Friday, September 23, 2011

चमड़ी मोटी करना विकल्प है या फिर असंवेदनशीलता ?

फेसबुक पर एक लड़की ने दुखी होकर आत्महत्या कर ली और अंजलि गुप्ता जैसी होनहार ऑफिसर ने भी धोखा मिलने पर आत्महत्या कर ली बहुत जगह इन दो प्रकरणों पर चर्चाएँ पढ़ी ज्यादातर लोगों का मत है की चमड़ी मोटी कर लेनी चाहिए। हर बात को हलके में उड़ाकर आगे बढ़ जाना चाहिए। दुखी नहीं होना चाहिए।

प्रश्न यह है कि चमड़ी मोटी कर लेना भी कोई विकल्प है ? क्या यह व्यक्ति को असंवेदनशील होने के लिए नहीं कह रहा ? आज हमारी सरकार की चमड़ी मोटी हो गयी है। जनता के मरने का दुःख नहीं। पुलिस की चमड़ी भी मोटी है , बलात्कार आदि की घटनाएं बदें तो बढें , क्या फरक पड़ता है। फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर लड़कों की चमड़ी वैसे ही काफी मोटी है। दो चार लड़कियां आत्महत्या कर भी लेंगी तो क्या नयी खेप जो जाएगी। किसी नयी को फंसा लेंगे।

लेकिन क्या लड़कियां भी अपनी चमड़ी मोटी कर लें ? क्या यही विकल्प है ? एक ने धोखा दिया तो क्या दुसरे पर यकीन कर लें ? एक के बाद एक नए गड्ढे में बिना दुखी हुए छलांग लगाती रहे ? यह तो अनाचार हुआ। संस्कारों का हनन हुआ। यदि लडके और लड़कियां अपनी चमड़ी मोटी कर लेंगे तो शर्म हया सब मर जायेगी और दिशाहीन होता समाज पता नहीं कहाँ पहुँच जाएगा।

ज़रुरत है इस तरह कि घटनाओं को बारीकी से समझने कि निंदनीय कृत्यों कि भर्त्सना करने कि दोषी को दण्डित करने कि अपराधी प्रवित्ति को रोकने कि माता-पिता द्वारा अपनी संतानों को समझाए जाने कि लड़के खिलवाड़ करें और लड़कियां खिलौना बनें। रिश्तों में पर्याप्त दूरी बना कर रखें नेटवर्किंग साईट्स पर नकाब में ढके चेहरों पर इतनी जल्दी यकीन करें।

अन्यथा मोटी चमड़ी कर लेने का मतलब है , आँख बंद कर लो सब तरह कि अनियमितताओं के प्रति और -"सब चलता है " कहकर बह जाओ उसी दिशाहीनता कि ओर। अभी स्त्री लुटती है और आत्महत्या करती है फिर स्त्री पुरुष दोनों के मध्य आत्महत्याओं का अनुपात बराबर हो चलेगा।

Zeal

32 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जिजीविषा बनी रहे, राहें निकल आयेंगी।

Bikramjit said...

In THe incident you mentioned it was a girl who took this extreme step , But its not always a girl who does that .. boys also go through the same emotion ..

ANd I can understand what you say ki have a thick skin is not the way But then what to do .. after one debacle One cant stop to live, you have ot move on and yeah start to trust again .. thats what life is all about ..

If one has deserted it doesnot mean all will do the same.. The one who has been unfaithful or deserted will find the same happen to them too.. But yeah we are slowly progresssing towards the world where SAB CHALTA HAI attitude is a must .. and I am myself trying my best to change to that attitude gone are the days when people were faithful and cared for each other .. nowadays its ONE NIGHT STANDS.. that last more then a actual relation .. SOrry if i sound very rude ..
Hopefully and god willing I can be one of those with time ... one needs to change

Bikram's

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

good

सुधीर said...

अक्सर समाज और संस्कारों के द्वंद्व ही ऐसा तनाव पैदा करते हैं कि युवा होते बच्चे आत्महत्या जैसा कदम उठाते हैं। कोई गलती हो जाने पर या खुद के गलत साबित हो जाने पर वे इस द्वंद्व के चलते खुद का सामना नहीं कर पाते। कोई युवा गलती नहीं करना चाहता, पर गलत साबित हो जाना व्यवहार का हिस्सा है। इसलिए संस्कारों के बोझ में से हमें एक राह निकालनी होगी कि एक गलती का मतलब, दुनिया खत्म हो जाना नहीं होता।

mahendra verma said...

