ या फोलोअर्स खो देने का डर था? या इन नपुंसकों से दोस्ताना चल रहा है? या फिर खुद के गाली खाने की प्रतीक्षा में कतार लगाए कड़ी हैं?
ऐसी नारियों को तो कम से कम नारी मुक्ति की बात नही करनी चाहिए| इनमे शर्म बाकी है तो कम से कम आ से ही इन बागड़ बिल्लों का साथ छोड़ दें व सामूहिक रूप से इनका बायकॉट करें| तभी समझ में आएगा कि ये भी भारतीय नारियां हैं|
कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनमे दम नही| पता नही अपने कीबोर्ड पर बैठे, इन्हें किस बात का डर सता रहा है? जो लोग इन बागाद्बिल्लों के ब्लॉग पर जाकर भी चुप रहे और एक स्त्री का अपमान देखते रहे, भले ही उनका समर्थन न किया हो फिर भी उनका यह व्यवहार प्रशंसनीय नही है| तमाशा देखने का इतना ही शौक है तो अपने आस पड़ोस में मदारी बुला लीजिये, कम से कम किसी महिला का अपमान तो मत होने दीजिये|

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

जिस महिला अपमान आप देख रहे थे, आपसे वह अधिक साहसी है जो सार्वानिक रूप से इन कुकृत्यों के विरुद्ध आवाज़ उठा सकती है| इसके लिए भी इन्हें जलील किया जाएगा, लेकिन मेरा तो विश्वास है कि डरना इनकी फितरत में नही है| Iron Lady का तमगा इन्हें ऐसे ही नही मिला|
साथ ही आभार है आदरणीय श्री अनूप शुक्ल जी का जिन्होंने इन पाखंडियों को मांह तोड़ उत्तर दिया| एक स्त्री के मान की रक्षा करने का साहस दिखाया|

आज की यह पोस्ट चेतावनी है उन बागड़ बिल्लों के नाम जो ब्लॉगजगत में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं| जो यहाँ गुटबाजी और खेमेबाजी को अपना हथियार बना रहे हैं| जो इनके साथ है, वह पाक साफ़ और जो नही वो उसे कटही कुतिया कहेंगे, माँ और बहन बोलकर गालियाँ देंगे|
इस प्रकार तो ब्लॉगजगत की स्वतंत्रता ही छिन जाएगी| यहाँ किसी का एकाधिकार सहन नही किया जाएगा|

अभी बहुत से बुद्धूजीवी यहाँ अपनी रुदालियाँ पेलने आएँगे| उन्हें चेतावनी मैं देता हूँ| यहाँ हम अपनी माताओं और बहनों का अपमान नही होने देंगे|
जो बन पड़े करें, अंजाम ठीक नही होगा|

मेरी भाषा पर ऐतराज़ जताने वालों को एडवांस में ही बोल देता हूँ कि यदि आपकी भावनाओं को ठेस मेरी भाषा व शब्दों से पड़ रही है तो मुझे इसकी परवाह नही| क्योंकि ऐसी भावनाओं को मैं दुर्भावना कहता हूँ जो किसी स्त्री का अपमान करे या अपमान का तमाशा देखे| बहस करने का मूड है तो आ जाइए मैदान में, आज आर पार की लड़ाई हो ही जाए|
ये सब कुकृत्य अब नही चलने देना है|

दिव्या दीदी, मैं जानता हूँ कि आप एक साहसी महिला हैं| इन हरामखोरों के लिए आप अकेली ही भारी हैं| किन्तु बहन का अपमान सहन नही कर सकता| मई इस ब्लॉग जगत में अधिक पुराना नहीं हूँ और न ही अधिक लोगों का पाठक हूँ| प्रारम्भ हुए इन घृणित घटनाओं को मैं नही पढ़ सका, नही तो वहीँ उत्तर दे आता|
आपके साहस के कारण ही यह ब्लॉग जगत अपनी स्वतंत्रता को कायम रखे हुए है|

Bhushan said...

मेरी किस्मत बहुत अच्छी थी. दो वर्ष पहले जब मैंने ब्लॉगिंग शुरू की तो एक ऐसे ब्लॉग पर चल गया जहाँ किसी के विरुद्ध बहुत ही गंदी किस्म की पोस्ट लिखी गई थी. उस पर लगभग चालीस ब्लॉगरों ने टिप्पणियाँ लिखी हुई थीं. उन टिप्पणियों में एक होड़ थी कि- 'दोस्तो आप गंदे हैं लेकिन हम तो आपसे भी ज़्यादा गंदे हैं.' मैं उनके ब्लॉग्स से दूर ही रहा हूँ. उनके मुकाबले सीधे-सादे ब्लॉग मुझे बेहतर लगते हैं जहाँ बलॉगर साधारण सी भाषा में दिल की बात लिख कर मुक्त हो जाते हैं. जहाँ विद्वत्ता के नाम पर घिनौनी सामग्री होती है उनसे दूर रहना बेहतर है.

वाणी गीत said...

स्त्री/पुरुष द्वारा सार्वजनिक मंचों पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग किसी के लिए भी नहीं किया जाना चाहिए!
दो इंसानों में रिश्तों का बनना- बिगड़ना चलता रहता है , कभी परम मित्र दुश्मन बन जाते हैं , कभी दुश्मन दोस्त बन जाते हैं , किसी से असहमति अथवा नाराजगी जताने के लिए कम से कम सार्वजनिक मंचों पर तो इसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से भाषा पर नहीं पड़ना चाहिए, यदि क्रोध में कभी ऐसा हो तो उसे सुधार लिया जाना चाहिए ! यह स्त्री /पुरुष दोनों पर ही समान रूप से लागू होता है !

Poorviya said...

Swaan ke andhe ko hara hara hi dikhata hai.......


jai baba banaras......

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आज की इस पोस्ट को पढ़कर मन में क्रोध बहुत है| किन्तु यहाँ आने वाली अधिकतर टिप्पणियों से मुझे तो निराशा ही मिल रही है| जिसे देखो एडजस्ट करने की राय दे रहा है|
अरे क्यों करें एडजस्ट? आज किसी पराई स्त्री को गाली पड़ रही है, किसी पराई स्त्री का अपमान हो रहा है, क्या एडजस्ट करते करते हम उस दिन का इंतज़ार नही कर रहे जब हमारी सगी माँ बहनों को गालियाँ पड़ें?
और बात केवल एक स्त्री की ही नही है| बात है नैतिक मूल्यों की|
मुझे तो समझ नही आता कि गंदगी फैलाने वाले इन ब्लोगर बिल्लों का ब्लॉग लिखने का उद्देश्य ही क्या है? क्या केवल व्यक्तिगत आक्षेप लगाना ही मकसद है? या फिर राखी सावंत बनने की इच्छा है|
यहाँ राखी सावंत का नाम लेने पर मुझपर भी महिला का अपमान करने का आरोप लग सकता है| जिसे लगाना है लगा ले, मैं कोई स्पष्टीकरण नही दूंगा|
जो लोग इन परिस्थितियों में एडजस्ट करने की सलाह दे रहे हैं, वे या तो गांधी जी के बन्दर हैं (न कुछ देखो, न सुनो, न बोलो) या फिर ब्लॉग जगत के मनमोहन सिंह, जो केवल निंदा करना जानते हैं, कोई ठोस कदम उठाना नही|
यदि हिंदी ब्लोगिंग में ऐसे मनमोहन भरे रहे तो ये सब गंदगी तो चलती ही रहेगी|

Patali-The-Village said...

सही और सार्थक अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

shikha varshney said...

ये दुनिया है और यहाँ हर तरह के लोग होते हैं.कई बार कीचड में पैर पड़ जाता है तो कीचड अपने ही मुंह पर आता है.इससे बचने के २ ही रास्ते हैं एक - कि बस इससे बच कर निकला जाये.जो कि आसान है.
दूसरा कि कीचड साफ़ किया जाये.जो कि मुश्किल भी है और इसमें समय भी लगेगा और अपने हाथ भी गंदे होंगे.अत:विचलित न हों.

जयकृष्ण राय तुषार said...

डॉ० दिव्या जी आपकी पोस्ट में सार्थक रूप से जिस बात का विरोध किया गया है वह ध्यान देने योग्य है |ब्लोगिंग में हम भी ऐसे कुत्सित मानसिकता के ब्लोगरों का विरोध करते हैं |ब्लोगिंग में कहीं कोई नियंत्रण नहीं है |इसलिए ऐसी कुत्सित मानसिकता के लोग अपनी बात कह लेते हैं |लेकिन बहुतेरे अच्छे कार्य करने वाले ब्लोगर भी हैं |यह राजनीति प्रिंट मिडिया में भी है |लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि धीरे -धीरे अच्छे लोग आयेंगे तो खराब लोगों का महत्व कम होता जायेगा |आपको साहस के साथ अपनी बात कहने के लिए बधाई

ashish said...

हम विचारो के आदान प्रदान में भाषागत शुचिता का ध्यान नहीं रख सकते तो बाकी बाते गौण हो जाती है. मुझे तुलसीदास की पंक्तियाँ याद आ रही है

काटेहि पे कदली फरे कोटि जतन कोऊ सींच
विनय ना माँ खगेश सुनु , डाटेहि पै नव नीच

इमरान अंसारी said...

भाषा पर संयम रखना बेहद ज़रूरी है.......भावनाएं सबके भीतर होती है और उनकी कद्र की जानी ज़रूरी है......हमारी भाषा और हमारा वयवहार ही यह प्रदर्शित कर देता है की हमारी नींव कैसी है| कई बार ऐसा होता है की हमे दुसरो की बात तो बहुत बुरी लग जाती है पर हम जब उनके खिलाफ बोलते हैं तो अपनी कडुवाहट को छिपाते तक नहीं |

Pallavi said...

संगीता जी की बात से सहमत हूँ...लोगों की मानसिकता को उजागर करती सार्थक पोस्ट सच में समझ नहीं आता किसी बात का गुमान होता है ऐसे लोगों को जो इतनी छोटी सी बात उनको समझ नहीं आती की यदि औरत न होती तो उनका वजूद भी ना होता ....
समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

अजय कुमार said...

kisee ke prati abhadra bhaashaa kaa prayog nindaneey hai.
achchhe aur kharaab ,dono tarah ke log samaaj ka hissa hain ,Blog-Jagat mein bhee hain.
aise log mukhya dhaaraa se khud hee alag ho jaate hain.

रेखा said...

बहुत ही शर्मनाक है यह सबकुछ ........हमसभी को एकजुट होकर विरोध करना चाहिए ऐसी मानसिकता वाले लोगों का

Sunil Kumar said...

यह उनकी उनकी मानसिक हालात को बताती हैं l ऐसे लोगों की निंदा अवश्य करनी चाहिए

Dilbag Virk said...

अशिष्टता किसी की भी हो , स्वीकार्य नहीं

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

इमरान अंसारी जी, आपना कहा-
"कई बार ऐसा होता है कि हमे दूसरों की बात तो बहुत बुरी लग जाती है पर हम जब उनके खिलाफ बोलते हैं तो अपनी कडवाहट को छिपाते तक नहीं"

सबसे पहले तो यहाँ बात कडवाहट की नही अभद्रता की हो रही है| क्या आप कडवाहट और अभद्रता को एक ही श्रेणी में रख रहे हैं?
दूसरी बात आप चाहते हैं कि जब हम उनके खिलाफ बोलें तो हमारे वचनों में कडवाहट न आने पाए| आप क्या चाहते हैं कि कोई हमे तमाचा मारे और हम अगरबत्ती लेकर उसकी आरती उतारें?

Suman said...

nice

डा. अरुणा कपूर. said...

पढ़ कर बहुत दु:ख हुआ कि स्त्रियों के बारे में ऐसा लिखा जा रहा है!..मै इसका विरोध करती हूं!

mahendra verma said...

