Thursday, January 27, 2011

' उत्सव ' नामक युवक -- एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

'उत्सव' एक बेहद ज़हीन और गोल्ड-मेडलिस्ट युवक हैपिता BHU में mechanical engineering के अध्यापक हैं तथा माता ' मनोविज्ञान' विषय की अध्यापिका हैं

इस युवक ने रुचिका काण्ड के अपराधी - " राठोड " तथा अरुशी काण्ड के अपराधी ' डॉ तलवार ' पर कातिलाना हमला कर स्वयं ही सजा दे दीदोनों आरोपियों कों न्याय प्रक्रिया की मंथर गति के चलते सजा नहीं हुई और मासूम बच्चियों कों न्याय नहीं मिला

प्रश्न यह है की एक सभ्रांत परिवार के युवक उत्सव ने ऐसा कदम क्यूँ उठाया ?

  • उत्सव एक भावुक और संवेदनशील ह्रदय वाला युवक हैजिसने उन अनजान बच्चियों का दुःख महसूस किया जो असमय ही हिंसक पुरुषों की लालच और हिंसा का शिकार हुईं
  • उत्सव ने victims के परिवार वालों की असहायता कों महसूस कियाजिन्होंने इतने वर्ष दुःख और तिरस्कार झेले , उनका दर्द समझा
  • अपराधी समाज में निरंकुश घूम रहे हैं और कानून व्यवस्था लाचार है , इस लाचारगी कों महसूस किया
  • दोषियों कों सजा मिलनी ही चाहिए , ये सभी कहते हैं , लेकिन उसने उन्हें सजा दी ।
  • उत्सव कों अपने किये का कोई पछतावा नहीं है , क्यूंकि वो जानता है की उसने सज़ा गुनाहगारों कों दी है और ये गुनाहगार कानून से बड़ी सफाई से बच निकलेंगे
  • उसे अपना अंजाम का कोई खौफ नहीं है , क्यूँ इस घृणित समाज में रहने की उसकी इच्छा समाप्त हो चुकी है
  • मई सन २००८ में , IBM बैंक के २६ वर्षीय एक युवक ने आत्महत्या कर ली थीअपने suicide note मेंउसने लिखा था - " मैंने ये दुनिया पूरी देख ली हैनया कुछ बचा नहीं है , इसलिए मरने के बाद आगे की दुनिया देखना चाहता हूँ " । आज नयी पीढ़ी , मानसिक रूप से बहुत सक्षम है , बहुत आगे तक सोच लेती है विज्ञान ने प्रकृति कों और रहस्यों कों काफी हद तक खोल दिया हैये रहस्योद्घाटन जीने की इच्छा कों भी समाप्त कर रहे हैंप्राकृतिक संतुलन ख़तम हो रहा है
  • उत्सव जैसे ज़हीन युवकों की आँखों में 'सपने' नहीं बल्कि सीने में आग है
  • आज उसे भी मानसिक रोगी कहकर , न्याय प्रक्रिया की शिथिलता द्वारा बचा लिया जाएगा
भारत में कोई नहीं सजा पाताचाहे वो आतंकवादी कसाब हो , राठोड हो , डॉ तलवार हो अथवा उत्सव होसब बच जायेंगे


युवकों से अपील -
  • अपने सपनों कों मरने मत दीजियेआपके सपने ही आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और आपकी हिफाज़त करते हैं
  • अपनी जिंदगी में संतुलन बनाए रखिये । अपने अन्दर की आग से खुद कों बचा कर रखिये । इस आग का सकारात्मक उपयोग कीजिये।
  • आस - पास हो रही घटनाओं से विचलित होकर ऐसे भयानक कदम मत उठाइये , जो आपके सुन्दर जीवन कों बर्बाद कर देये जीवन अनमोल है , इसकी कद्र कीजिये
  • समाज की कार्य प्रणाली से असंतोष है और मन में आक्रोश है तो सकारात्मक तरीके से अपना योगदान कीजियेसमाज में सुधार लाने के बहुत से विकल्प हैंहिंसा का मार्ग उचित नहीं है
  • आपका जीवन अनमोल है , इसलिए कोई भी ऐसा कदम मत उठाइये जिससे आपको नुक्सान पहुंचे ।
  • हर निर्णय लेने के पूर्व बहुत बार सोचिये
अभिभावकों से अपील -
  • अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय गुजारिये
  • आपका जितना ज्यादा प्यार आपके बच्चों कों मिलेगा , वे उतना ही मज़बूत बनेंगे और आस पास घटित विसंगतियों कों झेलने की ताक़त पायेंगे
  • उनके साथ हर उम्र में भरपूर interact कीजियेउनके भावुक , बाल-मन में आने वाले हर प्रश्न कों जानिये और यथा शक्ति उनकी जिज्ञासाओं और उलझनों कों शांत कीजिये
  • ध्यान रहे - " जो बीज बोयेंगे आज , वही काटेंगे कल "
  • अपनी संतान कों अवसाद ग्रस्त होने से बचाएं ।

