Friday, January 13, 2017

communism

An economics professor at a local college made a statement that he had never failed a single student before, but had recently failed an entire class.

*That class had insisted that socialism worked and that no one would be poor and no one would be rich, a great equalizer*

The professor then said, "OK, we will have an experiment in this class on this plan : All grades will be averaged and everyone will receive the same grade !

After the first test, the grades were averaged and everyone got a B.
The students who studied hard were upset and the students who studied little were happy.
As the second test rolled around, the students who studied little had studied even less and the ones who studied hard decided they wanted a free ride too so they studied little.
The second test average was a D!
No one was happy.
When the 3rd test rolled around, the average was an F.
As the tests proceeded, the scores never increased as bickering, blame and name-calling all resulted in hard feelings and no one would study for the benefit of anyone else.
To their great surprise, ALL FAILED and the professor told them that communism would also ultimately fail because when the reward is great, the effort to succeed is great, but when government takes all the reward away, no one will try or want to succeed.

*These are possibly the 5 best sentences you'll ever read and all applicable to this experiment :*
1. You cannot legislate the poor into prosperity by legislating the wealthy out of prosperity.
2. What one person receives without working for, another person must work for without receiving.
3. The government cannot give to anybody anything that the government does not first take from somebody else.
4. You cannot multiply wealth by dividing it!
5. When half of the people get the idea that they do not have to work because the other half is going to take care of them and when the other half gets the idea that it does no good to work because somebody else is going to get what they work for, that is the beginning of the end of any nation !

केजरीवाल

मुझे लगता है केजरीवाल जी को दिल्ली के साथ साथ हरयाणा , गोवा, पंजाब और उत्तर प्रदेश का भी मुख्यमंत्री बना देना चाहिए । धीरे धीरे भारत की सभी रियासतें उनके अधीन हो जाएंगी और वे चक्रवर्ती सम्राट बन जायेंगे । आप लोगों को भी चंदगुप्त मौर्य के शासनकाल में दुबारा जीने का मौक़ा मिलेगा । बस समस्या एक ही है । मनीष सिसौदिया तो एक ही हैं । अन्य रियासतों में किसको टिकाया जाएगा ?

Wednesday, December 14, 2016

प्रेम

प्रेम की उम्र बहुत छोटी होती है । किन्तु यदि इस बात की अभिलाषा हो कि प्रेम अखंड और अक्षुण् रहे तो कभी भी उसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। एक बार यदि पा लिया तो उसका खो जाना तयशुदा है । जो अप्राप्य है वही सर्वव्याप्त है । प्राप्त होते ही सिमट जाता है । और फिर विलीन । प्रेम यदि आत्मा के स्तर पर रहे तो अखंड रहता है ।

Saturday, November 5, 2016

Freedom of expression? or freedom of crime?

सबको आजादी चाहिए ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देशद्रोह , दुश्मन मुल्कों को ख़ुफ़िया एवम संवेदनशील जानकारियों का दिया जाना , किसी को बलात्कार की आजादी चाहिए , किसी को राशन कार्ड की आजादी चाहिए ! किसी को पटरी उखाड़ने की आजादी तो किसी बसें फूंकने की आजादी चाहिए !किसी को तीन तलाक की आजादी चाहिए तो किसी को इंशा अल्लाह देश के टुकड़े करने की आजादी चाहिए ! संसाधनों और बुद्धि का इतना दुरूपयोग अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! अभिव्यक्ति कि आजादी ? या हरकतबाजियों की आजादी ?