इस तरह अभद्र भाषा का प्रयोग कर हिंदी और नारियों का अपमान करने वाले ब्लॉग जगत के ही नहीं बल्कि पूरे मानव समाज के लिए कलंक हैं। ऐसे लोगों की प्रवृत्ति में दुष्टता कूट-कूट कर भरी होती है। किसी भी तरीके से इनकी आदत नहीं सुधरती। इनके लिए सबसे बड़ी सजा है, उपेक्षा। उपेक्षा से बड़ी गाली दूसरी नहीं होती। इनकी चर्चा करना इन्हें महिमा मंडित करने के समान है। एक दिन इनके ही मित्र इनकी दुष्टता का मजा चखाएंगे।

JC said...

भगवान् बुद्ध ने क्या कहा था?
यही न कि यदि आप किसी को कुछ देना चाहते हैं और वो उसे न ले तो वो वस्तु आपके पास ही रह जायेगी... और इसी भाँती कोई आपको गाली दे और आप न लें तो उसी को लगेगी न?

श्री कृष्ण भी कह गए कि यदि कोई किसी को गाली देता है तो (सत्य के विषय में अज्ञानतावश) वो मुझे ही गाली दे रहा होता है, क्यूंकि मैं सभी के भीतर हूँ...

तो फिर सही समय आने पर उसका क्या नतीजा होगा?
वो केवल कृष्ण को ही पता है, हम अज्ञानियों को नहीं...
किन्तु उसके लिए पहले आपको एक शर्त निभानी होगी (जैसा हर वस्तु के क्रय-विक्रय, खरीद-फरोक्त, में भी होता है)...
और वो है केवल क्रष्ण में विश्वास पूरी तरह से करना होगा...

Bikramjit said...

Well so true what you say people will od anything to gai na bit of publicity , but using such language is atrocious. And you say there are people who have commented saying this language is good. WOW..

Well you should have put a link to this blog too, so we can all find out what sort of stuff people do write.

I remember my dad would always say that treat others as you want to be treated ..

its quiet obvious from this blogger how he wants to be treated and how he wants the ladies in the household to be treated .. A Real shame

Bikram's

संतोष त्रिवेदी said...

माननीया दिव्या जी ,आपकी पोस्ट बहुत क्रोध-पूर्वक लिखी गई है,जिसमें आपने यह भी नहीं ध्यान रखा कि जिन बातों को लेकर आप इतना उत्तेजित हो गई हैं,वह उस पोस्ट का हिस्सा नहीं थीं !चूंकि मैंने भी वह पोस्ट पढ़ी है और लगातार विमर्श में रहा इसलिए मेरा दायित्व बनता है कि आप जो कह रही हैं वही सही नहीं है !
आपने उस 'अनामिका' पर कोई ध्यान नहीं दिया जिसने अपनी टीप में 'बिच' शब्द जान-बूझ कर डाला सो उसके सन्दर्भ में आगे की टिप्पणियां होती गईं.इस नाते मैं उन टिप्पणियों को 'वैध' या सभ्य नहीं ठहरा रहा हूँ.ऐसे ही मेरी एक पोस्ट "डॉ. अमर कुमार :एक इंसानी ब्लॉगर" पर जानबूझ कर उन्हीं महोदया ने आपका नाम लिया,बवाल खडा किया ,बाद में सारे कमेन्ट भी डिलीट कर दिए !सो,स्त्री मात्र होने से क्या विशेषाधिकार मिल जाता है ?
दूसरी बात सार्थक-लेखन हो भी रहा है क्या ?आपकी दोनों पिछली पोस्टों में कौन-सी सार्थकता उभर कर आई है,यह अगर हम पूछेंगे तो हो सकता है यह कमेन्ट अस्तित्व में ही न आए.लेखक और ब्लॉगर को केवल 'सुन्दर भाव',बढ़िया विवेचन' आदि ही सुनना होगा.आलोचना सुनना और सहिष्णु होना एक अच्छे ब्लॉगर की निशानी है,फिर भी लोग आत्म-प्रशंसा के लिए 'मोडरेशन' का सहारा लेने लग जाते हैं.
एक और आपत्ति है,उस पोस्ट में आपको केवल श्रीमान अनूपजी का विचार जँचा जो उन्होंने हल्के-फुल्के ढंग में ही दिया था ,जबकि कई अन्य ब्लॉगर की बुद्धि और विवेक पर आप प्रश्न-चिह्न लगा रही हैं.इस पोस्ट का उत्तर देने का यह भी एक कारण है !
कोई भी समझदार ब्लॉगर असभ्य भाषा का समर्थन नहीं कर सकता,ठीक उसी तरह जैसे आपने इस पोस्ट और "मरणोपरांत" पोस्ट पर की है.
दिव्याजी,अंतर्जाल में अगर हैं तो खुले दिमाग से रहें और आलोचना सहने की ताब भी पैदा करें.
वैसे हमेशा की तरह आपकी यह पोस्ट 'चर्चा-मंच' में शामिल की जाएगी और आप 'फूल कर कुप्पा ' हो जाएँगी.जनता हूँ,यह टिप्पणी आप प्रकाशित नहीं करेंगी क्योंकि इसमें आपकी 'प्रतिष्ठा' घायल होगी.अगर कर सकीं तो समझूंगा कि आप आलोचना सुनने का भी माद्दा रखती हैं !

अरूण साथी said...

दिव्या जी सबसे बड़ी बात जो आपने कही वह यह कि तटस्थ रहने वालों से बड़ा गुुनहगार कोई नहीं दिनकर जी ने भी लिखा है जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध। सचमुच कभी कभी आलेख को पढ़कर मन व्यथित हो जाता है पर उसको नजरअंदाज कर बढ़ जाता हॅंु इस नाते गुनहगार तो मैं भी हूं पर सबसे बड़ी बात यह कहना चाहूंगा वह यह है ब्लॉगिंग की दुनिया और चटुकाटों और स्वार्थी लोगों की दुनिया होकर रह गई है और यहां आलेख के स्तर के हिसाब से टिप्पणी नही की जाती बल्कि अगला से मुझे टिप्पणी मिली या नहीं यह महत्पूर्ण हो जाता है तब भला टिप्पणीकारों की क्या चिंता?

रही बात महिलाओं के प्रति अभद्र नजरीया रखने वालो की जो अपने घर में मां बहन से कैसे नजर मिलते होगें तो मैं कहना चाहूंगा की निठारी कांड का अभियुक्त भी इसी समाज में हमलोगों के बीच रहता था। किसके मन में राक्षस बैठा है यह कौन जानता? इसकी अभिव्यक्ति जब वह करता है तब हमे पहचान कर उसकी निंदा करनी चाहिए वह चाहे मैं होउ या आप...

prerna argal said...

दिव्याजी आपका लेख पढ़कर बहुत दुःख हुआ की हमारे ब्लॉगजगत में ऐसे भी लोग हैं जो ऐसी मानसिकता रखतें हैं /और जिस देश में औरत को देवी का दर्जा दिया गया है उसके लिए खुलेआम इतने गलत शब्दों का उपयोग करते हैं /पता नहीं इतना पढ़-लिख कर भी इंसान अपनी सोच क्यों नहीं बदल पाता /और अपनी निम्न सोच का परिचय दे देता है /भले ही नारियों को देवी का दर्जा दिया गया है परन्तु पुरुष मानसिकता और पुरुष अहम् के कारण कई पुरुष औरत को नीचा दिखा कर और उसके लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल कर के अपने को बढ़ा समझने की भूल करते हैं /पर ऐसा कर के वो अपनी प्रष्ठभूमि और अपने परिवार द्वारा मिली निम्न सोच को ही उजागर करते हैं /बधाई आपको अपने लेख द्वारा ऐसे लोगों की मानसिकता और सोच को सबके सामने उजागर करने के लिए./

NISHA MAHARANA said...

ऐसे लोग वास्तव में बीमार मानसिकता वाले होते है
जो अपनी माँ ,बहन, बीवी और बेटी को भी शक
भरी निगाहों से देखते है और उनका जीना हराम
कर देते है ऐसे लोग वास्तव मे निंदा के पात्र हैं।

vishwajeetsingh said...

आदरणीय दिवस दिनेश गौड़ जी एवं प्रेरणा अर्गल जी के विचारों से सहमत हूँ । आप आर्यन लेडी है , नारी जाति के प्रति कुत्सिक विचार रखने वाले मानसिक रोगियों से न डरे , उन्हें देर - सवेर इसका दण्ड अवश्य मिलेगा । अपनी औजस्वी लेखनी का प्रसाद बाटती रहें ।
सही और सार्थक अभिव्यक्ति ...... आभार ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अभी अभी वह टिप्पणी पढ़ी. हिन्दी के चिट्ठों में इस तरह के भी शब्दों का प्रयोग होने लगा, कमाल है. पढ़कर क्षोभ हुआ. पता नहीं क्यों बार बार कुछ अच्छा सृजित होने की जगह फिर वही गुटबाजी और इस तरह की भाषा का प्रयोग किया जाता है. सम्प्रेषण के एक अच्छे माध्यम को खराब/खत्म करने में ऐसी ही घटनाओं का योगदान होगा. ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत जैसे अच्छे एग्रीगेटर लोगों द्वारा विवादों को उछालने के कारण बन्द हो गये और लगता है अब मुफ्त ब्लाग भी इन्हीं सब चीजों के चलते बन्द हो जायेंगे.

anu (anju choudhary) said...

दिव्या जी ...अगर आपकी बात सच है तो आपसे विनती है कि आप उस ब्लोगर का नाम यहाँ सबके साथ साँझा करे ...ताकि सभी को उनकी करतूत का ठीक से पता चल पाए ....और सभी वरिष्ठ ब्लोगर सदस्यों से प्राथर्ना कि वो गंभीरता से इस मुद्दे पे विचार करे

--

anu

अरुण चन्द्र रॉय said...

Beyond my comprehension !

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

माननीय संतोष त्रिवेदी जी,
लगता है आप यहाँ नए हैं| सन्दर्भ केवल अभी की पोस्ट का नही है, आप शायद अरविन्द मिश्रा का इतिहास नही जानते| जाकर पूछ लीजिये ब्लॉग जगत में किसी से भी कि एक वर्ष पहले अरविन्द मिश्र ने किसे कटही कुतिया कहा था? आपको उत्तर मिल जाएगा| अपनी बेटी के समान किसी महिला को कटही कुतिया कहने वाले की मानसिक स्थिति कैसी होगी, यह आप सोच सकते हैं, यदि बुद्धि हो तो|
जिस बात को फिर भी भुला दिया गया, उसे आज तक अरविन्द मिश्र जैसे लोग कायम किये हुए हैं| पछतावा तो दूर, अभी तक ये इस घृणित कार्य के खुद की पींठ थपथपा रहे हैं| दिमाग लगाकर वह टिपण्णी पढ़िए जिसमे अरविन्द मिश्रा एक बेनामी टिप्पणीकार को कुतिया के प्रकार गिना रहा है|

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दूसरी बात, सार्थकता के पैमाने क्या आप निर्धारित करेंगे? क्या इसके लिए आपसे सर्टिफिकेट लेना पड़ेगा?
आपने यहाँ ऐसा क्या देख लिया जिसे सार्थक नही कहा जा सकता? आपकी ही बात करें तो "मौत का एक दिन" की सार्थकता समझाइये ज़रा|
बंधुवर जब हमारी माँ बहनों को गालियाँ पड़ेंगी तो हम सहिष्णु नहीं हो सकते और आप भी नहीं हो सकेंगे|
मरणोपरांत में आपको क्या असभ्य लगा ज़रा बताएंगे? और जहां तक इस पोस्ट का सवाल है, तो बंधुवर वो तो दिव्या दीदी की महानता है की एक साल baad जब वही कहानी दुहराते देखा तब लिखा| उनकी जगह मैं होता तो उसी समय इन्हें नंगा कर चूका होता| शायद आप भी यही करते|
बंधुवर आलोचना सहने वाली बात का उदाहरण मैं दे चूका हूँ, एक साल सह ली, अब नहीं|

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आपको आपकी टिपण्णी का जवाब देना ज़रूरी नहीं था, क्योंकि आपकी टिपण्णी यहाँ पोस्ट कर दिव्या दीदी ने आपके हाथ से फूल कर कुप्पा होने का मौका छीन लिया| यह काम कोई साहसी ही कर सकता है| जिसके मन में चोर हो वह ऐसी टिप्पणी को सार्वजनिक नही करेगा|

बहस करने का मूड हो तो आजाइए, मैं भी तैयार हूँ|

प्रवीण पाण्डेय said...

