Saturday, January 1, 2011

हिंदी भाषा मेरी शान है , मेरी पहचान है -- मेरा १०० वां लेख !

अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी पर अपना शतकीय लेख लिखते हुए मन में अपार प्रसन्नता है

हिंदी ब्लॉग जगत से जुड़ने के बाद , पहली बार हिंदी भाषा से प्रेम हुआ और मन में अपार सम्मान पैदा हुआ अपनी राष्ट्र भाषा के लिए इसके पहले कभी सोचा ही नहीं इस था विषय पर शायद अंग्रेजी स्कूलों में पढ़कर brainwash हो गया था , जहाँ हिंदी का एक शब्द बोलना भी गुनाह होता था और उसके उस गुनाह के लिए शिक्षकों द्वारा बेरहमी से उँगलियों के जोड़ों [ knuckles ] पर, लकड़ी की मोटी पटरी से मारा जाता था तथा प्रति शब्द एक रूपए का जुरमाना देना होता था

इस यातना से बचने के लिए , कोई भी विद्यार्थी हिंदी बोलने का गुनाह नहीं करता था इसे लिखते समय अपने Loreto Convent और Canossa Convent के शिक्षक [ Mother Superior , Mother terressa , sister Fillo , sister Lidwin , sister tessel ] आदि आँखों के सामने तैर गए, जिनसे बहुत बार हिंदी बोलने की सजा पायी थी .

इसके बाद उत्तरोत्तर उच्च शिक्षा में तो हिंदी भाषा में किताबों का अकाल सा रहता है मेडिकल के दौरान भी विदेशी लेखकों [ Davidson, Parkinson , Hutchinson ] की अंग्रेजी में लिखी किताबों को ही पढ़कर डिग्री हासिल की

शुक्र है माता-पिता और आस-पड़ोस वालों का जिनके कारण हिंदी में वार्तालाप का मौक़ा मिलता था तथा हिंदी सीखने में मदद मिली वरना कितनी शर्म की बात होती की एक हिंदी राज्य में रहकर और हिंदी "मातॄ-भाषा" होने के बावजूद हिंदी नहीं आती

दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में जहाँ गणित और विज्ञान में ९० प्रतिशत अंक जुटाए वहीँ हिंदी में क्रमशः ६१ और ६४ मिलने के कारण अंकों का प्रतिशत नीचे गिर गया मेडिकल की CPMT परीक्षा में हिंदी भी पास करना अनिवार्य था जिसमें एक बार फिर इश्वर ने बचा लिया क्यूंकि १५० में से ७५ अंक लाना अनिवार्य था और मुझे मात्र ७५ अंक ही मिले थे यदि ७४ मिलते तो प्रवेश नहीं मिलता लेकिन BHU-PMT , AIIMS , Jipmer-Pondicherry , CBSE तथा AFMC आदि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में हिंदी में पास होना अनिवार्य नहीं था जो उस से एक राहत महसूस कराती थी लेकिन आज मुझे लगता है की हिंदी एक अनिवार्य विषय होना चाहिए और अंग्रेजी माध्यम से पढने वाले बच्चों की हिंदी काफी कमज़ोर होती है , जिस पर विशेष ध्यान देना चाहिए -

अंग्रेजी स्कूलों में पढने वाले विद्याथियों को हिंदी बोलने पर सजा और यातना नहीं मिलनी चाहिए , और ऐसे शिक्षकों के खिलाफ सख्त कारवाई करनी चाहिए जो बच्चों को हिंदी बोलने पर प्रताड़ित करते हैं जो बच्चे हिंदी जानते हैं और धारा-प्रवाह हिंदी में बात करते हैं , उनमें एक अलग ही आत्मविश्वास होता है जो उन्हें अन्य सभी क्षत्रों में भी बहुत आगे ले जाता है हिंदी सीखने , बोलने और लिखने से किसी की अंग्रेजी कमज़ोर नहीं हो जायेगी , अपितु आपके अन्दर निज पर अभिमान करने की प्रेरणा मिलेगी

भाषा और संस्कृति दिलों को जोडती है इसलिए अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करें, गर्व करें और प्रचार प्रसार करें
मैं उन लोगों की विशेष प्रशंसा करती हूँ जो दक्षिण भारतीय हैं, गुजराती हैं, बंगाली हैं, पजाबी हैं, मराठी हैं किन्तु फिर भी अपनी राष्ट्र भाषा का सम्मान करते हुए हिंदी भाषा से जुड़े हुए हैं

थाईलैंड में आकर मैंने देखा यहाँ के निवासी सिर्फ थाई भाषा में ही बात करते हैं , अपनी भाषा का सम्मान करते हैं और गर्व महसूस करते हैं यहाँ आकर विदेशी भी थाई ही बोलने लग जाते हैं उनसे भी काफी प्रेरणा मिली अपनी भाषा का सम्मान करने की

विदेश में बसे ज्यादातर भारतीय गुजराती , मराठी और ९० % दक्षिण भारत से हैं लेकिन वे सभी हिंदी में धाराप्रवाह बोलते हैं सिर्फ हिंदी भाषा ही है जो विदेशों में बसे , विभिन्न राज्यों से आये भारतीयों को एक सूत्र में बांधती है

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है की जो काम अंग्रेजी से ना बनता हो उसे हिंदी से बनाया जा सकता है एक बार दिल्ली एयरपोर्ट पर अंग्रेजी में बात करने से लोग चिढ़कर कुछ कर नहीं रहे थे फिर एक उच्चाधिकारी से हिंदी में अपनी परेशानी कहने पर एक आत्मीयता का रिश्ता बना और कार्य चुटकियों में हो गया उसके बाद से अब हिंदी भाषा की महिमा का भान हो गया

एक हिंदी भाषा से जुडा हुआ रोचक किस्सा यहाँ लिख रही हूँ --

१८ मार्च २०१० को किरण बेदी जी थाईलैंड आई थीं जिनसे मुलाक़ात के लिए बड़ी बड़ी हस्तियाँ आमंत्रित थीं हॉल हिन्दुस्तानियों से भरा हुआ था लेकिन वातावरण में सिर्फ अंग्रेजी की धूम थी हर कोई ये बता देना चाहता था की उसकी अंग्रेजी किसी से कम नहीं है हर कोई किरण जी से सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करना चाहता था, और वो भी मजबूरीवश अंग्रेजी में ही जवाब दे रहीं थीं लोगों की बे सर-पैर की अंग्रजी सुनकर मेरी सांस फूल रही थी , कि इनका अंग्रेजी वाक्य जो शुरू हो चुका है वो कब थमेगा कोई उतार , चढ़ाव, कॉमा , प्रश्न , ही कोई अंत किरण जी जैसे-तैसे इन अंग्रेजी मोहमाया में लिप्त सज्जन एवं सज्जनियों के प्रश्नों को समझकर उन्हें विनम्रता से उत्तर दे रही थीं और उनकी अंग्रेजी भावना का सम्मान कर रही थीं

