Thursday, August 30, 2012

लम्पट-ब्लॉगर

प्रिंट मीडिया के एक समाचार पत्र में हिंदी ब्लॉगर्स को 'लम्पट' कहा गया !

कारण -- ईर्ष्या !

हिंदी ब्लॉगर्स दुनिया की सबसे शान्तिपूर्ण प्रजाति के हैं ! वे बेख़ौफ़ हर विषय पर अपनी लेखनी चलाते हैं , बिना किसी शोहरत और पैसों के मोह के ! क्या समझेगी इस बात को बिकी हुयी मीडिया ! खुद तो ब्लॉगर्स के बेहतरीन आलेख चोरी करके छापते हैं और उससे मुनाफा कमाते हैं ! चोरी और लूट मचाकर डाका डालते हैं हमारे ब्लॉग्स पर और ऊपर से तुर्रा ये की ब्लॉगर्स लम्पट हैं !

मीडिया वाले आजकल कामचोरी करते हैं काम करते नहीं केवल तनख्वाह लेते हैं ! ब्लॉग्स और फेसबुक से लेखकों के विचार चुराते हैं और उस पर हल्दी , अजवाईन का तड़का लगाकर अपने नाम से छाप देते हैं !

मेहनत हमारी , मुनाफा इनका !

नहीं चलेगा ये अन्याय ! हम सभी स्त्री एवं पुरुष ब्लॉगर्स की तरफ इस घटिया बयान का पुरजोर विरोध करते हैं ! डरपोक हैं ये , डरते हैं ये ब्लॉगर्स से ! ब्लौगिंग की लोकप्रियता ने असुरक्षा पैदा कर दी है इनके दिलों में ! ऐसा बयान व्यक्ति की द्वेषपूर्ण सोच और तंगदिली की तरफ इशारा करता है ! सुधर जाईये !

वन्दे मातरम् !

Zeal

27 comments:

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

हाहहाहाहाह मेरे लिए तो एक तरफ कुआं और दूसरी ओर खाई.. अच्छा यही होगा कि खामोश रहूं।

वैसे अगर बात लंपटों की हो तो मैं दावे के साथ कहा सकता हूं कि ये दोनों जगह हैं और हां संख्या भी बराबर ही होगी..अंतर बडे और छोटे लंपट का हो सकता है।

lokendra singh said...

सख्ती से इस मानसिकता का विरोध होना चाहिए... अभी भोपाल में मीडिया चौपाल में भी ये बात सामने आई थी.

कुश्वंश said...

लम्पट कौन है ज्यादा विश्लेषण करने की न जरूरत है न समझने की, बिका हुआ प्रिंट मीडिया (सभी नहीं) तभी कुछ कहने की हिम्मत जुटा पाता है जब ब्लॉग्गिंग के मूर्धन्य ऐसा करने देते है.बात का पुरजोर विरोध दर्ज करैं

प्रवीण पाण्डेय said...

सच में हम लोग सृजन में चुपचाप लगे रहते हैं।

Bikramjit said...

but the question is WHO CARES..



Bikram's

Ratan singh shekhawat said...

प्रिंट मिडिया पहले अपने यहाँ काबिज पत्रकारों के रूप में ब्लेक्मेलारों से तो निपट लें फिर ब्लोगरों पर ध्यान दें|
वैसे प्रिंट मीडिया उन्हीं लम्पट ब्लोगर्स के ब्लॉग से चोरी कर आजकल बिना अनुमति लिए रचनाएँ छाप रहे है तो फिर प्रिंट मीडिया को क्या चोर नहीं कहा जाय ??

DR. ANWER JAMAL said...

aisa bilkul nahi chalega ab.

G.N.SHAW said...

बिलकुल सही मिडिया वाले बिक गए है

Virendra Kumar Sharma said...

उत्तेजित न हों !डॉ .दिव्या जी !,आलोचना (समालोचना ,समीक्षा न सही ) ब्लॉग कर्म के लिए वरदान समझिये .जो सशक्त होता है वही अखरता है .जो पत्रकार पिटता उसकी लेखनी में दम होता है .समाचारों ने हमारा नोटिस लिया यह क्या कम है .ये वही लोग हैं जो सम्पादक बदल जाने पर स्वीकृत रचना भी वापस करते आयें हैं (साप्ताहिक हिन्दुस्तां में शीला झुनझुनवाला ने एक लेख स्वीकृत किया "क्या धूमकेतु ही डायना -सौर के विनाश का कारण बने ,इसे विशेषांक के लिए स्वीकृत किया गया था ,संपादक बदल के साथ लेख मेरे पास वापस आया इस खूब सूरत टिपण्णी के साथ -बन्धु ये बातें अब बहुत पुरानी हो गईं हैं ,मैंने वह लेख पुन :प्रेषित कर दिया विज्ञान प्रगति को जहां उसका नम्बर तकरीबन नौ महीने बाद आया ,मैंने मन में सोचा -बंधू ये बातें उतनी भी पुरानी नहीं हुईं हैं जो पुराण बन जाएँ ,कुछ मुद्दे अनिर्णीत रहें आयें हैं यह भी एक ऐसा ही मुद्दा था जिस पर आज भी शोध ज़ारी है .

