Friday, March 18, 2011

संवाद की सार्थकता ज्यादा है या फिर मौन ही श्रेयस्कर है ?

यत्र-तत्र , बहुत से अहम् स्थानों पर बुद्धिजीवियों को मौन देखकर मन में ये प्रश्न उपस्थित हो गया की संवाद की उपयोगिता ज्यादा है या फिर मौन ही श्रेयस्कर है ?

मेरे विचार से संवादहीनता (communication gap) सबसे दुखद स्थिति है। संवाद के द्वारा ही बड़ी-बड़ी मुश्किलों का हल मिल जाता है। किसी भी एक व्यक्ति का ज्ञान पूर्ण नहीं होता , इसीलिए परिचर्चाओं की महत्ता है।अपनी-अपनी शिक्षा , संस्कार , परिवेश , अनुभवों, वय आदि के अनुसार अनेक विचारों के जाने से विषय सार्थक हो जाता है और एक बेहतर विकल्प बहुत से लोगों के सामने उपस्थित हो जाता है

संवाद स्थापित होने पर ही लोग एक दुसरे को बेहतर समझ सकते हैं , इससे ग़लतफ़हमियों की गुंजाइश नहीं रहती। एक आत्मविश्वास भी आता है , कार्य-क्षेत्र में उपयोगिता बढती है जागरूकता बढती है , पहचान मिलती है और व्यक्ति, विषय और वस्तुस्थिति का बेहतर ज्ञान होता है। संवाद रिश्तों को बेहतर बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मन में पड़ी दरारों को भी भर देता है।

इसके विपरीत मौन से क्या हासिल होगा ? संवादहीनता तो लोगों के दिलों में दीवारें ही खड़ी कर रही है मौन का आम आदमी की जिंदगी में क्या काम मौन तो राजनीतिज्ञों की बपौती है बड़े-बड़े घोटालों से निपटिये मौन नाम के ब्रम्हास्त्र से। मौन के नीचे बहुत कुछ ढका भी जा सकता है घोटालों को , अपनी कमतरी को , अपनी अनिश्चितता को , अपने वैमनस्य को , अपनी दोहरी मानसिकता को भी

मेरे विचार से संवाद , व्यक्ति के आत्मविश्वास के परिचायक हैं जबकि मौन ,व्यक्ति के अन्दर घर किये हुए भय का।मौन केवल एक अवस्था में धारण करना चाहिए जबकि सामने वाला आपका अपमान करने के उद्देश्य से अनर्गल प्रलाप कर रहा हो। किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो और कोई मौन रख ले ,तो उसे diplomatic या escapist कहेंगेसंवाद हर स्थिति में श्रेयस्कर है जबकि मौन सिर्फ विवाद की स्थिति में ही उचित है

जरूरी है की लोग संवाद और विवाद के अंतर को अच्छी तरह समझें।


किसी भी प्रकार का भय ही मौन का जनक है इस विषय पर मित्र ब्लॉगर्स की क्या राय है ? कृपया मौन मत रखियेगा , क्यूंकि किसी भी विमर्श में जहाँ विचार आमंत्रित हों वहां मौन कैसे श्रेयस्कर हो सकता है?

आभार

115 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

संवाद ज़रूरी है ... लेकिन यदि व्यर्थ की बहस हो तो मौन ही रहना उचित है ...कहा भी गया है एक चुप सौ को हरा देती है ..

अरूण साथी said...

मैं भी आपके विचार से सर्वथा सहमत हूं, संवादहीनता को मैं मृत्यु के समान मानता हूं, क्योंकि जिंदा लोग और जिंदा कौम हमेशा मुखर होती है और होना भी चाहिए।

या भीष्मपितामह बनने वालों को इतिहास भी माफ नहीं करती जैस कृष्ण से कलाओं में श्रेष्ठ भीष्म को हमने भगवान नहीं माना।

ZEAL said...

एक चुप सौ को कैसे हरा देती है , यदि इस पर कुछ विस्तार से प्रकाश डालें तो ज्ञान वर्धन होगा।

पी.एस .भाकुनी said...

परिश्थितियों पर निर्भर करता है .........

ZEAL said...

भाकुनी जी , आपकी बात से सहमत हूँ की परिस्थियों पर निर्भर करता है , लेकिन दुखद तो तब है जब वहां चुप्पी लगायी जाती है , जहाँ संवाद आवश्यक होता है। अक्सर लोग Diplomatic होकर चुप्पी साध लेते हैं।

ZEAL said...

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अरुण साथी जी ॥

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ एक कवि ने कही है ....

" तो तटस्थ रहेगा , उसको इतिहास भी माफ़ नहीं करेगा "

मौन अक्सर दायित्वों से भागने का एक साधन भी है।

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rashmi ravija said...

संवाद से सौ समस्याओं का हल हो सकता है.....जबकि संवादहीनता सौ समस्याओं को जन्म देती है.

अन्तर सोहिल said...

संवाद जरुरी है, दुसरों के विचार जानने और बुद्धि विकास के लिये।
तर्क और बहस की परिणति कभी नहीं हो सकती।
जहां वाद अपने भीतर ही नये सवाल पैदा कर देता है, वहीं मौन खुद को जवाब ढूंढने में मदद करता है।

प्रणाम

Rakesh Kumar said...

