Tuesday, September 25, 2012

बॉस की पत्नी हैं आप, बॉस नहीं ..

महिलाओं की एक बहुत बड़ी अज्ञानता है की वे अपने पति को अपनी पहचान समझती हैं !  प्रधानमन्त्री की पत्नी का नाम भी कोई नहीं जानता लेकिन वे खुद को किसी प्रधानमंत्री से कम नहीं समझतीं!

उसी प्रकार कॉरपोरेट जगत में जो पुरुष जिस ओहदे पर है उसकी पत्नी खुद को भी यूनिट हेड , मैनुफैक्चरिंग हेड अथवा विभागाध्यक्ष समझने लगती हैं !

गलत है ये रवैय्या ! आपको सम्मान निश्चय ही आपके पति के ओहदे के अनुसार मिलेगा , लेकिन इसका ये अर्थ नहीं की आप गुमान में ही डूबी रहे और तानाशाहों की तरह बर्ताव करें !

हो सके तो अपना बर्ताव सही रखें ! आपके पति का ओहदा उसकी पहचान है , आपकी नहीं  ! आपको सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के नाते मिल रहा है , शेष आपकी शालीनता और विनम्रता के कारण ही मिलेगा !

आपकी पहचान आपकी खुद की योग्यता है ! अपने पति के ओहदे से अपना दिमाग मत चढ़ा के रखिये !

12 comments:

Prabodh Kumar Govil said...

Sahi baat!Ye Mahilaon se aap hi kah sakti theen, ham log nahin!

रविकर said...

एक और सच ||

Bharat Bhushan said...

पति के सेवानिवृत्त होने पर उसकी पत्नी का शिष्ट व्यवहार ही लोग याद रखते हैं. बढ़िया पोस्ट.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सच को आइना दिखा दिया आपने!

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

सौ फीसदी सहमत
वैसे बास की बीबी और उसके कुत्ते को खुश करके भी आप चैन से रह सकते हैं।

Maheshwari kaneri said...

बहुत सही कहा आप ने...सहमत हूँ..

mridula pradhan said...

sachchi baat likhi hai......

Reena Maurya said...

एकदम सही बात..
:-)

प्रवीण पाण्डेय said...

पत्नी की शालीनता से पति का मान बढ़ता है।

दिवस said...

बहुत सही कहा आपने।
ऐसी स्त्रियाँ अपने पति के नीचे काम करने वाले कर्मचारियों अपना जूनियर समझने लगती हैं। यहाँ तक कि उन कर्मचारियों के परिवाल्र के सदस्यों को तो अपना नौकर समझती हैं।
ओहदा पति का चाकरी पत्नी की हो, ये चाहती हैं। इस स्त्रियों को समझना होगा कि उनके पति के कर्मचारी कार्य क्षेत्र में ही उनके जूनियर हैं। कार्य क्षेत्र के बाहर वे एक नागरिक की तरह जीने का अधिकार रखते हैं। साथ ही उनके परिवार के सदस्यों भी जूनियर का परिवार की तरह ट्रीट नहीं किया जाना चाहिए।
सीनियर सिटीजन होने का सम्मान आपको मिलेगा किन्तु आपके पति के ओहदे का नहीं।

Virendra Kumar Sharma said...

प्रति -रक्षा सेवा के जाँ बाज़ लोगों की पत्नी को आपने छोड़ दिया जो पति के ओहदे में एक दर्ज़ा जोड़ लेती हैं .मसलन मसलन लै .कर्नल जी बीवी खुद को कर्नल ही समझेंगी .तड़ी इन्हें इतनी सिखलाई जाती है कि किसी फंक्शन में राष्ट्रपति के दस्तक देने पर भी ये अपने स्थान पर आदर स्वरूप खड़ीं नहीं होतीं .दिव्या जी आजकल आप खरी खोटी सीधी दो टूक सुना रहीं हैं इस आंच को बलाए रखिये .इस दौर की यह ज़रुरत है .हमारा दुर्भाग्य है , हम जानतें हैं कि गुरशरण कौर जी कौन हैं ?लोक संगीत की विधा भजन में आप पारंगत है और आकाशवाणी जालंधर से आप गाती रहीं हैं .पर आपने सरदार मौन सिंह जी को इटली के लोक संगीत में रूचि लेने से नहीं रोका .

ram ram bhai
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मंगलवार, 25 सितम्बर 2012
आधे सच का आधा झूठ

अनूषा said...

बिल्कुल सही - एक समकालीन सटी विषय चुना आपने, और आपका मत सटीक व सधा हुआ. दरअसल, पति का ऊँचा ओहदा बड़ी ज़िम्मेदारी है, जिसे समझने के लिये एक खुला दिमाग ज़रूरी है.
केवल पति के अॉफिस के लोगों के संग व्यवहार में नहीं, रिश्तेदारी में दिखावा भी पति की तरक्की के संग बढ़ता जाता है.
आज की नारी बराबरी चाहती/माँगती है, कुछ करने की आज़ादी - फिर गुमान भी अपनी उपलब्धियों पर ही शोभा देता है - सो भी एक हद तक.