खुन्नस ब्लोगरों से यह है कि न्यू -मीडिया किसी का रिमोट नहीं है .यहाँ सम्पादक ,नाम का नहीं है ,प्रबंधक या प्रबंध सम्पादक के अधीन नहीं है ,वह है और बाकायदा है अपनी एक राय रखता है .

बहर सूरत यह दुखद प्रसंग है .जबकि दोनों जन -संचार का ज़रिया हैं .सामाजिक सरोकारों से जुड़े होने चाहिए संसदीय (अप -भाषा )भाषा से नहीं यहाँ यह कहने की ज़रुरत नहीं है कई रिसाले सालों साल ब्लॉग से उठाए माल से चल सकतें हैं .हींग लगे न फिटकरी रंग चौखा ही चौखा .जो लेखक सम्पादक की ठसक से मुक्त हुआ है वह ब्लोगर कहलाता है .,सम्पादक पर तो अब तरस आता है ,कोर्पोरेट हाउसिज़ हैं अब अखबार .यहाँ अब कोई प्रभाष जोशी नहीं है ,'पेज थ्री" वाले हैं
जिनकी अपनी कोई राय नहीं हैं सब प्रबंध संपादकों के ,निगमों के दिग्विजय सिंह हैं .

Virendra Kumar Sharma said...

अरे अखबार नवीसों! इन मंचासीन और मंचा- रूढ़ लम्पटों का मुंह तो ढक देते आपने तो पुलिसियों को भी मात कर दिया जो मुंह पे कमसे कम कपड़ा ढांक देतें हैं .कल को इन लम्पटों पर सुजानों का हमला हो गया तो कौन जिम्मेवार होगा ?
मजा आ गया दिव्या जी ! मनोजी के के बाद आपने भी इस विषय को उठाया , तमाम टिपण्णी मनोयोग से पढ़ी हैं वहां भी ,मंचासीन और अन -सीन सभी ब्लोगरों की ,ब्लोगरियों की यकीन मानिए यहाँ कैंटन में इस वक्त रात का पूरा डेढ़ बजा है भारत में दिन के ग्यारह बजे होंगें .शब्बा खैर !हेव ए ग्रेट नाईट .
वीरुभाई ,४३,३०९ ,सिल्वर वुड ड्राइव ,कैंटन (मिशिगन )यू एस ए
धूर ध्वनी :००१ -७३४ -४४६ -५४५१

रचना said...



LUCKNOW: Hindi bloggers are now getting their place in the sun. Drawn from India and the rest of the world, they will be honoured in Lucknow on August 27 for popularising the language in cyberspace.

Parikalpana, a bloggers' organisation, would confer the awards on 51 persons during an international bloggers' conclave at the Rai Umanath Bali auditorium here, said Ravindra Prabhat, the organising committee's convenor.

The participants, some of whom also blog in English and Urdu, have made Hindi popular in the United States, the United Kingdom, the United Arab Emirates, Canada, Germany and Mauritius.

"The blogger of the decade prize would be conferred on Bhopal's Ravi Ratlami who has a huge following," added Prabhat, a noted Hindi blogger.

The NRI bloggers who have confirmed their participation include Dr Poornima Burman, editor of Abhivyakti (an online book in Hindi published from Sharjah) and the Toronto-based Samir Lal 'Samir' who writes blogs in Hindi and English.

London-based journalist Shikha Varshneya, a regular blogger who has written a book 'Russia in Memory', is also expected to attend the ceremony. The others include Sudha Bhargava (USA), Anita Kapoor (London), Baboosha Kohli (London), Mukesh Kumar Sinha (Jharkhand) and Rae Bareli's Santosh Trivedi, an engineer who left his job with the Uttar Pradesh Power Corporation Ltd, for blogging.

Avinash Vachaspati, the author of the first book on Hindi blogging in India and DS Pawala (Bokaro), the first to start Hindi blogging in India would also be there as would multi-lingual blogger Ismat Zaidi, who writes in Hindi, Urdu and English. Her Urdu ghazals are a hit on the web.