78 comments:

STRANGER said...

This guy seems to be mentally ill, needs consultation.

P S Bhakuni said...

> उत्सव....उसे अपना अंजाम का कोई खौफ नहीं है , क्यूँ इस घृणित समाज में रहने की उसकी इच्छा समाप्त हो चुकी है......।
shayad yahi sach hai, ek behtrin post hetu abhaar........

वन्दना said...

दिव्या जी बहुत ही सारगर्भित आलेख है ……………सभी को सोचने को विवश करता है।

sada said...

बहुत ही विचारणीय लेखन ...।

निर्मला कपिला said...

दिव्या बहुत अच्छा सार्थक आलेख है। बहुत अच्छा प्रमर्श दिया उवाओं को भी और माँ बाप को भी। धन्यवाद, शुभकामनायें।

संजय भास्कर said...

REALY DIVYA JI ....SOCHNE PAR VIVAS KAR DIYA HAI

दीर्घतमा said...

भारत में केवल देश भक्तो को ही आरोपित और कय्घरे में खड़ा किया जाता है क्यों की देश इस समय एक विदेशी के हाथ का खिलौना बना हुआ है

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

आज के ज्वलंत और दुखद विषय पर आपका सार्थक लेख मन-मष्तिस्क को झकझोर देने में सक्षम है |

mahendra verma said...

उत्सव से संबंधित घटना के माध्यम से आपने युवावस्था के मनोविज्ञान का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया है।

लचर कानून व्यवस्था, अभिभावकों की उदासीनता और अपरिपक्व सोच के कारण आज की युवापीढी दिग्भ्रमित सी हो गई है और आत्मघाती क़दम उठा रही है। यह बहुत चिंताजनक स्थिति है।

किशोरावस्था के अंतिम चरण से ही मन में क्रंतिकारी विचार पनपने लगते हैं। यदि अभिभावकों का सही मार्गदर्शन न मिले और सही संगति न मिले तो युवावस्था के आते तक ये विचार विद्रोह का रूप लेने लगते हैं।

युवकों को उचित दिशा निर्देश दे कर विद्रोह की इस नकारात्मक उर्जा को रचनात्मक कार्यों में रूपांतरित किया जा सकता है।

युवकों और उनके अभिभावकों को आपने जो सुझाव दिए हैं, वे बहुत उपयोगी हैं, सभी को इन सुझावों पर अमल करना चाहिए। आपके सुझावों पर अमल करने से स्थिति में सुधार लाना निश्चित रूप से संभव है।

इस महत्वपूर्ण और सामयिक आलेख के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, दिव्या जी।

sagebob said...

बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है आपने.सच में बच्चों के साथ ज़्यादा समय गुजरने की जरूरत है .ज्ञानवर्धक आलेख के लिए बधाई.

ashish said...

ये समाचार पढ़ा था और उत्सव के पिता का मीडिया में बयान भी की उनका बेटा बीमार है . मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का विषय है ये और आपने बढ़िया कोशिश की है .

शिव शंकर said...

भारत में कोई नहीं सजा पाता । चाहे वो आतंकवादी कसाब हो , राठोड हो , डॉ तलवार हो अथवा उत्सव हो । सब बच जायेंगे।

जी बिल्कुल, हमारी न्याय व्यवस्था में बहुत सुधार की आवश्यकता है ।

सार्थक प्रस्तुति, धन्यवाद ।

शिव शंकर said...