भर्तहरी का कहना है कि विद्वानों कि सभा में मौन मूर्खों का आभूषण है.पंचतंत्र में एक कथा आती है कि एक ब्राह्मण देवता जंगल से होकर गुजर रहे थे .एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे से जैसे ही गुजरे ,एक ब्रहम राक्षस उनके कंधे पर सवार हो गया.ब्राह्मण देवता घबरा गए.लेकिन उन्होंने धर्य नहीं खोया और यह नीति याद की कि संवाद बनाये रखना चाहिए ,कोई न कोई हल निकल आता ही है .तुरुन्त उन्होंने ब्रह्म राक्षस से पूछा कि भाई तुम मेरे कंधे पर क्यूँ सवार हुए हो ? ब्रह्म राक्षस बोला मै तुम्हे खाऊंगा.वे बोले तो खाते क्यूँ नहीं.वह बोला मेरे पैर अभी गीले हैं उन्होंने पूछा तो फिर ?ब्रह्म राक्षस बोला मुझे शाप है कि गीले पैरों से मै तुम्हे खा भी नहीं सकता और न ही जमीन पर चल सकता हूँ.वे बोले क्यूँ तो जबाब आया कि जमीन पर गीले पैरों से चलूँगा तो जल जाऊंगा,तुम चलते रहो जब तक कि मेरे पैर सूख नहीं जाते.ब्राह्मण देवता को तो मिल गया सूत्र .तुरंत उतार
फैंका कंधे से जमीन पर ब्रह्म राक्षस को और जल गया वह धूं धूं.
तो यह संवाद का ही करिश्मा था दिव्याजी.

ZEAL said...

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एक proverb और भी है लेकिन कोई इसको समझाए तो की कैसे ?

" Speech is silver but silence is gold "

But how ?

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ZEAL said...

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राकेश जी ,
बहुत सुन्दर उद्दाहरण से समझाया आपने । संवाद से ही हल निकलते हैं । बहुत से महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग जाते हैं ।
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amit-nivedita said...

agreed,dialog can solve almost any problem.in fact many problems are byproduct of silence.sometimes pause should be there ,but it must result in a pregnant pause.

योगेन्द्र पाल said...

जील जी,

आपने सही कहा है संवाद होना चाहिए, पर कई जगह ऐसी हैं जहाँ आप संवाद कर के सामने वाले को व्यर्थ का बढ़ावा देते हैं

मैं ब्लॉगजगत का ही उदहारण देता हूँ

कई ब्लॉग लेखक धर्म के विरुद्ध लिखते हैं उन पर कुछ पाठक नित्य कमेन्ट करते हैं (जाहिर है कमेन्ट ऐसे लेखकों के खिलाफ होते हैं) फिर वे पलटवार करते हैं और उन कमेन्ट को जबाब देती हुई पोस्ट लिखते हैं और आज उनके ऐसे ब्लॉग काफी लोकप्रिय हैं

सोचिये कि ऐसे लेख लिखने वाले को कोई टिप्पणी ही न मिले तो क्या होगा? हफ्ता-महीना-या ज्यादा से ज्यादा साल भर उल्टा सीधा लिखेगा कोई संवाद न कायम हो पाने की स्थिति में शांत हो जायेगा और अपने पागलपन को कहीं और उतरेगा,

ऐसे मामले में व्यर्थ संवाद कायम करके ऐसे पागलों को लोग हीरो साबित कर देते हैं और कुछ नहीं मिलता पर संवादशून्यता ऐसे व्यक्ति को मनोरोगी बना देगी

वैसे कई ब्लोगों पर आप भी कमेन्ट नहीं देतीं हैं, क्या शायद आप जानती हैं कि वहाँ शांत रहना ही सर्वोत्तम है

सदा said...

विषय अच्‍छा है ...और संवाद भी हो रहा है ...

मेरी भी बधाई एवं शुभकामनाएं लीजिए ।।

वन्दना said...

संगीता जी से सहमत हूँ।

ZEAL said...

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Yogendr ji ,

Yes I agree with you at this point. Thanks for being explicit.

बहुत सुन्दर और स्पष्ट तरीके से आपने अपनी बात को समझाया है ।

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ZEAL said...

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योगेन्द्र जी ,

ब्लॉगजगत का आपने बेहतरीन उदाहरण दिया है । जहाँ परनिंदा हो रही हो , इश्वर की निंदा हो रही हो , धर्म की निंदा की जा रही हो अथवा किसी समुदाय विशेष ( स्त्री अथवा पुरुष) , की निंदा हो रही हो ,वहां मौन ही श्रेयस्कर है । क्यूंकि निंदकों की अग्नि को शांत करने के लिए 'मौन' ही सर्वोत्तम जल है।

लेकिन यह भी सच है की अधिकाँश परिस्थियों में संवाद से ही कोई बेहतर विकल्प निकलता है । बस जरूरी ये है की लोग संवाद और विवाद के अंतर को अच्छी तरह समझें।

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सुज्ञ said...

मौन और सम्वाद दोनो परिस्थिति अनुसार आवश्यक है।
विवादों के निपटारे हेतू सम्वाद जरूरी है।
आवेशों की दशा में मौन जरूरी है।

नेताओं को कहो भी कि संवाद स्थापित करे, वे कहां करने वाले है।
और किसी विचारक को कहो कि वह मौन रहे, झट से कहेगा यह मेरी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन है।

राकेश जी द्वारा प्रस्तुत बोध-कथा में ब्राह्मण देवता के लिये संवाद जरूरी था तो, ब्रह्म राक्षस के लिये मौन रहना उपयोगी होता।

अतः मौन व सम्वाद दोनो ही काल, क्षेत्र, परिस्थिति सापेक्ष है।

Deepak Saini said...

संवाद ही जरूरी है , मौन से तो किसी भी समस्या का हल नही निकल सकता इसलिए संवाद ही श्रेयस्कर है

G.N.SHAW ( B.TECH ) said...

मौन रहना या नहीं रहना ...उस समय के परिस्थितियों पर निर्भर करती है ! मेरे गुरु जी राकेश कुमार जी के कथनों से भी सहमत !

रश्मि प्रभा... said...

व्यक्ति और परिस्थिति पर निर्भर है सबकुछ ... कहीं संवाद कहीं मौन

aarkay said...

वैसे तो सुखद संवाद ही श्रेयस्कर है परन्तु कई बार स्थिति बिगड़ने की यदि आशंका हो तो मौन भी रखना पड़ सकता है.
कभी कभार diplomatic भी होना पड़ता है .

संजय भास्कर said...

संवादहीनता समस्याओं को जन्म देती है.

संजय भास्कर said...