एक मर्यादा का स्तर तो बना कर रखना ही पड़ेगा, अन्यथा भवन ऐसे ही ढहते हैं।

कुश्वंश said...

दिव्या जी , अक्सर मैंने देखा है ,कुछ सिरफिरे लोग जिन्हें साहित्य से कुछ लेना देना नहीं होता , बड़े साहित्यकार का तमगा लगाने को गुट बना लेते है और वाह-वाह करने लगते है फिर वही सिरफिरे लोग अनर्गल लिख कर अब वो चाहे स्त्री के बारे में ही क्यों न हो , अपनी kunthaa nikalte है . blog jagat में ऐसे logo का ek bhara poora समुदाय है. कुत्सित बाते लिखने वाले beemaar मानसिकता के लोग होते है , वो स्त्री हो या पुरुष , लिंग भेद का प्रश्न ही नहीं है. ऐसे beemaar logon के prati कोई kanoonee कार्यवाही अभी virtual jagat के liye bane कानून में नहीं है मगर jaldee ही hogee bas jaroorat है ise jor shor से उठाने की , लाम बंद hone की . गुट baajee छोड़कर प्रतिकार करने ki . jaroorat है ऐसे logo को akela chodne kee . दिव्या जी मैंने वो लेख to नहीं padhaa, मगर aapkee post से anumaan to laga ही saktaa hoo kya likhaa hoga. मैं ऐसे blog ki ही नहीं blog से jude logon ki भी भर्त्सना kartaa hoon , kisi के sammaan को को चोट pahuchane वाले lekh kitne bhee utkrist क्यों न हो, unkaa बहिस्कार hona ही chahiye अब kaise karna है सुधी jan , vidwaan jan निर्णय kare और awgat karaye. kya karnaa है kaise nipatna है ऐसे duscharitro se इस hindi blog jagat में .

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय बहन anu जी, आपने उस ब्लोगर का नाम जानने की इच्छा प्रकट की है| मैं आपको नाम भी बता देता हूँ|
वह घटिया ब्लोगर अरविन्द मिश्रा है| उसके ब्लॉग का लिंक http://mishraarvind.blogspot.com/ है| उसकी अभी की पोस्ट टिकाऊ बनाम टरकाऊ ब्लोगिंग में भी आप नमूना देख सकती हैं| टिप्पणियाँ अवश्य पढियेगा|

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

जहां तक गुटबाज़ी का सवाल है, यह शायद एक ऐसा मानवीय विकार है जिसे रोका नहीं जा सकता। जहां दस लोग रहेंगे, उनमें से दो-तीन आपके निकट मित्र होंगे और दूसरे केवल मुलाकाती॥

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

सतीश पंचम जी, मैं सम्बंधित व्यक्तियों का नाम बता देता हूँ|
एक नाम तो अपनी पिछली टिपण्णी में दे चूका हूँ और उसकी करतूत आप भी जानते हैं|
नाम है अरविन्द मिश्रा|

दुसरे का नाम भी सुन लीजिये|
ये महानुभाव हैं अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी| ज़रा इसकी भी करतूतें सुन लीजिये|
पहले ये आदमी एक महिला को बहन बोलता है और बाद में उसे सबके सामने ज़लील करता है| एक उदाहरण यहाँ देखें|
पहले आप zeal ब्लॉग की ये पोस्ट पढ़ें|
http://zealzen.blogspot.com/2011/04/do-not-treat-her-like-commodity.html
पोस्ट की दिनांक 26 अप्रेल 2011
इसके अगले ही दिन 27 अप्रेल 2011 को अमरेन्द्र द्वारा पोस्ट की गयी यह घटिया पोस्ट यहाँ देखें|
http://amrendrablog.blogspot.com/2011/04/blog-post.html
इसके दिमाग की गन्दगी इसके एक एक शब्द में दिखाई देगी| जिस स्त्री को यह बहन बोलता था, उसी के ब्लॉग से पोस्ट की कहानी चुराकर उसे एक घटिया रूप में पेश किया| और तो और इसके दिमाग की हवस का नज़ारा भी देखने को मिल जाएगा|
बताइये ऐसे लोग भला कैसे हिंदी की सेवा कर सकते हैं?

और भी कुछ जानना चाहें तो बता दीजियेगा| गंदगी बहुत भरी पडी है|

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

भाई संजय झा जी,
यह पोस्ट किस निहितार्थ में बुरी लगी, ज़रा निर्देश करेंगे?
क्या अब अपने अपमान के खिलाफ आवाज़ उठाना भी बुरा है?
बंधुवर, इतने मानसिक गुलाम तो मत बनिए|

दूसरी बात, आप मुझे अनुज का संबोधन दे रहे हैं, क्या आप अनुज से ऐसी अपेक्षा रखेंगे कि वह अपनी बहन का अपमान होता देखता रहे, और बदले में अपनी भाषा पर नियंत्रण रखे?
यदी मेरी बहन का अपमान हो रहा हो तो मैं भला चुप कैसे रह सकता हूँ? क्या मुझे क्रोध नही आना चाहिए?
ये तो भला मानिए आप मेरा कि अभी तक केवल भाषा ही हिंसक हुई है|

शोभना चौरे said...
This comment has been removed by the author.
Atul Shrivastava said...

आपकी पोस्‍ट एक गंभीर मसले को लेकर है।
माफ करें मैंने पिछले पोस्‍टों पर उन कमेंटस को नहीं पढे जिसे लेकर इस पोस्‍ट का जन्‍म हुआ लेकिन दिवस जी के कमेंटस से कुछ तस्‍वीर साफ हुई। उनका आभार करने के साथ ही यह कहना चाहता हूं कि ऐसे मसलों पर शांत रहने के बजाय‍ इसका पुरजोर विरोध करना ही ठीक होगा वरना उनके हौसले बुलंद होते जाएंगे.....
दिव्‍या जी आपने विरोध का माद्दा दिखाया इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं।

शोभना चौरे said...

अभद्र भाषा का प्रयोग कर न तो हिंदी की सेवा की जा सकती है, न ही महिला के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल कर अपनी विद्वता का परिचय दिया जा ता है |वसुधैव कुटुम्बकम की भावना जिस देश में विराजती है वहां महिलाओ के बारे में इस तरह के विचार सार्वजनिक रूप से रखना अक्षम्य है |
दिव्याजी ,इतना सुन्दर लिख रही है आप हर पोस्ट पर इतने विचार आ रहे है विमर्श भी हो रहा है लिखती रहे \
व्यक्तिगत आलोचना ,अभद्र भाषा ,महिलाओ के आलेखों पर व्यंगात्मक टिप्पणीया असहनीय है |

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

आपकी बातों से सहमत. हर चीज की एक सीमा होती है. उससे परे कोई भी चीज अशिष्टता में बदल जाती है......
.
पुरवईया : आपन देश के बयार

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

People are using blogs to satisfy there ill conceived thoughts,you have rightly taken up and addressed this issue.kudos.....keep on writing

boletobindas said...

निंसंदेह किसी भी अवस्था में किसी स्त्री या पुरुष के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग कभी नहीं किया जाना चाहिए। इसका विरोध सभी को करना होगा। हद ही है कि नियमित लेखन वाले चंद सौ ब्लागर ही हैं और हिंदी जगत में स्त्रियों के बारे में गाली की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। किसी भी तरह के लेखन में इसका प्रयोग हमेशा से ही वर्जित है।

आपकी दोनो पिछली पोस्ट मुझ पहले व्यंग्य और टिप्पणी के बीच अंतर को बताती लगी..पर पूरी पढ़ने के बाद पता चला कि वो मरणोपरांत पोस्ट के संदर्भ में लिखी गई है। वैसे जाने-अनजाने दोनो पोस्टों का स्वतंत्र अस्तिव बना हुआ है और दोनो ही अपने में पूर्ण है। इसलिए पोस्टे के विचार से सहमत होना और असहमत होने का अधिकार पाठक को है..पर गालीगलौज की भाषा का इस्तेमाल करना पूरी तरह से गलत है.कितनी भी गालीगलौज करने वाला व्यक्ति हो तो पराई स्त्री को देखकर एकबारगी कोशिश करता है कि गालीगलौज की भाषा का इस्तेमाल न करे। पर महज चंद पोस्टों के बीच कोई अपने को साहित्याकर होने का गुमान पाल ले तो क्या कहने.....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...एकदम सही...हम क़ाइल हैं आपके

मदन शर्मा said...

दिवस भाई के विचारों से मै पूरी तरह सहमत हूँ!
गलत बातों का विरोध होना ही चाहिए चाहे कोई कितना ही बड़ा शुरवीर क्यों न हो.
हर बात की एक मर्यादा होती है मर्यादा की सीमा को लांघना उचित नहीं !!!!

मुनव्वर सुल्ताना Munawwar Sultana منور سلطانہ said...

जब ऐसे दुर्योधनों को लतिया कर बराबर करने वाला भाई मौजूद है तो परेशानी किस बात की है। निःसंदेह वो कृष्ण नहीं हैं लेकिन भाई होने के कर्तव्य को निभाना उन्हें आता है उन्हें आता है शठे शाठ्यम समाचरेत को चरितार्थ करना। अरिविन्द मिश्र किस्म के लोगों से सही तरीके से निपटने वाला भाई हमारे पास है हमें उन पर गर्व है। आप भी तो न जाने क्यों हिचकिचाती हैं उन्हें बताने में। उम्मीद है कि आप भाई को भूली नहीं होंगी। वो सिर्फ़ टिप्पणीकार या ब्लॉगर मात्र नहीं हैं ये तो आप भी जानती हैं। आपने भी तो कहा था कि ब्लॉग जगत से आपको भाई मिला है।

प्रतिभा सक्सेना said...

इतना सब जान कर बड़ा विस्मय हो रहा है कि इतना पढ़-लिख कर भी लोग ऐसे असंस्कारित बने रहते हैं .भाषा और अभिव्यक्ति पर संयम लेखन की पहली शर्त होनी चाहिये!

ZEAL said...

प्रिय भाई दिवस ,

आपके जन्मदिन पर अपनी लिखी एक रचना ( भाई -बहन का काल्पनिक संवाद )आपको उपहार में दे रही हूँ, जो १९ अप्रैल २०११ को लिखी गयी थी।
http://zealzen.blogspot.com/2011/04/blog-post_19.html

इस रचना में एक भाई अपनी बहन को उदास को देखकर कुछ इस प्रकार से संवाद करता है....