भारत में कोई नहीं सजा पाता । चाहे वो आतंकवादी कसाब हो , राठोड हो , डॉ तलवार हो अथवा उत्सव हो । सब बच जायेंगे।

जी बिल्कुल, हमारी न्याय व्यवस्था में बहुत सुधार की आवश्यकता है ।

सार्थक प्रस्तुति, धन्यवाद ।

शारदा अरोरा said...

सारे समाज का गुस्सा उत्सव के जरिये निकला है ....मगर ये अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं है ....अपनी ऊर्जा को सही दिशा दीजिये ...अपने सपनों के साथ सबके सपनों को उड़ान दीजिये ...मन मर जाता है तो बाकी कुछ नहीं रहता , अपने हौसले को आसमान दीजिये ...आपने प्रश्न भी उठाया है , लिखा अच्छा है ...

AS said...

It does make one think, where did we go wrong? Mentally ill? No i do not think so. Its more of the upbringing he had. Its the responsibility of the parents to see that the kids are bought up in the right way to have the right perspective of things. Here the sad part is that both the parents were educated, but i think lost in their own world and left the poor kid to fret out his problems alone.
Mental stress can make or break, there has to be a proper outlet to it. The parents have traditionally played this role, and in the indian context would continue to play so. Maybe its this syndrome effecting the parents too, of following the western culture of letting the kids free earlier, and let them fret for them self ...

DR. PAWAN K MISHRA said...

व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश दीखता है

अरविन्द जांगिड said...

सार्थक सन्देश देती रचना, ये भी मानव स्वभाव ही है जब वो आक्रमण पर आमादा हो उठता है, लेकिन संयम भी जरुरी है आखिर जानवर और मानव में यही फर्क है...लेकिन ये भी सत्य है की ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं जब सयंम रखना बड़ा कठिन हो पडता है.

अभिभावकों को विशेष रूप से अपने पाल्यों को ऐसी परवरिश देनी चाहिए जो हर कदम में साथ रहे.

Mukesh Kumar Sinha said...

ye aakrosh nyay vyastha ke virudhh hai...adalat koi bhi case pe twarit karyawahi nahi karta...!!


#mera blog open nahi ho raha, koi suggestion dijiye, kya karun....:(

डा. अरुणा कपूर. said...

दिव्या जी!..उत्सव न्याय व्यवस्था में परिवर्तन चाहता है!....लेकिन उसके लिए जो कोशिश कर कर रहा है,वह गैर कानूनी है!..इससे उसका मनोरोगी होना साबित हो रहा है, ऐसे में उसका साथ देने के लिए कोई आगे नही आएगा!...अब हमारे अंधे-कानून के बारे में कहना भी क्या?...आरुषि मर्डर केस को ही देखें तो अब तक कितनी देर हो चुकी है!...सारे सबूत मिटाए जा चुके है और अपराधी को पहचान कर भी गिरफ्तार करने के लिए कोर्ट या पुलिस के पास कोई कडी नही है!...आपकी पोस्ट यथार्थ की ओर इंगित कर रही है!

Dilbag Virk said...

sunder lekh , nyay prkriya ka kachhuae ki chal chlna yuvkon ko avsaad grast kar rha hai . utsav bhi isi ka shikar hua hai . aapne yuvkon aur abhibhavkon se apil karke bahut achchha kam kiya hai .

दिनेश शर्मा said...

सारगर्भित एवं संदेश-परक आलेख। आभार!

प्रवीण पाण्डेय said...

हताश होने से भी कोई लाभ नहीं, चिन्तनीय विषय।

अरुण चन्द्र रॉय said...

दिव्या जी बहुत ही सारगर्भित आलेख है ……………सभी को सोचने को विवश करता है।

रूप said...

Good one, but Is it justified. youth like 'Utsav' should have adopted different methods. b'cause Rathore and Talwars are numerous and they need be treated in a different way. May be by existing a log helps justify youngsters like 'Utsav'. ye d way. good to hear 'Vijayi vishwa......'

shiva said...

बहुत ही सारगर्भित आलेख है

deepak saini said...