फिर मेरे सब्र का बाँध टूट गया दो वाक्य हमने भी अंग्रेजी में बोलकर सबको ये सन्देश दे दिया की कम मत समझियो

उसके बाद शुरू हुआ मेरा और किरण जी का धाराप्रवाह हिंदी-संवाद उसके बाद तो पूरा वातावरण हिंदीमय हो गया लगा की भारत गया है थाईलैंड में सभी जोश में गए , नकाब उतार फेंका और सहज ही हिंदी में संवाद होने लगा सभी एक सूत्र में बंध गए , हिंदी भाषा से जो अपनापन अपनी भाषा में था वो अंग्रेजी में कहाँ ?

एक बार बड़ी बहिन से पूछा - " विश्वविद्यालय में अंग्रेजी में भौतिकी पढ़ाती हैं आप, सिमपोजियम attend करती हैं , लेक्चर्स देती हैं , फिर अपने मन के उदगार और कवितायें हिंदी में क्यूँ लिखती हैं ? उन्होंने कहा - " जैसे दिन भर की थकान सिर्फ घर आकर ही दूर होती है वैसे ही अंग्रेजी के आवरण को हटा , हिंदी में जो सुकून मिलता है ,वो अंग्रेजी भाषा में नहीं हैऔर यदि हिंदी भाषी लोग ही हिंदी में लिखने से कतरायेंगे तो बाकी लोग हिंदी का सम्मान कैसे करेंगे । "

मुझे लगता है , अंग्रेजी भाषा के स्कूल हिंदी के प्रचार प्रसार में बाधक हैंलेकिन यदि इन अंग्रेजी स्कूलों को हटा दिया जाए , तो शिक्षा की गुणवत्ता ही नहीं दिखेगीक्या वजह है अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उंचा है ? मुझे लगता है , हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उंचा करना बेहद जरूरी हैइसी से वहां की शिक्षा में गुणवत्ता आएगी और लोगों की हिंदी में भी रूचि बढ़ेगीवरना अंग्रजी के लिए दीवानापन दिनों दिन बढ़ता जाएगा

आज मुझे हिंदी में ब्लॉग लिखकर जो प्रसन्नता मिलती है , उसकी अभिव्यक्ति ठीक से करने के लिए मुझे और हिंदी सीखनी होगी राष्ट्र भाषा हिंदी में लिखने वालों को और हिंदी भाषा का सम्मान करने वालों को मेरा शत शत नमन

आभार

87 comments:

Kunwar Kusumesh said...

हिंदी के प्रति आपका लगाव वन्दनीय है.नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.

खुशदीप सहगल said...

सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
यह हमारी आकाशगंगा है,
सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
उनमें से एक है पृथ्वी,
जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां...
-डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो...

जय हिंद...

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

Read.

Nice to see it is 100 posts now. Proud of you.


Semper Fidelis
Arth Desai

Rahul Singh said...

हम में से अधिकतर बच्‍चों के सिर्फ अंगरेजी ज्ञान से संतुष्‍ट नहीं होते बल्कि उसकी फर्राटा अंगरेजी पर पहले चमत्‍कृत फिर गौरवान्वित होते हैं. चैत-बैसाख की कौन कहे हफ्ते के सात दिनों के नाम और 1 से 100 तक की क्‍या 20 तक की गिनती पूछने पर बच्‍चा कहता है, क्‍या पापा..., पत्‍नी कहती है आप भी तो... और हम अपनी 'दकियानूसी' पर झेंप जाते हैं. आगे क्‍या कहूं, आपने हिन्‍दी का एक उजला पक्ष दिखाया, अच्‍छा लगा.

ashish said...

हिंदी भाषा हमारी राष्ट्रीयता और सम्मान का प्रतीक है , इसकी उन्नति में ही हमारी सफलता निहित है . ":निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति का मूल ". . हम आपकी पहली पोस्ट से इस पोस्ट तक के पाठक रहे है . अच्छा लगा आपका आंग्ल भाषा से निकलकर हिंदी भाषा में सम्प्रेषण . जरुरत है आप जैसी सोच की जो हिंदी को नया मुकाम दिला सकती है . विचारणीय और महतवपूर्ण आलेख .

ashish said...

आपकी इस शतकीय नाबाद पारी और जिस जज्बे से निभाई गयी उस जज्बे को प्रणाम .

AS said...

It has been ages, since this has been happening.
Let me Quote an instance ..
I was outside India , in Sweden, I speak english fast, and when i am there, i have to speak slow. The reason is, when i asked the Swedish people, why, the answer was, we hear you in english, then interpret it to swedish, then understand it. Same is the case when they speak, the first make the sentence in swedish, translate to english and then speak. So they speak slow.
So where are we as Indians, Do we think in Hindi, or in English. The answer is so obvious, we do in both.
Culture, heritage the very essence of the nation cannot be captured in a foreign language.
The irony for me is, i call myself a nationalist but then i cant respond in Hindi.
What do you call जूठा in English? You cant express small things, so what about big?
We have a plethora of languages, the best in the world but we shun them. Its a uphill task but not impossible.
I have know ZEAL for a while, and i know at heart she was Hindi. Glad she has been able to come up at this level. Its an inspiration to me, though i guess she is smaller to me :) but far wiser than me.

: केवल राम : said...

आपको नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें ..स्वीकार करें

: केवल राम : said...

आपने हिंदी के प्रति जो विचार अभिव्यक्त किये हैं ...वास्तविक लगते हैं ....हिंदी ...देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली भाषा ..और देवनागरी लिपि सबसे वैज्ञानिक लिपि ...संस्कृत से जन्मी इस भाषा का साहित्यक संसार बहुत बड़ा है ..निश्चित रूप से हिंदी के प्रति आपका प्रेम प्रशंसनीय है ...बहुत बहुत आभार इस लेख के लिए ..शुक्रिया

sada said...

