Tuesday, April 12, 2011

भारत-स्वाभिमान सेनानी -- आप शीर्ष पर खड़े हैं , संतुलन बनाए रखिये

व्यक्ति जैसे जैसे ऊंचाई की तरफ अग्रसर होता है , वैसे वैसे संतुलन बिगड़ने लगता है , इसलिए बहुत आवश्यक है की इस संतुलन को बनाए रखें

अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी आदि जिस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं , वहां पर करोड़ों जोड़ी आखें उनकी तरफ उम्मीद के साथ देख रही हैं। इस स्थिति में उनके मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को बहुत नपा तुला होना चाहिए। ही मर्यादा के खिलाफ हो , ही किसी को ठेस पहुँचाने वाला हो , ही आपसी वैमनस्य को दर्शाए और अहंकार तो गलती से छू भी जाए।

इस आन्दोलन में उतरे देश के अनमोल रत्नों ने ये साबित कर दिया की एकता में ही बल है फिर भी व्यक्ति तो भिन्न ही हैं इसलिए थोड़ी बहुत वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि अन्ना जी को भूषण-द्वय ज्यादा उपयुक्त लगे और रामदेव जी को किरण जी का होना ज्यादा उपयुक्त लगा तो इसमें बुराई नहीं है कोई तीनों ही व्यक्तित्व अपने आपमें किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं हैं किरण जी रहें या फिर भूषण जी , दोनों ही इमानदारी की मिसाल हैं और देशभक्ति से ओत-प्रोत , इसलिए दोनों ही परिस्थियों में देश का भला ही होगा।

जहाँ तक भूषण-द्वय का सवाल है , बहुत इमानदार व्यक्तित्व हैं और इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त भी हैं , सराहना पड़ेगा अन्ना जी के निर्णय को लेकिन यदि केवल पिता अथवा बेटे में से किसी एक को लिया जाता तो बेहतर होता क्यूंकि एक अन्य व्यक्ति के समावेश से उस गठन को विस्तार मिलता और परिवार के एक व्यक्ति को दुसरे का समर्थन और सहयोग तो वैसे भी मिलता ही है।

रामदेव जी का भाई-भतीजावाद का आरोप सही नहीं है , लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। एक परिवार में यदि दोनों ही काबिल हैं तो एक को लेने के साथ, एक किसी अन्य योग्य व्यक्तित्व को शामिल किया जा सकता था। लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए की भीतर की बात बाहर आने पाये और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँ क्यूंकि भ्रष्ट तंत्र तो मौके की तलाश में 'Divide and rule" वाली निति लिए तैयार खड़ा है।

किरण बेदी जी तो इस पद के लिए पहले ही मना कर चुकी थीं , क्यूंकि जिनता मैं उन्हें जानती हूँ , वे इस पद के बहुत ऊपर उठ चुकी हैं वे नेतृत्व बेहतर कर सकती हैं आज देश को पद धारकों से ज्यादा सही दिशा देने वालों की और सही नेतृत्व करने वालों की आवश्यकता है।

देश के इस आन्दोलन में शामिल हस्तियों को देखकर लगा मानों स्वतंत्रता के समय के लाल, बाल , पाल , बोस और भगत सिंह , डॉ राजेन्द्र प्रसाद, और जय प्रकाश जैसे व्यक्तित्व पुनर्जीवित होकर इन हस्तियों के रूप में भारत को स्वाभिमान दिलाने पुनः हमारे बीच गए हों।

हमारा भी दायित्व है की हम इनकी अनावश्यक निंदा करें मानवीय भूलों के प्रति उदार रहें तथा उनके ऊपर समय तथा तंत्र के दबाव को भी समझें। आखिर वे हमारे और देश के लिए ही इतने कष्ट सह रहे हैं।

आभार

Monday, April 11, 2011

फुलगेंदवा न मारो ..न मारो ..लगत करेजवा पे चोट ..

