Tuesday, September 18, 2012

दिव्या देखे मूड़ पिराये, दिव्या बिन रहा न जाए ..

डॉ दिव्या श्रीवास्तव की पोस्टों से अक्सर कन्फ्यूजियाये प्रवीण शाह नामक ब्लॉगर ने बिना सोचे समझे चुनौती दे डाली महिला ब्लॉगर्स को !  लेकिन वे भूल गए की ये ब्लॉगजगत विद्वान् एवं पढ़ी-लिखी महिलाओं के लेखन से सुसज्जित रहता है !  अंशुमाला जी , रचना जी , रेखा जी ने इनकी ललकार  का जब करारा जवाब दिया तो हमारे बेचारे प्रवीण जी निरुत्तर हो गए, किसी का भी जवाब नहीं दे पाए ! !  टिप्पणियों की लालच में गन्दी मानसिकता वालों की बेहूदा टिप्पणियां भी डिलीट करने से इनकार कर दिया ! आखिर एक जैसे पर वाली चिड़ियाँ एक साथ जो उडती हैं ! 

अर्थ का अनर्थ करना कोई प्रवीण शाह से सीखे ! राजनैतिक परिपेक्ष्य में लिखी गयी कविता को भी स्त्री-पुरुष का मुद्दा बना डाला ! आखिर परपंची क्या समझेंगे क्रांतिकारियों की कविताओं को ! उनका तो काम ही है , स्त्री बनाम पुरुष का मुद्दा उठाकर अपनी दूकान चलाने का !

प्रवीण ने कोशिश तो बहुत की महिला ब्लॉगर्स को बहकाने की , भड़काने की , बरगलाने की , लेकिन अफ़सोस की
एक महिला को छोड़कर अन्य किसी को बरगला नहीं पाए !

धन्य है ब्लॉगजगत !

19 comments:

पूरण खंडेलवाल said...

उनकी वो पोस्ट बेवजह की थी और ये बात मैंने वहाँ भी लिखी थी और आपकी पोस्ट पर भी लिख रहा हूँ कि इस तरह कि एक दूसरे पर नुक्ताचीनी करने की बजाय सार्थक मुदों पर लिखा जाये तो ज्यादा बेहतर होगा !

दीर्घतमा said...

बड़े लोगो को इतना गुस्सा ठीक नहीं आपका प्रत्येक लेख पढता हु कितना सराहना करू आपके साहस की बहुत-बहुत धन्यवाद.

दिवस said...

इन मूर्खों को कहाँ है इतनी समझ जो आपके शब्दों को समझ पाएं? उस मुर्ख को तो ये भी नहीं पता कि राजिव, संजय व इंदिरा गांधी कैसे मरे?
एक विदेशी नारी की तो उस मुर्ख बड़ी चिंता है किन्तु एक राष्ट्रवादी स्त्री का अपमान इसे रास आ रहा है। ऐसा कर वह कौनसा नारीवाद दर्शा रहा है?
उस मुर्ख को मैं वही जवाब दे आया हूँ।

आपकी उस बेहतरीन कविता के एक-एक शब्द से मैं पूर्णत: सहमती रखता हूँ। आप जैसी राष्ट्रवादी ब्लॉगर का अपमान कर उस मुर्ख ने राष्ट्र का अपमान किया है। जिसकी सजा उसे उसके ही ब्लॉग पर मिल गयी। मैंने अक्सर देखा है कि आपके नाम पर टीआरपी कमाने वालों की इच्छा रखने वालों को अपने ही घर में मूंह की खानी पड़ती है।
वैसे प्रवीण शाह मुझे किसी राखी सावंत से कम नहीं लगता।
हाश........... अब कहीं राखी सावंत का नाम लेने के कारण मुझ पर भी नारी विरोधी होने का ठीकरा फोड़ा जा सकता है।
अंशुमाला जी, रचना जी व रेखा जी का ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ जो उन्होंने उस मुर्ख को उसकी औकात बता दी।

और आपको व आपकी लेखनी को नमन करता हूँ। ह्रदय से नतमस्तक हूँ आपके आगे।

जय माँ भारती........