Friday, May 20, 2016

प्रधानमंत्री मोदी जी के नाम पत्र

परमप्रिय/आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
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आपके कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं बधाई । आप स्वस्थ एवं दीर्घायु हों तथा अपनी जनता की सेवा इसी प्रकार करते रहें । आपका बहुत-बहुत आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी पोस्टों पर निरंतर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं और उन्हें संज्ञान में भी लेते हैं । पिछले दो वर्षों में मैंने आपसे जिन मुद्दों पर भी निवेदन किया आपने उन्हें तत्काल संज्ञान में लेकर उन्हें समय रहते दुरुस्त भी किया है । कुछ बहुत अहम् मुद्दों पर जहाँ आपसे चूक हो रही थी , उन्हें भी आपने हमारी पोस्टों द्वारा निवेदन किये जाने का सम्मान करते हुए सुधारा । हमारा एक निवेदन जो हम पिछली सरकार के समय से निरन्तर कर रह थेे कि आयुर्वेद को उसकी प्रतिष्ठा वापस दी जाए , आपने उस पर भी ध्यान दिया है । आपका ह्रदय से आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी खरी-खरी एवं कड़वी पोस्टों को दवाई समझ पी जाते हैं और बदले में हमें (जनता को) अमृत देते हैं । हम अपने मित्रों समेत आपका सादर आभार व्यक्त करते हैं ।
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आज आपसे पुनः एक अहम् निवेदन कर रही हूँ की भारत से जातिवाद और आरक्षण सदैव के लिए समाप्त कर दिया जाए । किसी के नाम के आगे कोई जाति न लिखी हो । सिर्फ नाम ही उसकी पहचान हो । न जाती होगी, न ही जातिगत आरक्षण , न कोई क्लेश , न ही किसी के मन में किसी प्रकार का असंतोष होगा । सभी को सामान अवसर मिलेंगे । प्रतिभाएं फलेंगी फूलेगी । देश का सच्चे अर्थों में विकास होगा । सबका साथ, सबका विकास होगा ।
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आपने दो वर्षों में तकरीबन सभी अहम् कार्य पूरे कर दिखाए हैं , सिवाए दो कामों के । एक आरक्षण हटाना और दूसरा काम उससे भी अहम् अभी शेष है । कृपया हमारे इस निवेदन को संज्ञान में लेकर इस पर शीघ्रातिशीघ्र कदम उठाये जाएँ और आरक्षण समाप्त किया जाए । तभी बुलेट ट्रेन आने की ख़ुशी हम सच्चे अर्थों में मना पाएंगे ।
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सादर,
आपकी शुभेच्छु,
दिव्या
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(हमारे जो मित्र आरक्षण के खिलाफ हैं , वे कृपया इस पोस्ट को शेयर कर हमारा सहयोग करें । सादर आभार )

Sunday, March 13, 2016

मनुवाद क्या है और क्या है मनुस्मृति।

मनु महराज कहते हैं- :
जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में
‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है।
ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप
में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद
की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में
जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए
मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति
व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है,
उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है।
क्या है मनुवाद :
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी
सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या?
महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि
शासक माने जाते हैं।
मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या
मनुष्य कहा जाता है।
अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी
प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति
प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृति में समाज संचालन के लिए जो
व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद
कहा जा सकता है।
मनुस्मृति : समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं,
उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है।
अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है,
न्याय व्यवस्था का शास्त्र है।
यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय
व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है।
उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का
निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का
नाम ही धर्मशास्त्र है।
महर्षि मनु कहते है- धर्मो रक्षति रक्षित: । अर्थात जो
धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि
वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है
कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य
तथा समान होता है।
जिन्हें हम वर्तमान समय में धर्म कहते हैं दरअसल वे संप्रदाय हैं।
धर्म का अर्थ है जिसको धारण किया जाता है और मनुष्य
का धारक तत्व है मनुष्यता, मानवता।
मानवता ही मनुष्य का एकमात्र धर्म है। मुस्लिम,
ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्म नहीं मत हैं, संप्रदाय हैं ।
संस्कृत के धर्म शब्द का पर्यायवाची संसार की अन्य
किसी भाषा में नहीं है। भ्रांतिवश अंग्रेजी के ‘रिलीजन’
शब्द को ही धर्म मान लिया गया है, जो कि नितांत
गलत है। इसका सही अर्थ संप्रदाय है। धर्म के निकट यदि
अंग्रेजी का कोई शब्द लिया जाए तो वह ‘ड्यूटी’ हो
सकता है। कानून ड्यूटी यानी कर्तव्य की बात करता है।
मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी
कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति
है।
आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है,
कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में
विसंगतियां देखने को मिलती हैं।
मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि
याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया
जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है।
अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल
आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून
के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान
हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।
मनुस्मृति में दलित विरोध :
मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद
को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है
और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है। मनु किसी को
दलित नहीं मानते।
दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों
की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार
वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी
तरह उसकी योग्यता पर आधारित है।
प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ
शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन
को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम,
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण,
द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र
की श्रेणी में रख सकते हैं। जन्म के आधार पर फिर उसकी
जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य
जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं
पुरुष और स्त्री।
मनु कहते हैं- ‘जन्मना जायते शूद्र:’
अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते
हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि
अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी
या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की
संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण
बन सकती है।
हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति
शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु
वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी
योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने।
एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास
बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ
पूजन की परंपरा है।
विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन
आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित
विरोधी थे।
ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद् बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)
अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से
क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति
हुई।
दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के
कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट
मान लिया गया, जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक
हैं।
ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह
से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन
और अध्यापन।
आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।
भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग
या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति। उदर से पैदा हुआ वैश्य
अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से
उत्पन्न शूद्र वर्ग।
यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न
होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की
साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है
जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर
में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम
नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य
कर समाज में अपने योगदान दे सकता है।
आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु
की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी
भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।
वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने
का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि
किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि
शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से
अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा
सकती है? इसी तरह चतुर्वर्ण के बिना स्वस्थ समाज की
कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ब्राह्मणवाद की हकीकत :
ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित
स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे
लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने
जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने
अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा। वर्तमान
संदर्भ में व्यापम घोटाला इसका सटीक उदाहरण हो
सकता है। क्योंकि कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार के माध्यम से
अपनी अयोग्य संतानों को भी डॉक्टर बना दिया।
हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपनाकर
अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं। इसके लिए मनु दोषी नही। हो सकता है मनुस्मृति में कुछ प्रक्षिप्त अंश डाल दिये हों जो मूल मनुस्मृति का अंग ही न हो।
मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं।
बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते,
जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का
एक वर्ग आज भी अनपढ़ है।
मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण
अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ
हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को
लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद
या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।
मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और
उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों
को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना
चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी।
दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का
भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह
के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी
पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान
की खुलकर प्रशंसा की है।
पंडित, पुजारी बनने के ब्राह्मण होना जरूरी है :
पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका
जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से
मतलब श्रेष्ठ व्यक्ति से न कि जातिगत।
आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण
होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है।
ऋषि दयानंद की संस्था आर्यसमाज में हजारों विद्वान
हैं जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। इनमें सैकड़ों पूरोहित जन्म
से दलित वर्ग से आते हैं।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)
महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता
को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी
प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों
को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के
अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।