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कितने
अपनेपन से पूछा था तुमने खैरियत उस ख़त में
दर्द बढ़ गया है तुम्हें सच्चाई बताकर

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खुश हूँ तुम्हारे घर (ब्लॉग) अब वो आने लगे हैं
नाज़ जिनके उठाते थे तुम दर--दर

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बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी

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जिस 'अपनेपन' को 'क्रोध' कहकर तुमने अपमानित कर दिया था ,
उस 'प्रसाद' को बचाकर रख लिया है किसी मांगकर चखने वाले के लिए

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ये सच है की कोई भी मूल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही

आभार

Sunday, April 10, 2011

ईष्या, द्वेष , पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत आक्षेप से भरे वक्तव्य व्यक्ति के संस्कारों को उजागर कर देते हैं.

जब इंसान स्वयं को किसी से कमतर पाता है तो उसके अन्दर अनायास ईर्ष्या , द्वेष जन्म लेने लगता है । वो अपने स्तर से गिर जाता है , दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में स्वयं को और भी नीचे गिरा लेता है। ईर्ष्या से कांपते हुए अपनी कमतरी छुपाने के लिए व्यक्तिगत हो जाता है और दूसरों पर निरर्थक आक्षेप लगाने लगता है।

जो लोग दूसरों की प्रतिभा की सराहना करना जानते हैं वो लोग इस भयानक मानसिक दोष से मुक्त रहते हैं। अन्यथा व्यक्तिगत आक्षेप करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं । और अपने संस्कारों को भी परिलक्षित करते हैं।

ऐसा ही कुछ किया पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडी 'शाहिद अफरीदी' ने । अपनी हार बर्दाश्त न कर पाने के कारण पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर खेल के बारे में न बोलकर , भारत के लोगों के खिलाफ बयान दे दिया। शायद निंदा करके वो अपने मनोबल को बनाए रखना चाहता था। शायद अपने देशवासियों को मुंह दिखाने के लिए पर-निंदा द्वारा ही शेर बनना चाहता होगा। क्या भारत के खिलाफ बयानबाजी ही पाकिस्तानियों की मर्दानगी है ? इनके साथ कितना भी दोस्ताना सलूक क्यूँ न किया जाए , ये नहीं सुधरेंगे।

वहां के सैन्य बल और राजनीतज्ञों का वैमनस्य और द्वेष तो क्षम्य है , लेकिन खिलाड़ियों के मुंह से ऐसे वक्तव्य अत्यंत अशोभनीय हैं और खेल की भावना को दूषित करते हैं।

आभार।

Saturday, April 9, 2011

शोहरत की लालच में स्त्री की अस्मिता को शर्मसार करती पूनम पांडे.

पूनम नाम की एक महिला जिसका नाम पहले कभी नहीं सुना था ने वादा किया था की वर्ल्ड कप की विजय प्राप्ति पर वो विजेता भारतीय खिलाड़ियों के लिए निर्वस्त्र होंगी।

पूनम जी से मेरे दो प्रश्न हैं --

  • क्या खिलाड़ियों को इतनी तुच्छ मानसिकता का समझा की वो इस घिनौनी पेशकश से खुश होंगे ? विश्व विजेताओं के पास एक खूबसूरत परिवार और शुभचिंतक मित्र होते हैं जिनके साथ वे अपनी खुशियाँ बांटते हैं।
  • २८ वर्षों बाद मिलने वाली जीत पर निर्वस्त्र होना गवारा है , लेकिन क्या ४२ वर्षों बाद भ्रष्टाचार से मुक्ति जो अन्ना हजारे दिलायेंगे , उसके लिए भी वो निर्वस्त्र होना पसंद करेंगी जहाँ करोड़ों देशभक्तों की भीड़ है और एक ७३ वर्षीय वृद्ध देश की खुशहाली के लिए , निस्वार्थ भाव से , अपनी सेहत के साथ समझौता करके , भूखा प्यासा , भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा है ?