सबसे पहले तो आप इस शतक के लिये बधाई स्‍वीकार करें ..हिन्‍दी भाषा राष्‍ट्र का गौरव जिसके लिये आपके इतने सुन्‍दर एवं प्रेरक विचारों को जानकर मन हर्ष से भर गया ...नया वर्ष की मंगलकामनाओं के साथ आभार ...।

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत अच्छी पोस्ट है...हमें अपनी भाषा पर गर्व होना ही चाहिए...
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

नया सवेरा said...

नया साल शुभा-शुभ हो, खुशियों से लबा-लब हो
न हो तेरा, न हो मेरा, जो हो वो हम सबका हो !!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मन के उद्गार तो मातृभाषा में ही ठीक से निकल सकते हैं...नव वर्ष की बहुत शुभकामनाये .

ZEAL said...

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आशीष जी ,

इस बात में कोई दो राय नहीं की आप मेरे उन चंद पाठकों में से हैं जिन्होंने ब्लॉग-सफ़र में अब तक , बिना किसी पूर्वाग्रह के मेरा साथ निभाया। इश्वर से प्रार्थना रहेगी की आपका स्नेह एवं प्रोत्साहन मुझे आगे भी मिलता रहे।

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यशवन्त माथुर said...

आप को सपरिवार नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं .

लेखों का शतक पूरा करने पर हार्दिक बधाई.

सादर

गिरधारी खंकरियाल said...

नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ हिंदी में शतकीय लेख के लिए बधाई स्वीकार कीजिये

ZEAL said...

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From AS --

@--I just had a thought, so am writing to you. You have the power of expression, but i have an observation. May be right may not be right. Its debatable. The need is to break the confines of few and reach to the masses. Your articles need to move out of the domain of writings, and touch the commonality. They as of today are of high literal value, but then the class and genre which reads it is also going to be limited.
So i leave it to you. Think about it, and if i am wrong let me know.

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@ AS --

आपने अपना जो विचार मेल से जाहिर किया उससे मैं सहमत हूँ तथा मुझे भी लगता है , की के मेरे विचार एक बड़े जन समुदाय तक पहुँचने चाहिए। यहाँ मुझे पढने वाले लोग एक निश्चित संख्या में ही हैं। लेकिन मेरे पास कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है। यहाँ ऐसे बहुत से पाठक एवं ब्लोगर हैं जो मेरी आवाज़ को मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा सकते हैं।

गीता में एक जगह उपदेश किया गया है - " कर्म करते चलो...."

मुझे लगता है , केवल कर्म करना ही मेरे हाथ में है , और निष्ठा के साथ उसी में लगी हुई हूँ। यदि मेरे प्रयासों से चंद लोगों में भी जन-चेतना जागृत होती है , तो अपना जीवन सफल समझूंगी।

आपने इस विषय पर सोचा । मुझे बहुत अच्छा लगा। यदि आपके पास कोई बेहतर विकल्प हो तो अवश्य बताइयेगा।

आभार।

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सुज्ञ said...

आपको तो सदैव ही हमारी शुभकामनाएं रहती है यह पाश्चात्य नव-वर्ष का प्रथम दिन है, अवसरानुकूल है आज शुभेच्छा प्रकट करूँ………

आपके हितवर्धक कार्य और शुभ संकल्प मंगलमय परिपूर्ण हो, शुभाकांक्षा!!

आपका जीवन ध्येय निरंतर वर्द्धमान होकर उत्कर्ष लक्ष्यों को प्राप्त करे।

ZEAL said...

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मेरे जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिना हिंदी का मोल समझे ही निकल गया। लेकिन फिर भी देर नहीं हुई है । मुझे भी राष्ट्र भाषा हिंदी की सेवा करने का मौक़ा मिल रहा है ।

मुझे हिंदी में लिखने की प्रेरणा अपनी बड़ी बहिन से मिली । इसके अतिरिक्त हिंदी-ब्लोगर्स जो इतनी उत्कृष्ट हिंदी में कवितायें एवं लेख लिखते हैं , वे भी मेरे प्रेरणा-स्रोत हैं। मैं ह्रदय से अपने पाठकों एवं ब्लोगर्स को इस प्रेरणा के लिए आभार प्रेषित करती हूँ।

मैं चाहती हूँ , लोग हिंदी बोलने और पढने में गर्व महसूस करें। हिंदी ही हमारी पहचान है और हम भारतीय ही अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को बड़े स्तर पर पहचान दिला सकते हैं।

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boletobindas said...

दिव्या जी साल का पहला दिन और आपकी पोस्ट राष्ट्रभाषा को समर्पित। दिल खुश हो गया। सच कहा है कि अपनी भाषा में जो कहा जाता है उससे ही सुकुन मिलता है। सही मे देश में सरकारी स्कूल में शिक्षा का स्तर उंचा हो औऱ देशभाषी अपनी भाषा में ही बात करें तो फिर हिंदी दुनिया में बोली जा सकती है। पर कुछ हमें भी बदलना होगा।

deepak saini said...

हिंदी के प्रति आपका प्रेम प्रशंसनीय है
नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ हिंदी में शतकीय लेख के लिए बधाई स्वीकार कीजिये

Man said...

divya ji aap ko badhai or shubh kamnaye shatkiy hindi ke liye lekh per,hindi type karta lakin takniki samshya ke karan nahee kar paya

vandematrm

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या जी सच में बेहद सुदर लेख...

मै जानता हूँ कॉन्वेंट में हिंदी किस प्रकार प्रताड़ित होती है, मै भी कॉन्वेंट में पढ़ा हूँ और वहां के वातावरण से परिचित हूँ...

