Thursday, September 13, 2012

गलती आवाम की ? या फिर सरकार की ?

५० % जनता अपने मताधिकार का इस्तेमाल ही नहीं करती ! अकर्मण्य होकर घर बैठे ताश खेलती है , घटिया सीरियल देखती है, क्रिकेट देखकर झूमती है, या फिर खानाबदोशो की तरह उस दिन यारी-दोस्ती निभाती है अपने जैसों के साथ , लेकिन मतदान को अपनी ज़िन्दगी का सबसे अहम् हिस्सा नहीं समझती ! मतदान करने का मौक़ा बहुत मुश्किल से मिलता है ! उसे यूँ ही न गवायिये ! जो लोग मतदान करने के लिए निकलते भी हैं , उसके आधे तो आँख बंद करके भ्रष्ट सरकार द्वारा चंद दारू की बोतलों में खरीद लिए जाते हैं ! बचे हुए का आधा प्रतिशत अंग्रेजों का तलवा-चाट निकला , इसलिए बार-बार विदेशियों को ही चुन लेता है ! लुछ हिंजड़े आरक्षण के लोभ में पहले ही से गद्दार हो चुके हैं , अतः उनसे उम्मीद ही व्यर्थ है ! खुद ही सोचिये वो प्रतिशत कितना छोटा है जो देश हित में सोचने वाली सरकार को अपना बहुमूल्य मतदान करके लाता है ! और उसी के भरोसे बाकी के निठल्ले भी ऐश करते हैं ! अतः अज्ञानी जनता को अपनी गलती समझनी चाहिए ! गद्दार, मक्कार सरकार आएगी तो घोटाले और बम-ब्लास्ट ही तो होंगे ना !बाद में धिक्कारने से क्या फायदा जब चिड़िया चुग गयी खेत !

Zeal

15 comments:

रविकर फैजाबादी said...

कर्म करें सब गलत वे, रखे सही की आस |
सड़ी गली वस्तुओं से, चाहें सरस सुवास |
चाहें सरस सुवास, किन्तु कुछ नहीं करेंगे |
चाहें दुष्ट विनाश, हाथ पर हाथ धरेंगे |
आये शुभ मतदान, दान दारु का लेकर |
पड़े पियक्कड़ तान, खो रहे आया अवसर |

Bharat Bhushan said...

आवाम की अस्मिता को टंकारती पोस्ट. बढ़िया.

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

Maheshwari kaneri said...

बहुत सही कहा..

S.N SHUKLA said...

saarthak post, aabhaar.

VINOD TIWARI said...

Aavam ki Galti hai, sarkar to aavam hi banati hai..

Rp Kasture said...

maine fece buk par iske liye muhim chalyi thi

घनश्याम मौर्य said...

मैं भी अपराधी हूँ। पिछले लोकसभा चुनाव में मैं भी वोट नहीं कर पाया था।

B.P.SINGH Chandel said...

sbse badi glti srkar ki ,aabam garibi ke karan majbur hai,ki jo une election ke samay kuchh paise ya khane -pine saman dekr,evm ka batn apne favour me dab ba lete hai ,kyoki dabe/kucle/bhukhmri-trast log apni murad tatkalik purn krtne me hi khush hote hai .dusre jab yh dekhte hai ,ki koi bhi khada numainda theek nahi hai ,to be mn masosh kr ghr se bahar vot dalne nahi nikalte ,yh mera niji kai elections me srvekshn pr aadharit thathy hai.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

A dictator is badly needed.
जो सिरफ़ नाम का ही न हो -- काम का भी डिक्टेटर हो !
जो थोडा हिटलरी हो -थोडा स्टालिनी हो और थोडा माओ के जैसा हो !
इसके बिना भारत की हालत सुधरने वाली नहीं,
लेकिन ऐसा घालमेल डिक्टेटर मिलेगा कहाँ से ?

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

Dr. sandhya tiwari said...

बहुत सही कहा..........

Rajesh Kumari said...

बिलकुल सही कह रही हैं आप

सुशील said...

बिल्कुल सही कहा है वैसे तो पर ऎसा भी तो हो सकता है :

सरकार की गलती है
चुनाव बंद क्यों नहीं कराती
बिना वोट लिये दिये
ये सब क्यों नहीं कर जाती
चुनाव का पैसा बचाती
उसको भी कहीं
विदेशी बैंक में क्यों
नहीं पहुँचाती ?

surenderpal vaidya said...

सही कहा आपने । जब मतदाता ही जागरुक न हो तो डकैतोँ का ही राज होगा । कुछ वोटर सोये रहते हैं, कुछ चंद सिक्कोँ और शराब की बोतल के बदले अपना वोट दे देते हैं । देखादेखी मेँ भ्रष्ट नेता इसी मानसिकता का लाभ उठाकर जीत जाते हैँ ।
नतीजा देश भोग रहा है ।