इस चंचल नयनों में नीर भरे, वो कौन है निष्ठुर पापी शय
अवनत पलकों में छलक रहे ,क्यूँ काँप रहे हैं आँसूं द्वय
क्यूँ गला तुम्हारा रूंध रहा , स्वर कम्पन में है किसका भय
हर दुःख को तेरे हर लूँगा , हर क्षण पर तेरी होगी जय

बहन मेरी उदास न हो , यश सदा तुम्हारा अमर रहे
हर मुश्किल में तुम बढ़ी चलो ,चाहे कितनी भी समर रहे
मैं जान लड़ा दूंगा अपनी , यूँ अटल तुम्हारी आस रहे
हर बहना का अपने भैया में ,अटल बना विश्वास रहे।

जिस भवन में हम तुम पले बढे , हैं वहां बहुत से फूल खिले
उस उपवन के रंगीं फूल को , उर में रखकर हैं द्वार सिले।
है सदा तुम्हारा स्थान अलग, जिसमें न किसी को जगह मिले
अधरों पर तेरे मुस्कान सजे, हर लोक में तुझको मान मिले।

मैं भाई तुम्हारा गर्वीला , तुम बहन हो मेरी लाखों में
उर में रहो औ मन में रहो , तुम सदा रहोगी आँखों में
भैया भैया कहकर ही यूँ ,तुम मुझे सदा सताती रहना।
बहना मेरी मैं पुलकित हूँ , तुम यूँ ही जाती आती रहना।

--------------

इस कविता को लिखते समय एक आदर्श भाई की कल्पना थी मन में। आप निसंदेह एक आदर्श भाई हो इसलिए अपनी यह रचना आपको समर्पित करती हूँ। आपके जन्मदिन पर यही मेरी तरफ से आपको उपहार है।

हमारे देश में स्त्रियों की दुर्दशा इसलिए भी है क्यूंकि आप जैसे भाइयों की बहुत कमी है। ईश्वर से प्रार्थना करुँगी भारतवर्ष की हर बहन को दिवस जैसा भाई मिले, जिसके संरक्षण में राखी के धागे भी मुस्कुराने लगें।

आपके जन्म-दिन पर आपको ढेरों आशीर्वाद और शुभकामनायें।

आप जियो हज़ारों साल,
साल के दिन हों पचास हज़ार।

दीदी।

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ZEAL said...

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इस आलेख को मेरा अंतिम आलेख समझा जाए । आप सभी के साथ मेरा सफ़र बस यहीं तक का था।

एक निवदन है। हिंदी भाषा का पूरा-पूरा सम्मान करें । इसे समृद्ध करें। और स्त्रियों का भी सम्मान करें । पुरुषों का पुरुषार्थ स्त्री की रक्षा में है , उसे अपमानित करने में नहीं। जिस घर में स्त्री का सम्मान नहीं होता वहां से देवता भी रूठ जाते हैं।

ब्लॉगजगत के सभी नवोदित एवं स्थापित ब्लॉगर के आलेखों पर सदैव कुछ सार्थक ही पाया है , बहुत कुछ सीखा भी है। इसलिए निवेदन है कि कलम के सिपाही अपने कर्तव्य में लगे रहे। उनकी लेखनी बिना रुके सतत चलती रहे।

शुभकामनाएं।

दिव्या
ZEAL

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JC said...

दिव्या जी, मैंने अपनी टिप्पणी आपके २६ अप्रैल के मूल लेख को और उसकी टिप्पणियाँ पढ़ अंग्रेजी में दे दी है तुगल में समय बचाने से... और, उस की कोई प्रतिलिपि मेरे पास नहीं है... यदि पसंद न हो तो 'मेरा सामान' मुझे लौटा देना, जिस से में उसे कहीं और काम में ले सकूं - अपनी दायीं जेब से कुछ वस्तु निकाल अपने बांयी जेब में रखने जैसे :)
...
वैसे भी आपने तो अब 'ताला' लगा के किसी को भी अपने ही पोस्ट की गयी टिप्पणी को कॉपी करना भी कठिन / असंभव कर दिया है... और जो लिंक देते हैं उनको भी पूरा टीपना पड़ता है :)

और आपकी सूचना हेतु जो लिंक आपने श्री अमरेन्द्र त्रिपाठी जी की दी थी श्री गूगल ने कहा ऐसा ब्लॉग उन्हें मिला ही नहीं...
हो सकता है इस का कारण गलत टीपना हो!

मेरी बेटी भी - जब वो वयस्क और एक माँ स्वयं नहीं हुई थी - मुझसे नाराज़ होती थी कि में सीधा बिंदु पर क्यूँ नहीं आता, मैं क्यूँ सभी विषय को पहले 'मूल' से जोड़ने का प्रयास करता हूँ - उसके शब्द में 'भगवान्' से!...

किन्तु अब वो समझदार हो गयी है और अब उस की बेटी उस से कई ऐसी वस्तुवें मांग करती है जो (आर्थिक रूप से) माता-पिता की पहुँच में नहीं होती है, तो मुझे वो याद करती है :)

शायद यही काल-चक्र की विशेषता है - बीज बो तुरंत फल चाहे कोई तो उस की यह मूर्खता ही कहंगे बुद्धजीवी सभी...
कृष्ण जी भी कह गए 'फल' देना उनके हाथ में है, (वो अपने हिसाब से देंगे सुपात्र को ही), जबकि कर्म करना अर्थात 'बीज बोना' पानी आदि देना आपके, हम सबके, हाथ में है...

शिर्डी के साईं बाबा भी आवश्यकता दर्शा गए 'श्रद्धा' और 'सब्र' की...
और पुट्टपर्ती वाले, 'प्रेमा' अथवा प्रेम की (उनको केवल एक बार दिल्ली के तालकटोर बाग़ में कई दशक पूर्व सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था, जब उन्होंने बिल्ली और तोते के माध्यम से भगवान् के मानव को वैसे ही प्रेम करना बताया जैसे हम बिल्ली को पीटेंगे यदि वो हमारे पंछी को खा जाए )

"हरी अनंत / हरी कथा अनंता" कह गए ज्ञानी-ध्यानी... ...

JC said...

श्री अमरेन्द्र त्रिपाठी जी का लेख, २७ अप्रैल का पोस्ट, पढ़ लिया और अन्य टिप्पणियाँ भी...

दिव्या जी, सारांश में यही कह सकते हैं कि "सीख उसी को दीजिये / जा को सीख सुहाए... "

न्यू टेस्टामेंट में अध्याय ७-(६) में सेंट मैथ्यू ने भी कहा, "Give not that which is holy unto the dogs, neither cast your pearls before swine, lest they trample them under their feet, and turn again and rend you"...

वैसे मैंने पहले भी, अन्यत्र कहीं, उदाहरण दिया था (विषैले ग्रह शुक्र के प्रतिरूप दुर्योधन का, और चन्द्रमा के प्रतिरूप सती द्रौपदी का द्वापर युग में उसे, काल दोष / जिव्हा दोष जनित अज्ञानता के कारण, "अंधे का बेटा' कह अपना ही, भरी सभा में (आकाश में सब तारा-मंडल की उपस्थिति में) चीर-हरण कराने का दोषी होना...

किन्तु हम भारतीयों के ज्ञानी-ध्यानी पूर्वज इस का कारण कृष्ण-लीला को बता गए,,,
अर्थात काल-चक्र का सतयुग से घोर कलियुग तक, ब्रह्मा के अरबों वर्ष के एक दिन में, हजार+ बार उल्टा चलना,,,
जिस कारण हम आज मानव कार्य-क्षमता को समय के साथ साथ निम्नतम अवस्था में पहुंची देख रहे हैं,,,
('प्रधान मंत्री', सूर्य समान, जब भ्रष्टाचार में सभी 'नेता', सौर-मंडल के अन्य सदस्य, ही डूबे प्रतीत हो रहे हैं) लाचार, हाथ पर हाथ धरे किसी 'दिल्ली बैली' समान अश्लील फिल्म को किसी अन्धकारमय हॉल में बैठे देखने समान...

किन्तु फिर भी उसका आनंद अधिकतर 'आम आदमी' उठा रहा है - यही चमत्कार है लीला का जिसका स्तर गिरता ही जा रहा है - सभी आभासी पर्यावरण में भी...

डॉ. जेन्नी शबनम said...

Zeal,
pura aalekh padhi aur kuchh tippaniyaan bhi. dukh sirf is baat ka nahin ki blogers aisa kar rahe, dukh is baat ka hai ki aakhir aisi maansikta kyon? aapke aalekh se logon mein jaagrukta aayegi. shubhkaamnaayen.

Maheshwari kaneri said...

दिव्या जी.. आप का पूरा आलेख बहुत ध्यान से पढ़ा और साथ ही सारी टिपणियाँ भी..समझ नही आरहा है कि पढ़े लिखे लोगो की येसी मानसिकता...? इस समाज में हर तरह के लोग हैं..लेकिन जो भी हो मैं आप के लेखन को नमन करती हूँ.. पहले भी आप की कई लेख पढ़ी है .जिस साहस स्पष्ट्ता और निरभिकता से लिखती हो उसमें आप के ह्र्दय की सरलता और सत्यता का दर्शन होता है....येसे ही लिखती रहो कभी तो लोगो की मानसिकता में सुधार आएगा...

प्रतुल वशिष्ठ said...

नया नया मुल्ला जोर से नमाज़ पढ़ता है...
नया नया विचारक(?) हिन्दी अपशब्दों का खुलकर प्रयोग करता है.
अश्लील और अभद्र शब्दावली के प्रयोग में वह अपनी विद्वता की झलक पाता है. अपशब्दों के युग्म बनाने में उसे जो आनंद मिलता है वह उसे साहित्य-साधना समझकर इतराता घूमता है.
श्रेष्ठ गुरुजनों के निर्देशन में ही उसे कहने योग्य बातें और त्यागने योग्य बातों में अंतर समझ आ सकता है. धीरे-धीरे उसमें पक्वता आ जाती है और वह संतुलित वक्ता हो जाता है. किन्तु अहंकार ग्रसित गटर निःसृत शब्दावली का प्रयोग करते हैं और अपने जैसे ही गुरुजनों की तलाश भी करते हैं. उन्हें किसी की शुक्ल पाक शब्दावली नहीं भाती.

प्रतुल वशिष्ठ said...

आपका अंतिम आलेख :
आपकी कमी सदा ब्लॉगजगत को अखरेगी... मुझे भी.

सञ्जय झा said...

@anuj....divas....bhai ye post 'pratikriyatmak' hai.....jo 'kriyatmak' post doosre kshor pe para
hai mere sandarbh usme nihit hai................

"is blog ke ekdum suruti daur se pathak rahe hain"

jab aap akrosh se yahan bhare baithe the hum oos kshor pe apna rosh virodh kshama sahit kar aaye the......

tu-tu...mai-mai se kuch hasil nahi hota........

aur ek khas baat 'bahan' ke liye 'bhai' ka ye
'bharakna' sallutable......sachhi mee..bye god"

pranam.

डॉ. दलसिंगार यादव said...

स्त्री पुरुष को एक दूसरे से ऊँचा या श्रेष्ठ साबित करने के चक्कर में सभी लोग गाली गलौज पर उतर आते हैं। वर्चस्व कैसा? समाज का अस्तित्व तो दोनों से है। समरसता की भावना नहीं होगी तो वैमनस्य ही जन्म लेगा।

कुश्वंश said...

दिव्या जी . आलेख अंतिम क्यों , एक निभीक और निष्कपट लेखन से मरहूम कर हिंदी ब्लॉग जगत को नुक्सान न पहुचाये और इस निर्णय को बदले , और लिखती रहे , हमें मालूम है आप इस पर विचार जरूर करेंगी नहीं तो उन अविवेकी पुरुषों का मंतव्य पूरा हो जाएग जो वास्तव में आपको नुक्सान पहुचना चाहते थे अनर्गल प्रलाप करके. एक बार जरूर सोचे और किसी भावावेश में कोई निर्णय न ले , लिखे और निर्भीक और सार्थक लेखन से हिंदी की सेवा करे. शुभकामनाएं आप के सर्वोत्तम स्वस्थ के लिए .

Suresh Chiplunkar said...

अच्छा…??? गुटबाजी, गालीगलौज इत्यादि हिन्दी ब्लॉगिंग में अभी भी चल रहा है? असल में बहुत दिन हुए इधर को आए, सो पता नहीं चला…
बहरहाल, आपकी बातों से सहमति है… हिन्दी का स्तर भले ही काव्यात्मक न रखें लेकिन कम से कम गालियों और अशुद्धियों से बचें…

mahendra verma said...

