Monday, November 29, 2010

अपने मन की व्यथा किसी से मत कहो..

बचपन से आज तक बहुत बार सत्यनारायण भगवान् की कथा सुनी । पंडितों ने लीलावती, कलावती से ज्यादा कुछ नहीं बताया। पाँचों अध्याय कंठस्थ हो चुके थे।

गत माह पुनः निमंत्रण मिला हरी कथा सुनने का। श्रद्दा से कथा पाठ प्रारम्भ हुआ। पंडित जी ने एक नयी बात कही , जो मुझे बहुत अच्छी लगी और जिसकों जीवन के विभिन्न पडावों पर सही भी पाया।

उन्होंने बताया की कभी भी अपने मन की पीड़ा किसी से कहनी नहीं चाहिए , सिवाय दो लोगों के।
  • माता पिता से
  • गुरु से

गुरु तो आजकल मिलते नहीं। और माता पिता सभी खुशनसीबों के पास होते हैं। इसलिए जब कभी मन उदास हो या पीड़ा असह्य हो जाए तो माता-पिता के सिवाय किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए , क्यूंकि अक्सर व्याकुल मन को जो चाहिए होता है , वो नहीं मिलता, बल्कि थोड़ी देर की सहानुभूति या फिर ढेरों समझाइशें या फिर आपमें ही ये कमी है , जिसके कारण ऐसा हुआ , सुनने को मिलता है।

किसी का दुःख साझा करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए , वो भी आपके लिए स्नेह से लबालब भरा होना चाहिए। तभी उसके साथ अपने मन की व्यथा कहनी चाहिए। अन्यथा अल्पकालिक आराम तो वो दे देगा आपको अपने सहानुभूतिपूर्ण वचनों से। लेकिन अक्सर उन जानकारियों का गलत इस्तेमाल ही करेगा , जब खुद नाराज़ हो जाएगा तब।

इसलिए जब मन व्यथित हो तो स्वयं के साथ थोडा समय गुजारना चाहिए। जब मन में स्फूर्ति वापस आ जाये , तभी मित्रों और सहयोगियों से कुछ कहें। थोडा वक़्त दुखों को जीतने में भी लगाना चाहिए। जब हम अपने दुखों के साथ लड़ना सीख जाते हैं तो दुःख में भी सुख की अनुभूति होने लगती है।

और हाँ एक विशेष बात - जब हम दुखी होते हैं तो हमें कोशिश करनी चाहिए की हम अपने मित्रों को परेशान ना करें। अपने दुःख उनसे कहकर हम उनपर भी दुःख का बोझ अनायास ही डाल देते हैं। वो कुछ कर भी नहीं सकेंगे और परेशान भी हो जायेंगे। हो सकता है वो आपके हित में कुछ कहें और आपको पसंद न आये तो दोनों का मन उदास होगा। इसलिए बेहतर यही है की मन की व्यथा को पिया जाए और नीलकंठ बना जाए।

आभार।

65 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया प्रेरक पोस्ट.पढ़कर बहुत अच्छा लगा ... आभार

राम त्यागी said...

मेरे हिसाब से मित्र से भी साझा कर सकते हैं , पति या पत्नी को भी आपस में बात साझा करनी चाहिए !

सतीश सक्सेना said...

"किसी का दुःख साझा करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए , वो भी आपके लिए स्नेह से लबालब भरा होना चाहिए। तभी उसके साथ अपने मन की व्यथा कहनी चाहिए।"

"..लेकिन अक्सर उन जानकारियों का गलत इस्तेमाल ही करेगा , जब खुद नाराज़ हो जाएगा तब।"


"...वो कुछ कर भी नहीं सकेंगे और परेशान भी हो जायेंगे।"

विरोधाभास देखें...
विरोधाभास देखें...
सारी दुनिया के बारे में धारणा फिक्स बना ली दिव्या ??

प्रवीण पाण्डेय said...

रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय,
सुन अठिलैहियें लोग सब, बाँट न लैहिहैं कोय।

abhi said...

