Tuesday, February 21, 2012

मैकाले-सरकार (कांग्रेस) और चिराग तले अँधेरा

मैकाले की शिक्षा पद्धति ने ब्रेन-वाश कर दिया है हमारे भारतीय समाज का। divide and rule policy चलाकर उन्होंने हमें टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट दिया। आज इसी विभाजन की "मंथरा-नीति" से कांग्रेस हमें नोच-नोच कर खा रही है देश का विकास बाधित है धन और सत्ता को हड़पने का लालच चरम पर है। फिर भी विकल्प है हमारे पास। इस भ्रष्ट मैकाले -तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए इन्ही के हथियार से इन्हें मारना होगा। मैकाले-सरकार (कांग्रेस) को अपनी "भारतीय संस्कृति " की ताकत से मारना होगा। परंपरागत तरीके , आस्था और विश्वास , रीति-रिवाज , पर्व और त्योहारों की महत्ता को समझकर, अपने बच्चों को समझाना होगा हम जैसा भारत चाहते हैं वैसा भारत पहले अपने घरों में बनाना होगा। ध्यान रहे कहीं "चिराग तले अँधेरा रह जाए"

अपने बच्चों के साथ देश की चर्चा अवश्य कीजिये। वे क्या बदलाव चाहते हैं , उन्हें सुनिए। समाज में क्या घट रहा है , उन कडवी सच्चाईयों से उन्हें अवगत कराईये। उनके साथ भिन्न भिन्न विषयों पर डिबेट करिए। उनका दिमागी विकास भी होगा और समाधान भी आएगा। उनके मन में उठ रहे अनेक संशयों का अंत भी होगा।

कभी अपने बच्चों से बात करके देखिये, आप उन्हें कनफ्यूज़न का डिब्बा ही पायेंगे। क्योंकि बढ़ते बच्चों के पास पल प्रतिपल असंख्य प्रश्न जन्म ले रहे होते हैं , लेकिन उनका समाधान करने वाला कोई नहीं होता। माता पिता या तो असमथ होते हैं उनके उत्तर देने में , या फिर उनके पास समय नहीं होता है अपने बच्चों के लिए। वे समझते हैं अच्छे स्कूलों में डालकर इतिश्री हो गयी उनके दायित्वों की। आँख-नाक -कान खुले रखने से तो जैसे परहेज़ है इन पढ़े-लिखे लोगों को। खुद अपडेटेड रहते हैं मुद्दों पर , ही अपने बच्चों को रखते हैं।

बच्चे रट-रट कर तो आगे बढ़ जाते हैं , लेकिन उनके पास विषय पर पकड़ गहरी नहीं होती कंसेप्ट नहीं होता। दुनिया में इतना ज्ञान बिखरा पड़ा है और घटनाएं हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन सब कुछ एक साथ तो घोंटकर नहीं पिलाया जा सकता है। पुरुष अपनी अपनी नौकरियों में व्यस्त और त्रस्त हैं और उनकी पत्नियाँ शाम ढले गॉसिप करती मिल जायेंगी। मटर-गोभी , हेयर-स्टाइल और पडोसी निंदा से ज्यादा बतियाने की ज़रुरत ही नहीं समझती। बच्चों को क्या संस्कार देंगीं

कभी अपने बच्चों के साथ भी पर्वों पर चिंतन और राष्ट्र-हित की चर्चा किया कीजिये। वरना चिराग तले अँधेरा ही रह जाएगा।


जिस कवी की कल्पना में, ज़िन्दगी हो प्रेमगीत
उस कवी को आज तुम नकार दो...
भीगती नसों में आज, फूलती रगों में आज
आग की लपट का तुम बघार दो
....


भारत माता की जय ,
वन्दे मातरम् !

16 comments:

Rajesh Kumari said...

bahut prabhaav shali post sahi me bachchon ko grow karne me kahin chook ho rahi hai unki shankaaon ka samadhan karna humari jimmedari hai.

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

भाषा को लेकर हमारे नेता एक गलतफ़हमी में लोगों को डाल रहे हैं। हिंदी की राजनीति से भटकाव करते नेता आम जनता को गुमराह कर रहे है॥ अपने बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाते है और जनता से राष्ट्रभाषा से प्रेम करने को कहते हैं!!!!!!!!