आप से आग्रह है कि आप अपना निर्णय बदलें।
आप लिखती रहें , निरंतर।
आपके विचारों से समाज का हित ही होता है।

प्रतुल वशिष्ठ said...

दिव्या जी,आपका लेखन प्रवाहमयी सुरसरी गंगा की की भाँति रहे... मेरी भी कामना है...
भैया दिवस का जन्म-दिवस शुभ तभी तो होगा जब बहिन दिव्या (प्रकाश) सतत कायम रहे. बड़े लोगों का आशीर्वचन भी मिल गया है..
दुष्ट लोग अपनी दुष्टता भी त्याग देंगे... आप अपने ब्लॉग-लेखन की मिठास से मुख मीठा करते रहें.. सभी के मन की इच्छा है.

कौशलेन्द्र said...

ब्लॉग पर व्यक्तिगत द्वेष के कारण किया गया लेख साहित्य की श्रेणी में नहीं आता. साहित्य लेखन की श्रेणियाँ हो सकती हैं.....उनका वर्गीकरण हो सकता है. जो श्रेष्ठ साहित्य होगा स्वयं ही निखर कर सामने आ जाएगा. निकृष्ट साहित्य बैसाखियों के सहारे चल भले ही ले पर दौड़ नहीं सकेगा.
अब बात आती है ब्लोग्स पर गन्दगी और बदबू फैलाने की. यह निंदनीय तो है ही दंडनीय भी होना चाहिए. मैं पहले भी कह चुका हूँ कि ब्लोगिंग का एक संविधान होना चाहिए और उसका पालन हर ब्लोगर के लिए अपरिहार्य. दोषी लोगों का दंड के रूप में फिलहाल ब्लॉग बिरादरी से बहिष्कार किया जाना चाहिए. यह अपेक्षा की जाती है कि ब्लोगिंग में जो भी अपनी सहभागिता कर रहे हैं सभी शिक्षित हैं और वे समाज को एक उत्कृष्ट दिशा देने की क्षमता से युक्त हैं. किन्तु अपेक्षाएं सदा पूरी नहीं हो पातीं. पिछले कुछ समय से देख रहा हूँ कि ब्लोगिंग को कटुतापूर्ण दुर्भावनाओं और व्यक्तिगत शत्रुता का अखाड़ा बना दिया गया है. स्पष्तः, अमरेन्द्र त्रिपाठी और अरविंद मिश्र के द्वारा सांकेतिक लक्ष्य कर व्यक्ति विशेष के प्रति अपनी भाषा में प्रयुक्त किये गए अमर्यादित शब्द उनकी कुत्सित मानसिकता के द्योतक हैं. इनके कृत्य व् आचरण न केवल निंदनीय हैं अपितु सभ्य समाज के लिए वर्ज्य भी हैं. ब्लॉग जगत में किसी भी स्त्री के प्रति ऐसी भाषा का प्रयोग या दुराग्रह दंडनीय होना ही चाहिए. दुःख तो इस बात का है कि इन दोनों ने ब्राह्मण होकर भी अपनी मर्यादाओं का पालन नहीं किया. क्या ब्राह्मणों को ऐसा ही आदर्श समाज में प्रस्तुत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. यदि ये दोनों विप्रगण स्त्री का सम्मान नहीं कर सकते तो उन्हें स्वयं को ब्राह्मण कहलाने का कोई अधिकार नहीं है. जिस देश और समाज में नारी का सम्मान नहीं किया जाता उसे पतित होने से कोई नहीं बचा सकता. जिस देश में ब्राह्मणों ने नारी को शक्ति रूप में प्रतिष्ठित कर उसकी पूजा करने की परम्परा डाली हो उसी देश में विप्रों द्वारा अभद्र व् अमर्यादित शब्दों का प्रयोग हमारे समाज के अधोपतन का स्पष्ट प्रमाण है और गंभीर चिंता का विषय है. इन दोनों विप्रों के प्रति कोई व्यक्तिगत दुर्भाव न होते हुए भी नारी शक्ति के सामाजिक अपराध के कारण मैं ऐसे सभी लोगों के बहिष्कार की स्पष्ट घोषणा करता हूँ.
विचार वैषम्यता मनुष्य समाज का स्वाभाविक गुण है पर अपने विचारों की पुष्टि में सशक्त तर्कों के साथ ही लिखना सभ्य समाज का विशिष्ट गुण है. यदि हम वैचारिक परिवर्तन चाहते हैं तो गालियों का सहारा छोड़ना पडेगा. गालियाँ दुर्बल की खीझ और गुस्ताखी की परिचायक हैं. गंभीर शब्द जितनी सम्प्रेषण शक्ति रखते हैं उतनी शक्ति अभद्र शब्दों में नहीं होती. पढ़े लिखे लोगों से यह समझने की अपेक्षा की जाती है.
आज मुझे बहुत मानसिक संत्रास हो रहा है ....हम उस देश के वासी हैं जहाँ कन्याभोज आमंत्रित कर स्त्री शक्ति के सम्मान की स्पष्ट घोषणा की जाती है. हम चरण स्पर्श करते हैं कन्यायों के और यहाँ दिव्या के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है ? हो सकता है कि मेरी बातों से पुरुष के अहम् को चोट पहुंचे ...पर इसी कारण अपनी श्रेष्ठ परम्पराओं का परित्याग तो नहीं किया जा सकता न !
मैं दिव्या से भी नाराज हूँ कि क्या इन्हीं तुच्छ घटनाओं के कारण उन्होंने अंतिम पोस्ट की घोषणा कर दी है ? ...अस्पृश्य जैसे त्याज्य कुविचारों से आहत होकर क्या सुपथ का परित्याग कर देना उचित है ? मैं पूरे सम्मान के साथ किन्तु उम्र में बहुत बड़ा होने कारण दिव्या को आदेशित करता हूँ कि वे अपने निर्णय को सकारात्मक निर्णय में बदलने की कृपा करें और अपना लेखन यथावत जारी रखें.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मैं तो यही कहूंगा कि आप लेखन को न त्यागें और यहां तो कदापि नहीं. मेरी यही प्रार्थना है.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय दिव्या दीदी,
मेरे जन्मदिवस पर मुझे सबसे प्यारा उपहार आपके द्वारा मिला है| इसे मैं सदैव संभाल कर रखूंगा|
ये मुझे हमेशा याद रहेगा|
इस प्यारे से तोहफे के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|
इसे पाकर मैं बहुत खुश हूँ और यही प्रयास रहेगा कि आपकी इन उम्मीदों पर खरा उतर सकूं|

किन्तु अगली ही टिपण्णी में आपने मुझे एक सदमा दे दिया|
दिव्या दीदी, मैं आपकी मनोस्थिति समझ सकता हूँ| किन्तु मैं नही चाहता कि आप यहाँ से जाएं| आपको यहाँ रोकने का प्रयास कर रहा हूँ|
अत: आपसे विनती है कि आप अपना यह निर्णय वापस लें| मुझे आपकी ज़रूरत है| केवल मुझे ही नही हम सबको आपकी ज़रूरत है| आपके लेख समाज में बेहतर बदलाव के लिए होते हैं| आपके विचारों से लाभान्वित होने का अवसर आप हमसे क्यों छीन रही हैं?
दिव्या दीदी, फ़रियाद कर रहा हूँ आपसे|
साथ ही सभी पाठकों से भी विनती है कि वे दिव्या दीदी को जाने से रोकें| वे चली गयीं तो हिंदी ब्लॉग जगत की Zeal चली जाएगी|

JC said...

@ कौशलेन्द्र जी, "वसुधैव कुटुम्बकम" , मात्र दो शब्दों में हमें वसुधा (अर्थात जिसने हमें, सभी जीव-निर्जीव को श्रंखला बढ रूप से अनंत काल से धरा हुआ है), अर्थात 'धरती के परिवार' का अनंत में से एक सदस्य दर्शाया जाता आया है हमारे हमसे ज्ञानी-ध्यानी पूर्वजों, योगी, सिद्ध पुरुष, आदि द्वारा...

'ब्रह्मिन' अथवा 'ब्राह्मण' योग समझा जा सकता है ब्रह्म + मन का, अर्थात जिसके मन में ब्रह्म का निवास है...
इसे अन्य शब्दों में कहा गया कि ब्राह्मण वो है जो 'सत्य' को जानता है...
किन्तु सागर मंथन / मानस मंथन की कथा आरम्भ में दर्शाती है 'विष' का उत्पन्न होना...
जो देखा जा सकता है आज, कलियुग के अंत में, अर्थात मंथन के आरम्भ में, जैसा कि सभी 'पढ़े-लिखे' जानते हैं कैसे राम जी की गंगा तक मैली हो गयी है, और सम्पूर्ण पर्यावरण ही विशाक्त प्रतीत होता है...
अर्थात काल-चक्र युग के अंत के निकट पहुँच गया है! और अब या तो ब्रह्मा कि रात आएगी, अन्यथा शिव-सती से सम्बंधित 'सत युग' आएगा, जिसकी प्रतीक्षा हर व्यक्ति करता आया है, किन्तु अज्ञानतावश इस के लक्षणों से सभी बुद्धिजीवी आज अनभिज्ञं है भले ही वो ब्राह्मण कुल का हो या किसी और कुल का...
सरल शब्दों में संभवतः 'हम' कह सकते हैं कि वास्तव में निराकार त्रेय्म्बकेश्वर को छोड़ आरम्भ में सभी साकार 'क्षुद्र' थे, अर्थात वर्तमान में सभी क्षुद्र हैं, छोटे हैं, जिसका द्योतक भीड़ का होना और संसार का छोटा प्रतीत होना है, जिसके कारण धक्का-मुक्की का होना प्रतीत हो रहा है, भले ही वो ब्लॉग-जगत ही क्यूँ न हो...
काका हाथरसी को सुनाने का सुअवसर कोलेज दिनों में प्राप्त हुआ था... उन्होंने भी बढती भीड़ को देख अनुमान लगाया था कि कैसे आदमी को एक के ऊपर सोना पड़ेगा, जिसे हम गगन-चुम्बी अट्टालिकाओं के रूप में आज शहरों में देख सकते हैं :)

@ दिव्या जी, इस कारण कृष्ण (काला, बांसुरी वाला) आज अर्जुन को कहते हुए सुना जा सकता है कि सब धर्मों को छोड़ मेरी शरण में आओ :) :

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

बस क्या....??
कुछ वर्णसंकरों के ची पों ची पों करने से आपने बाँसुरी बजाना बंद कर दिया तो बात परेशानी की है। मिश्रित वर्णसंकर गधे अपनी खुशी के लिये रेंकते हैं और हम बाँसुरी अपनी खुशी के लिये बजाते हैं तो उनकी खुशी के लिये त्याग करना सही नहीं लगता लेकिन यदि आप उनका रेंकना ही सुनना सुनाना चाहती हैं तो ये आपका निर्णय है। निर्णय पर डटे रहने की शक्ति बनी रहे।
हृदय से प्रेम सहित
भइया

कौशलेन्द्र said...

