कहते हैं अच्छे कर्मों का फल भी अच्छा होता है। लेकिन बहुधा ऐसा देखा गया है की हमें अपने सत्कर्मों का पूरा पूरा फल नहीं मिलता। किसी की मदद की तो बदनामी मिली, कभी ज़हीन बुद्धि से उच्च शिक्षा हासिल की तो उम्र बीत गयी चौके चूल्हे में। कोई देश की आजादी के लिए लड़ता है , तो फांसी मिलती है । चार दिन भी सुकून के उसके नसीब में नहीं। जबकि रिश्वतखोर और कामचोर ऐश से रहते हैं। कभी कोई जी-जान से किसी बड़े काम को अंजाम देता है तो श्रेय कोई और ले उड़ता है। कभी खूनी बेधड़क घूमता है जबकि निर्दोष व्यक्ति दुसरे की गुनाह की सजा भुगतता है। तो फिर कर्म और भाग्य का रिश्ता क्या है ?
मेरे विचार से यदि १००% कर्म किया जाए , किन्तु यदि भाग्य साथ नहीं है तो कर्म व्यथा जाएगा। लेकिन यदि कर्म कुछ न भी करें , तो भी यदि भाग्य प्रबल है तो व्यक्ति को , धन , दौलत, अच्छी नौकरी , चाहने वाले और शोहरत सब कुछ छप्पर फाड़ कर मिल जाता है ।
वैसे आपका क्या विचार है ? कर्म बड़ा है या फिर भाग्य ?