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Wednesday, September 22, 2010

एक अनाम रिश्ता -- प्यार का --

' आई लव यू '
ये वाक्य बहुत बार, बहुत लोगों को दोहराते सुना था , लेकिन कभी यकीन नहीं हुआ उनके शब्दों पर। क्या प्यार जैसा कुछ होता भी है ? क्या लोग प्यार के मायने समझते भी हैं ? क्या प्यार करने के पहले सोचते भी हैं , की निभा पायेंगे या नहीं ? क्या प्यार तपस्या नहीं ? क्या प्यार बलिदान नहीं ? क्या एक आदर्श प्रेम संभव है ?

क्या , आई लव यू कहने के पहले , कोई इनसे जुड़े दायित्वों के बारे में सोचता है?

प्यार की बहुत सी परिभाषाएं सुनीं और पढ़ी हैं । जाने क्यूँ कोई भी परिभाषा मन को उपयुक्त नहीं लगी। बहुत सोचा, मनन किया, की प्यार आखिर है क्या ? बस इतना ही समझी --

-प्यार एक एहसास है।
-इस रिश्ते का कोई नाम नहीं होता। अनाम है ये रिश्ता।
-इस रिश्ते को नाम देने के साथ ही ये एहसास समाप्त हो जाता है , और एक नया रिश्ता जीने की कवायद शुरू हो जाती है।
- प्यार में अंतर्मन अपने प्रिय के स्मरण मात्र से कभी मुस्कुरा उठता है तो कभी आँखों में आंसू छलक उठते हैं।
- प्यार में पीड़ा [वेदना ] तीव्रतम होती है , इस वेदना का सुख भी स्वर्गिक होता है।
- प्रेम तो सात्विक होता है, जो अपने प्रिय से कोई अपेक्षा नहीं रखता।
- ये प्रेम न तो वात्सल्य है, न करुण, न ही श्रृंगार। ये तो वीर रस से युक्त है जो अपने प्रिय की खातिर सब कुछ आहुत , करने को तत्पर होता है।
-सात्विक प्रेम निश्छल और निर्भय होता है।
- मुझे लगता है कि प्रेम कभी न ख़त्म होने वाला सिलसिला है।
- प्रेम सदैव एक तरफ़ा ही होता है , जो चुप-चाप खामोश होकर अपने प्रिय को फलता-फूलता देखता है, और उसी कि मुस्कुराहटों में खुद को सफल हुआ मानता है।

कुछ पंक्तियाँ अपने प्रिय के नाम --

प्रेम कलि जो खिली थी उर में, उसकी उमर कुछ मॉस की थी।
प्रेम कि अग्नि पावन है, वो वजह नहीं उपहास की थी ॥
इस जगत में सब कुछ नश्वर है, ख़त्म तो एक दिन होना है ।
मीठी यादों का झरना जिसमें , वो मेरे उर का कोना है॥
तुम रचे वहां , तुम बसे वहां , तू सदा रहोगे पूज्य वहां।
मथुरा में रहो, गोकुल में रहो, उर में मेरे है धाम तेरा॥

तुम कृष्ण मेरे , तुम राम मेरे ।
तुम ही हो , अभिमान मेरे ॥

आभार ।