.............सहमत हूँ।
जरूरी ये है की लोग संवाद और विवाद के अंतर को अच्छी तरह समझें।

संजय भास्कर said...

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|
कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

सञ्जय झा said...

'HANS RAJ SUGYA JI SE SAHMAT'

apko ek achhe vimarsha dene ke liye badhai.........

holinam.

Kunwar Kusumesh said...

Silence communicates very emphatically.It plays an important role in body language.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

संवादहीनता निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण होती है...
लेकिन कभी-कभी मौन भी श्रेयस्कर होता है...
यह विषय और परिस्थितियों पर निर्भर रहता है।

सलीम ख़ान said...

जरूरी है की लोग संवाद और विवाद के अंतर को अच्छी तरह समझें।

किसी भी प्रकार का भय ही मौन का जनक है। इस विषय पर मित्र ब्लॉगर्स की क्या राय है ? कृपया मौन मत रखियेगा , क्यूंकि किसी भी विमर्श में जहाँ विचार आमंत्रित हों वहां मौन कैसे श्रेयस्कर हो सकता है?

खुशदीप सहगल said...

कुछ तो लोग कहेंगे,
लोगों का काम है कहना,
छोड़ो बेकार की बातो को.
कहीं बीत न जाए रैना...

कुछ रीत जगत की ऐसी है.
हर एक सुबह की शाम हुई,
तू कौन है, तेरा नाम है क्या,
सीता भी यहां बदनाम हुई,
फिर क्यों संसार की बातों से,
भीग गए तेरे नैना...

कुछ तो लोग कहेंगे,
लोगों का काम है कहना...

जय हिंद...

अजय कुमार said...

maun ayr mukharata kaa prayog poore vivek se karanaa chaahiye

Suman said...

किसी भी प्रकारका भय मौन का जनक बिलकुल नहीं है
मौन भी एक कला है जब संवाद बोझ बन जाते है तो मौन श्रेष्ट है !
शब्द चांदी है तो मौन सोने के तरह है !
और सृजन तो मौन से ही जनमता है !

प्रवीण पाण्डेय said...

संवाद आवश्यक है।

ajit gupta said...

मेरा एक सिद्धान्‍त है और मैं इसका हमेशा पालन करती हूँ। कि जब आप ज्ञानवान व्‍यक्ति के साथ हों और आपको बहुत कुछ ज्ञान या नवीन जानकारी मिल सकती हो तब आपको मौन रहना चाहिए। यदि उस समय आपने अपनी विद्वता बताने का निश्‍चय किया तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन यदि आप ऐसे लोगों के मध्‍य हो जहॉं केवल निरर्थक बातों की ही उम्‍मीद हो तब आप खूब बोलिए जिससे आप फिजूल की बातों से बच जाएंगे और दूसरों को भी कुछ ज्ञान दे जाएंगे।
संवादहीनता के कारण कई बार झगडे बढ जाते हैं ओर कई बार मिट जाते हैं यह व्‍यक्ति विशेष पर निभर्र है।

Rakesh Kumar said...

@ एक चुप सो को कैसे हरा सकती है.

क्या नेताओं की चुप्पी नहीं देखी आपने. वो तो सो को छोड़ लाखों
करोड़ों को हरा देती है.आपने काले धन की बात की थी स्विस बैंक में.
यदि नेता चुप्पी तोडें तो क्या होगा समझ सकतीं हैं आप.

Rakesh Kumar said...

एक और उदाहरण'संवाद' का रामायण से ,
जब हनुमानजी ने लंका में प्रवेश किया तो उन्हें सीता का पता नहीं लग पा रहा था.फिर उन्होंने एक घर देखा जो औरों से अलग था 'रामायुध अंकित गृह सोभा बरनी न जाये ,नव तुलसिका बृंद तहँ
देखि हरष कपिराई'.वह घर विभीषण का था.उसके सज्जनो के से चिन्ह पहचान कर हनुमान जी ने यह नीति विचारी 'एहि सन हठी करिहौं पहचानी,साधु ते होई न कारज हानी' और उससे संवाद किया .
अर्थात नीति यह है कि सज्जन और साधू व्यक्ति से अपनी और से हठ करके(initiative लेकर)भी पहचान बनाने में कोई हानि की सम्भावना नहीं है.बल्कि कुछ न कुछ लाभ ही मिलेगा.
ब्लॉग जगत में भी यह बात लागू हो सकती है.जैसा योगेन्द्र पाल जी ने कहा ,यदि दुर्जनों के ब्लॉग पर टिपण्णी देने से हम बचें,तो सज्जनों के ब्लॉग पर हमे अपनी और से पहल कर टिपण्णी/संवाद बनाना चाहिए .

Manpreet Kaur said...

बोथ आर सेम है जी हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर आये !
Music Bol
Lyrics Mantra
Shayari Dil Se
Latest News About Tech

मलखान said...

दोनों का अपना महत्त्व है. जब जिसकी जरूरत हो, उसे इस्तेमाल करना ही सबसे सही है. कई बार मौन खतरनाक हो जाता है तो कई बार संवाद. कभी संवाद से बिगडती बात बन जाती है तो कभी वही संवाद इसके उलट असर भी दिखता है. परिस्थितियों पर बहुत कुछ निर्भर करता है. आपका लेख अच्छा लगा.

योगेन्द्र पाल said...

@zeal

जो व्यक्ति कुतर्क करने उतरा हो उसके सामने बोलना ही नहीं चाहिए |

और प्रेम की अभिव्यक्ति का सच्चा माध्यम मौन ही होता है "खामोशियाँ गुनगुनाने लगीं"

पाठकों पर अत्याचार ना करें ब्लोगर

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

.वैसे इस मुद्दे पर एक लम्बी बहस की दरकार है । पर परिणाम और एक कामन निर्णय के लिये जी एन शाव रश्मिप्रभा जी की बात एकदम सटीक है ।
अब दूसरी बात निजी आपके लिये..अगले दो तीन ये गम्भीर विषय लिखकर मूड मत खराब करो भाई ।
और दो दिन पहले वाली स्माल बेबी दिव्या बनकर हाथ में पिचकारी लेकर सबको रंगो से भिगो दो ।
दर्शन जी देखो । अभी से पेग भांग के साथ मस्ती करने लगीं ।

ZEAL said...