सामयिक और ज्वलंत मुद्दे पर सार्थक विवेचना।
जो यह कहते हैं कि चमड़ी मोटी कर लेनी चाहिए, वे मनुष्यता से कोसों दूर हैं।
जो पशुवत जीवन जीना चाहते हैं वे अपनी चमड़ी मोटी कर लेते हैं। जिनमें संवेदनशीलता नहीं, वे मनुष्य ही नहीं।

kshama said...

Yahee vikalp hai,ki,naqaab poshon pe wishwas na kiya jaye!

रेखा said...

सही कहा आपने .....आज -कल जैसी परिस्थिति है,ऐसे में किसी पर यकीन करने से पहले अच्छी तरह उसे जानना और परखना आवश्यक हो गया है

मनोज कुमार said...

बड़ा ही दुखद खबर है। यह एक ऐसी घटना है जो विचलित करती है।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

दर असल हमारी सहनशक्ति कम होती जा रही है और मानसिक बल कमज़ोर पड़ता जा रहा है... या फिर, आज के तेज़ मीडिया के कारण हमें इन समाचारों की अधिकता दिखाई दे रही है?

Vaanbhatt said...

हम संवेदनशील लोगों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं...मोटी चमड़ी और थेंथर प्रवृत्ति वाले खुशनसीब हैं...

दर्शन लाल बवेजा said...

बुरा ही हाल है जहां देखों जी

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

विकल्प नहीं, असंवेदनशीलता ही है|
सज्जनों की निष्क्रियता ही सर्वथा दुर्जनों को दुर्जनता के लिए प्रेरित करती है|
चमड़ी मोती करने का अर्थ तो यह है कि कोई भरे बाज़ार किसी की बहन के साथ कोई बतामीज़ी करे तो चुपचाप अनदेखा कर निकल लो| कोई आपके मित्र अथवा बंधू को पीटे तो चुपचाप निकल लो| कोई आपके माता पिता का अपमान करे तो चुपचाप निकल लो| कोई आपके देवी देवताओं का अपमान करे तो चुपचाप निकल लो| कोई आपके धार्मिक स्थल गिरा दे तो चुपचाप निकल लो|
कुल मिलाकर न देखो, न बोलो, न सुनो बस गांधी जी के बन्दर बन जाओ| समाज का विनाश दुष्टों के कारण नहीं अपितु इन्ही बंदरों के कारण हो रहा है| वे तो दुर्जन हैं जो अपना काम (दुर्जनता फैलाना) भली भाँती कर रहे हैं| इन्हें क्या दोष दें, इनका तो काम है यही| दोष देना है तो उन सज्जनों को दिया जाए जो अपना काम (सज्जनता फैलाना) कतई नहीं कर रहे|
महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं, चुपचाप निकल लो| कल पुरुष करेंगे, चुपचाप निकल लो| ये भला कैसा तरीका हुआ?
ब्लॉग जगत में भी यही हो रहा है| कोई किसी का कितना ही अपमान क्यों न करे, सभी के उपदेश यही फूटते हैं कि अनदेखा करो|
कुल मिलाकर ठाले बैठ जाओ और कुछ मत करो| जो हो रहा है, होने दो| अच्छा या बुरा, हमे फर्क नहीं पड़ता| जिस दिन हम पर विपत्ति आएगी, उस दिन हम औरों से फ़रियाद करने लायक नहीं रहेंगे| क्योंकि हमने जीवन में सदैव औरों की तकलीफों को अनदेखा किया है|

दिव्या दीदी, बेहतरीन, किन्तु सावधान रहिये| शायद आपके इस आलेख में भी कोई खोट निकाल कर आपके नाम पर यहाँ वहां पोस्ट लगा दें| आजकल अधिकतर ब्लोगर्स का टारगेट आप हैं| किन्तु हमे आपकी निडरता व बेबाकी पर पूरा विश्वास है| इन सबका मूंह तोड़ जवाब देना आपको भलीभांति आता है| और फिर हम भी आपके साथ हैं|

ZEAL said...

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Dinesh Rai Dwivedi ji's comment--

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi has left a new comment on your post "चमड़ी मोटी करना विकल्प है या फिर असंवेदनशीलता ?":

हर तरह के आघातों को सहन करने की क्षमता विकसित करें। कुम्हड़े का फून न बनें कि उंगली दिखाई और मुरझा गए। आघात को सहन करें, उस का उत्तर दें। प्रतिपक्षी को उस का सही स्थान दिखाएँ। कुछ कृत्यों को हम निन्दनीय कह कर टाल देते हैं, जब कि वे निन्दनीय नहीं अपराधिक होते हैं जिस के लिए कर्ता को दंडित किया जाना चाहिए।

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ajit gupta said...