आदरणीय जे .सी. जी ! ॐ नमोनारायण ! ! ! कलियुग में अधोपतन हमारी विकास प्रक्रिया का ही एक भाग है. कालचक्र के इस खंड में भी कुछ लोग पतन को रोकने में सफल हो सकेंगे ...ऐसा मेरा विश्वास है. ब्राह्मण ने सदा ही समाज को दिशा देने का कार्य किया है...आज वह अपने उत्तरदायित्वों को न केवल विस्मृत कर चुका है अपितु असमर्थ भी होता जा रहा है- यही दुर्भाग्य है. ब्राह्मण कुलोत्पन्न होने पर भी यदि कोई अपने ब्राह्मण धर्म का पालन कर पाने में असमर्थ है तो यह दुर्भाग्य है. ऐसे ही कारणों से विद्रोह स्वरूप मैंने अपने नाम से कुल नाम हटा दिया है.
कोई आवश्यक नहीं कि हम हर बात में दिव्या के विचारों का समर्थन करें. भेद हो सकता है ...पर इन्हीं कारणों से अमर्यादित भाषा का प्रयोग तो उचित नहीं कहा जा सकता है न ! यदि दिव्याके लेखन से किसी को आपत्ति है तो वह उनकी पोस्ट पर न आये ...बात यहीं ख़त्म हो जाती है. मैं आशा करता हूँ कि स्त्री का अपमान करने वालों का सभी ब्लोगर्स की और से सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा. हमें दृढ़तापूर्वक ऐसे कृत्यों का विरोध करना ही होगा.

दिवस जी ! मैं आपकी भावना समझ सकता हूँ, पर हर स्थिति में संतुलन बनाए रखने से ही लड़ाई जीती जा सकती है....यह भी ध्यान रखना आवश्यक है. अवांछित तत्वों से निपटने के लिए एक योजना बनानी होगी. हमें हर हाल में अपनी गौरवमयी परम्पराओं को बचाना ही होगा.

दिगम्बर नासवा said...

सार्वजनिक लिखते हुवे भाषा पर संयत होना बहुत ही जरूरी है ... ऐसे शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए ...

बी एस पाबला BS Pabla said...

पोस्ट, टिप्पणियों के घालमेल से निचुड़ी बात यह है कि
जिसे निडरता से गंदगी के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाला कहा जा रहा
उनके द्वारा जब अपने कृत्य पर हंगामा होने के बाद माफ़ी मांगी गई तो उस महिला ब्लॉगर ने जमकर लताड़ा था कि "...माफी की बात गैरजरूरी है"

आपने अभी देखा ही क्या है हिंदी ब्लॉगिंग में :-)

जो एक साल पहले किसी का लिखा पढ़वाने पर आमादा हैं उन्हें सलाह है कि वे 5-6 वर्ष पहले का लिखा भी पढ़ें

जरा ईमेल पर सम्पर्क कीजिए। सारी संबंधित बातें सामने आने पर इस पोस्ट पर आए आपके विचार न बदले तो कहिएगा।

निडर!?
हुँह्ह

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

माननीय पाबला जी,

बंधुवर, आप किन लोगों के विचार बदलने की बात कर रहे है? क्या आपको लगता है की यहाँ टिप्पणी करने वालों में ज़रा भी चारित्रिक दृढ़ता नहीं है, जो आपसे मेल और फोन पर संपर्क करके अपने विचार बदल देंगे?
महोदय जी, यहाँ केवल विद्वान् पाठकों ने ही उपस्थिति दर्ज की है, जिन्हें मेल पर संपर्क करके आपकी चटोरी कहानियों में रूचि नहीं है। जिसे आप एक साल पुरानी बात कह रहे हैं, वह अरविन्द मिश्र की नयी नवेली पोस्ट (टरकाऊ-ब्लौगिंग, ९ सितम्बर २०११) पर दोहराई गयी हैं जो उन्होंने एक वर्ष पहले भी कही थीं। एक साल का समय बहुत होता है , लेकिन वह १२ महीनों में ज़रा भी नहीं बदले।

और आप किस महिला की बात कर रहे हैं, नाम लिखकर कहिये, ऐसा क्या गुप्त एजेंडा है? यदि दिव्या जी की बात कर रहे हैं तो साफ़ साफ़ लिखिए और यह भी बताइए की उनसे आपकी क्या दुश्मनी है । क्या दिव्या जी ने आपको किसी प्रकार कष्ट पहुँचाया है?

और यदि ५-६ साल पुरानी किसी अन्य महिला ब्लॉगर की बात कर रहे हैं , तो उसके अनावश्यक विवाद का कोई औचित्य नहीं है ।

आप यहाँ आये भद्र लोगों का विचार बदलना क्यूँ चाहते हैं, कृपया अपना मंतव्य स्पष्ट करें।

यदि साफ़-साफ़ लिखने के बजाये लोगों को मेल द्वारा क्यूँ आमंत्रित करना चाहते हैं, कृपया अपने उद्देश्यों को जाहिर करें यहाँ।

दिव्या दीदी से बहुत बार आपकी प्रशंसा सुनी है, आश्चर्य है आपको दिव्या दीदी से क्या व्यक्तिगत दुश्मनी हो सकती है भला?

आपको कभी दिव्या दीदी के ब्लॉग पर आते नहीं देखा, आज अचानक आने के पीछे राज क्या है ? कृपया स्पष्ट करें?

मेल अथवा फोन द्वारा लोगों को अपने खेमे में शामिल करने की साजिश क्यूँ ? क्या ये आपकी निडरता का सबूत है?

एक बात को पक्का जान लीजिये , कमज़ोर चरित्र वाले लोग इस post पर आये ही नहीं अतः यहाँ आये लोगों में दुष्प्रचार करने का जघन्य अपराध मत कीजिये।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी,
आप देख सकती हैं कि आपके ब्लॉग जगत से चले जाने के निर्णय से कुछ खेमों में कितना जश्न का माहौल है| उनके भी दर्शन हो रहे हैं जो कभी दिखे ही नही|
आपके चले जाने से आपके विरोधी तत्वों का ही मनोबल बढेगा| अत: आपसे पुन: प्रार्थना है कि आप अपना निर्णय बदलें और यहाँ लौट आएं|

दिव्या दीदी, आशा है, निराशा नहीं मिलेगी|

Rakesh Kumar said...

दिव्या जी,
लिखना न छोड़ियेगा,प्लीज.
भावनाओं के ज्वार में ऐसा करना बिलकुल
भी उचित नहीं.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय कौशलेन्द्र जी,
आपसे सहमती रखता हूँ, साथ ही चाहता हूँ कि हिंदी भाषा व स्त्रियों का अपमान करने वालों का बहिष्कार हो|
किन्तु प्रश्न यह है कि बहिष्कार करेगा कौन?
ब्लोगिंग के कथित ठेकेदार तो ऐसे लोगों की चाटुकारिता में ही लगे हैं| आप देख सकते हैं कि यहाँ वहां कितने ही ब्लोगर सम्मलेन हो रहे हैं जो इसी खेमे के लोग करवाते हैं, यही वे लोग हैं जो स्वयं को हिंदी ब्लोगिंग का करता-धर्ता समझे बैठे हैं और यहाँ इन्ही के पाले के अरविन्द मिश्र जैसे लोग ही सम्मानित हो रहे हैं|
अरविन्द मिश्र के ब्लॉग पर उसकी ताज़ा तरीन पोस्ट देख लीजिये|
इन लोगों का तुर्रा तो देखिये ज़रा|
यह तो वही बात हुई कि अपने शहर में मैं कोई सम्मलेन करवाता हूँ तो वहां आपको सर्वश्रेष्ठ ब्लोगर का सम्मान अवश्य दिलवाऊंगा|
आप तो यह सब बेहतर समझते हैं|

जहाँ तक सवाल है बहिष्कार का तो यह काम चाटुकारों से तो संभव नही है| और जो सज्जन दिखाई देते हैं, वे सब इन परिस्थितियों में मौन धारण कर लेते हैं| बाकी समय वे भी दुष्टों के पाले में कई बार दिखाई देते हैं| यहाँ इस पोस्ट पर भी जब सभी केवल सहानूभूति प्रकट कर रहे थे, या एडजस्ट करने की सलाह दे रहे थे तो गुस्सा आना भी स्वाभाविक था| किसी की कलम ऐसे लोगों को जवाब देने के लिए नही चलती|
ऐसा कब तक चलेगा? अपनी ही माँ-बहन का अपमान होता देख क्रोध न आए तो क्या हो?

आदरणीय कौशलेन्द्र जी. आपके लिए मन में बहुत सम्मान है| मैं जानता हूँ कि आपने जो भी तरीका निकाला होगा, वह सर्वथा उचित ही होगा| कृपया बताएं कि हमे क्या करना चाहिए|
कृपया मार्गदर्शन करें|

Kunwar Kusumesh said...

आपकी नाराज़गी वाजिब है.टिप्पणियों और बातचीत में शिष्टता और शालीनता तो होना ही चाहिए.

AK said...

लेखन एक धर्म है और धर्म किसी भी दबाव में छोडी नहीं जाती
तेग बहादुर ने शीश कटाया ईसा ने सूली पे लटक धर्म बढाई

साम दाम दंड भेद राजनयिकों के तरीके थे,नीच कुटीलों ने
ताना गाली छिछोरी भद्दी यानि स्वयं सा नीच रीत सदैव अपनाई

विधर्मियों की कुकृत्यों से आप आपा न खोएं उत्साही वत्सल लेखिका
अर्जुन सा मर्माहत हो ,पर अनुरोध है दिव्या दिव्य गांडीव ले उठाई

कलियुग का कलिक काल है सर्वत्र काला ही काला ,क्यों हो विचलित
अँधेरा कितना भी घना हो रौशनी की एक लौ से है भाग जाई

आप तो फिर भी दिव्या हैं यथा नाम तथा गुण तो एक अनुरोध है
दिव्य रौशनी की इस एक पुंज से कालिमा को ले भगाई कि ते भगाई

डॉ टी एस दराल said...

दिव्या जी , आपका क्षुब्ध होना अपनी जगह ज़ायज़ है ।
तटस्थ रहने वालों से बड़ा गुनाहगार कोई नहीं है ---मांफी चाहता हूँ , इससे सहमत नहीं ।

जहाँ तक ब्लोगिंग का सवाल है --लोग किसी के कहने से ब्लोगिंग शुरू तो करते हैं , लेकिन जारी रखना या छोड़ना एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है । कोई किसी को मज़बूर नहीं कर सकता छोड़ने के लिए । इसी तरह टिप्पणी भी स्वैच्छिक है । अक्सर लोग लेखक को देख कर टिप्पणी करते हैं । लेकिन हम तो टिप्पणी तभी करते हैं जब लेख पसंद आए या समझ आए । किसी मज़बूरी में कभी नहीं करते ।

आपकी पिछली पोस्ट पर बहुत ढूँढने के बाद एक टिप्पणी के एक शब्द को पढ़कर शक हुआ था कि शायद यही वो टिप्पणी है जिससे आप खफ़ा हैं । लेकिन जो किसी को भी पता नहीं चला , उस पर इतना बिगड़ना हमें तो ज़रुरत से ज्यादा ही लगा ।

टिप्पणियों में थोड़ी बहुत छीटा कसी तो चलती है ।
लेकिन किसी भी तरह के व्यक्तिगत आक्षेप के हम भी विरुद्ध हैं ।
फिर भी यही कहूँगा कि ब्लोगिंग करना या न करना आपका अपना फैसला है ।
कृपया अन्यथा न लें ।
शुभकामनायें ।

अभिषेक मिश्र said...

आपने इसे अपना अंतिम आलेख बताते हुए चौंका दिया है. ब्लॉग जगत विस्तृत हो रहा है, तो समाज के हर तरह के रंग दिखेंगे ही यहाँ भी. मगर ऐसे निर्णय उचित नहीं.

कुश्वंश said...