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अजित जी ,
सच में , बहुत सुन्दर सिद्धांत बताया आपने । मौन और संवाद के दो उपयुक्त स्थल ।

राकेश जी ,
बेहद सुन्दर दृष्टांत बताया है आपने । यही लाभ है चर्चा का। आपके पठन का लाभ हम सभी पाठक इस विमर्श में ले रहे हैं ।

राजीव कुलश्रेष्ठ जी ,
मेरा कोई कसूर नहीं है , मुझे बनाते समय इश्वर ही कुछ ज्यादा संजीदा हो गया था। आप लोग तो सौभाग्यशाली हैं , घर-घर गुझिया बनने की खुशबू आ रही होगी । लेकिन विदेशी धरती के वातावरण में कोई रंग नहीं है , कोई खुशबू नहीं है । हम तो ब्लौग पर आकर ही थोडा सा रंग और थोड़ी सी खुशबू चुराते हैं।

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सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दिव्या जी ,
कहीं किसी परिचर्चा पर मौन की अपेक्षा मुखर होना ही श्रेयष्कर होता है | अपने विचारों को मजबूती के साथ रखना , दूसरों को सुनना और एक सार्थक विचार विमर्श करके किसी परिणाम तक पहुंचना अच्छा होता है |
जहाँ तक मौन की बात है----इसका मतलब यही हुआ कि स्वयं को बचाकर आगे बढ़ लेना | मैंने ब्लॉग जगत
में यही अक्सर देखा है | जब दो लेखकों/विचारकों का किसी मुद्दे पर तर्क-वितर्क होता है , तो अन्य में से कुछ तो दुराग्रहवश किसी एक का पक्ष पकड़ लेते हैं शेष 'मौनं श्रेयस्करम' के आधार पर बीच में नहीं पड़ते | हाँ , कुछ ऐसे
भी हैं जो अपनी स्वाभाविक विशेषताओं के कारण सही को सही और गलत को गलत कहने में संकोच नहीं करते |

रंगपर्व होली की बहुत-बहुत मंगलकामनाएं |

ZEAL said...

सुरेन्द्र जी ,
बहुत सटीक बात कही आपने ।

mahendra verma said...

मौन दो प्रकार का होता हे-
भय से उत्पन्न मौन पशुता है और संयम से उत्पन्न मौन साधुता है।
यही बात संवाद पर भी लागू होती है-
क्रोध से उत्पन्न संवाद पशुता है और संयम से उत्पन्न संवाद साधुता है।

इसलिए मौन और संवाद, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण है। परिस्थिति के अनुरूप संयमपूर्वक संवाद या मौन को व्यवहार में लाना चाहिए।

डॉ टी एस दराल said...

संवाद या मौन --it can not be an all or none phenomena . discretion is always required .

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (19.03.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

रचना said...

to keep silent on a issue
or to speak and converse on a issue

it all depends on what the issue is

many a times we do exactly that what we preach others not to do

like in one of your comments you have said ब्लॉगजगत का आपने बेहतरीन उदाहरण दिया है । जहाँ परनिंदा हो रही हो , इश्वर की निंदा हो रही हो , धर्म की निंदा की जा रही हो अथवा किसी समुदाय विशेष ( स्त्री अथवा पुरुष) , की निंदा हो रही हो ,वहां मौन ही श्रेयस्कर है ।
but many a times you have reprimanded bloggers who kept mum on issues mentioned in this comment

the problem is zeal that we all think we are "right " and the other is wrong . we are not open to accept that we can be wrong . we keep mum or speak when it suits us and our keeping mum or speaking many a times has nothing to do with the issue . we speak or abstain from speaking depending on who is standing with us and who is not

i personally believe that we need to talk openly on issue and in case of blogging we need to comment only where we think we can add something to the post or we can highlight the mental conflict of thoughts of the writer

but its better to be silent when the other person is in problems even if we know that our argument is correct
there is no point in pushing someone over the cliff
all arguments can wait till the opponent is ok and fit

we should not push someone to limits in that case silence is gold and speech is silver

i am sure you know that the voice of deaf is also there and its far more louder then others !!

ZEAL said...

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Well said Dr Daral.

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You are right Rachna.

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: केवल राम : said...

संवाद , व्यक्ति के आत्मविश्वास के परिचायक हैं
लेकिन यह व्यक्ति की सोच और स्थिति पर भी निर्भर करता है ...!

cmpershad said...

जब अर्थ का अनर्थ होता देखो तो मौन श्रेयस्कर है :)

रचना said...

and zeal its a crime to be silent on a issue just because no one wants to speak

speech is best used when its for people who cant speak for themselves

शेखचिल्ली का बाप said...

खामोशी भी और तकल्लुम भी ,
हर अदा एक क़यामत है जी
@ आप कितना अच्छा लिखती हैं ?
मुबारक हो आपको रंग बिरंग की खुशियाँ .
हा हा हा sss हा हा हा हा ssss

http://shekhchillykabaap.blogspot.com/2011/03/blog-post.html

सुधीर said...

सब तटस्थ रहेंगे तो इतिहास नहीं बनेगा. सब बोलेंगे तो एकाध तो इतिहास बनेगा...

Bhushan said...

संवादहीनता समाज के सनातन रोगों में से एक है. संवाद स्थापित रहे यह स्वस्थ होने की निशानी है.

होली मुबारक.

धीरेन्द्र सिंह said...

मैं तो जो कहना चाह रहा था वह तो बोला जा चुका परन्तु मौन भी बोलता है. विद्वजनो के बीच मौन रहकर भी संवाद होता है किन्तु अज्ञानी को समझाने के लिए संवाद का सहारा लेना पड़ता है. यदि व्यक्ति ज्ञानिओं के बीच है तो श्रेष्ठ है मौन यदि अज्ञानी हैं तो बेहतर है संवाद. यदि गहन विश्लेषण किया जाये तो व्यक्ति बिना संवाद के रह नहीं सकता है. मौन और संवाद दोनों बातचीत के प्रकार हैं. एक सूक्ष्म है तो दूसरा स्थूल.

ashish said...