दुःख या फिर किसी तरह की परेशानी में मैं भी कोशिश करता हूँ की खुद के साथ ही थोड़ा वक्त बिताऊं...
वैसे कुछ ऐसे मित्र हैं मेरे जिनसे कुछ छुपाना मेरे लिए नामुमकिन है..अगर मैं उनके सामने होता हूँ तो वो जान लेते हैं की मैं किसी कारणवश दुखी हूँ और फिर बिना बात जाने वो नहीं रह पाते,
मैं भी उन्हें बातें बता के बहुत हल्का महसूस करता हूँ.. :)

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

प्रेरणादायी पोस्ट....

मनोज कुमार said...

बहुत सही कहा है आपने। रहीम ने भी कहा था,
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय
सुनि अठलैहैं लोग सब बांटि न लैहैं कोय।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार::पूर्णता

deepak saini said...

बहुत अच्छी व प्रेरणादायक बात कही आपने
अपनी व्यथा को मन मे दबाना ही उचित है
परन्तु हर कोई तो अपने दिल दबा कर नही रख सकता

Deepak Shukla said...

Hi..

Man main koi dukh ho tere,
kabhi kisi se bolo na..
Man ke raaz, raaz rahne do..
Unhen kabhi bhi kholo na..

Prerak prasang.. Aur anukarneeya aalekh..

Deepak..

P.N. Subramanian said...

आपकी बातों का समर्थन करना चाहूँगा. कल ही ऐसा ही कुछ डा. अजित गुप्ता जी के ब्लॉग पर भी पढने मिला था.

ADITI CHAUHAN said...

guru ki parampara lagbhag khatm hi ho gayi hai. course se sambandhit vishyon par unse baten ki ja sakti hai kintu anya vishyon par nahi.
agar maata-pita ka vyavhaar dostana hai to unse man ki vyatha kahna sabse achha hai.

lekin mai maanti hun ki saare rishte hone ke bavjud bhi hamko ek mitra ki jarurat to hoti hi hai. bas mitra banaane men jaldbaji nahi karni chahiye.

Rajesh Kumar 'Nachiketa' said...

ये तो वही बात हो गयी,
रहिमन निज मन कि व्यथा मन ही राखो गोय,
सुनी अठिलैहैं लोग सब बांटी ना लैहें कोई.
याद दिलाने के लिए धन्यवाद...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत ही बढ़िया पते की बात है ...

Pratik Maheshwari said...

बहुत सही लगी मुझे यह बात...
पर आज कल धैर्य कम होता जा रहा है लोगों में..
फिर तकनीकी युग में लोग अपनी सोच से पहले ही सब कुछ जग-जाहिर कर देते हैं...
विडम्बना बड़ी है.. कोई सीखे तो अच्छा रहेगा...

रचना said...

agreed and had said the same few posts back

वन्दना said...

बहुत सुन्दर और सारगर्भित पोस्ट्……………

arvind said...

bahut badhiya...prerak post....rahiman nij man ki vyathaa man hi raakho goy....

BrijmohanShrivastava said...

काल्पनिक आराम से याद आया
भोले बन कर हाल न पूछो बहते है अश्क तो बहने दोे
जिससे बढे बैचैनी दिल की एसी तसल्ली रहने दो
दुख को जीतने में ही तो आदमी वक्त नहीं लगा पाता है
अंतिम दो पद से चिन्तक और विचारक डेल कारनेगी याद आगये । एक अच्छा मार्ग दर्शक लेख

ashish said...

आपका ये आलेख पढ़कर मुझे रहीम दास की पंक्तिया याद आ गयी.
रहिमन निज मन की व्यथा , मन ही राखो गोय
सुन अठिलैहे लोग सब , बाँट ना लैहे कोय

Mrs. Asha Joglekar said...