ऐसी स्त्रियाँ संस्कार और सभ्यता का गला घोंटती हैं, समस्त स्त्री जाती को शर्मसार करती हैं , समाज को गलत सन्देश देती हैं , व्यभिचार और अनाचार को निमंत्रण देती हैं ।

ऐसी स्त्रियों के खिलाफ त्वरित कारवाई होनी चाहिए जो अपने संस्कार विहीन विचारों से 'वैचारिक प्रदूषण' करती हैं। इन्हें ये समझने की जरूरत है की देश की जीत सिर्फ विश्व कप में ही नहीं बल्कि और भी उपलब्धियों में है ।

जैसे--
  • संस्कारों का जीवित रहना।
  • गरीबों को रोटी मिलना और उन्हें भी मुस्कुराने का अवसर मिलना।
  • देश का भ्रष्टाचार मुक्त होना।
  • एक अरब जनता का जागरूक होना ।
  • बच्चे-बच्चे का साक्षर होना
  • दहेज़ और कन्या भ्रूण हत्या मुक्त समाज का होना ।

यदि पूनम जैसी स्त्रियों को सुन्दर काया के साथ सुन्दर बुद्धि भी मिलती तो स्त्री-उत्थान और देश का उत्थान दोनों एक साथ ही हो जाता।

और भी बहुत से गम हैं ज़माने में IPL के सिवा । खिलाड़ियों पर करोड़ों लुटाया जाता है और गरीबों के बारे में सोचने के लिए फुर्सत ही नहीं तो धन कहाँ से आएगा । कांच के घरों में रहने वाले , गरीबों के सपनों को कुचलकर नाम कमाते हैं ।

है किसी विश्व-विजेता खिलाड़ी में ये दम की वो इनाम में मिली धन-राशि को गरीबों के नाम समर्पित कर दे?

आभार

Wednesday, April 6, 2011

यदि ईश्वर एक है तो भेद-भाव क्यूँ है ? -- आस्तिकता बनाम नास्तिकता

वर्ल्ड कप के खुमार में एक बात ने नया चिंतन मन में पैदा कर दिया। धुरंधर धोनी को सफलता मिली तो उन्होंने ईश्वर के साथ किया हुआ वादा त्वरित गति से पूरा किया खेल से पूर्व इश्वर की श्रद्धा से पूजा अर्चना की थी और खेल के बाद सबसे पहले उन्हीं का स्मरण किया।

ज्यादातर सफल व्यक्ति ( अम्बानी से ओबामा तक ), ईश्वर की ताकत में आस्था रखते हैं। अपने अस्तित्व और सफलताओं का श्रेय ईश्वर को ही देते हैं फिर नास्तिक कैसे होते हैं कुछ लोग नास्तिक हो जाने के लिए किन कारणों का योगदान होता है क्या असफलताएं किसी को नास्तिक बना सकती हैं क्या निराशा के भाव जब गहरे हो जाते हैं , तो व्यक्ति नास्तिक हो जाता है? नास्तिक व्यक्ति अपनी सफलताओं और सृष्टि के संचालन का श्रेय किसे देता है ? क्या नास्तिक जन्मजात होते हैं ?

जब तक कोई स्वयं बताये की मैं नास्तिक हूँ अथवा आस्तिक हूँ , तब तक हम उसे अपना जैसा ही पाते हैं , मानवीय संवेदनाओं से युक्त। लेकिन जैसे ही इश्वर की चर्चा आती है तो नास्तिक व्यक्ति क्यूँ उसके खिलाफ बोलता है जिसकी सत्ता ही नहीं है उसकी नज़रों में ? जब सत्ता ही नहीं है तो विरोध किसका ?