Virendra Kumar Sharma said...

आखिर प्रपंची क्या समझेंगे क्रांतिकारियों की कविता को ,......बढ़िया प्रस्तुति !
ram ram bhai
मंगलवार, 18 सितम्बर 2012
कमर के बीच वाले भाग और पसली की हड्डियों (पर्शुका )की तकलीफें :काइरोप्रेक्टिक समाधान
http://veerubhai1947.blogspot.com/

Virendra Kumar Sharma said...

आखिर प्रपंची क्या समझेंगे क्रांतिकारियों की कविता को ,......बढ़िया प्रस्तुति !
ram ram bhai
मंगलवार, 18 सितम्बर 2012
कमर के बीच वाले भाग और पसली की हड्डियों (पर्शुका )की तकलीफें :काइरोप्रेक्टिक समाधान
http://veerubhai1947.blogspot.com/

Virendra Kumar Sharma said...

मोहन खूब नचायो ,रमैया इटली जी ,

बहुत ही फाग रचायो .रमैया इटली जी ,

टूटे सब लय ताल देश के ,टूटे सबद -रसाल रमैया इटली जी ,

भारत अब बे -हाल ,रमैया इटली जी !

कुछ तो करो इलाज़ रमैया इटली जी .

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

.


`*•.¸¸.•*´¨`*•.¸¸.•*´
ॐ गं गं गं गणपतये नमः !
गणेश चतुर्थी मंगलमय हो !
`*•.¸¸.•*´¨`*•.¸¸.•*´

अर्शिया अली said...

:)
............
हिन्‍दी की सबसे दुर्भाग्‍यशाली पुस्‍तक!

ZEAL said...

पूरण जी , आपका कमेन्ट पढ़ा था वहां ! आपने सही कहा प्रवीण ने व्यर्थ की पोस्ट लिखी है ! लोगों का समय नष्ट करने के लिए, लेकिन उसका दोष भी तो नहीं है कोई , बेचारे के पास लिखने के लिए विषय जो नहीं है , लेखनी में दम होगा तब तो लिखेगा ! उसे न तो देश से सरोकार है , ना ही देश को लूटने वाली सरकार से ! प्रवीण को तो सोनिया से भी ताकतवर जो लगती है वो है 'दिव्या' ! इसलिए लोकतंत्र की बहाली के लिए दिव्या के खिलाफ मुहीम छेड़ रखा है ! लेकिन बेचारे को क्या पता था की मुंह की खायेगा ! इसके आलेखों पर इसके घटिया मित्रों ने भी शिरकत की है , जो अपनी बहन, बेटियों , माँ aur पत्नी को अश्लील गालियाँ देते हैं ! प्रवीण की पोस्ट के माध्यम से ब्लौगजगत के कुछ लफंगे टिप्पणीकारों का भी चरित्र सामने आया है !

ZEAL said...

.


रही बात एक दुसरे की नुख्ताचीनी करने की तो आपको तब समझ आता जब बेवजह गालियाँ आपको मिल रही होतीं तब ! जब सार्थक मुद्दों पर लिखने वालों की राह में विघ्न पैदा करने वाले असुर आ जाते हैं तो उनका समूल विनाश करना आवश्यक होता है !

मैं उस कहावत में यकीन नहीं करती की "कुता भौके और हाथी चले अपने रास्ते" !---कभी-कभी हाथी को चाहिए की भौंकने वाले कुत्ते को कुचलकर उसे उसकी औकात बताता चले ! ताकि अनावश्यक प्रदूषण से समाज को बचाया जा सके ! ये नैतिक दायित्व भी बनता है हाथियों का !

ये एक अति सार्थक पोस्ट है और लोग जब हाथी वाली परिस्थिति में आयें तो अपना नैतिक दायित्व अवश्य निभाएं , इस बात की प्रेरणा लें इस आलेख से !