Thursday, March 10, 2016

बैलगाड़ी से "सोशल मिडिया की गाडी" तक का सफर

पहले बैलगाड़ी से चलते थे लोग ! चार घंटे में चार किलोमीटर ! अब इक्कीसवीं सदी चल रही है, सोशल साईटें चार मिनट में पूरे लोक की सैर करा देतीं हैं आपको ! ओवैसी और उमर खालिद जैसे लोग देश में खुले आम खौफनाक खेल खेलते हैं और पलभर में मंद्बुद्धियों के हीरो बन जाते हैं ! फिर कन्हैय्या जैसे छुटभैय्ये गला फाड़ कर देश के टुकड़े करने की बात करते है और राहुल , केजरी शतुघ्न सिन्हा जैसे मसीहाओं के साथ मिलकर कुंद्बुद्धियों का एक बड़ा गिरोह बना लेते हैं ! फिर न्यायाधीश महोय , जो अपने ज्ञान की हथौड़ी, सवा सौ करोड़ जनता के सर पर दे मारते हैं की लो चलो स्वीकार करो इस देश के लाडले बच्चे को , मेरे उच्च ज्ञान के अनुसार ये देशद्रोही नहीं है ! फिर लग गयी मूढ़मति जनता उस तेईस पन्ने के फैसले में दिए गए प्रवचन को वायरल करने में ! अजी जनाब आजकल के देश-तोडू , तथाकथित बचकाने-बुड्ढे टाइप छात्र तेईस मिनट भी प्रवचन नहीं सुनते बल्कि सेकंडों सेकण्ड में देशद्रोहियों का गिरोह बना डालते हैं और आप मुंह ताकते रह जाते हैं ! भ्रमित करने और सबूत मिटाने का काम भी चुटकियों में होता है ! बैलगाड़ी से सफर करना छोड़िये , लातों के भूत बातों से नहीं मानते, यदि संविधान में इन गुंडों के लिए सज़ा नहीं है तो संशोधन करके लिख डालिये नया क़ानून ! कब तक अंग्रेज़ों की गुलामी करेंगे न्याय के मंदिर में बैठकर !