ईश्वर की सत्ता है, तभी धर्म हैं क्या ईश्वर को साम्प्रदायिकता का जिम्मेदार मानना चाहिए या फिर इंसान की अज्ञानता जिम्मेदार है साम्प्रादायिकता के लिए ? क्या ईश्वर की सत्ता ख़तम की जा सकती है ? क्या नास्तिक-जन धर्म के झगड़ों को मिटाने में कोई सार्थक भूमिका अदा कर सकते हैं ?

oxygen न हो तो जीवन भी नहीं होगा, पर हवा को किसी ने देखा नहीं है आज तक । पंखा चला दें तो भी हवा को देखा नहीं जा सकता , लेकिन उसके अस्तित्व को भली-भांति महसूस किया सकता है। इसी तरह इश्वर को किसी ने नहीं देखा , लेकिन उसकी सत्ता को अनेक रूपों में महसूस अवश्य किया है।

मेरे विचार - इश्वर की सत्ता सर्वव्यापी है , कण-कण में है ईश्वर एक ही है। मेरी हर सफलता और ख़ुशी ईश्वर की कृपा से मिली है। दुखों का कारण अपनी अज्ञानता को मानती हूँ। बहुत बार इश्वर के साक्षात दर्शन भी किये हैं। जो नास्तिक हैं , उनमें भी ईश्वर के दर्शन किये हैं

आपका क्या विचार है इस विषय पर ...

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Tuesday, April 5, 2011

कैसे इनकार कर दूँ कि डरती नहीं हूँ

बचपन से एक ही सपना था , डॉक्टर बनने का। इश्वर ने पूरा किया पांच वर्षों की अच्छी नौकरी और प्राईवेट प्रक्टिस का सुख भी लिया , लेकिन यहाँ आने के बाद इस सुख से वंचित होना पड़ा। संतोष कर लिया सोचा ब्लॉग के माध्यम से हिंदी भाषा में रोगों पर लेख लिखूंगी , जिससे अपने पसंदीदा विषय से भी जुडी रहूंगी और लोगों को जानकारी भी मिलेगी वैसे तो इन्टरनेट पर सब सुलभ है , लेकिन हिंदी में सरल भाषा में लिखे होने के कारण ब्लॉग के माध्यम से आम व्यक्ति ना चाहते हुए भी उसे पढ़ ही लेगा और सामान्य जानकारी उसे मिलेगी और विषय के प्रति जागरूकता भी रहेगी।

लेकिन अभी चंद रोगों पर ही लिखा था की स्वयं को ही उनसे ग्रस्त पाया मन में भय पैदा हो गया। इसलिए चिकित्सा सम्बन्धी विषयों पर लिखना छोड़ दिया। शोभना चौरे जी और जगन राममूर्ती जी के निवेदन पर लिखी पोस्टें ड्राफ्ट में हैं लेकिन मन में भय उत्पन्न हो जाने के कारण पब्लिश नहीं की कभी शायद कोई शक्ति मुझे चिकित्सा सेवा से दूर रखना चाहती है।

दिसंबर और जनवरी से स्वास्थ बहुत खराब है सर्जरी due है , विलम्ब हो रहा है , लेकिन कई वजहों से विलम्ब की अवधी बढती जा रही है। चिकित्सा सेवा करने का जितना शौक था , अब उतनी ही ज्यादा चिकित्सा सेवा पर निर्भर हो गयी हूँ

मेरी पिछली पोस्ट की कुछ पंक्तियों ने जहाँ निराश किया है आपको , उसके लिए खेद है भविष्य में ऐसा नहीं होगा। मैं तो वही दिव्या हूँ ..अकडू , घमंडी , स्पष्टवादी...आदि आदि ...

श्री सुरेश झंझट जी की लिखी हुई बेहतरीन पंक्तियों के साथ आप सभी का आभार।

अधरों पर ताला अनजाना और आँसुओं पर पहरे ,
भीतर-भीतर सब कुछ पी लें, कुछ कहें तो अच्छा है..