KEEP THE DOG MUZZLED.

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दिवस said...

आपके ब्लॉग पर टिप्पणी देने से पहले मैंने उस मुर्ख को उसी के ब्लॉग पर जवाब दिया था। जिसे यहाँ भी रखना चाहता हूँ ताकि किसी अनिष्ट के समय मेरी टिप्पणी यहाँ सुरक्षित रहे।
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वही पुराना ढर्रा...दिव्या के नाम पर टीआरपी कमाना।
यह भी न देखा कि पोस्ट का विषय क्या है और नारीवाद का राग अलापने लगे।
प्रवीण शाह, राजिव गांधी किसी आतंकी हमले में नहीं बल्कि उस कथित नारी की इच्छा से उड़ाया गया था जिसके विषय में दिव्या जी ने वह कविता लिखी है। और उसकी सास इंदिरा गांधी भी उस महिला की महत्वाकांक्षाओं पर बलि चढ़ा दी गयी थी। संजय गांधी (असली नाम संजीव गांधी) का हश्र भी वही हुआ था जो राजिव व इंदिरा का हुआ। विषय की जानकारी न हो तो पहले जानकारी जुटाइये न कि बिना सोचे-समझे किसी राष्ट्रवादी का ऐसा अपमान कीजिये।
और अब ऐसी नारी के लिए
"पति को, देवर को, सास को मार गयी...
कौन से नक्षत्र ले आई थी धरा पे तुम...
कालसर्प योग कब जायेगा भारत का ? "
जैसे शब्द ही प्रयुक्त किये जायेंगे।

तुम जैसे मौकापरस्त लोगों को केवल ऐसे मौकों की ही तलाश रहती है जहां किसी सकारात्मकता से भी नकारात्मकता निकाली जा सके। ये पोस्ट लिखकर तुमने कोई नारीवाद नहीं अलापा अपितु एक राष्ट्रवादी का अपमान किया व भारत देश के लिए आफत बनी सोनिया का समर्थन किया। नारीवाद-पुरुषवाद, सब एक कोने में रह गए तुमने राष्ट्रवाद को तमाचा मारने की कोशिश की है। मुझे समझ नहीं आता कि तुम लोग ब्लॉगिंग करते किसलिए हो? तुम्हारा अपना कोई उद्देश्य तो है नहीं अपितु दुसरे को भी अपने उद्देश्यों की पूर्ती में बाधा बन रहे हो।
दिव्या जी ने तो नारी का अपमान नहीं किया पर तुमने राष्ट्र का अपमान अवश्य ही कर दिया।

यदि नारी की इतनी ही चिंता है तो संतोष त्रिवेदी का "रंडापा" क्यों रास आ रहा है तुम्हे? और खुद का "विधवा विलाप" क्यों भूल जाते हो? इन शब्दों के द्वारा तो जैसे तुम नारी को सम्मान के शिखर पर पहुंचा रहे हो न?

संतोष त्रिवेदी को किसी महिला ब्लॉगर के लिए रंडापा शब्द का उपयोग नारीवाद लगता है, क्या यही शब्द वो अपनी माँ-बहन-बेटी-पत्नी के लिए प्रयुक्त कर सकता है? क्या तुम अपनी माँ-बहन-बेटी-पत्नी की बातों को विधवा विलाप कह सकते हो? शर्म आनी चाहिए।

इस प्रकार के घिनौने लेखों द्वारा नारीवाद की आड़ में अपनी खुन्नस निकालना बंद करो। सभी वादों से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद को पहचानों। देश में दुनिया भर की समस्याएं हैं, देश बर्बादी की कगार पर है। परिस्थितियाँ इतनी विकट हैं कि जीवन भर प्रयास करते रहो तब भी जीवन छोटा पड़ जाए। राष्ट्र बचेगा तो नारी स्वत: बच जायेगी।
जो स्त्री राष्ट्रवाद का झंडा उठाकर चल रही है उसे तुम जैसे नारी के कथित शुभचिंतकों से सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

दिव्या के नाम का खौफ कईयों को है। उन्हें भी जो उनका नाम लेकर उन पर छींटे उछाल रहे हैं और उन्हें भी जो बिना नाम लिए अपना डर दर्शा रहे हैं।

http://www.diwasgaur.com/2012/04/blog-post.html

http://www.diwasgaur.com/2012/05/blog-post_25.html

पढो इन दोनों आलेखों को। तुम जैसों के लिए ही लिखे गए हैं।

ZEAL said...