हमारी न्याय व्यवस्था में बहुत सुधार की आवश्यकता है ।

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

उत्सव का ये कदम आज की न्यायपालिका से विश्वास उठने जैसा है जहाँ की तारीखों पर तारीखें दी जाती हैं और न्याय नहीं मिलता ..सिर्फ एक झूठा भ्रम न्याय पाने का ... या फिर इतना लेट की यों कहे तब पह्तावे होत जब चिड़िया चुग गयी खेत |

आपकी पोस्ट कल चर्चामंच पर होगी...आपका आभार

ADITI CHAUHAN said...

ham sab ke andar ek 'utsav' chhupa hua hai. bas baahar nahi aa paata. system ke upar yakeen khatm hone lage to aise utsav saamne aayenge hi
nice topic
thanks

डॉ टी एस दराल said...

बेशक उत्सव मानसिक रूप से विक्षिप्त है । तभी तो उसने ऐसा कदम उठाया । हम मानसिक संतुलन बनाये रखने वाले इस दोषपूर्ण न्याय प्रणाली के आगे ह़ार जाते हैं ।

P.N. Subramanian said...

बहुत ही सुन्दर समझाईश.

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

आपने तार्किक रूप से उत्सव के व्यवहार को समझाया. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.
हो सकता कि एक-दो कारण और भी रहे हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जो कारण आपने गिनाएं, उनमें ही सत्यता महसूस होती है.उपाय भी बेहद व्यवहारिक और सार्थक हैं.

मुनव्वर सुल्ताना said...

युवाओं के लिये उत्साही बने रहने का सुझाव, अभिभावकों के लिये बच्चों के प्रति उदासीन न रहते हुए सजग रहना लेकिन रहना ऐसी ही व्यवस्था में। हिंसा की परिभाषा की व्यापकता पर विचार विमर्श आवश्यक है वरना अमर शहीद भगत सिंह, आज़ाद जैसे लोगों पर मात्र हिंसक होने का टैग लगा कर दरकिनार कर दिया जाएगा और गांधी-नेहरू को देश की स्वतंत्रता का सारा श्रेय दे दिया जाए जिसका परिणाम आज कांग्रेस के चरित्र में देखा जा रहा है कि सबरीमाला में लाशें उठायी जा रही हैं और देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस के युवराज पार्टी में व्यस्त हैं। न्यायपालिका के ठेकेदारों को भी कुछ सुझाव दे दीजिये।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

उत्सव क्या वाकई में सजा का पात्र है! मुझे ऐसा नहीं लगता. एक लड़का जो ठीकठाक पढ़ा लिखा है, आखिर क्यों हमला करता है. मुझे ऐसा लगता है कि यह हमला सिस्टम पर है, उसके दोषों पर है..

nivedita said...

हमारी सबसे बड़ी शत्रु हमारी हताशा ही है । आपका लेख आज के बच्चों को जरूर पढ़ना चाहिए

Patali-The-Village said...

बहुत ही विचारणीय लेख! सभी को सोचने को विवश करता है।

kaafir said...

दिव्या जी..

उत्सव जैसे युवा जो ऐसे असंतोष और क्रोध से भरकर लोगो की सरेआम हत्या करने पर उतारू है...

चाहे भले ही वो अपराधी ही क्यूँ ना हो.. ऐसा व्यवहार तो पाशविक ही कहा जाएगा... असामान्य

ही कहा जाएगा.. और ऐसा कोई मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति नहीं करता.. बल्कि एक मानसिक

रोगी ही कर सकता है.. अगर इसी तरह लोग अपने हाथो सजा देने लगेंगे.. तो देश और समाज कैसे

कार्य करेगा..

भारत में कोई नहीं सजा पाता । चाहे वो आतंकवादी कसाब हो , राठोड हो , डॉ तलवार हो अथवा उत्सव हो । सब बच जायेंगे।

ये आपने क्यूँ कहा | कोई भी देश या व्यवस्था भावनाओं से नहीं चल सकता..सब के लिए उस देश के इतिहास

काल और परिस्थितियों के तहत क़ानून बनाए जाते है जिनपर किसी देश का सविधान काम करता है..

कसाब एक अंतररास्ट्रीय अपराधी है इसलिए भारत को उन नियमो से चलना होगा.. उसे युद्द अपराध में

फ़ासी दी जा चुकी है और उसे वो सजा मिलेगी भी | राठोड भी जमानत पर है..उसे छोड़ा नहीं गया है और

क्या कोई पक्की तरह से कह सकता है की डा.तलवार अपराधी है ?