थाई लोगों के अपनी भाषा के प्रति प्रेम के बारे में अपने बड़े भाई से सुना था...तीन चार महीने पहले तक मेरे बड़े भाई बैंकॉक में थे...जब भी उनका भारत आना होता तो मुझे थाई लोगों के अपनी मातृभाषा के प्रति श्रद्धा और प्रेम के बारे में बताते थे...जिस प्रकार भारत में अंग्रेजी बोलना स्टेट्स सिम्बल समझा जाता है वैसा थाईलैंड में नहीं है...इसके अलावा मेरे एक परिचित एवं अग्रज तुल्य श्री राजीव दीक्षित ने एक बार मुझे बताया कि वे एक बार फ्रांस गए थे जहाँ वहां की किसी बड़ी हस्ती से मिलने का मौका मिला जो कि अपनी आत्मकथा लिखने में व्यस्त थे...राजीव भाई ने जब उनसे पूछा कि क्या आप अपनी आत्मकथा अंग्रेजी में लिख रहे हैं तो उस व्यक्ति ने बड़ी ही गन्दी शक्ल बना कर कहा कि जब मेरे पास मेरी फ्रेंच भाषा मेरे पास है तो मुझे अंग्रजी की क्या ज़रुरत है...

तब इन बातों से ऐसा लगता है कि जिस प्रकार से सभी देशों में अपनी अपनी मातृभाषाओं पर इतना गर्व किया जाता है तो वैसा भारत में क्यों नहीं...यहाँ क्यों हमेशा हिंदी प्रताड़ित होती है?

इंजीनियरिंग के समय भी मैंने यही देखा...मेरे साथ के सभी लोग किसी बड़े आदमी के सामने हिंदी बोलने से भी कतराते थे...मैंने भी विदेशी लेखकों की किताबें पढ़कर ही अपनी इंजीनियरिंग पूरी की है...जहाँ तक मेरा मानना है तकनीकी शिक्षा में हिंदी जितनी सार्थक हो सकती है उतनी और कोई भाषा नहीं...

आपके इस सुन्दर लेख के लिये आपका धन्यवाद...

डॉ टी एस दराल said...

इस सार्थक लेख के साथ आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।

प्रवीण पाण्डेय said...

और यह लगा स्टेट ड्राइव, इस तरह शतक लगा आपका।

G Vishwanath said...

आपका हिन्दी से यह प्यार हमें अच्छा लगा।
मैंने भी अंग्रेजी स्कूल में अपनी पढाई की थी।
लेकिन कभी उन पाद्रियों ने हमें अपनी भाषा में बोलने से रोका नहीं।
हमें अंग्रेजी में ही बोलने का उपदेश देते थे, यह कहकर कि अंग्रेजी में बोलते रहने सी ही हम ठीक से अंग्रेजी सीख सकेंगे। कहते थे कि अपनी अपनी भाषा में हम स्कूल के बाहर ही बोलें। प्रोत्साहन था, जबरदस्ती नहीं।

मुझे नहीं मालूम, मुझे कब और क्यों और कैसे हिन्दी से प्यार हुआ।
मेरी मतृभाषा तो तमिल और मलयालम की एक अजीब मिली जुली बोली है जो केरळ में पालक्कड जिले में बोली जाती थी।
पिताजी १९४० में केरळ छोडकर मुम्बई आकर बस गये। मेरा जन्म भी मुम्बई में ही हुआ और बचपन में मुम्बई की "बम्बैया हिन्दी" से मेरा परिचय हुआ। कई साल बाद जब राजस्थान और यू पी में मेरी पढाई हुई, मुझे अपनी हिन्दी सुधारने का मौका मिला था। हिन्दी की किबाबें पढने लगा।
हिन्दी फ़िल्मों से और हिन्दी फ़िल्मी गानों से मैं आकर्षित हुआ और इनसे बहुत कुछ सीखा हूँ।

हम तो अंग्रेज़ी और हिन्दी, दोनों भाषाओं में लिखते हैं। अंग्रेजी में आसानी से लिखता हूँ। हिन्दी में अभ्यास की कमी के कारण मुझे ज्यादा समय लगता है और गलतियाँ भी होती हैं खासकर लिंग सम्बन्धी गलतियाँ। हम दक्षिण भारती हिन्दी में लिंग के नियमों से बहुत परेशान होते हैं क्योंकि दक्षिण भारतीय भाषाओं में और अंग्रेजी में ऐसे नियम नहीं होते।

पर हिन्दी में लिखने में एक विशेष आनन्द अनुभव करता हूँ । पता नहीं क्यों!
आपने ब्लॉग जगत में शतक पूरा किया, उसके लिए मेरी हार्दिक बधाई।
आगे भी लिखते रहिए। हम तो पढने के लिए और टिप्पणी करने के लिए हाजिर होंगे। यदा कदा यदि हमारी ओर सी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो कारण केवल मेरी व्यस्तता है या मेरी अनुपस्थिति है। कभी कभी हम कई दिनों तक कंप्यूटर और इंटर्नेट से दूर रहते हैं।

नव वर्ष के अवसर पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

डॉ टी एस दराल said...

जैसे दिन भर की थकान सिर्फ घर आकर ही दूर होती है। वैसे ही अंग्रेजी के आवरण को हटा , हिंदी में जो सुकून मिलता है ,वो अंग्रेजी भाषा में नहीं है ।

बहुत सही कहा है । पूर्णतया सहमत हूँ मैं भी ।
इस सार्थक रचना के साथ आपको सपरिवार नव वर्ष की बधाई एवम हार्दिक शुभकामनायें ।

अरविन्द जांगिड said...

हिंदी भाषा के प्रति आपका समर्पण और सम्मान प्रशंशनीय है. मात्रभाषा से भाव प्रेषण में मौलिकता मिलती है और आत्म संतुष्ठी भी....१०० वे लेख के लिए आपको बधाई.

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

जी बिल्कुल सही कह रही है आप... मगर हिंदी माध्यमों के स्कूलों में की शिक्षा का स्तर बहुत ही गिरा हुआ है इसलिए लोग अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की तरफ जाते है... शिक्षा का स्तर हिंदी स्कूलों में सुधारना अति आवश्यक है. हिंदी को आगे बढाने का प्रयास इस जड़ से ही शुरू होना चाहिए..... सुंदर प्रस्तुति . नये वर्ष २०११ की हार्दिक शुभकामनाएं ..

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सारगर्भित सौवें लेख के लिये बधाई.
नये वर्ष की असीम-अनन्त शुभकामनाएं.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आपको और आपके परिवार को मेरी और मेरे परिवार की और से एक सुन्दर, सुखमय और समृद्ध नए साल की हार्दिक शुभकामना ! भगवान् से प्रार्थना है कि नया साल आप सबके लिए अच्छे स्वास्थ्य, खुशी और शान्ति से परिपूर्ण हो !!

राज भाटिय़ा said...