झील की बातें आप माता पिता से ज्यादा अच्छी मित्र से कर सकते हैं तो जरूर करें । लेकिन मित्र सच्चा हो । कहते हैं कि दुख बांचने से कम होता है और सुख बढता है ।
पर यदि ाप नही चाहते कि ये बात दस लोग जानें तो अपने तक रखें । मराठी में एक कहावते है कि ओठा बाहेर ते गोटा बाहेर । यानि ङोंट से बाहर बात गई तो समझो कि कुनबे से भी बाहर गई ।

Mrs. Asha Joglekar said...

कृपया कई पढें की की जगह ।

Tausif Hindustani said...

किसी का दुःख साझा करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए , वो भी आपके लिए स्नेह से लबालब भरा होना चाहिए। तभी उसके साथ अपने मन की व्यथा कहनी चाहिए।
सटीक बात कही है आपने , आपसे पूर्ण रूप से सहमत हूँ
dabirnews.blogspot.com

दिगम्बर नासवा said...

सही कहा ... दुःख बांटने से कभी कभी इंसान उपहास का पात्र भी बन जाता है ...

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर आलेख.अपनी लड़ाई स्वयं अपने आप ही लड़नी होती है. अन्य के साथ पीड़ा बांटने से ज़रूरी नहीं कि आप की पीड़ा कम होने का कोई उपाय मिल ही जाए.आप की बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि केवल माता पिता के साथ ही अपनी पीड़ा सांझी की जा सकती है ,क्यों कि केवल माता पिता का प्रेम ही निस्वार्थ होता है. पति पत्नी के संबंधों में भी कहीं न कहीं कुछ स्वार्थ का अंश होता है. आभार

गिरधारी खंकरियाल said...

व्यथा की गोपनीयता और प्रासंगिकता पर निर्भर करेगा .

DR. PAWAN K MISHRA said...

किसी ना किसी से तो कहना ही पड़ेगा. जरूरत है ऐसे साथी की जो समझ सके

सम्वेदना के स्वर said...

ओशो कहते हैं
जब बहुत दुखी हो तो किसी विराने में जाकर,अपने दिल की बात आसमान से कह दो।
और जब खुश हो तो सबके साथ उस खुशी को बाटों।

Kunwar Kusumesh said...

मन की व्यथा पीने की आदत डालने से जो blood pressure बढ़ेगा उसे क्या दवाइयों से सही किया जाये ,मैडम.
मन की व्यथा अपने किसी एक या दो खास व्यक्ति से ज़रूर कहनी चाहिए.इससे मन हल्का होगा. आपकी इस बात से सहमत हूँ कि सबसे अपना दुःख नहीं बताना चाहिए क्योंकि कर कोई हमदर्द भी नहीं होता.

Bhushan said...

कई लोग घर में मूर्तियाँ और फोटो लगा कर उनसे बात कर लेते हैं. व्यक्ति को जैसा उचित लगे वैसा कर लेना चाहिए. परंतु हर हालत में अपने भीतर की शक्ति को लौटाने का प्रबंध आवश्यक है - छोटा-मोटा नुकसान उठा कर भी.

G Vishwanath said...

Share your happiness with everyone.
But share your grief with few.

I agree.
But when sharing your grief, why limit it to parents and the Guru?
What matters is how close your confidant is to you.
If you trust him/her, do share it even if he/she is not your parent or Guru.
Grief shared with a proper person is one way of mitigating it.

Regards
G Vishwanath

Archana said...

मन की व्यथा हर बार हर किसी से नहीं बताई जा सकती है,चाहे माता-पिता हों या मित्र... मै ये मानती हूँ। ज्यादा जरूरी ये तय करना होता है कि कब, किसे, क्या और कितना बताया जाय...चाहे माता-पिता हों या मित्र... या मन में रखा जाय...

एस.एम.मासूम said...

अपना दुःख किसी से ना कहें तो क्या बीमार पड जाएं? वैसे बात सही है, दुःख किसी से बयान करके कोई फाएदा नहीं होता लेकिन लोग तो ब्लॉग मैं भी अपना दुःख बयान कर डालते हैं. इसने मुझे यह कह दिया उसने यह कह दिया.

आराम बड़ी चीज़ है मुह ढक के सोइए
किस किस को टोकिये अजी किस किस को रोइए.