हिंदी ब्लॉग जगत को सम्रध बनाने का काम होना चाहिए , गुटबाजी का इसमें कोई स्थान नहीं होना चाहिए, गलत को गलत और सही को सही कहे अगर कहना जरूरी हो मगर मर्यादा की सीमा में रहकर. हिंदी खूबसूरत भाषा है इसमें अभद्र शब्दों का कोई स्थान नहीं है . दिव्या जी ने जबसे ब्लॉग लिखना शुरू किया था में भी लगभग तभी से ब्लॉग जगत में हूँ. और अक्सर देखा है की लोग इस ब्लॉग पर ही .. गैर जरूरी टिप्पणिया देकर इसे अखाड़ा बनाना चाहते है क्यों ? में समझ ही नहीं पता , हो सकता है दिव्या जी का निर्भीक , बेबाक लेखन और टिप्पणिया इसका एक कारण हो , अगर ऐसा है तो ये स्त्री-पुरुष मानसिकता बदलनी होगी पुरुष ब्लोगेर्स को. मगर दिव्या जी इस सबसे बचने का तरीका समाधान ढूँढने में है न की आत्म हत्या करने में . और आप इतनी कमजोर नहीं जो ब्लोगींग से विमुख होकर आत्मघाती समाधान अपनाए और ब्लॉग जगत एक वास्तविक चिकित्सक से दूर हो जाये.में सुझाव दूंगा अगर मानेगी तो , कम से कम अभी ब्लॉग से न जाये , लिखे और ताकत से लिखे . जाना ही हो तो प्रसन्नचित होकर जाये फिर कभी , तब , जब आप का चित्त शांत हो , खुश हो, मन में कोई मलाल न हो, शुभकामनाये

Ankit pandey said...

Sahi kaha hai aapne.

ZEAL said...

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डॉ दराल ,

आपकी ९० प्रतिशत बातों से सहमती है , लेकिन बचा हुआ १० प्रतिशत जो अनुचित लगा उसको स्पष्ट कर दूँ। लिखना न लिखना मेरा स्वयं का निर्णय है , अपने सही कहा, इसका जिम्मेदार कोई नहीं है । लेकिन आपको पता होना चाहिए की दुनिया का प्रत्येक निर्णय परिस्थितिजन्य होता है। समाज के कुछ शरारती तत्व किसी के प्रति द्वेष रखते हैं, अपमानित करते हैं , कुतिया जैसी बेहद घृणित भाषा का प्रयोग करते हैं , तो व्यथित होकर ऐसे निर्णय लेने ही पड़ते हैं। और इन निर्णयों के लिए जिम्मेदार समाज के यही घ्रणित लोग होते हैं।

मुझे तो घोर आश्चर्य होता है की 'अरविन्द मिश्र" जैसे लोग जो पढ़े लिखे हैं वे एक स्त्री को , जो किसी की बेटी है , किसी की बहू है , किसी की माँ है , उसे कुतिया कैसे कह सकते हैं। यदि इनकी पत्नी ,माँ अथवा बेटी को कोई कुतिया कहे तो इनको कैसा लगेगा ? ...शायद कुछ लगेगा ही नहीं , संभवतः इनके घर के संस्कार यही होंगे।

आपने इनकी गन्दी शब्दावली और मानसिकता की निंदा नहीं की , आखिर क्यूँ ? दुखद है आपका तटस्थ रहना । आप उनके मित्र हैं अतः मित्र के खिलाफ बोलने में संकोच कर रहे हैं , इतना समझ सकती हूँ।

अमरेन्द्र ने अरविन्द मिश्रा के ब्लौग पर निम्न टिप्पणी लिखकर डिलीट कर दी ....

" ऐसी कुतियाओं ने ढेरों कुत्ते जैसे भाई पाल रखे हैं "

यह लिखकर उस टिप्पणी को पोस्ट किया फिर डिलीट कर दिया । शरीफ बना रहना चाहता है बेचारा।

भाई-बहन का रिश्ता अमरेन्द्र और अरविन्द्र जैसे लोग क्या जानेंगे, जो किसी गैर की पत्नी , बेटी और माँ को अपमानित करने में ही अपना शौर्य समझते हैं।

जिसने मुझे कभी देखा तक नहीं , वो मुझे चरित्र सर्टिफिकेट बाँट रहा है? ये निन्दित मनुष्य बहिष्कार के ही लायक हैं। कमज़ोर हैं वे लोग जो ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने वाले के साथ जुड़े रहना चाहते हैं। स्वयं को इतना कमज़ोर नहीं बनाना चाहिए की एक टिप्पणीकार खो देने के डर से उनकी अभद्रताओं पर पर्दा डालते रहे।

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ZEAL said...

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जो वरिष्ठ हैं , उन्हें एक आदर्श स्थापित करना चाहिए । अपने से छोटों के प्रति स्नेह के भाव रखने चाहिए । आशीर्वाद और शुभकामनाएं देनी चाहियें , ना कि कुतिया कहकर अपने संकारों का परिचय देना चाहिए। ऐसे लोग तो अपने पुरखों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को भी बट्टा लगा रहे होते हैं।

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बी एस पाबला BS Pabla said...

पिछली टिप्पणी के बाद मुझे संबोधित प्रतिक्रिया पर केवल दीर्घ अट्टहास

ZEAL said...

यहाँ पर आये सभी टिप्पणीकारों ने जिन्होंने अशिष्ट भाषा के खिलाफ आपति दर्ज कि और जिन्होंने मेरी कठिन परिस्थिति में अपनेपन और स्नेह को देकर मुझे ताकत दी है, उनका आभार।

कमज़ोर पड़ गयी थी , और गलत निर्णय ले लिया था। लेकिन सभी ब्लॉगर्स और टिप्पणीकार ने मेरा मनोबल बनाए रखा। आजीवन ऋणी रहूँगी सबकी।

दो चार द्वेष रखने वालों से व्यथित होकर , प्यार करने वालों का स्नेह निमंत्रण कैसे ठुकरा सकती हूँ। अपने गलत निर्णय के लिए खेद है , अपने स्नेही पाठकों से दूर कैसे रह सकती हूँ।

मैं वापस आऊँगी , कभी दूर न जाने के लिए।

मेरा लेखन मेरी साधना है , कभी नहीं त्याग सकती हूँ इसे। पुनः लिखूंगी एक नए उत्साह के साथ । एक नयी ZEAL के साथ।



मेरे इस निर्णय के लिए भी दूसरे ही जिम्मेदार होंगे , और वे हैं , मेरे ब्लॉग परिवार के मित्र, भाई, बहन ,माता और पिता समान ब्लॉगर एवं टिप्पणीकार । आप लोग मेरे मार्ग दर्शक हैं और मेरे सारथि "श्रीकृष्ण" भी।

.

डॉ टी एस दराल said...

दिव्या जी , आपत्तिजनक भाषा का मैं भी विरोध करता हूँ । --आप उनके मित्र हैं अतः मित्र के खिलाफ बोलने में संकोच कर रहे हैं , इतना समझ सकती हूँ। -- आपने सही कहा।

लेकिन इसे कमजोरी न समझें ।
ब्लोगिंग में स्वस्थ वातावरण बना रहे , इस दिशा में प्रयासरत हैं । कांटे को कांटे से निकालना मैं सही नहीं समझता ।
आप मुझे गाँधीवादी भी कह सकती हैं ।

शायद ऐसे में कुछ दिन का विराम देना ही सही रहेगा ।

Rakesh Kumar said...

पुनः लेखन का निर्णय लेने के लिए आभारी है दिव्याजी आपके.
एक तरफ दो चार निम्न सोच के व्यक्ति,दूसरी ओर आपको
सम्मान देने वाले और आप से हृदय से प्यार करने वाले
आपके इतने पाठकगण.आप यूँ हीं अपनी दिव्य वाणी से
पथ प्रदर्शन करती रहिएगा ब्लॉग जगत का.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
पुन: अपने ब्लॉग पर सक्रीय होने के लिए आपका आभारी हूँ| अब कोई चिंता नहीं, कोई दुःख नहीं|
मेरे जन्मदिवस का उपहार अब सम्पूर्ण हो गया है|
बहुत बहुत धन्यवाद...

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय डॉ. दाराल जी,
माहौल खुशनुमा बना रहे, यह हम भी चाहते हैं| हम कोई आतंकी नहीं हैं|
किन्तु यह क्या बात हुई कि कोई गंदी गंदी गालियाँ दे, कोई अश्लील पोस्ट लिखे और आप चाहते हैं कि हम चुप चाप बैठ कर शांती स्थापित करें| क्या इससे आप दुष्टों को उनकी दुष्टता का दंड देने के बजाय, और अधिक दुष्टता करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रहे?
जहां तक चुप रहने का सवाल था, दिव्या दीदी तो पूरा एक वर्ष चुप रही थीं| क्या निष्कर्ष निकला?
क्षमा कीजिये यह कहने के लिए कि आज भी "कुत्ता" अपनी गली में भौंक रहा है|

मैं गांधीवादी नही हूँ| डॉ साहब गांधी जी से कोई शिकायत नहीं, किन्तु गांधीवाद ने इस देश का पौरुष नष्ट कर दिया है| किन्तु कम से कम एक भाई तो अपना पौरुष नहीं खो सकता कि कोई उसकी बहन को इतना कुछ कह जाए और वह गांधीवाद का राग अलाप कर शान्ति का पुजारी बना रहे|

अत: डॉ साहब, आपसे कोई मतभेद नहीं है, किन्तु आपसे असहमती अवश्य है|

बी एस पाबला BS Pabla said...

विचार बदलने के लिए शुक्रिया

AK said...

अब कलियुग की शुरुयात ही भारत युद्ध से हुई जिसे हम महाभारत के नाम से जानते हैं और ज्यों सागर मंथन से विष के बाद अमृत उत्पन्न हुआ , त्यों ही गीता रुपी अमृत हमे मिला . तो ज़ाहीर है कि ऐसे दानवी और आसुरी तत्व कलियुग में बढ़ चढ़ बोलेंगे ही . क्या था महाभारत में ऐसा कि असत की प्रधानता लिए कलियुग का प्रादुर्भाव हुआ ?

सत्यनिष्ठ लोगों का मोह , स्नेह , वचन , राजसत्ता कि वफादारी आदि ; सत्य की निष्ठा से बढ हो - सत्य से निष्ठा तोडना .
चाहे वे भीष्म हो - जिन्होंने ने राजकुल की रक्षा की शपथ ली थी , या द्रोण की राजसत्ता से सत्य से ज्यादा वफादारी हो . या कर्ण की दुर्योधन की दोस्ती का दर्जा सत्य से ऊपर हो . सो असभ्य , गलीज भाषा का इस्तेमाल करने वाले निर्लज्ज , इंसान से इंसानियत में हार खीस - अपने जन्मजात पाशविक प्रवर्ती वाले नरपशु के संगी साथी से आप क्या उम्मीद रखती हैं ? वो भी नरपशु ही हैं - अंतर बस इतना है कि ... किसी की खाल उतर गयी , किसी की थोड़ी खिसकी है...जो यक़ीनन वक़्त आने पर उतर जाएगी ही ...

पर मूल प्रश्न यह है कि - इंसानी बस्ती में अगर जानवर आ जायें तो उसे कैसे भगाते हैं ? अनुरोध कर के ? मनुहार कर के ??
कदापि नहीं . वो बस लात से भागते हैं या डंडे से . या फिर गले में पट्टा लगा के .
और जिन के गले में पट्टा लगा हो उसे क्या कहते हैं - जगजाहीर है .
वैसे भी पालतू कुत्ता अगर काटता है तो सब से पहले इंसान को ही काटता है
और पागल हो जाये तो बस काटता ही काटता है ....
कोई आश्चर्य नहीं कि पिस्तौल बन्दूक और राईफल के ज़माने में डंडे अब भी बिकते हैं .
ऐसी भड़ास कुकुर संस्कृति की बदलौत ना जाने कितने लोगों की रोजी रोटी चल रही है
जरुरत आन पड़ी है इन्हें इंसानी बस्ती से मार भगाने की , ना की खुद भागने की

इसी लिए गीता में कहा गया है कि

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व : जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव : निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११- ३३॥

अर्थात हे अर्जुन ये सारे लोग असत्य के साथ होने की वजह से पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं , तू तो निमित मात्र है
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च : कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा : युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥११- ३४॥
द्रोण , भीष्म इत्यादि भी ऐसे ही पहले से मरे हुए हैं , निश्चिंत हो युद्ध करो , तू इन वैरियों से अवश्य जीतेगा

boletobindas said...