संवाद के रस्ते हमेशा खुले रहने चाहिए हिंदुस्तान और पाकिस्तान की शांति वार्ता की तरह . . सार्थक चिंतन

आशुतोष said...

ज्यादा तो विश्लेसन नहीं कर सकता मगर मेरा अपना मत है की दोनों का अपना अलग अलग अस्तित्व है...परिस्थिति पर निर्भर करता है..
कही कहीं मौन तो कहीं संवाद आवश्यक होता है..
जैसे विभिन्न ऋतुओं का अलग अलग महत्त्व होता है..

मदन शर्मा said...

मैं श्री राकेश जी के बातों से पूरी तरह सहमत हूँ आज सामाजिक अव्यवस्था का कारण है हमारा मौन.
हम सोचते हैं की व्यर्थ में बोल के हम क्यों झगडा मोल लें. इसी बात को सामने वाला हमारी निर्बलता
समझता है. शास्त्रों में कहा गया है मौनं स्वकृति लक्षणं. गलत बातों का जबाब तो देना ही चाहिए वो यदि
फिर भी न माने तो कान के पीछे जोर से घुमा के देने का! आप मौज मस्ती के इस मौसम में क्या इस तरह
के टेंशन देने वाले विषय उठा रही हैं. और भी गम हैं ज़माने में इसके सिवा........
जरा बाहर निकल के देखें, निकली हम मर्दों की टोली है
पी के भंग लगा के रंग , कैसे करती हंसी ठिठोली है
अन्दर से जरा बाहर निकलें, क्यूँ करती आँख मिचोली है
अर र... र... र.. क्यूँ गुस्सा हो गयीं बुरा न मानो होली है

mridula pradhan said...

ati sarvatr varjyet ya fir yun kah len ki na ati vani ,na ati chup......mouka aur samay dekhkar nirdharit karna chahiye ki kab bolen aur kab moun rahen.

Rahul Singh said...

मौके की बात है, ऐसी मीठी कुछ नहीं, जैसी मीठी चुप.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आत्म चिंतन के लिये मौन आवश्यक है, और देशहित के लिये संवाद, वाद-विवाद-बहस सब कुछ.

kaafir said...

आज मौन रहूँगा.. क्यूंकि लोगो से सीख रहा हूँ...

आपका धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! हम चले मोनी बाबा के दरबार मे ...:)

IRFANUDDIN said...

hhmmmm all ready there are so many sayings on the post....
anyways... i think there are two reasons to be silent... first among them are people who are diplomatic, they don't want to open up bcoz they are afraid of being categorized into... and the other section of the people who don't speak much are those who are not actually aware of when to speak what.... they just keep on thinking that if i speak something wrong what others will think of me.

IRFANUDDIN said...

BTW its a pleasant surprise for me that you have removed comment moderation from your blog space :D

आचार्य परशुराम राय said...

संवाद की अलग महत्ता है और मौन की अलग। जहाँ संवाद आवश्यक हो, संवाद करना चाहिए। जहाँ मौन आवश्यक है, वहाँ मौन धारण करना उचित है। दोनों में संतुलन होना चाहिए। रहीम कवि लिखते हैं-
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला बरसना, अति की भली न धूप।।
वैसे मौन भय के कारण नहीं, बल्कि रुचि के अभाव में होता है या साधना के रूप में भी, जहाँतक मैं समझता हूँ।
वैसे आपके विचार आपकी जगह से उत्तम हैं। आभार।

Dr Varsha Singh said...

किसी भी प्रकार का भय ही मौन का जनक है.....
सहमत हूं आपसे....

kshama said...

Holee kee dheron shubhkamnayen!

Rakesh Kumar said...

होली के शुभ अवसर पर आपको, आपके समस्त परिवार को और सभी ब्लोगर जन को हार्दिक शुभ कामनाएँ .

ZEAL said...

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वाद विवाद नहीं होता । एक विवेचना , एन मनन, सम्बंधित विषय पर तर्कों का आदान-प्रदान है । संवाद के द्वारा ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है ।

यदि मौन की महिमा ज्यादा है तो देश विदेश , विद्यालयों और संस्थाओं में संवाद का औचित्य क्या है ? क्या ये मात्र उत्सव है अथवा देश हित , जन हित , विज्ञान के विकास आदि के लिए आयोजित एक लाभकारी परिचर्चा अथवा विमर्श है ?

इस समय इस लेख पर जो चर्चा है , उसमें कितने ही महत्वपूर्ण विचार अब तक आ चुके हैं । यदि सभी लोग मौन धारण कर लेते तो लाभ क्या होता ? फिर तो पशु के सामान मौन धारण करके पगुरायें और जगह पाकर सुस्ताते फिरें।

साहित्य संगीत कला विहीना ,
साक्षात पशु पुच्छ विशां हीना ।

मनुष्य की श्रेष्ठता उसके संवाद के कारण भी है । और आत्मचिंतन क्या मौन होता है ? जहाँ चिंतन है वहाँ मौन कहाँ ? आत्म-चिंतन एकांत में करते हैं तो सामूहिक चिंतन को संवाद कहते हैं । लेकिन चिंतन तो संवाद ही है ।
और चिंतन के द्वारा ही कुछ निष्कर्ष सामने आता है ।

आज जापान में आई सुनामी से भी मौन रखकर नहीं निपटा जा सकता । हज़ारों लोगों के साथ विमर्श और उनके संवादों के सार्थक योगदान से ही कुछ सकारात्मक होगा । ग्लोबल वार्मिंग जैसे प्रकृति के साथ खिलवाड़ होते मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय विमर्शो पर भी यदि मौन रख लें तो ?