केवल राम said...

किसी का दुःख साझा करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए , वो भी आपके लिए स्नेह से लबालब भरा होना चाहिए। तभी उसके साथ अपने मन की व्यथा कहनी चाहिए।"
किसी के दुःख को समझने के लिए ...संवेदनशीलता होनी चाहिए...ह्रदय में प्रेम होना चाहिए..हम किसी के दुःख को तभी महसूस कर सकते हैं ..जब किसी पराये का दुःख हमें अपना दुख लगने लगे ...वर्ना दुनिया में स्वार्थ के सिवा मिलता ही क्या है ....सार्थक पोस्ट ..शुभकामनायें

Dr Varsha Singh said...

सार्थक लेखन.

'उदय' said...

... kyaa baat hai ... adhyaatmik abhivyakti ... badhaai !!!

सुज्ञ said...

हर व्यक्ति मन हल्का करने के लिये कोई न कोई कंधा तलाश ही लेता है।
तथापि एकांत में मन खाली करना,अच्छी व्यवस्था हो सकती है।
माता-पिता तो आदर्श व्यवस्था है ही।
योग्य गुरू का उपयोग मात्र पाप-प्रायश्चित के लिये करना उचित होगा।
कितना भी अच्छा मित्र हो, उसे अन्तिम उपाय की तरह ही अपनाया जा सकता है।

सुशील बाकलीवास said...

दुःख दर्द में जब निस्वार्थ और सच्ची सलाह का अभाव लगे तो समय को ही उस दर्द का उपचार कर लेने दिया जावे, बशर्तै दर्द का कारण डिप्रेशन (अवसाद) में ले जाने जैसा न हो ।

Rahul Singh said...

चलिए, यह तो हम सबसे बांट लिया आपने.

abhishek said...

bikul satya bataya aapne divya ji..:)
sunder prerak...:)

मोहिन्दर कुमार said...

आपकी कही बात में बजन है...परन्तु मेरा मानना है कि कठिन परिस्थितियों में सभी विकल्पों को काम में लाना चाहिये.
मैने कहीं पढा था कि "व्यथा और प्रसन्नता मन की दो स्थितियां है" जिनका आंकलन हर कोई अपनी तरह से करता है. कोई व्यक्ति प्रसन्नता के सारे साधन होते हुये भी व्यथित हो सकता है. किसी के शब्द ही व्यथा के सारे समीकरण बदल देते है. और तो और कभी कभी हास्य परिहास एंव की व्यथा को हल्के पन से लेने पर भी इसका समाधान हो सकता है........ बस आवश्यकता है तो व्यथा को हर कोण से देखने की है... जो कि एक व्यक्ति के सम्भव नहीं.. हम सब एक दायरे के भीतर रह कर ही सोच पाते हैं.... लिखते रहिये

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

लेख बहुत अच्छा है, परंतु शिकायत का मौका आपने दे ही दिया है तो करता चलता हूं। अव्वल तो आजकल के पंडित जी लोग लीलावती-कलावती से आगे कुछ जानते नहीं, इसलिए धार्मिक कथा-आख्यानों से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। मौजूदा समय में सर्वाधिक नुकसान ईश्वर का हुआ है और उसके कारण मनुष्यों का। शास्त्रों में स्रोता-वक्ता के लक्षण बताए गए हैं। गीता और उपनिषद तो बार-बार कहते हैं कि सत्य का वक्ता और श्रोता दोनों दुर्लभ हैं। रही बात मन की व्यथा किसी से कहने की तो आपका यह मानना सही नहीं है कि सद्गुरु नहीं मिलते। मिलते हैं, यह मेरा अनुभव है। रही बात, मां-बाप की तो हम उनसे शेयर तो कर सकते हैं, परंतु समाधान वहीं कर सकता है जो समर्थ होगा। सद्गुरु थोड़ा दुर्लभ हैं, परंतु कबीर की बात भूलनी नहीं चाहिए-"खोजी होय तुरत आ मिलिहौं।" ​
​वैसे तीस​रा विकल्प हमेशा प्रस्तुत है, वो है मित्र का। मित्र मां-बाप जितना करीब होता है और गुरु जितना होशपूर्ण। परंतु, हर अच्छी वस्तु दुर्लभ होती है, इसलिए हमें विवेकपूर्ण खोज करनी चाहिए। बुरा यह भी नहीं है कि हम स्वयं पर ही भरोसा करें, अपने ही मित्र बनें, अपने ही मां-बाप और हर सुख-दुख स्वयं ही स्वयं से साझा करें। "आत्मैस ह्यात्मनो बंधुः आत्मैवरिपुरात्मनः" वाली बात गत नहीं है।