मैं किसी का पक्ष नहीं लेता..पर किसी के कह देने से तो कोई अपराधी नहीं हो जाता

कानून है अभी देश में.. भारत में देर है अंधेर नहीं है

किसी देश देश को वही मिलता है जिसके वो काबिल हो..और भारत में सुधार हो रहे है

और फिर कमी तो हर जगह है ...

मनोज कुमार said...

बहुत ही सारगर्भित आलेख जो इस प्रश्न के विभिन्न पहलुओं की तर्क संगत व्याख्या करता है और साथ ही उचित सलाह भी देता है।

राज भाटिय़ा said...

दिव्या जी अब समय आ गया हे देश मे जनता के न्याय का, कब त्क इन नोजवानो को कोई रोकेगा...... भगत सिंह ओए सुभाष चंद्र जी को कोई रोक पाया था, अगर सरकार सोती रही तो देश को तो जागना ही पडेगा, कब तक अपनी मां बहिन की इज्जत को लुटते कोई देख सकता हे..... अब यह चिंगारी बुझने वाली नही, अभी तो भडके गी ओर भी...... ओर इन सब को लपेट मे ले गी

: केवल राम : said...

सोचने पर विवश करता आलेख ....आपकी परखी नजर को सलाम ...प्रस्तुतिकरण का अंदाज और भी बढ़िया

अजय कुमार झा said...

एक बहुत ही बेहतरीन पोस्ट दिव्या जी । उत्सव के बहाने बहुत से संदर्भ तलाशे आपने ..आज उत्सव उन तमाम आक्रोशों का प्रतीक बन गया है जो अपने शैक्षणिक सामाजिक पृष्ठभूमि को सिरे से नकार कर ऐसी ही एक बलकट्टी अपने दिलों में लिए बैठे हैं..वैसे मुझे यकीन है कि ऐसे सिरफ़िरे कहे जाने वाले उत्सव ही राठौडों के मुंह की हंसी छीन लेंगे ..

Rajesh Kumar 'Nachiketa' said...

अपने अन्दर की आग को संभाल कर और समय पड़ने पर सही दिशा में इस्तेमाल करने की जरूरत है.....ठीक वसे ही जैसे पेट के भोजन को पचाने वाला रह अगर ठीकस इ इस्तेमाल ना हो तो कहीं वो आँतों को ही ना पचा डाले {इसमें कोई वैज्ञानिक सुधार की जरूरत हो तो डॉ साहिबा जरूर मदद कीजिये.}
ज्यादा ऊर्जा जब हो तो विनाश का कारन बनता है (जैसे परमाणु बम में) और अगर उसे controlled तरीके से use किया जाए तो सब को काम में आता है (जैसे nuclear reactor द्वारा बिजली बानानें में.)
सार्थक लेख.
राजेश

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

दिव्या जी, आपकी हर अपील .......... काबिलेतारीफ. बहुत ही विचारणीय प्रस्तुति.

शोभना चौरे said...

prerk aalekh

वाणी गीत said...

युवकों की मानसिक स्थिति का अच्छा विश्लेषण किया है आपन ...हर तरह अव्यवस्था और अन्याय मानसिक संतुलन पर बुरा असर डालता ही है ...
ये सही है की जो बोयेंगे वाही काटना पड़ेगा !

boletobindas said...

अच्छी सोच के साथ विश्लेषण करता आलेख.

Kunwar Kusumesh said...

जी देश में ध्वस्त कानून व्यवस्था देख कर उलझन तो होती है,पर निर्णय लेने में दिमागी संतुलन खो देना भी उचित नहीं.

Coral said...

बहुत अच्छा किया है विश्लेषण आपने! बात तो सौ आने सच है --- जो बीज बोयेंगे आज , वही काटेंगे कल

Suresh Chiplunkar said...

उत्सव जैसे हजारों युवा हमारे आसपास ही हैं… उनके गुस्से और ऊर्जा का "सही" और "उचित" जगह इस्तेमाल करने वाला कोई संगठन नहीं है, अधिकतर बार यह ऊर्जा और गुस्सा असामाजिक तत्वों के हाथ लग जाता है या फ़िर निराशा में नशे का आदी हो जाता है… कम से कम उत्सव इन दोनों बुराईयों के हाथों में पड़ने से बचा रहा…

उत्सव ने जो किया, "वैसा ही कुछ" करने के इच्छुक भी लाखों लोग हैं… बस हिम्मत नहीं जुटा पाते…

rakesh kumar said...