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ZEAL said...

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मुझे तो संवाद हर परिस्थिति में अच्छा लगता है और उचित लगता है । निस्वार्थ होकर किसी भी संवाद में अपने विचार रखना मुझे अपने दायित्वों का एक हिस्सा लगता है । चुप लगा जाना राजनीति है और स्वार्थ को दर्शाती है।

मुझे जब भी भय लगता है तो मौन रख लेती हूँ । जैसे -

* रात में अचानक कोई आवाज़ सुनाई दे तो भूत अथवा चोर की आशंका से सांस रोककर मौन [भय जनित]
* किसी विषय पर यदि मेरी जानकारी नहीं होती तो मौन ही एकमात्र विकल्प बचता है। पूछे गए प्रश्न का उत्तर नहीं आता तब भी मौन । लेकिन उत्तर आने की अवस्था में त्वरित संवाद । [नाक काटने का भय]
* जब कोई अपमानित कर रहा हो तब भी मौन , क्योंकि सामने वाले को क्रोध की स्थिति में संवाद की भाषा समझ ही नहीं आएगी। [अपना अपमान और ज्यादा होने का भय]

इसलिए मुझे लगता है किसी न किसी भय से ही मौन उत्पन्न होता है । और सोचा-समझा मौन राजनीति।
इमानदार और स्पष्टवादी लोग मौन नहीं रखते । काश्मीर मुद्दे पर अमेरिका का मौन ? राजनीति , अथवा चाणक्य निति अथवा कुटिल निति ?


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डा. अमर कुमार said...


यदि टिप्पणीकर्ता अपने बुद्धिजीवी होने का मुग़ालता न पाले हो तो,
संवाद और विवाद के अंतर को अच्छी तरह समझ लेने तक मौन ही श्रेयस्कर है ।

Rakesh Kumar said...

दिव्या जी,
इस बात से बड़ी खुशी मिल रही है कि आप वाद भगवान का सम्पूर्ण रूप से पूजन कर रही है.अपनी सार्थक पोस्ट के सर्जन से आपने भगवान के ब्रह्मा रूप की उपासना की.फिर अपनी प्रति-टिप्पणियों के माध्यम से सुविचारों और तत्व का पोषण कर भगवान के विष्णु रूप की ,और फिर निरर्थक विचारों का मर्दन कर भगवान के शिव रूप का पूजन किया.
मुझे तो बहुत आनन्द आता है बार बार आपकी पोस्ट पर आकर.आप यूँ ही पूजन में लगी रहें और भगवान का आशीर्वाद सैदव आप पर बना रहे बस यही दुआ और कामना है.

YUSRAN said...

अभिवादन
http://yusdinu.blogspot.com

अमित शर्मा said...

आप को होली की हार्दिक शुभकामनाएं । ठाकुरजी श्रीराधामुकुंदबिहारी आप के जीवन में अपनी कृपा का रंग हमेशा बरसाते रहें।

दर्शन कौर धनोए said...

Mere blok par aapka svagat haae ..happy holi !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं। ईश्वर से यही कामना है कि यह पर्व आपके मन के अवगुणों को जला कर भस्म कर जाए और आपके जीवन में खुशियों के रंग बिखराए।
आइए इस शुभ अवसर पर वृक्षों को असामयिक मौत से बचाएं तथा अनजाने में होने वाले पाप से लोगों को अवगत कराएं।

पी.एस .भाकुनी said...

aapko shpariwaar holi ki hardik shubhkaamnayen.....

गिरधारी खंकरियाल said...

अतिशयता से दूरी होनी चाहिए . चाहे संवाद हो या मौन !

Babli said...

बहुत सुन्दर ! उम्दा प्रस्तुती! ! बधाई!
आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

HAKEEM YUNUS KHAN said...

आपकी हालिया पोस्ट की चर्चा हमने की है
ब्लॉग की ख़बरें पर
आयें और सराहें
हमारा हौसला बढ़ाएं
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/03/blog-post_19.html

ZEAL said...

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डॉ अमर ,
मौन धारण कब तक करना चाहिए , इसकी बहुत सटीक अवधि बताई आपने।

राकेश जी ,
ब्रम्हा, विष्णु और शिव की उपासना का एक नया स्वरुप दिखाया आपने । बहुत अच्छा लगा।

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Kailash C Sharma said...

बहुत सही कहा है.होली की हार्दिक शुभकामनायें!

VICHAAR SHOONYA said...

दिव्या जी आपको और आपके परिवार को होली की शुभकामनाये और बधाई.

ज्योति सिंह said...

uchit baat par bolna jaroori hai nahi to ab samya badal gaya hai goonge ko doshi samjha jaata hai .sundar lekh ,holi ki badhai aapko .

प्रतुल वशिष्ठ said...

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भाषा का क्रमतर महत्व है :
यदि किन्हीं दो के मध्य सांकेतिक भाषा से काम बन जाता हो तब भाषा के अन्य रूप व्यय नहीं करने चाहिए. ['कोई दो' हो सकते हैं : गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, माँ-बेटी, भाई-बहन आदि]
यदि सांकेतिक भाषा से काम नहीं बनता तो वाचिक भाषा स्थान पाती है.
वाचिक भाषा में भी तीन रूप देखने में आते हैं : १) सार्थक और शिष्ट भाषा २) अर्थपूरक भद्दी और फूहड़ भाषा ३) निरर्थक लक्षित भाषा
पहला रूप हम परस्पर बातचीत/चर्चा के रूप में पाते हैं. ...
दूसरा रूप हम प्रायः तब देखते हैं जब चर्चा में कोई वक्ता बिना तर्क और ज्ञान के केवल अपने पूर्वाग्रह के बल पर छा जाने की कोशिश करता है.
तीसरा रूप हम आसानी से बच्चों के खेल के समय देख सकते हैं. जब कोई एक टीम हारने लगती है तब ... या दो बच्चों के बीच जब किसी तीसरे बच्चे को नहीं खिलाते तब ... देखने में आता है कि हारने वाली टीम अथवा खेल में शामिल न किया गया बालक खेल को बिगाड़ता है... शोर-शराबा करता है... अजीब-गरीब आवाजें निकालता है ..