Asgar Wajahat and Shesh Narayan Singh are also expected to participate, but a confirmation is awaited.

The bloggers would discuss the future of the new media, its contribution to the society, especially the future of Hindi blogging and its role in the days to come.

---
this is the news in ht dated 8th august lucknow edition

santosh trevedi left his job for bloging REALLY ???

avinash vachaspati wrote the first book on hindi bloging REALLY ??

DS Pawala (Bokaro), the first to start Hindi blogging in India REALLY ??


DONT YOU THINK ITS HIGH TIME WE FIRST PUT THE FACTS RIGHT

mahendra verma said...

लगता है, प्रिंट मीडिया ब्लागिंग की लोकप्रियता के कारण हीनभावना से ग्रसित हो गई है।

Virendra Kumar Sharma said...

लम्पटता के मानी क्या हैं ?

कई मर्तबा व्यक्ति जो कहना चाहता है वह नहीं कह पाता उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिलतें हैं .अब कोई भले किसी अखबार का सम्पादक हो उसके लिए यह ज़रूरी नहीं है वह भाषा का सही ज्ञाता भी हो हर शब्द की ध्वनी और संस्कार से वाकिफ हो ही .लखनऊ सम्मलेन में एक अखबार से लम्पट शब्द प्रयोग में यही गडबडी हुई है .

हो सकता है अखबार कहना यह चाहता हों ,ब्लोगर छपास लोलुप ,छपास के लिए उतावले रहतें हैं बिना विषय की गहराई में जाए छाप देतें हैं पोस्ट .

बेशक लम्पट शब्द इच्छा और लालसा के रूप में कभी प्रयोग होता था अब इसका अर्थ रूढ़ हो चुका है :

"कामुकता में जो बारहा डुबकी लगाता है वह लम्पट कहलाता है "

अखबार के उस लिखाड़ी को क्षमा इसलिए किया जा सकता है ,उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिला ,पटरी से उतरा हुआ शब्द मिला .जब सम्पादक बंधू को इस शब्द का मतलब समझ आया होगा वह भी खुश नहीं हुए होंगें .

यूं अखबार वालों की स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है.अखबार श्रेष्ठ नहीं होता है औरों से ,अन्य माध्यमों से ,अखबार की एक नियत बंधी बंधाई भाषा होती है उसी के तहत काम करना होता है हमारे मित्र बाबू लाल शर्मा (पूर्व सम्पादक ,माया ,दैनिक भास्कर ,अब स्वर्गीय ) बतलाया करते थे वीरू भाई कुल २२,००० शब्द होतें हैं जिनके गिर्द अखबार छपता है .अखबार की एक व्यावहारिक सी भाषा होती है जिसमें कोई ताजगी नहीं होती .

ब्लॉग ताज़ी हवा का झोंका है भाषा प्रयोग के मामले में .ब्लोगर जब लिखता है उसमें ताजगी होती है .आतुरता होती है मैं और ब्लोगरों से अच्छा लिखूं .आगे बढूँ .

सही शब्द था "आतुरता "सम्पादक का यह वक्तव्य ज़रूर लम्पटता है जिसे अखबार ने शीर्षक बनाया है .अभिव्यक्ति की जल्दी में अखबार ऐसा कर गया अब अगर उसे पलट कर कोई लम्पट कहे तो यह उपयुक्त नहीं होगा .

अब लोभ और लोभी शब्द एक ही धातु "लभ" से बनें हैं लेकिन लोभी शब्द अच्छे अर्थ में नहीं जाएगा .

लौंडा लौंडिया का अर्थ वैसे तो लडका लडकी ही होता है लेकिन लखनऊ की नवाबी ने इसके अर्थ बदल दिए यह शब्द सामाजिक रूप से वर्जित हो गया .हरियाणा में तो इसे बहुत ही गर्हित मानते हैं ,सोडोटौमी से जोड़ देते हैं .

इसी तरह लम्पट शब्द अब एक ख़ास चरित्र के मामले में आ गया है .यह चरित्र नीति का शब्द है ब्लोगर के लिए यह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता .

वीरुभाई ,४३ ,३०९ ,सिल्वरवुड ड्राइव ,कैंटन ,मिशिगन

००१ -७३४ -४४६ -५४५१

सन्दर्भ :
क्या हममें से अधिकांश लंपट हैं???

आज अख़बार में छपे एक रपट पर नज़र पड़ी, जिसका शीर्षक है –

“ब्लॉग की दुनिया में लंपटों की कमी नहीं”

Satish Chandra Satyarthi said...

इस अखबार को पढ़ता भी है कोई?

दिव्यांशु भारद्वाज said...