Aapke diye gaye sujhav 'Srimadbhagwad Geeta'me diye gaye 'Vishad Yog' ki taraf ingit karte hai.Vishad ki awastha hum sub ke jivan me aati hi rehti hai aur yadi vishad ka hal sahi prakar se nahi kiya jata to visfot hota hai aur anek mansik aur sharirik rogo ka janam hota hai.yadi vishad se hi yog bana liya jaye to vishad bhi jivan me aage badhne ka sadhan ho sakta hai aur vishad yog ban jata hai.Maa bapo ka apni santano se accha communication rahe aur bachche apni poblems ko khul kar apne maa bapo se discuss kar sake , maabap unko theek se sune aur sahi suzav de to bachcho ka visad yog suru se hi banne lagta hai aur jivan me is tarah ki apriya ghatna hone se bach sakti hai.

મલખાન સિંહ said...

​विश्लेषण अच्छा है। आदर्श ​स्थि​ति यही है ​कि समाज सभ्य हो। ले​किन अगर ​किसी पी​ड़ित को न्याय ही नहीं ​मिलेगा तो क्या होगा? यह प्रश्न अहम है। य​दि कसाब बच जाएगा तो क्या होगा। हमारा समाज ​पिछड़ता जाएगा। और ​किसी न ​किसी को कानून हाथ में लेना ही पड़ेगा। यह जरूरत से ज्यादा मजबूरी है मैडम।

Sawai Singh Raj. said...

आदरणीय डॉ.दिव्याजी
आपकी रचना वाकई तारीफ के काबिल है !

Sawai Singh Raj. said...

लेकिन तारीफ के लिए शब्द नही है!

मेरे पास ........

G Vishwanath said...

Utsav needs to be handled with sympathy.
I agree with your analsysis of his state of mind.
There is enough provocation in our country to cause such behaviour.

The latest news is that the there will be no eyewitnesses to the burning alive of the Government officer available to testify in a court of law.
The oil mafia must have threatened the witnesses.

So how will justice be done? What can a judge do, if there are no witnesses to give evidence?
This frustration exists in the minds of most law abiding people, but we only complain and don't do anything about it.
Utsav is an exception and reacted. Of course what he did cannot be justified. His act can only be understood.
I hope they give him some nominal punishment, and counsel him and then let him go.
We are unable to punish greater criminals. Utsav is not a criminal, in my opinion, merely a frustrated defaulter and a person with symptons of mental illness.

Regards
GV

sanjay jha said...

is se phale ke 'utsav' vyavsta ki mar pe chikhte hue ek bare barg ka 'ideal' bane.......'vyavastha'
ko khud sarkar niyantrit kare.....anyatha ye to agaz hai......anzam kya hoga?

pranam.

abhishek1502 said...

उत्सव द्वारा किया गया कार्य सही नही ठहराया जा सकता और इस की असली दोषी हमारी न्यायपालिका है जहा पर इन्साफ या तो मिलता ही नही और यदि मिलता भी है तो बहुत देर से .
ये सत्य है की विज्ञानं ने बहुत से प्रकति के रहस्य खोल दिए है . पर उस का प्रभाव सकारात्मक है जो हमें प्राकतिक व्यवस्था समझने में मदद करता है . अतः मैं इस बात से बिलकुल भी सहमत नही हू की इस के कारण जीने की इच्छा समाप्त हो रही है . ये हमारी व्यस्त जीवन शैली का दोष है .

cmpershad said...

उत्सव की उत्सुकता में भावुकता का मिश्रण !!!!!!

सम्वेदना के स्वर said...

एक विचारणीय पहलू यह भी कि अगर आज़ादी की लड़ाई के समय भी मनोवैज्ञानिक होते तो भगतसिंह, राजगुरू, आज़ाद, खुदीराम बोस आदि नवयुवकों को यही सलाह दी जाती????

शाकिर खान said...

what a good blog


alway write good things
मिनिस्टर का लड़का फ़ैल हो गया । kya minister use goli maar dega

amar jeet said...

अच्छी रचना
इस बार मेरे ब्लॉग में क्या श्रीनगर में तिरंगा राष्ट्र का अहित कर सकता है

मैं.. और, ब्लॉगर ? said...