जब दो के बीच वाचिक भाषा का माध्यम न हो... यानी
– साक्षात प्रस्तुत न हों
– फोन, मोबाइल, स्काईप की सुविधा न हो ..
– कभी-कभी अपनी सुविधा के अनुसार भी हम इन संचार के माध्यमों की उपेक्षा करते हैं. { आपके पास फोन आदि सुविधा होने पर भी एक बड़े वर्ग से बातचीत करना और अपनी बात एक बहस के रूप में चालित करने की इच्छा ने ब्लॉग माध्यम [पोस्ट और टिप्पणियों] को चुना.}
... तब तब भाषा का लिखित रूप संवाद का माध्यम बनता है...

निष्कर्षतः
मौखिक भाषा का इस्तेमाल हम प्रायः अपने विशेष/आत्मीय लोगों से बातचीत करने में करना चाहते हैं.
और लिखित भाषा का इस्तेमाल हम चर्चाओं में, बहसों में, वाद-विवाद में और जन-सामान्य के बीच करना चाहते हैं.

परिस्थितिवश हम कैसा भी आचरण किसी के लिये कर सकते हैं.

'परिवेश की भाषा, व्यक्तित्व की भाषा' ............... सांकेतिक, वाचिक और लिखित भाषा से भी पहले प्रयुक्त होती है.

मेरे घर का परिवेश ही ऐसा है कि ... कई बातों की वर्जना है...
यद्यपि वर्जनाएँ तोड़ने वाले उस भाषा को नहीं सुन पाते. लेकिन कुछ के कान ऐसे होते हैं जो परिवेश और व्यक्तित्व की भाषा के अस्फुट स्वरों को भी सुनने की क्षमता रखेते हैं.

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प्रतुल वशिष्ठ said...

सारांश रूप में कहता हूँ :
पहला स्थान है : परिवेश और व्यक्तित्व की भाषा का जिसके स्वर अस्फुट होते हैं.
दूसरा-तीसरा स्थान है : सांकेतिक और वाचिक का
चौथा स्थान है : लिखित का
हम पहले स्थान की भाषा को ही मौन-भाषा के रूप में समझते हैं.
हाँ, चर्चाओं में अपनी महत्ता स्थापित करने के लिये हम अपने मौन को तोड़कर ही संवाद कर सकते हैं.

दीपक बाबा said...

poorviya ji, holi ki chhuti mein ghar gaye hai....... hamne socha hamhin holi ki shubhkaamnaayen de dein.


भूल जा झूठी दुनियादारी के रंग....
होली की रंगीन मस्ती, दारू, भंग के संग...
ऐसी बरसे की वो 'बाबा' भी रह जाए दंग..

होली की शुभकामनाएं.

Dilbag Virk said...

achcha snvad chal rha hai ,kya mhtvpoorn hai khud hi spsht hua jata hai

holi mubarik ho

राज शिवम said...

आपका लेख और आपके विचार बहुत अच्छे लगे,बड़ी सूक्ष्म और स्पष्ट आपने लिखा है,मै तो इसे मानता हूँ।होली के शुभ अवसर पर आप और सपरिवार के लिए जगदम्बा से मंगल कामना करता हूँ.....

Shah Nawaz said...

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

DR. ANWER JAMAL said...

आपको होली की शुभकामनाएँ
प्रहलाद की भावना अपनाएँ
एक मालिक के गुण गाएँ
उसी को अपना शीश नवाएँ

मौसम बदलने पर होली की ख़शियों की मुबारकबाद
सभी को .

ZEAL said...

प्रतुल जी , बहुत बढ़िया विश्लेषण किया है आपने।

nivedita said...

संवाद होना श्रेयस्कर है ,परन्तु सिर्फ़ उस स्थान पर ही जहां संतुलित हो कर सुना और समझा भी जाये ।अभी कुछ समय पहले मुझे भी एक व्यर्थ के विवाद में उलझाने का प्रयास किया गया था ,किन्तु उचित तर्कों के उत्तर में मुझे ही confused करार दे दिया गया ।ऐसे में मौन ही श्रेयस्कर लगता है ।
रंग-पर्व की बहुत सारी शुभकामनायें....

Sadhana Vaid said...

अवसर की अपेक्षा के अनुसार दोनों ही स्थितियाँ महत्वपूर्ण होती हैं ! जहाँ मुखर होने से वाद विवाद की स्थति पैदा हो जाये और झगड़ा बढ़ जाने का अंदेशा हो वहाँ मौन रहना ही श्रेयस्कर है और जहाँ मौन रहने से गलतफहमी पैदा हो रही हो या किसीके साथ अन्याय होने की आशंका हो वहाँ मौन रह जाना अपराध की श्रेणी में आ जायेगा ! वहाँ बोलना ही नितांत आवश्यक होगा ! बहुत सुन्दर आलेख ! होली की आपको तथा आपके समस्त परिवार को हार्दिक शुभकामनायें ! रंगों का यह पर्व आपके लिये ढेर सारी खुशियों की सौगात लेकर आये यही मंगलकामना है ! हैप्पी होली !

शोभना चौरे said...

संवाद और मौन पर इतने खुबसूरत और दोनों के विभिन्न पहलुओ के सार्थक विचार पढ़कर मैंने भी अपना मौन तोड़ ही दिया(हास्य )
जिन शब्दों को हम यु ही अपनी दैनंदिन की भाषा में बोलते है उन पर गहन चर्चा पढ़कर दिमाग की बहुत सी बंद खिडकिया खुल गई |
धन्यवाद

प्रतिभा सक्सेना said...

मुझे लगता है जहाँ सुनने और समझनेवाले हों वहीं संवाद की सार्थकता है ,नहीं तो चुप्पी भली .

सतीश सक्सेना said...

होली पर आपको सपरिवार शुभकामनायें!!

ZEAL said...