फरिवार संस्‍था को समाप्‍त करने में उठ रहे हमारे कदम ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Prem Prakash said...

...mujha facebook kabhi samvedansheel madhyam nhi lga...ya aur baat hai ke naya samay ma bhavnao ko vyakt krna ka ya ek popular medium ha... rhi baat atmhatya ke to mera to fir sa yhi khna ha...
बहस हंसकर करें या डूबकर
गर्दन की नाप तो लेनी ही होगी
उन छोकरों की ही
जिनके माइक्रोसॉफ्टी दिमाग के
खुले विंडो पर
बालिगाना खेल के लिए
तैयार हैं कई गेमप्लान

मदन शर्मा said...

बहुत सही लिखा है आपने आभार |

ashish said...

संवेदनशील ना होना मानवता के लिए अभिशाप ही है . मोटी चमड़ी तो कच्छप की होती है .

नीरज जाट said...

इस बारे में अपन अनुभवहीन हैं। इसलिये कोई टिप्पणी नहीं।

JC said...

शायद सुनने में यह विचित्र अथवा मूर्खतापूर्ण लगे, वास्तव में हर व्यक्ति आत्म-हत्या ही कर रहा है, और अज्ञानतावश यह जान नहीं पा रहा...

एक जोक कहलो इसे, या परमात्मा की लीला...
एक चोकीदार ने अपने सेठ को बोला कि वो जिस हवाई यात्रा पर निकलने वाला था, न जाए!
क्यूंकि उसने स्वप्न में देखा कि वो जहाज दुर्घटना ग्रस्त होने वाला था!

सेठ नहीं गया, और सपना सच हो गया!
उसने चोव्किदार को इनाम दे, नौकरी से निकाल दिया!
क्यूंकि, वो अपना निर्धारित कार्य, चौकिदारी न कर, सो गया था!

और, जिसे धूम्रपान न करने कि आप, डॉक्टर लोग सलाह देते हो, प्रचार करते हो सभी माध्यमों से, वो क्यूँ छोड़ नहीं पाता? मरता है तो क्या वो आत्म हत्या नहीं करता?... इत्यादि इत्यादि कई उदाहरण दिए जा सकते हैं...

मैंने भी १६ वर्ष सिगरेट पी और आनंद उठाया, और दबाव में आ एक दिन अचानक छोड़ दिया था, दो दशक पहले, किन्तु मैं भोजन नहीं छोड़ पाया हूँ, जिसे भी योगी विष मानते हैं! और हमारे प्रिय शिव तो विष ही धारण किये हुए हैं अरबों वर्ष से अपने 'नील-कंठ' में (सांप लपेटे)... चाणक्य ने भी विष-कन्याएं बनाईं, उन्हें संख्या थोड़ी थोड़ी मात्रा में खिला, मारने के लिए नहीं... और दवाइयां भी (एंटी बायोटिक) 'विष' नहीं हैं क्या? "विष ही विष को मारता है", "कांटे को काँटा ही निकालता है"...
किन्तु अत्याधिक विषाक्त वस्तु, दवाई, कोबरा / क्रेत आदि विषधर, इत्यादि, 'हलाहल समान' तुरंत मार सकते है शरीर को किन्तु आत्मा को नहीं :) ...
'सत्यम शिवम् सुन्दरम', एवं "सत्यमेव जयते'!
जय भारत माता, 'जगदम्बा' की"!

एस.एम.मासूम said...

नयी पोस्ट देख ख़ुशी हुई. मैंने तो पहले ही कहा था हिंदी ब्लॉग जगत मैं प्रेम बहुत है तभी तो जाने वाले लौट के फिर अवश्य आते हैं.दिव्या जी आप ने जिन रिश्तों और अपराध का ज़िक्र किया है ऐसे मामले हमेशा सामने आते रहे हैं. यहाँ चमड़ी मोटी करने की आवश्यकता नहीं बल्कि रिश्ते बनाने से पहले सावधानी बरतने की आवश्यकता है.

सदा said...

बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... सार्थक प्रस्‍तुति ।

Rakesh Kumar said...

सही ज्ञान न होना,भावनाओं में बह जाना,भले बुरे का निर्णय करने में अक्षम होना आदि अनेक समस्याओं को जन्म दे सकते हैं.आपका यह कहना कि 'नेटवर्किंग साइट्स पर नकाब में ढके चहरों पर इतना जल्दी यकीन न करें' बिलकुल सही है.

किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है said...

madam, gr8 to see you again, i often read your blog and would like others to read your words too.

In appriciation of the quality of some of your content wanna introduce you another blog www. jan-sunwai.blogspot.com which is going to publish a book for good blog writers, its a platform for writers like you as well as for the people looking for legal help.

Kindly check http:// www. jan-sunwai.blogspot.com

Regards.

jo aap se pareshan hain unke liye saadar
http://jan-sunwai.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

G Vishwanath said...

Developing a thick skin is still recommended by me.
I agree with Shri Dineshrai Dwivediji.
It does not mean we should close our eyes and tolerate all kinds of nonsense.
That is a wrong interpretation.
Fight when necessary.
But do not be so sensitive that even the slightest perceived insult affects your morale so much and makes you entertain thoughts of quitting.

In this particular case of your differences with Anurag Sharma, no purpose is going to be served by prolonging mutual agony.
I humbly suggest that both of you drop this matter and get on with life.
Neither of you is going to succeed in getting the other to back down.

You may not like this advice but as a friend and well wisher, I am unable to make any other recommendation.
May God bless you and your family.
Regards
GV

aarkay said...

सर्व प्रथम सोचने की बात यह है कि किसी व्यक्ति को आत्म हत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर करने के लिए कौन उत्तरदायी है , उसे चिन्हित कर दण्डित किया जाना चाहिए परन्तु ऐसे मामले प्राय: कानून की पेचीदगियों में उलझ कर रह जाते हैं जिस से न्याय मिलने की उम्मीद न के बराबर होती है. अत: इन उदाहरणों से सीख ले कर आत्म हत्या का विचार टालना कठिन होते हुए भी असंभव नहीं है. जीवित व्यक्ति हर व्यक्ति अथवा परिस्थिति तथा अन्याय से लड़ सकता है , मृत व्यक्ति नहीं. मोटी चमड़ी तो पीड़ित को विकसित करनी है , परन्तु और लोगों की असंवेदनशीलता हरगिज़ क्षम्य नहीं.
पुनरागमन पर इस सार्थक लेख के लिए बधाई, दिव्या जी.

Rajesh Kumari said...

sahi kaha hai Divya humko yese mamle gambheerta se lene chahiye.mata pita ko bachchon ke rishton me aur majbooti lani hogi taaki maa baap ka pyaar aur khayaal unko yesa kadam uthane se roke.

JC said...

डॉक्टर दिव्या, गीता के (कर्मयोग) अध्याय ३ के केवल दो श्लोक ४२-४३ ही नीचे दे रहा हूँ - जो मैंने डॉक्टर दराल की पोस्ट में भी छोड़ी है -

"कर्मेन्द्रियाँ जड़ पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से बढ़कर है, बुद्धि मन से भी उच्च है और वह (आत्मा) बुद्धि से भी बढ़कर है"
"इस प्रकार हे महाबाहु अर्जुन! अपने आपको भौतिक इन्द्रियों, मन, तथा बुद्धि से परे जान कर और मन को सावधान आध्यात्मिक बुद्धि (कृष्णभावनामृत) से स्थिर करके आध्यात्मिक शक्ति द्वारा इस काम-रुपी शत्रु को जीतो "...

NISHA MAHARANA said...

वस्तुतः भावनाओं में बहकर उठाया गया फैसला
एक नही कई घर बरबाद कर देता है।
पछतावे की आग में जलकर महिलायें
आत्महत्या कर लेती है जबकि दोषी
को सजा दिलानी चाहिये।आपकी
अभिव्यक्ति अच्छी लगी।

वन्दना said...

सार्थक मुद्दा उठाया है।

Real Matrix said...

अब देखते हैं कौन है जो आपको कुछ कह सके ?
अब हम आ गए हैं मैदान में ऐसे , जिससे सांप भी न मरे और लाठी भी टूट जाए.

जिस बात को रखना चाहो गुप्त
उसे मित्रां से भी रखो लुप्त

सो सॉरी बता न पाएंगे कि हैं कौन हम ?
परंतु कोई पहचान जाए तो इंकार हम न करेंगे !!!

http://www.museke.com/love_songs_playlist

Atul Shrivastava said...

अच्‍छी प्रस्‍तुति।
सोशल ने
टवर्किंग साईटों का यह रूप सच में चिंताजनक है।
चमडी मोटी कर लेने या असंवेदनशील हो जाना किसी समस्‍या का हल नहीं.....