आप के विचार से सहमत हुं, अगर हम मे दम हो तो हम दुसरो(भारतियो) को भी हिन्दी बोलने पर मजबुर कर दे, यह बात मैरे मे ही नही मेरे बच्चे यहां पेदा हुये हे, ओर वो बहुत सी युरोपियन भाषा जानते हे, लेकिन घर ओर अपने लोगो से सिर्फ़ हिन्दी मे ही बात करते हे, वर्ना चुप रहना पसंद करते हे, चाहे कोई अनपढ ही कह दे, जब तक हम अपनी पहचान की इज्जत नही करेगे, दुनिया भी हमे इज्जत नही देगी. धन्यवाद इस सुंदर लेख के लिये

Amrita Tanmay said...

आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा .आपकी लेखनी को दाद देना पड़ेगा . सही में आप बहुत अच्छा लिखती हैं . आपसे जुड़ना सुखद लग रहा है .आपका हिंदी अनुराग भी काबिले तारीफ़ है .आपको शुभकामनायें

joshi kavirai said...

बर्नार्ड ने कहा था कि यदि किसी देश को गुलाम बनाना है तो उसकी संस्कृति को नष्ट कर दो फिर और कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं |
अमरीका में एक काले विद्रोही नेट टर्नर के बारे में एक पुस्तक छपी थी 'कन्फेशंस ऑफ नेट टर्नर'जिसमें एक वाक्य आताब इन लोगों का अपनी भाषा में गया गया एक समूह गीत तलवार से भी अधिक खतरनाक है |
किसी व्यक्ति और राष्ट्र के पास अपनी भाषा और संस्कृति से बड़ा कोई हथियार नहीं होता |

मुझे लगता है कि इस मोर्चे पर हम निहत्थे होते जा रहे हैं और यह निहात्थापन पता नहीं हमें और कहाँ ले जाएगा ?

आपकी भावनाओं और आलेख के लिए बधाई

रमेश जोशी

mahendra verma said...

हिंदी हम भारतीयों की शान है, हमें इसका मान रखना चाहिए।
आपने जो प्रसंग उद्धरित किए हैं, वे बहुत ही प्रेरक हैं।

मेरा मत है कि उच्च शिक्षा के अंतर्गत विज्ञान, तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में एक विषय के रूप में हिंदी का शिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।
........
आपकी लेख-श्रृंखला में 100वीं कड़ी जुड़ने पर बधाई।

वाणी गीत said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

हिंदी को समर्पित आपका ये १०० वां लेख काफी दिलचस्प लगा.
नए वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आशा करता हूँ कि
ब्लॉग लेखन की आपकी ये यात्रा अनवरत चलती रहे.
आप नित्य नए मुकाम छुएँ.

मनोज भारती said...

दिव्या जी !!! आपकी सौवीं पोस्ट हिंदी भाषा को समर्पित देख मन प्रसन्न हुआ...। हिंदी स्कूलों में भी प्रतिभाएँ होती हैं और जो प्रतिभाशाली होते हैं,उनका चिंतन और सोच अपनी ही भाषा में होने के कारण उनमें जो मौलिक विचार और सृजन की क्षमता होती है , वह अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े बच्चों में शायद संभव न हो । क्योंकि कल्पना की उड़ान मातृ भाषा में जिन उँचाइयों को छू सकती है वह किसी मातृतर भाषा में संभव नहीं है ...हाँ, यदि कोई कुशाग्र बुद्धि वाला बच्चा अपनी मातृभाषा से इतर किसी दूसरी भाषा में कल्पना करने की शक्ति अर्जित कर लेता है...तभी मौलिक विचार की उत्पत्ति उस भाषा में संभव हो पाती है ।

हिंदी भाषा के उत्थान के विषय में आपने लिखा, यह देख कर मन अति हर्षित हुआ, नव-वर्ष में हिंदी भाषा के उत्कर्ष की कामना के साथ...तथा इस आशा के साथ कि आने वाले वर्ष में आपकी पोस्टों के कम से कम तीन सैंकड़े और बने ...नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

एस.एम.मासूम said...

मुझे लगता है , हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उंचा करना बेहद जरूरी है.
Very true
.नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

Kajal Kumar said...

100 ! बल्ले बल्ले.
सचिन को पीछे छोड़ देना है :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सार्थक लेख ...विदेशों में जब अपनी भाषा बोलने वाला मिलता है तो लगता है कि हमारा अपना ही कोई है ...और देश में हिंदी बोलने से पिछडापन महसूस करना विकृत मानसिकता है ...


नव वर्ष की शुभकामनाएँ

अशोक बजाज said...

सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े .
नव - वर्ष २०११ की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

अभिषेक मिश्र said...

1oo वीं पोस्ट, हिंदी भाषा का विषय और हिंदी ब्लौगिंग इन संयोगों का जुडना सुखद है. उदहारण भी आपने काफी उम्दा दिया. शुभकामनाएं.

amit-nivedita said...

अंग्रेजी भाषा तो महंगे होटल और हाई-प्रोफ़ाइल पार्टियों में डिनर खाने के लिये ड्रेस कोड वाला लिबास जैसा है,जब कि हिन्दी भाषा तो आलथी-पालथी मारकर इत्मिनान से भोजन करने जैसी सहजता देता है। "बहुत अच्छा लेख है आपका,बधाई एवं आभार।

प्रतुल वशिष्ठ said...

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आपसे प्रेरणा मिलती है.


रुपया चलाये जाने वाले क्षेत्रों में डॉलर संभाल कर रखना चाहिए.
हिन्दी भाषी क्षेत्रों में इंग्लिश को आड़े वक्त के लिये ही रखना चाहिए.
इंग्लिश या किसी अन्य भाषा को प्रभाव जमाने के लिये इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
अभी भी हमारी मानसिकता रिआया वाली ही है जो आंग्ल भाषियों के आगे आत्महीनता से ग्रस्त हो जाती है.
धीरे-धीरे ही यह दूर होगा. आप यदि इसी तरह के प्रेरक प्रसंग बताएँगे तो यह आत्महीनता भी दूर हो ही जायेगी.

.

मनोज कुमार said...

शतक की बधाई।
सहस्र की कामना।
नव वर्ष की शुभकामना।
राजभाषा हिन्दी के प्रति आपकी निष्ठा को नमन।

अभिषेक मिश्र said...