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निवेदिता जी , सही कहा आपने , विवाद में मौन ही श्रेयस्कर है ।

साधना जी , परिस्थिति विशेष को बखूबी समझाया आपने ।

शोभना जी , आपका मौन टूटना संवाद की महिमा दर्शा रहा है ।

प्रतिभा जी , सही कहा , जहाँ सुनने वाले और समझदार लोग हों , संवाद वहीँ उचित हें । विवाद पसंद लोगों के मध्य मौन ही श्रेयस्कर है ।

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mahendra verma said...

होली पर्व की अशेष हार्दिक शुभकामनाएं।

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर चिंतनशील प्रस्तुति
आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

BrijmohanShrivastava said...

होली का त्यौहार आपके सुखद जीवन और सुखी परिवार में और भी रंग विरंगी खुशयां बिखेरे यही कामना

सुलभ said...

संवाद स्थापित होने पर ही लोग एक दुसरे को बेहतर समझ सकते हैं , इससे ग़लतफ़हमियों की गुंजाइश नहीं रहती। एक आत्मविश्वास भी आता है , कार्य-क्षेत्र में उपयोगिता बढती है । जागरूकता बढती है , पहचान मिलती है और व्यक्ति, विषय और वस्तुस्थिति का बेहतर ज्ञान होता है। संवाद रिश्तों को बेहतर बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मन में पड़ी दरारों को भी भर देता है।

जी, आज यही मेरी मजबूती का आधार है, जहाँ से मैं हर नए साल अपने लक्ष्य को साध पाता हूँ. मेरे जानने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. मैं पहले से ज्यादा खुश हूँ. अपने प्रियजनों को साथ लेकर चलने का हुनर मिला है.

होली के मौके पर सुन्दर पोस्ट!

Mrs. Asha Joglekar said...

संवाद होना चाहिये विवाद नही । जहां विवाद की आशंका हो मौन बेहतर होगा । होली की रंग-भीगी शुभ कामनाएँ .

MANOJ KUMAR said...

Happy Holi !!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

रंग-पर्व पर हार्दिक बधाई.

दिगम्बर नासवा said...

समय समय पर दोनो चीज़ों की अपनी अपनी अहमियत है ....
आपको और समस्त परिवार को होली की हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएँ ....

sanjay said...

:)
श्श्श्श्श....:)

Dorothy said...

नेह और अपनेपन के
इंद्रधनुषी रंगों से सजी होली
उमंग और उल्लास का गुलाल
हमारे जीवनों मे उंडेल दे.

आप को सपरिवार होली की ढेरों शुभकामनाएं.
सादर
डोरोथी.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

आपसे सहमत हूँ !
आपको होली की शुभकामनायें !

Vivek Rastogi said...

संवाद और विवाद दोनों ही व्यक्ति को करना चाहिये बस सामने व्यक्ति या समूह सही होने चाहिये और सही न होने की स्थिती में या मानसिक स्तर न होने की स्थिती में मौन रहना उचित होगा।

kaafir said...

दिव्या जी...
आपको भी सकुटुम्ब होली की बहुत-बहुत शुभ-कामनाएं... आप परिवार सहित स्वस्थ्य और समृध रहे... जीवन में ख़ुशी का हर रंग शामिल हो ...
और एक बात ... आप सभी के विचारों को स्थान देती है ...
आप के लिए सभी का महत्व है... यह आपके विराट व्यक्तित्व का परिचायक है... अधिक नहीं कहूँगा अतिशयोक्ति लगेगी ...

मैं प्रयास करूँगा की किसी विषय पर मौन का प्रयोग न करू .. जब तक ऐसा करना अपेक्षित न हो जाए...क्यूंकि मेरे विचार से मौन उतना ही असर कारक है जितना संवाद...
किन्तु संवादहीनता कई बार गलतफहमियों को बढ़ा देती है... और आपके लेख - "संवाद की सार्थकता ज्यादा है या फिर मौन ही श्रेयस्कर है ? " से मैंने ये सीखा है की मौन किसी बात का हल नहीं...
सच कहूँ तो मेरे जीवन में संवादहीनता ने कई समस्याएं उत्पन्न की | आपके इस लेख को पढ़कर मैं अपने विषय पर विचार करने लगा था | और फिर मुझे अपनी कमी का पता चला ... सुधार जारी है ;)

एक बार फिर होली की शुभ-कामनाएं ....

... काफ़िर

ZEAL said...

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काफिर जी ,
आपने विषय को इतनी संजीदगी से पढ़ा और चिंतन किया , बहुत अच्छा लगा ।

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abhishek said...

sanwad hi behtar hai.....maun se accha hai..par samvad arthpurn hona chahiye.....par maun ki bhi ek vishesta hai ....maun rahkar bhi kai baar bahut kuch samjha ya samjhaaya jaa sakta hai......jaise koi agar gussa me apko kuch bura bol deta hai to aap use acche bol se samjha sakte hain (samvaad),samjhana hoga to samajh jaayega.....aur agar maun rahen to bhi kuch der me uska gussa shant hojayega......:):)

मीनाक्षी said...

एक ही रौ में आपके कई लेख पढ़ डाले...यहाँ आकर ठिठक गए...व्यक्तिगत जीवन में संवाद को जितना सार्थक और अहम मानते हैं , न जाने क्यों ब्लॉगजगत में मौन मुखर नहीं हो पाता....इस पोस्ट पर आई सभी टिप्पणियों पर गौर करें तो कभी लगता है कि बहुत से विद्वानों में हम कहाँ आ गए...कभी लगता है कि शायद विषय में रुचि ही पैदा नहीं हो पाई..या किसी तरह का कोई भय...या बेवजह चुप रहने की एक् एक बुरी आदत....या कभी लगता है कि किसी भी विषय पर वाद विवाद आपके हमारे ड़्राइंगरूम में होता तो शायद हम सहज संवाद कर पाते....एक अंजानी उहापोह ने टिप्पणी के रूप में मौन भंग कर ही दिया...