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aaderneeya divya jee..jab tak shiksha ka prachaar parsaar nahi hota bacche eun hee bhatkte rahenge..hamesha kee tarah atmchintan ko prerit karta shandaar lekh...aapka chitan eun hee anwarat chalta rahe..inhi shubkamnaon ke sath..sadar badhayee ke sath

दिवस said...

समस्या की जड़ ही यहाँ से शुरू होती है। देश में सबको भगत सिंह चाहिए किन्तु अपने घरों में नहीं, पडोसी के घरों में। ऐसे में चिराग तले अँधेरा तो होगा ही। माँ-बाप तो बच्चों को अच्छे महंगे स्कूलों में भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर देते हैं और सोचते हैं, हम जैसा अभिभावक कोई और नहीं। कोई भी बच्चा जीवन का पहला पाठ अपनी जननी से ही सीखता है।
सबसे ज़रूरी चीज़ ही यह है कि अभिभावक अपने बच्चों के साथ राष्ट्र हित में कुछ चर्चा करें। इससे बच्चों का बौद्धिक विकास तो होगा ही साथ ही राष्ट्र निर्माण के लिए नए द्वार भावी पीढी द्वारा खुलते जाएंगे।
लेकिन आज अभिभावक ऐसा नहीं करते।
पता नहीं क्यों स्वयं को ढक्कन बनाने पर तुले हैं अभिभावक? पुरुषों को अपने काम से फुर्सत नहीं, फुर्सत मिले तो अपने सहकर्मियों के साथ समय बिताना या और कोई मौज मस्ती। और महिलाओं के लिए आपने बिलकुल सही कहा। मटर-गोभी से फुर्सत किसे है?
आने वाली पीढी को राह कौन दिखाएगा?
यही तो चाहता था मैकॉले। वह तो विजयी रहा। अपने एक कृत्य से उसने भारत के सैकड़ों वर्षों के भविष्य को अपने नियंत्रण में ले लिया। ठीक इसी रास्ते पर यह कांग्रेस हमे ले जा रही है।

जिस कवी की कल्पना में, ज़िन्दगी हो प्रेमगीत
उस कवी को आज तुम नकार दो
भीगती नसों में आज, फूलती रगों में आज
आग की लपट का तुम बघार दो

बहुत अच्छे विषय पर, बड़ी ही सटीक कलम चलाई है आपने।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

इतिहास को फिर से लिखने और फिर से पढाने की आवश्यकता है...

सुबीर रावत said...

दोष मैकाले की शिक्षा से अधिक हमारी मानसिक गुलामी का है........ हम विदेशी भाषा, विदेशी सामान, विदेशी तकनीक के दीवाने हैं...... हमारा संविधान, हमारे न्यायालय के फैसले और हमारी उच्च शिक्षा सब विदेशी भाषा में ही तो है...... आज पूरे देश में जो थोड़ी-बहुत हमारी राष्ट्रभाषा स्वीकार्य है उसमे न हमारा योगदान है और न सरकार का. है तो बस बम्बईया हिंदी फिल्मो का..... बहस लम्बी है. आपने अच्छा मुद्दा उठाया है. आभार.

kshama said...

Bahut prabhavshalee post hai! Kaash.....iska asar janjanpe pade!

lokendra singh rajput said...

मैकाले की योजना अभी तक सफल है। हम मानसिक रूप से गुलाम है। जब तक शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन नहीं आ जाएगा तब तक बहत मुश्किल है।

Vivek Rastogi said...

जरूरत है नये शिक्षातंत्र को खोजने की और अपनाने की

veerubhai said...

अनुकरणीय प्रस्तुति .आभार ..

Bharat Bhushan said...

जो हम अपने बच्चों को दे रहे हैं समझ लीजिए वही हम देश को दे रहे हैं. बहुत विचारोत्तेजक पोस्ट.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

सही कह रही हैं आप

Rakesh Kumar said...

विचारणीय प्रस्तुति.
हम स्वयं अच्छे संस्कारों और विचारों
से युक्त हों,तभी बच्चे भी अनुकरण
कर पायेंगें.

mahendra verma said...

भारत निर्माण की शुरुआत अपने घर से ही होना चाहिए।
यह लाख टके की बात है।
देशहित के लिए जागरूक और प्रेरित करता आवाहन !

abhienow said...

दिव्याजी , एक बहुत ही सही मुद्दा चुना है आपने , नयी पीढ़ी का किस तरह योगदान माँगा जा सकता है इस समाज के उद्धार में....

Anonymous said...

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