मीडिया द्वारा ऐसे भाषा का प्रयोग दुखद है.

एंडी ब्‍लॉग करप्‍शन फ्रंट said...

खिसियानी बिल्‍ली की तरह ब्‍लॉग आयोजनों पर सवाल उठाने वाले मा0 शुकुल महाराज से निवेदन है कि पाबला जी द्वारा चर्चा में लाए गये उनके चेले के ब्‍लॉग घोटाले पर भी अपना प्रवचन देने की कृपा करें।


चर्चित संस्था 'कैग' ने वर्धा के अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अनियमितता और घोटाले का पर्दाफ़ाश किया है

यह वही हिंदी विश्वविद्यालय है जिसमें उत्तर प्रदेश के एक लेखाधिकारी, जो हिंदी ब्लॉगर भी हैं, प्रतिनियुक्ति पर आए थे लेकिन समय पूर्व ही 'भाग' खड़े हुए!

इन्हीं के ब्लॉग को सरकारी अनुदान दिया गया और इसी विश्वविद्यालय ने सरकारी खर्चे पर ब्लॉगर बुला कर, ब्लॉगर सम्मेलन भी करवाया गया था

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-08-29/nagpur/33474958_1_special-audit-audit-report-cag

एंटी ब्‍लॉग करप्‍शन फ्रंट said...

खिसियानी बिल्‍ली की तरह ब्‍लॉग आयोजनों पर सवाल उठाने वाले मा0 शुकुल महाराज से निवेदन है कि पाबला जी द्वारा चर्चा में लाए गये उनके चेले के ब्‍लॉग घोटाले पर भी अपना प्रवचन देने की कृपा करें।


चर्चित संस्था 'कैग' ने वर्धा के अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अनियमितता और घोटाले का पर्दाफ़ाश किया है

यह वही हिंदी विश्वविद्यालय है जिसमें उत्तर प्रदेश के एक लेखाधिकारी, जो हिंदी ब्लॉगर भी हैं, प्रतिनियुक्ति पर आए थे लेकिन समय पूर्व ही 'भाग' खड़े हुए!

इन्हीं के ब्लॉग को सरकारी अनुदान दिया गया और इसी विश्वविद्यालय ने सरकारी खर्चे पर ब्लॉगर बुला कर, ब्लॉगर सम्मेलन भी करवाया गया था

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-08-29/nagpur/33474958_1_special-audit-audit-report-cag

Maheshwari kaneri said...

बिलकुल सही कहा दिव्या जी मिडिया वाले बिक चूके है ..

घनश्याम मौर्य said...

ब्‍लॉगों की सामग्री चुराकर छापते समय प्रिन्‍ट मीडिया वालों को ब्‍लागरों की लम्‍पटता क्‍यों नहीं नजर आती?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

सुशील said...

लम्पटता की चर्चा करना बेकार है
लम्पटता तो दिखती साकर है
लम्पटता सूरत में नजर आती है
लम्पटता सीरत में दिख जाती है
लम्पटता लिखने में आ जाती है
लम्पटता छिपने नहीं जाती है
लम्पट को लम्पट ही कहा जायेगा
अपनी हरकतों से वो दिख जायेगा
कही बोल के बतायेगा कहीं
लिख कर के दे जायेगा !

मनोज कुमार said...

आपके इस आलेख के स्वर में जो जोश है मन को आलोड़ित करता है, आह्वान करता है, और प्रेरित भी।

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

आदरणीया दिव्या जी जय श्री राधे ...बहुत सुन्दर कहा आप ने बस कुछ पैसे डालिए और अख़बारों में खबर छपवा लीजिये ये है असलियत ..ये खुद जानते हैं अपनी असलियत क्या इनको आइना दिखाना .......
भ्रमर ५
भ्रमर का दर्द और दर्पण

surenderpal vaidya said...

आजकल प्रिंट मिडिया अपने रास्ते से भटक गया है । पेड न्यूज व विज्ञापनोँ से पैसा कमाना ही इसका काम है । कुछ को छोड़कर अधिकतर देश और समाज का नुकसान ही कर रहे हैं ।
बिल्कुल ठीक लिखा है आपने । आभार ।

ePandit said...

सहमत हैं, प्रिंट मीडिया का यह रवैया ठीक नहीं।

Anonymous said...

I always used to study article in news papers but now
as I am a user of net so from now I am using
net for articles, thanks to web.

my webpage; CarolynnQHolzhauer

Anonymous said...

I was suggested this blog via my cousin. I'm now not
sure whether or not this publish is written through him as
nobody else know such designated about my problem.
You're amazing! Thanks!

Also visit my site; AustinXThibadeau