अरविन्द जांगिड said...

प्रथम तो सार्थक रचना के लिए, आभार.
एक बात मैं जोड़ना चाहता हूँ, जब बांटना ही है तो उसी से क्यों ना बांटा जाय, जिसने ये तोहफे दिए है, मेरा मतलब है क्यूँ न अपने दुःख दर्द ईश्वर से ही बांटे जाय?

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

लेख बहुत अच्छा है, परंतु शिकायत का मौका आपने दे ही दिया है तो करता चलता हूं। अव्वल तो आजकल के पंडित जी लोग लीलावती-कलावती से आगे कुछ जानते नहीं, इसलिए धार्मिक कथा-आख्यानों से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। मौजूदा समय में सर्वाधिक नुकसान ईश्वर का हुआ है और उसके कारण मनुष्यों का। शास्त्रों में स्रोता-वक्ता के लक्षण बताए गए हैं। गीता और उपनिषद तो बार-बार कहते हैं कि सत्य का वक्ता और श्रोता दोनों दुर्लभ हैं। रही बात मन की व्यथा किसी से कहने की तो आपका यह मानना सही नहीं है कि सद्गुरु नहीं मिलते। मिलते हैं, यह मेरा अनुभव है। रही बात, मां-बाप की तो हम उनसे शेयर तो कर सकते हैं, परंतु समाधान वहीं कर सकता है जो समर्थ होगा। सद्गुरु थोड़ा दुर्लभ हैं, परंतु कबीर की बात भूलनी नहीं चाहिए-"खोजी होय तुरत आ मिलिहौं।" ​
​वैसे तीस​रा विकल्प हमेशा प्रस्तुत है, वो है मित्र का। मित्र मां-बाप जितना करीब होता है और गुरु जितना होशपूर्ण। परंतु, हर अच्छी वस्तु दुर्लभ होती है, इसलिए हमें विवेकपूर्ण खोज करनी चाहिए। बुरा यह भी नहीं है कि हम स्वयं पर ही भरोसा करें, अपने ही मित्र बनें, अपने ही मां-बाप और हर सुख-दुख स्वयं ही स्वयं से साझा करें। "आत्मैस ह्यात्मनो बंधुः आत्मैवरिपुरात्मनः" वाली बात गत नहीं है।

Shekhar Suman said...

मेरे ख्याल से बांटने में कोई हर्ज़ नहीं है ....
बाकी काफी चिंतन का विषय ये है कि किससे बांटे और किससे नहीं....

mahendra verma said...

मन की व्यथा को समझने वाले माता-पिता ही हो सकते हैं। दूसरों में इतनी संवेदना कहां?
आपके विचारों से सहमत।
व्यथा प्रेम से भी ज्यादा जटिल, ज्यादा गहरी भावना है।
मन की व्यथा को आंसुओं के रूप में बहा देना भी एक अच्छा उपाय है।
कुछ के लिए मन की व्यथा लाभकारी भी होती है। बिना व्यथित हुए कोई व्यक्ति कविता का सृजन नहीं कर सकता। व्यथा का सृजन से गहरा संबंध है।

अपनी ग़ज़ल की दो पंक्तियां उद्धरित करना चाहूंगा, जो इसी संदर्भ से जुड़ी हुई हैं-

मेरे मन की बात समझ न पाओगे तुम,
तेरे मेरे दुख में शायद कुछ अंतर है।

Poorviya said...

zeal ji lagata hai aaj kuch aap ka man saant nahi hai jo aaise post aap ne likhi.
koie baat nahi jab bhee aaisa kuch ho
1.man ko sant kare.
2.purani kehawat hai ekant wasa jhagara n jhasa.
3.maun rahana .
4.apne aap ko kisi bhee kam main vyast rakho.--
hum to yahi karte hai aur mast hai.