1oo वीं पोस्ट, हिंदी भाषा का विषय और हिंदी ब्लौगिंग इन संयोगों का जुडना सुखद है. उदहारण भी आपने काफी उम्दा दिया. शुभकामनाएं.

अनामिका की सदायें ...... said...

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

Bhushan said...

आपकी पोस्ट पढ़ कर आँखों में पानी सा आ गया. पंजाबी भाषी हूँ, अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ा. बचपन में गोविंद वल्लभ पंत के हिंदी आंदोलन से प्रभावित हुआ था. आपने अंग्रेज़ी स्कूल के टीचरों से उल्टे हाथ पर डंडे खाए. भारत में केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में आज भी ऊँचे ओहदों पर बैठे अधिकारी (आईएएस या कोई भी हों) वैसे ही टीचर हैं जो हिंदी में काम करने वालों को चुपचाप सबक सिखा जाते हैं.

IRFANUDDIN said...

more than any thing else its a status symbol now to get admitted our kids into Convents and interact with them in English in front of others.... i am felling bad while writing here in English text..... next time for sure i am going to type here in Hindi in ur commnent box....Regards.

अरविन्द जांगिड said...

मैडम जी,

वैसे तो ब्लॉग पर हम सभी लेखन को आते हैं, विचारों पढते हैं, आपके विचार अत्यंत ही सुन्दर हैं इसमें कोई दो राय नहीं, फिर भी एक सुझाव है, आप अपने ब्लॉग को थोडा सा रंग दीजिए, टेम्पलेट डिजाइन में जाकर पोस्ट साइज़ को थोडा बढा दीजिए जिससे दोनों तरफ खाली पड़ी जगह भरी भरी सी लगे. कुछ भी करने से पहले ब्लॉग का पूरा बेक अप ले लीजियेगा जिससे यदि फिर पुरानी अवस्था में जाना हो तो विकल्प बच सके.

हो सकता है ये सुझाव आपको पसंद नहीं आये, लेकिन मैं चित्रकारी करता आया हूँ, इसलिए शायद आपके ब्लॉग के विषय में मैंने ऐसा लिखा है.

यदि आप को ब्लॉग दो डिजाइन करना हो दो एक बार बताइयेगा, ज्यादा तो नहीं लेकिन अभ्यास से JAVA, HTML की कुछ टिप्स मैं भी सीख चुका हूँ.

धन्यवाद.

If you have any query, please tell me on the below mentioned E-Mail address.

I will happy to share my knowledge.

arvindjangid@rocketmail.com

Gopal Mishra said...

जब मैंने पहली बार आपका comment अपने blog www.achchikhabar.blogspot.com पे देखा तो मुझे अंदाज़ा नहीं था की आप हिंदी ब्लॉगजगत की इतनी बड़ी blogger हैं. एक बार फिर से उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद.
आपको सौवें लेखे के लिए हार्दिक बधाई. मैं भी आपकी तरह हिंदी को promote करना चाहता हूँ ..खास तौर पे इन्टरनेट पे.

Dr Varsha Singh said...

‘हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर उंचा करना बेहद जरूरी है । इसी से वहां की शिक्षा में गुणवत्ता आएगी और लोगों की हिंदी में भी रूचि बढ़ेगी। वरना अंग्रजी के लिए दीवानापन दिनों दिन बढ़ता जाएगा।’ ...आपने सोलह आने सच लिखा है। हार्दिक बधाई।
नव वर्ष 2011 आपके एवं आपके परिवार के लिए सुखकर, समृद्धिशाली एवं मंगलकारी हो...

डॉ. नूतन - नीति said...

नववर्ष पर सौवीं पोस्ट का तोहफा .. वाह... और आपका हिंदी भाषा से लगे.. बहुत अच्छा लगा..आपका संस्मरण लेख के रूप में बढ़िया.. आपको बधाई और नव वेश के मौके पर आपके लिए और आपके प्रियजनों के लिए शुभकामनाएं .. नया साल मुबारक हो...

डॉ. नूतन - नीति said...

दिव्या जी !! जैसा अनुभव आपका है वैसा ही मेरा है... हमें उस ज़माने में स्कूल में हिंदी बोलते हुवे पकडे जाने पर ५० पैसा फाइन देना पड़ता था... और वही उच्च शिक्षा में विदेशी लेखकों के इंग्लिश की किताब... लेकिन हमारी मात्र भाषा हिंदी है.. और हमें हिंदी पर गर्व है.. आपका शुक्रिया इस लेख पर...

निर्मला कपिला said...

आपको सपरिवार नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।

shashi said...

ऐसे स्कूलों में क्यों पढ़े जिसमें पैसा भी दिया, आत्मगौरव भी!
लेकिन अब तो हर स्कूल में ये हाल है! शहरों में, खास कर महानगरों में जहाँ हर भाषा के लोग हैं, अंग्रेज़ी तो सार्वजनिक भाषा हो गई है|

हिंदी में बच्चों के लिए इतना वांग्मय भी नहीं, जो कम हिंदी जानने वाले के स्टार का भी हो| रोचकता में भी बहुत कमी है| अमरीका, कोरिया, जापान से आने वाले साहित्य (फ़िल्म, शब्द, विडीयो गेम व संगीत के रूप में) जो आता है वह बच्चे के लिए रोचक होता है| इस कारण भी बच्चे को स्कूल के काम के अलावा हिंदी पढ़ने के लिए प्रेरित करना मुश्किल होता जा रहा है |

लेकिन एक समस्या और है| वह है, कि हम आज अपनी संस्कृति के ज्ञान के अपार भण्डार को ही भूल चले| जिन के पास कुछ करने का रुतबा, पोजीशन है वे सब अंग्रेज़ी पढ़ते है! हिंदी ही नहीं तो संस्कृत तो क्या ही देखेंगे!

इस कारण मुझे संस्कृत के ज्ञान के प्रचार के लिए, और विभिन्न भाषी भारतीयों को एकजुट करने के लिए अंग्रेज़ी का सहारा लेना ही पड़ा|

कभी मौक़ा पड़े तो अवश्य देखियेगा - http://practicalsanskrit.blogspot.com और http://www.facebook.com/practicalsanskrit

भारतीयों के अलावा अन्य देशों व भाषाओं के लोग भी आते हैं|

जयकृष्ण राय तुषार said...

allahabad ki taraf se aapko nav varsh ki aseem shubhkamnayen.nice post thanks with regards

abhishek1502 said...