मैं नई पोस्ट देखने आया था पर हैरान था कि आप लेखन छोड़ रही हैं....फैसला बदल लिया ये बहुत अच्छा किया..अविरल, अविराम और अजर लिखते रहिए....जब आपके पास दुश्मनों से ज्यादा दोस्तों की तदादा है तो परेशां मत हुआ कीजिए.....जब ब्लॉग जगत पूरी तरह से सक्रिय होकर अपने विशाल रुप को धारण करेगा तब उसमें जाने कितने ब्लागर का अस्तित्व शून्य की तरह विलिन हो जाएगा...इस झणभंगूर ब्लाग में चंद लोगो के लिखे पढ़े पर ध्यान न दें....किसी के कहने से चंदन न तो अपना सुंगध छोड़ देता है न ही चंदन की संगत में भुंजग फुफंकारना छोड़ता है..फिर ये ळिखना छोड़ना फिर पकढ़ने जैसे मन के विचलन पर रोक लगाइए....

Atul Shrivastava said...

दिव्‍या जी आपका आभार कि आपने अपना निर्णय बदल दिया।
आपके ब्‍लाग में आकर हमेशा कुछ नया सीखने मिलता है और नए ब्‍लागरों के ब्‍लाग पर जाकर जो प्रोत्‍साहन आप देती हैं वो भी काबिलेतारीफ है.....
शुक्रिया.... शुक्रिया......

JC said...

@ AK जी, 'हिन्दू' को कम से कम पहले समझना होगा कि असली जीव निराकार परमेश्वर, नादबिन्दू विष्णु, है जिसका विस्तार अनंत है - एक फूलते गुब्बारे समान, जो अनादि काल से एक शून्य, बिंदु, से आरम्भ कर फूले जा रहा है, वर्तमान में एक अन्धकारमय आनंत शून्य ('०') जिसे संख्या '३', यानि ॐ - अंग्रेजी में शून्य ('०') समान दीखते अक्षर 'o' समान भी, जिसके लिए होंठों को भी 'o' समान बना कंठ और सांस की सहायता से 'ओ' का अनंत तक उच्चारण कर सकते हैं... मशीन की सहायता से यदि वायु और मानव में यदि सांस न रुके...

किन्तु सीमित सांस के कारण कुछ देर बाद होंठ बंद करना लाचारी है मानव की, तो वो ध्वनि 'म' अथवा 'm' सुनाई देगी, यानि 'Om', ध्वनि जिसके द्वारा निराकार ब्रह्म को दर्शाया जाता आ रहा है, प्राचीन भारतियों अथवा हिन्दुओं द्वारा...
उनकी विशेषता थी कि वे चन्द्रमा को उच्चतम स्थान देते थे, और सूर्य के चक्र (साईकल) के भीतर ही चन्द्रमा के चक्र को मान्यता दे काल की गणना चन्द्रमा के आधार पर मान करते थे, और जिसको 'हम', (पाकिस्तानी, अर्थात प्राचीन हिन्दुस्तानी भी), आज भी परम्परानुसार करते चले आ रहे हैं...

और जहां तक ज्ञान का प्रश्न है, तो आज वैज्ञानिक भी जानते हैं कि हमारी पृथ्वी ४ अरब से अधिक समय से अंतरिक्ष में चन्द्रमा (जो हिमालय श्रंखला समान पृथ्वी के गर्भ से ही उत्पन्न हुआ) के साथ घूमती चली आ रही है... जबकि मानव तो हाल ही में कुछ लाख वर्ष पहले ही आया... साधारण बैक्टेरिया तो ३ अरब वर्षों से इस स्टेज पर आ चुका था, जो प्राचीन हिन्दू के अनुसार उत्पत्ति कर मानव रूप पाया है (अर्थात शुद्ध शक्ति से आरम्भ कर ८४ लाख रूप धर मानव का इस धरती पर पदार्पण हुवा... इस प्रकार मानव ने स्वार्थ में जानवरों की जमीन हड़प ली है, न कि वे हमारी जमीन में घुसे आ रहे हैं :)

अभिषेक मिश्र said...

Aapke nirnay ka swagat.

प्रवीण पाण्डेय said...

सबसे मर्यादा अपेक्षित है।

ajit gupta said...

दिव्‍याजी, विगत एक सप्‍ताह से प्रवास पर थी तो यह पोस्‍ट नहीं पढ़ पायी। आज पढ़ी और कुछ टिप्‍पणी भी देखी। मेरे पास एक एस एम एस आया है उसे ही यहाँ लिख रही हूँ - don't get upset with people or situation .... they are powerless without your reaction.

mahendra srivastava said...

ओह.. काफी समय बाद यहां आया हूं, आश्चर्य हुआ। नि:संदेह टिप्पणी में ना ही भाषा की मर्यादा का ध्यान रखा गया है और ना ही एक महिला का। इसकी जितनी भी निंदा हो वो कम है।
मेरा अनुभव रहा है कि अक्सर लोग पहले तर्क वितर्क करते हैं, विषय की जानकारी ना होने पर कुतर्क करने लगते हैं। फिर भी वो खुद को कमजोर पाते हैं तो जाहिर है अपमानित करने वाली भाषा या फिर गाली गलौज पर उतारू हो जाते हैं।
चूंकि बहुत सारी बातें हो चुकी हैं, लेकिन दिव्या जी आपको पता है क.... चंदन विष व्यापत नही, लपटे रहत भुजंग..। इस पूरे घटनाक्रम को पुरानी बात समझ कर अपनी लेखनी के साथ हम सबके बीच में इसी तरह बनी रहें। हम सब आपको आदर और सम्मान देते हैं।

Arunesh c dave said...

आपको ऐसे विवाद मे पड़ना ही नही चाहिये इन लोगो का काम ही विवाद पैदा कर अपनी महत्ता पैदा करना है एक अन्य ब्लागर का भी नाम आपने इंगित किया था वह भी इसी श्रेणी मे आते हैं। इन विवादो मे पड़ने से समय जाया होता है साथ ही लेखनी भी प्रभावित होती है। इसलिये ऐसे लोगो के कमेंट पहली बार मे ही डिलीट कर देने चाहिये। मै तो व्यंग्य लिखता हूं ऐसे विवादो मे पड़ूं तो सारा फ़िन ही इसी मे चला जाय सो मेरा परामर्श यही है कि स्रूजन करने वाले को विवादों से दूर रहना चाहिये।

कौशलेन्द्र said...

डॉक्टर दराल जी ! विरोध या समर्थन के सभी के अपने-अपने तरीके होते हैं. मैं आपकी भावनाओं को समझ सकता हूँ. किन्तु बड़े होने के कारण दिव्या को आपसे कुछ अपेक्षाएं होना स्वाभाविक हैं.
पाबला जी शायद हमसे एकसौपचास किलोमीटर ही दूर हैं ....उनसे परिचय तो नहीं है पर उनकी बातें बड़ी रहस्यमयी सी लग रही हैं !
दिवस जी ! फिलहाल तो तरीका यही है कि हम अवांछित ब्लोग्स का बहिष्कार करें तथा बिना अवरोधों से उलझे हुए अपनी सुनिर्धारित दिशा में चलते रहें......परिणामों की मनचाही अपेक्षा किये बिना. दूसरी बात यह है कि विरोधी कितना भी कटु क्यों न हो वह हमें स्वयं को परिमार्जित करने का अवसर भी प्रदान करता है.
बहिष्कार की बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं कुछ लोगों को जानता हूँ जिनके वक्तव्यों से आदर्श की बयार बहती सी प्रतीत होती है पर उनका जीवन न जाने कितने पापों से भरा हुआ है. वे जिस भी संस्था में रहे उसे ही दीमक की तरह चट कर गए...ऐसे विरोधी चरित्र के लोगों से ही समाज को अधिक खतरा है. इनका बहिष्कार ही एक मात्र उपाय है ऐसे लोगों के भाषणों /लेखों से परहेज किया जाना चाहिए. हम कितनी भी अच्छी बातें क्यों न करें, हमारा लेखन कितना भी अच्छा क्यों न हो ...जब तक उपदेष्टा के व्यक्तिगत जीवन में शुचिता और निर्मलता नहीं होगी उसके विचारों का प्रभाव शून्य होगा.
हमें यहभी ध्यान रखना होगा कि जब हम किसी गलत बात का विरोध करते हैं तो स्वयं भी उस मार्ग और आचरण से बचने का प्रयास करें. यह एक निर्मल और आत्मनियंत्रण वाला मार्ग है जो आघात-प्रतिघात को न्यून करता है.
अरुणेश दवे जी का विचार अच्छा है...यह भी एक उत्तम उपाय है.
खैर, दिव्या जी का रोष अब तक कम हो चुका होगा. वे नयी ऊर्जा और नए विचारों के साथ मैदान में पुनः आमंत्रित हैं, हम सब उनका स्वागत करते हैं.

कौशलेन्द्र said...

पुनश्च, यद्यपि इस स्पष्टीकरण की आवश्यकता तो नहीं तथापि यदि किसी को यह भ्रम हो कि दिव्या ने अनेकों भाई पाल रखे हैं तो स्पष्ट करदेना चाहूंगा कि मेरे और दिव्या के बीच में पिता और बेटी का सम्बन्ध है.......और कोई भी सम्बन्ध पाला नहीं जाता ....स्वस्फूर्त भावना से प्रवाहित होता है......इसमें कोई शर्त नहीं होती ....कोई बंधन नहीं होता....कोई लक्ष्य नहीं होता......
कदाचित दिव्या के ब्लॉग पर आने वाले लोगों में से दिवस के अतिरिक्त और कोई समर्पित भाई है भी नहीं.

तरूण जोशी " नारद" said...

आदरणीय दिव्या जी
नमस्कार
कई बार तो जाने अनजाने में किसी की कही बात से स्वयं अपमानित महसूस हो जाना अच्छी बात नहीं है
अगर वह व्यक्ति कुछ कह रहा है तो उससे इसका कारण पत्या कीजिये और उसको संतुष्ट करके पुनः अपने अभियान में उसे भी अपने साथ करके आगे बढिए और यदि कुछ अनजाने में हो रहा है तो इसकी जो भी misunderstanding हुई हो उसका समाधान करके आगे बढे जाये.

तरूण जोशी " नारद" said...

एक बात और ये तो ब्लॉग जगत में आपकी छवि और इस परिवार के सदस्यों का प्यार है की आपके जाने की खबर सुनकर सभी आपको रोकने के लिए निवेदन कर रहे है
ठीक उसी प्रकार से जैसे की गोपीया श्री कृष्ण को रोकने के लिए

yashoda agrawal said...

अरविन्द मिश्र स्वयं क्या है??
शायद विवाहित है....
यदि कुंवारा है तो विवाह तो करेगा ही....
पर किससे?????
खौरही कुतिया से या कटही कुतिया से
उसे मानवी तो मिलने से रही......
बस जरूरत है खुल कर बोलने की.....
सो शुरुवात कर रही हूँ......
मुझे घुन पीसना है चने नहीं....एकाध पिस गया तो क्षमा
सादर

विरेन्द्र सिंह शेखावत said...

मेने तो ब्लॉग पढना ही ZEAL ब्लॉग से ही सुरु किया था और आप ने लिखा की "इस आलेख को मेरा अंतिम आलेख समझा जाए "

पर अगली ही पोस्ट में लिखा

"अपने स्नेही पाठकों से दूर कैसे रह सकती हूँ।
मैं वापस आऊँगी , कभी दूर न जाने के लिए"

आप की भाषा और शब्दों में बहुत दम/ताकत है आप लिखते रहे हम आप का ब्लॉग पढ़कर बहुत कुछ सीखते है
आप ने आपना निर्णय बदला लिखते रहे आप का आभार और धन्यवाद्