M VERMA said...

अच्छी नसीहत .. प्रेरक और सावधान करती

Kaushalendra said...

दिव्या जी !
पहले तो सत्य नारायण की कथा का इतिहास ....
१९२३ ......संभवतः यही समय है जब मध्य प्रदेश के बस्तर स्टेट ( वर्त्तमान छत्तीस गढ़) के तत्कालीन राजा नें दरभंगा से एक कर्मकांडी ब्राह्मण -पंडित ठाकुर प्रसाद जी को बस्तर आमंत्रित किया , उद्देश्य था वनांचल के लोगों में एकता का संचार करना. यह भार पंडित जी पर डाल दिया गया ......उन्होंनें बहुत विचार के उपरांत एक fiction की रचना की, उनका विश्वास था कि इससे लोगों में सत्य के प्रति निष्ठा और सभी कबीलों में एकता स्थापित हो सकेगी. राजा साहेब को योजना पसंद आयी . कथा का प्रथम वाचन बस्तर में हुआ .....आज यह पूरे विश्व में सभी हिदुओं के यहाँ पढी-सुनी जाती है.
इस कथा की उपयोगिता सदा रहेगी ......कथा के माध्यम से जीवन में सत्याचरण के अनुसरण की वकालत की गयी है ....पर हो क्या रहा है ...सभी जानते हैं ........कथा का आयोजन भगवान् को रिश्वत देने के लिए किया जा रहा है ....कथा में छिपे सार को जानकार भी लोग जानना नहीं चाहते.
चरक संहिता (A text book of ancient medicine) में एक स्थान पर कहा गया है -one should not disclose his secrets before others .... ठीक है परिहास का पात्र बनने .......या बेचारगी का विशेषण पा लेने से समस्या का हल नहीं होगा ......
परन्तु .......दिव्या जी ! अपना दुःख एक non - sppressible urge है ........तनाव को रिलीज़ तो करना ही पड़ेगा न ! ......माता-पिता और गुरुजन की सूची में एक नाम और जोड़ने की सिफारिश करूंगा ......सुहृदय मित्र......खोजना पड़ेगा पर मुश्किल नहीं है ....प्रयास करने में क्या हर्ज़ है ?

cmpershad said...

अपनों से कह लेने से मन हलका हो जाता है। यदि कोई हमारे दुख से प्रसन्न है तो वह अपना कैसे???

उपेन्द्र said...

बहुत ही सही कहा आपने . और नहीं तो लोग किसी के दुःख को बांटने की जगह उसका मजाक उड़ाते है. दुःख के बाद सुख का आगमन तो होगा ही. इसी उम्मीद में कर्तव्य पथ पर आगे बढना चाहिए.

प्रतिभा सक्सेना said...

सचमुच,औरों के सामने अपनी विवशता या बेचारापन दिखाने से क्या फ़ायदा -अपने दुख को व्यक्त करने के लिए कोई दूसरी राह खोज ले - माध्यम बन कर .

प्रतुल वशिष्ठ said...

.

कौशलेन्द्र जी ने सारगर्भित बात कह दी.
फिर भी एक काव्य आहुति मेरी ओर से :

"प्रेम-आगमन"

संयम की प्रतिमा बन जाओ
जितनी चाहे जड़ता खाओ
आगमन हुवेगा जब उसका
भूलोगे अ आ इ ई ओ.

दृग फेर आप मुख पलटाओ
या निर्लज हो सम्मुख आओ
पहचान हुवेगी जब उससे
सूझेगा केवल वो ही वो.

मन की बातें न झलकाओ
पीड़ा को मन में ही गाओ
उदघाटित हो जाएगा जब
हँसेंगे सब हा-हा हो-हो.