सभी भारतीयों को एक डोर से बंधने वाली अपनी मात्र भाषा हिंदी पर मुझे गर्व है . जब तक आप जैसे लोग रहेंगे हिंदी की बिंदी विश्व के ललाट पर शुसोभित होती रहेगी .

Muhammad Hamza said...

Good post.
We really need to love and learn to take pride in our own language.
English although been an international language,it can't take the place of our mother tongues,in my case,Urdu.
BTY,A very happy new year.(fromPakistan)

ZEAL said...

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अरविन्द जांगिड जी ,
आपका सुझाव अच्छा लगा लेकिन कंप्यूटर पर ज्यादा technicalities नहीं आती । इसीलिए ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करती , कहीं गड़बड़ हो गया तो सब डूब जाएगा।

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rachanabajaj said...

Dear ZEAL,

आपको आपके १०० वें लेख के लिये हार्दिक बधाई और नये वर्ष की शुभकामनाएं!! एक छोटा सा आग्रह है -- आपके निम्न वाक्य मे "मात्र-भाषा" की जगह "मातॄ-भाषा" लिखें.
// वरना कितनी शर्म की बात होती की एक हिंदी राज्य में रहकर और हिंदी मात्र-भाषा होने के बावजूद हिंदी नहीं आती। //

ZEAL said...

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रचना बजाज जी ,

मैंने आपके कमेन्ट से लेकर उसे एडिट कर दिया है। मैंने लेख लिखते समय बहुत कोशिश की थी लेकिन सही उच्चारण नहीं आ पा रहा था रोमन से । कृपया बताएं , किन अक्षरों को टाइप करने से सही शब्द "मातॄ-भाषा" मिला है , जिससे भविष्य में मुझे और अन्य पाठकों को सुविधा हो सके।

आभार।

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shashi said...

रचनाजी एवं दिव्याजी, ये समस्या कम्प्यूटर में टाइप करते समय आती है | इस सब की जड़ तक जाने के लिए एक सुन्दर लेख पढें जिसमे इस विषय का (कंप्यूटर पर भारतीय भाषा) पूरा इतिहास दिया है और दिया है भारतीय भाषाओं में टाइप करने के तरीके - http://practicalsanskrit.blogspot.com/2010/07/indic-transliteration-on-computers.html

गूगल का पेज http://www.google.com/ime/transliteration/ से सोफ्टवेयर डाउनलोड कीजीये या फिर नेट पर ही ब्राउज़र में टाइप करें -
http://www.google.com/transliterate/

अन्य कई वेबसाईट हैं जो इसमे मदद कर सकते हैं |

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

डॉ. दिव्या जी,
हिंदी के प्रति आपके स्नेह को नमन करता हूँ !
अपने ब्लॉग के माध्यम से आपका हिंदी के प्रचार प्रसार में योगदान सराहनीय है !
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

rachanabajaj said...

दिव्या जी,

मेरी पोस्ट पर मेरी संवेदना समझने के लिये तथा शुभकामानाओं के लिये शुक्रिया!!
मै हिन्दी लिखने के लिये Baraha/ Baraha Direct का इस्तेमाल करती हूं इसमे " मातृ " शब्द लिखने के लिये -
m+a+a+t+R+u keys का इस्तेमाल होता है. (+ का इस्तेमाल सिर्फ़ keys को अलग अलग करने के लिये किया है :) )

एस.एम.मासूम said...

Tippani of the Year 2010. ZEAL..

G Vishwanath said...

हिन्दी में टाईप करने के लिए आप किस औजार का प्रयोग करती हैं?
मैं Baraha का प्रयोग करता हूँ और मुझे कोई परेशानी नहीं होती।
"मातृभाषा" के लिए "maatRubhaaShaa" टाइप करता हूँ।
"मात्र" के लिए "maatr" टाइप करता हूँ।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

Poorviya said...

हिंदी के प्रति आपका प्रेम प्रशंसनीय है
नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ हिंदी में शतकीय लेख के लिए बधाई.

mridula pradhan said...

behad prernadayak lekh.padhnewalon per zaroor asar hoga aur asha hai sab milkar in bhawnaon ko aage badhane ki koshish bhi karenge.

ZEAL said...

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रचना जी , शशि जी ,
बहुत बहुत आभार आपका।

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विश्वनाथ जी ,
मेरे कंप्यूटर पर बारहा downloaded है , बहुत बार कोशिश की , लेकिन उसका इस्तेमाल करना नहीं आता। मैं तो ब्लॉग में ही टाइप करने की सुविधा द्वारा " enable hindi typing " के option द्वारा हिंदी में टाइप करती हूँ।

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मासूम जी ,
दिया हुआ लिंक पढ़ा
आभार आपका।

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दिगम्बर नासवा said...

१०० लेखों के लिए बधाई ... आपकी हर पोस्ट रोचकता बनाए रखती है ... ... ..
आपको और आपके पूरे परिवार को नव वर्ष मंगलमय हो ..

दीप said...

बहुत खिशी होती है जब कोई हिंदी के अपनत्व को दर्शाता है,
बहुत सुखद लेख लगा आप का, हिंदी के प्रसार प्रचार को हम आप जैसे ही आगे आ कर किया जा सकता है
बहुत - बहुत धन्यवाद शुभ कामना सहित दीपांकर पाण्डेय
http://deep2087.blogspot.com

निर्मला कपिला said...

कल जल्दी मे चली गयी थी आज पूरा आलेख पढा। मुझे भी हिन्दी से बहुत प्रेम है। आप जानती हैं कि मै अपने शहर मे अकेली हिन्दी लेखिका हूँ जबकि बाकी सब पंजाबी मे लिखते हैं। पंजाब मे हिन्दी लिखने वालों को हेय दृष्टी से देखा जाता है। मुझे लगता है देश को एक सूत्र मे पिरोने के लिये राष्ट्र भाशा ही एक अच्छा माध्यम है। किरण बेदी जी वाला प्रसंग पढ कर अच्छा लगा। शुभकामनायें।

G Vishwanath said...