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कालसर्प योग कब जाएगा भारत का ?

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पति को , देवर को , सास को मार गयी

फिर पूरे भारत को चट से डकार गयी

रेफरी बनी खड़ी है केंद्र में घेरे के ,

चाटुकार खिलाड़ी हैं चारों तरफ खेमे में

जोर से बजाती है सीटी जब उचक के

एक नया घोटाला आता है चमक के

शर्म का जो पानी था, कोरों पे टिका हुआ

कोयले की राख ने उसको भी सुखा लिया

कौन से नछत्र लिए आई थी धरा पे तुम,

कालसर्प योग कब जाएगा भारत का ?

Zeal

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ये कविता ना ही नारीवादियों के लिए है, जिन्हें बिना वजह आपात्ति है इससे , ना ही ताश की बिसात बिछाए जुवारी पुरुषों के लिए हैं ! इस कविता को समझ सकने का दम-ख़म केवल एक विशेष वर्ग में ही है , ये उन्हीं को आंदोलित करने के लिए लिखी गयी है ! अनपढ़ जमात कृपया दूर रहे !

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ZEAL said...

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Diwas ji, thanks.

वन्दे मातरम् !

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वन्दना said...

दिव्या जी यहाँ अर्थ का अनर्थ ऐसे ही किया जाता है सब देख रहे हैं और आपकी इस कविता मे तो कुछ ऐसा है ही नही सीधा प्रहार है राजनीति पर मगर सोच का क्या किया जाये कुछ लोगों की जो हमेशा नकारात्मक ही सोचती है।

Maheshwari kaneri said...

मैं वंदना जी से सहमत हूँ.... दिव्या जी आप सच में आयरन लेड़ी है .आप की हिम्मत को दाद देती हूँ..आप की लेखनी को नमन..

Prabodh Kumar Govil said...

"Tippni"aapme utsaah kaa sanchar bhi karti hai,aur nakaratmak hone par aapki pratirodh-kshamta ko bhi badhaati hai. Amaryadit tippnishayad likhne vale ko labh pahunchade, kyonki is se uski maansikta par darzanon log prahaar karenge.Par is se aapko jo peeda pahunchi, us par ek din "purush-samudaay" maafi maangenga!

Rajesh Kumari said...

जहां देश की सुरक्षा और देश भक्ति का सवाल हो वहां वर्ण वर्ग लिंग नहीं देखा जाता जो देश का दुश्मन है वो तो गाली खायेगा ही इतनी सी बात लोगों को समझ नहीं आती बात का बतंगड़ बनाना कोई इनसे सीखे यहाँ भी पार्टिवाद पर उतर आये

शंकर भारद्वाज said...

असल में प्रवीण शाह एक कांग्रेसी चम्मच है. यह व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ आदोलन होने पर नीचे से ऊपर तक बिलबिला उठा और इसने रामदेव और अन्ना के खिलाफ इतना जहर उगला कि एसा सिर्फ यातो कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति लिख सकता है या उसे जिसके मुंह में बेईमानी का गटर गिर रहा हो.

आपने इसकी मां सोनिया की बेईमानी पर उंगली उठाई, बेचारे का सुलग जाना तो स्व्वाभाविक ही था.

Bikramjit said...

aaaap jaate kyun hain aise logon ke blogs pe ...

jo log publicity ke liye kuch bhi karenge

Bikram's