गत माह पुनः निमंत्रण मिला हरी कथा सुनने का। श्रद्दा से कथा पाठ प्रारम्भ हुआ। पंडित जी ने एक नयी बात कही , जो मुझे बहुत अच्छी लगी और जिसकों जीवन के विभिन्न पडावों पर सही भी पाया।
उन्होंने बताया की कभी भी अपने मन की पीड़ा किसी से कहनी नहीं चाहिए , सिवाय दो लोगों के।
- माता पिता से
- गुरु से
गुरु तो आजकल मिलते नहीं। और माता पिता सभी खुशनसीबों के पास होते हैं। इसलिए जब कभी मन उदास हो या पीड़ा असह्य हो जाए तो माता-पिता के सिवाय किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए , क्यूंकि अक्सर व्याकुल मन को जो चाहिए होता है , वो नहीं मिलता, बल्कि थोड़ी देर की सहानुभूति या फिर ढेरों समझाइशें या फिर आपमें ही ये कमी है , जिसके कारण ऐसा हुआ , सुनने को मिलता है।
किसी का दुःख साझा करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए , वो भी आपके लिए स्नेह से लबालब भरा होना चाहिए। तभी उसके साथ अपने मन की व्यथा कहनी चाहिए। अन्यथा अल्पकालिक आराम तो वो दे देगा आपको अपने सहानुभूतिपूर्ण वचनों से। लेकिन अक्सर उन जानकारियों का गलत इस्तेमाल ही करेगा , जब खुद नाराज़ हो जाएगा तब।
इसलिए जब मन व्यथित हो तो स्वयं के साथ थोडा समय गुजारना चाहिए। जब मन में स्फूर्ति वापस आ जाये , तभी मित्रों और सहयोगियों से कुछ कहें। थोडा वक़्त दुखों को जीतने में भी लगाना चाहिए। जब हम अपने दुखों के साथ लड़ना सीख जाते हैं तो दुःख में भी सुख की अनुभूति होने लगती है।
और हाँ एक विशेष बात - जब हम दुखी होते हैं तो हमें कोशिश करनी चाहिए की हम अपने मित्रों को परेशान ना करें। अपने दुःख उनसे कहकर हम उनपर भी दुःख का बोझ अनायास ही डाल देते हैं। वो कुछ कर भी नहीं सकेंगे और परेशान भी हो जायेंगे। हो सकता है वो आपके हित में कुछ कहें और आपको पसंद न आये तो दोनों का मन उदास होगा। इसलिए बेहतर यही है की मन की व्यथा को पिया जाए और नीलकंठ बना जाए।
आभार।