दिव्याजी,

बरहा तो पूरा wordprocessor है जिसे मैं भी use नहीं करता।
latest version फ़िलहाल उपयोग मत कीजिए
कारण फ़िर कभी बताऊँगा

इसके बदले इससे पुराना Baraha Unicode Setup 9.2 ( जिसे अब आप download नहीं कर सकते) और जिसमे Baraha Pad aur Baraha IME शामिल है,उसका उपयोग कीजिए।
यह ज्यादा आसान है और सीधा सादा हिन्दी text file के लिए यही अच्छा रहेगा।
Internet से जुडा होना आवश्यक नहीं। इसे आप off line भी प्रयोग कर सकते हैं

केवल २ MB का फ़ाईल है जिसे आपको ई मेल द्वरा भेज रहा हूँ।
केवल आधे घंटे का अभ्यास आवश्यक है और यदि आप चाहें तो किसी दिन google chat पर आपको हम इसका प्रयोग सिखा देंगे।
आम शब्द तो आप खुद ही सीख जाएंगे और केवल क्लिष्ट शब्दों को टाइप करने में किसी की सहायता आवश्यक है।
baraha pad से आप किसी भी प्रान्तीय भाषा में text file टाइप कर सकते हैं
Baraha IME की मदद से आप Word/Excel/Powerpoint वगैरह में भी हिन्दी का प्रयोग कर सकते हैं
इसे अवश्य आजमाइए। मेरा विश्वास है के एक बार इसे अपनाने के बाद आप भविष्य में बरहा का ही प्रयोग करेंगे।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

ZEAL said...

बहुत आभार आपका विश्वनाथ जी। हम ज़रूर try करेंगे बारहा।

'उदय' said...

... jahaan tak mujhe yaad aa rahaa hai, aapne shuru men english men hi blog shuruvaat kiyaa thaa ... fir hindi men lekhan ... behad prasanshaneey ... century ... badhaai va shubhakaamanaayen !!

Sadhana Vaid said...

दिव्या जी इतने सार्थक और प्रभावशाली शतकीय आलेख के लिये हृदय से आपका अभिनन्दन करना चाहती हूँ ! हिन्दी के प्रति आपके मन में जो अनुराग एवं सम्मान है वह वन्दनीय भी है और अनुकरणीय भी ! अपनी भाषा में बोल कर व लिख कर जब हम वास्तव में गौरव का अनुभव करेंगे तभी सच्चे अर्थों में हम विश्व में इसे सम्मान दिलाने के लिये अग्रसर हो सकेंगे ! दुःख होता है यह देख कर कि अपने ही देश में हिन्दी भाषा का अनादर सबसे अधिक वही लोग करते हैं जिनकी मातृ भाषा हिन्दी है ! इतने सारगर्भित आलेख के लिये आपको बहुत-बहुत धन्यवाद ! नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करें !

boletobindas said...

आज की पोस्ट?

ZEAL said...

रोहित जी इंतज़ार का फल मीठा होता है।

ZEAL said...

नव वर्ष की मंगलकामनाओं एवं शतकीय लेख पर बधाई के लिए आप सभी का विनम्र आभार। मेरी इश्वर से प्रार्थना रहेगी की इस वर्ष भी सभी ब्लोगर साथी खूब तरक्की करें और खुशहाल रहें और समाज में अपने लेखों द्वारा भरपूर सकारात्मक योगदान करें।

स्वाति said...

सार्थक और प्रभावशाली लेख ...

ePandit said...

आपकी पोस्ट का विषय पसन्द आया। आपको एक बात बताना चाहूँगा हिन्दी चि्टठाकारी के शैशवकालीन दिनों में हम बहुत से चिट्ठाकार पहले अंग्रेजी में ही लिखा करते थे लेकिन एक बार जो हिन्दी में लिखना शुरु किया और जो आनन्द आया तो ज्यादातर का अंग्रेजी में लिखना छूट गया। सच में अपनी भाषा में लिखने का जो आनन्द में है वो अंग्रेजी में नहीं।

ZEAL said...

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@-ePandit

आपने सही कहा , एक बार जो हिंदी में लिखना शुरू किया , फिर जो आनंद आया तो इंग्लिश बहुत पीछे छूट गयी ।

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डॉ. दलसिंगार यादव said...

आज सर्फ़िंग करते करते आपकी इस पुरानी पोस्ट पर पहुंचा तो लगा कि मैं इस पर बहुत देर से आया। ख़ैर, देर आयत दुरुस्त आयत। आपके ब्लॉग पर लिखी गई हिंदी तो शुद्ध और प्रवाहमय एवं विचारों को व्यक्त करने में बेहद सक्षम लगी। फिर आप अपनी हिंदी से असंतुष्ट क्यों हैं? आप बिलकुल सही हैं कि देश के बाहर तो हिंदी का मान सम्मान है लोग जानते भी हैं और यही जानते हैं कि भारत की राजभाषा हिंदी ही है। परंतु देश में इसका विरोध है। यह तो मुट्ठी भर प्रभावशाली अंग्रेज़ीदाँ लोग है जो अंग्रेज़ी का आतंक कायम रखने के लिए हिन्दी की उपेक्षा करते हैं। ऐसे ही लोगों ने बहुसंख्यक को मन में भ्रम पैदा कर रखा है कि अंग्रेज़ी से देश जुड़ हुआ है। मेरा तो मानना है कि अंग्रेज़ी के बावज़ूद देश एक बना हुआ है।

chandksharma2gmail.com said...

निजी अनुभवों से भरा आप का लेख बहुत ही प्रेरणादायक है। फेसबुक और जील के माध्यम से आप हिन्दी और हिन्दू समाज की अभूतपूर्व सेवा कर रही हैं जिस की जितनी भी प्रशंसा की जा सके वह कम है। आप को बहुत बहुत बधाई हो। मेरी शुभइच्छायें स्वीकार करें।

Smita said...

zeal....mujhe bahut afsos hai ki tumhari itni purani post par aaj tak mera nazar kaise nahi padi....bilkul tumne mere man ki baat utaar kar rakh di hai apne shabdo me..main bhi ek convent school ki hi teacher hoon...aur vo bhi aise jisme aadhi se jyada hi jansankhya bilkul grameen parivesh ke bachcho ki hai...aur ve hindi tak thik se nahi bol pate to unhe english me padha pana kitna mushkil hota hai sahaj samajh sakti ho....phir bhi kya kiya jaye.....par bahut dukh hota hai...ki fr. sr. ke baar baar english me baat karne aur na bolne par fine kar dene ki dhamki sun kar....kya karoon ??