.

डा० अमर कुमार said...


क्या मेरी टिप्पणी की ज़रूरत है ?

यदि है तो, यहाँ मेरा एक सवाल अनुत्तरित रहा जाता है,
प्रारँभिक काल में Sharing and Caring की सुषुप्त इच्छा ने मानव को एक समूह में रहने.. और कालाँतर में परिवार और समाज की बुनियाद रखने को बाध्य किया होगा ? My kiddish thought may not have a valid point, but it needs to be answered.
सँभवतः माननीय ( I do really mean it, ) लेखिका यहाँ पर उल्लिखित व्यथा को मन की घुटन, अनिर्णय का ऊहापोह, आहत अहँ से उपजी मनोग्रँथियों से अलग करके नहीं रख पायी हैं ? स्मरण रहे यहाँ मेरा डिस्क्लेमर मात्र एक शब्द में मौज़ूद है... वह है, सँभवतः !

@ कौशलेन्द्र :
हालाँकि इन तथ्यों के सत्यापन एवँ प्रकाशन के अधिकार ब्लॉगस्वामिनी पर निर्भर हैं ,
पर जहाँ तक मुझे जानकारी है, कथा के प्रत्येक अध्याय के अँत में शँख फूँकने से पहले महाशय पँडित जी, " इति स्कंदपुराणे रेवाखंडे सत्यनारायण व्रत महात्म्य कथायाम अमुक अध्याय " अवश्य कहते हैं । स्पष्ट है यह कथा वहाँ स्कंदपुराण के रेवाखंड में मौज़ूद है, बँगाल में यह कथा नवाबी शासन के समय से प्रचलित है, जो आर्तजन को सत्य की जीत, और सत्यानुसरण के फल के प्रति आश्वत करती है । उत्तर भारत में इसका प्रसार 1928-30 के दौरान गाँधी जी के आन्दोलन के एक प्रचारतँत्र के रूप में हुआ ।

angel said...

MEANING OF GOD's LOVE

वाणी गीत said...

आप दूसरों के रहस्य छिपा सकते हैं मगर दूसरे भी आपके दुःख को छिपा लें , आवश्यक नहीं ...
लोंग रोकर सुनते हैं और हंसकर उड़ाते हैं ...
उपयुक्त समय पर सही सलाह दी है दिव्या !

मगर फिर भी ये सच है कि दुःख या दर्द या कोई बात आपको भीतर परेशान कर रही है , आप कह नहीं पा रहे हो तो मानसिक संतुलन गड़बड़ाने का भय भी होता है !

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

A nice presentation of the thoughts preoccupying the mind.

The best friend will never hesitate to sincerely convey the basis of the grief. Because more than mere grief, it is important to tackle to root-cause of grief so that the recurrence is remedied.

Gam kaa khazaanaa teraa bhi hain, meraa bhi
Yeh nazraanaa teraa bhi hain, meraa bhi

Apne gam ko geet banaake gaa lenaa
Raag puraanaa teraa bhi hain, meraa bhi

Tu mujhko aur main tujhko samjhaau kyaa?
Dil deewaanaa teraa bhi hain, meraa bhi


Semper Fidelis
Arth Desai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

अनुकरणीय पोस्ट!

निर्मला कपिला said...

आपकी हर बात मे दम है लेकिन कभी कभी किसी अच्छे दोस्त से कह कर तनाव कुछ कम हो जाता है। फिर भी आपकी बात मे दम है। शुभकामनायें।

Asha said...

कई बार मन की व्यथा बांटने से हल्की भी हो जाती है ,पर आवश्यक है सही व्यक्ति चुना गया हो |आपकी बात बहुत हद तक सही है
पोस्ट बहुत अच्छी लगी
बधाई
आशा

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आपकी पोस्ट पढ़कर मुझे अपनी दो पंक्तियाँ याद आ गयीं :
दर्द से दोस्ती कीजिये
ज़िन्दगी का मजा लीजिये !
आपने सही लिखा है माँ,बाप से बढ़कर कोई नहीं होता जिससे अपना दुःख बांटा जा सके मगर कभी कभी कुछ सच्चे दोस्त भी होते हैं जिनसे साथ दुःख बांटने सेमन हल्का हो जाता है !
आपकी पोस्ट बहुत ही व्वाहारिक और उपयोगी है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

रूप said...