उत्सव :
1860 में बनाये गये पुलिस और न्यायप्रक्रिया में उलझा
चौपटराज के अँधेर नगरी का एक अर्ध-विक्षिप्त नागरिक,

ZEAL said...

.

@ संवेदना के स्वर -

भगत सिंह , राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और खुदीराम बोस जैसे वीरों की तुलना आपने उत्सव जैसे युवक से करके देशभक्तों का सरासर अपमान किया है।

देशभक्तों ने अपने देश के लिए अपनी जान दी है , किसी पर कातिलाना हमला नहीं किया। उन्होंने अपने करोड़ों देशवासियों के हक के लिए लड़ाई लड़ी । वो हमारे लिए मिसाल हैं।

उत्सव एक मानसिक रूप से असंतुलित युवक है , जिसको अपनी भावनाओं और गुस्से पर नियंत्रण नहीं है । ऐसा युवक समाज में ख़तरा है । उसकी भावनाओं कों समझा जा सकता है , लेकिन उसके निंदनीय कृत्य कों justify नहीं किया जा सकता। दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं है । पूरी व्यवस्था दोषी है । CBI ने केस बंद कर दिया , सबूतों कों मिटा दिया गया । न्याय प्रक्रिया में विलम्ब आदि के चलते अनेक लोग दोषी हैं। उत्सव किसको- किसको चाक़ू मारेगा ? यदि उत्सव जैसे दो-चार देशभक्त और हो जाएँ तो आम जनता का सड़क पर चलना मुश्किल हो जाएगा। यदि यही देशभक्ति है तो आपको भी हाथ में चाकू लेकर दो चार अपराधियों कों निपटा ही देना चाहिए । विलम्ब किस बात का ?

उत्सव जैसे युवकों के कारण हमारे अन्य युवक गलत शिक्षा न ले लें , इसलिए वो अपील जरूरी समझी ।

यदि आपका बच्चा किसी कों चाक़ू मारता , तो आप उसे देशभक्त नहीं कहते , आपकी हालत भी उत्सव के माँ-बाप जैसी ही होती। फिर भी यदि आपको 'उत्सव' का कृत्य उचित लगता है तो आप अपने बच्चे के सामने उसकी मिसाल रख सकते हैं।

.

amit-nivedita said...

very detailed and minutely analysed post.

Bhushan said...

युवाओं का जीवन किसी भी अन्य चीज़ से अधिक महत्वपूर्ण हैं. बहुत सकारात्मक पोस्ट है.

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" said...

बालकोँ के संदर्भ मेँ आपका आवाहन प्रत्येक अभिभावक के लिए विचारणीय । धन्यवाद ।

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर प्रेरक आलेख प्रस्तुति के लिए आभार

dhirendra said...

गहन दृष्टि, व्यापक विश्लेषण.

हरीश जोशी said...

नमस्कार........आपकी रचना वाकई तारीफ के काबिल है
मैं ब्लॉग जगत में नया हूँ, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें......

http://harish-joshi.blogspot.com/

आभार.

सम्वेदना के स्वर said...

@ ZEAL

बच्चे की बात तो जानें दे दिव्या जी,उसे तो तब कुछ कहें जब स्वंम की स्थिति स्पष्ट हो।

अभी तो अपने मनोविज्ञान से ही जूझ रहे हैं, लगता है कि अक्सर अपनी इसी सुविधाभोगी और सिर्फ गाल-बजाने की प्रवृति ने हमें Argumentative Indian के खिताब से नवाज़ा है।

एक "उत्सव" है भीतर कहीं हम सब कायर्रों के,जो सन्देह करता है इस पूरी व्यव्स्था के आयोजन पर, जो पूछता है कि यह कैसी आजादी है? सिर्फ हुक्मरान बदले हैं..व्यव्स्था तो जस की तस है?

मनोविज्ञान की उलूल-जलूल बातों से न तो प्रेम को समझा जा सकता है न इस आक्रोश को! भारतीय व्यव्स्था को एक गहरे कथार्सिस की जरुरत है, उससे पहले वो सरल नहीं हो सकेगी शायद!

This Catharsis is long overdue and postponing it further will prove fatal!

SAJAN.AAWARA said...

MAM APKA YE LEKH KAFI PRERNADAYAK HAI. . . . . . . . . . . JAI HIND JAI BHARAT

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