रहिमन निज मन कि व्यथा ,मन ही राखो गोय

सुनी अठिलैहें लोग सब बाँट न लैहें कोय !

कुमार राधारमण said...

टेंशन लेने का नहीं मैडम.....देने का!

कुमार राधारमण said...

माता-पिता और गुरू के हृदय की विराटता पर संदेह नहीं। परन्तु,हममें से अधिकतर के माता-पिता ने बच्चों की परवरिश बहुत परेशानियां उठाते हुए की है। जब हम बड़े हो जाएँ,तो हमारा फ़र्ज़ केवल माता-पिता को सुख पहुंचाने का होना चाहिए। यह विचारणीय है कि जिस दुख को हम इतनी कम उम्र में नहीं झेल पा रहे,वयोवृद्ध माता-पिता उससे कितने दुखी होंगे।
यही बात गुरू के बारे में कही जा सकती है। कहते हैं,अनेक महापुरुष अंतिम दिनों में स्वयं भीषण रोगों से ग्रस्त इसलिए हुए कि वे जीवनपर्यन्त तमाम लोगों के दुखों को अपने ऊपर लेते रहे। एक तो गुरु मिलना मुश्किल और जब मिल जाए,तो दुख साझा करने का माध्यम बन कर रह जाए,ऐसा नहीं होना चाहिए।
तीसरी बात यह कि माता-पिता और गुरू भी मनुष्य ही हैं। वे अपना दुख किससे बांटें?
ज़रूरत है स्थितप्रज्ञता की उस स्थिति को प्राप्त करने की जहां न सुख में अति-उत्साह है,न दुख में टूटने की आशंका। ध्यान इसका सर्वोत्तम उपाय है। जो इसे नहीं समझ पा रहे,दुःख उनकी नियति है।

Kaushalendra said...

डाक्टर अमर जी !
स्कन्द पुराण की जानकारी के लिए धन्यवाद ! "बस्तर का इतिहास" नाम से लाला जगदलपुरी नें बस्तर का इतिहास लिखा है ...प्रस्तुत जानकारी उसी पर आधारित थी .......संभव है कि बस्तर में इसका प्रारम्भ पंडित ठाकुर प्रसाद जी द्वारा किया गया हो और इसका श्रेय उन्हें दे दिया गया हो . खैर ! इतिहास में मेरी इतनी पकड़ नहीं है. लीलावती-कलावती की कहानी में भी रूचि नहीं है ......कथा का रूप लोगों को उलझाता ही है ......सार तो इतना है कि हमें अपने जीवन में सत्य का अनुशीलन करना चाहिए ....शायद मूल कथा इतनी ही है...... सार को कितने लोग ग्रहण कर पाते हैं ?
समाज की अवधारणा का जन्म निश्चय ही शेयर एंड केयर की मौलिक आवश्यकता से ही हुआ है ...इसमें कोई संशय नहीं है.

abhishek1502 said...

nice post
मैंने ऐसे बहुत से लोग देखे है जो हर समय किसी के भी सामने अपना दुखड़ा रोने बैठ जाते है भले ही वो मदद करने के काबिल न हो .
सब को कुछ समय रोज एकान्त में रहने चाहिए और वो क्या चाहते है ये जानने की कोसिस करनी चाहिए क्यों की आप ही है जो स्वयं के बारे में सबसे ज्यादा जानते है . लगभग सारी समस्ये तो यहीं हल हो जाती हैं .
फिर भी यदि कुछ व्यथा रह जाये तो माँ बाप , गुरु और आप का सच्चा मित्र उस को समझ कर आप को उचित सलाह दे सकता है जो आप अपने अन्दर ढूढने में असफल रहे .
मैं तो ऐसा ही मानता हू