कभी सोचा है की इन नाज़ुक धागों पर क्या क्या लिखा होता है। समय की परतों के नीचे दबे , ढेरों खट्टे-मीठे शब्द , जिसको सींचते हुए हम सब काफी दूर निकल आते हैं। कभी भाई-बहन , कभी दो बहनों के बीच की डोर , कभी दो दोस्त । कितनी बातें । कितने लम्हे साथ गुज़ारे हुए । दुनिया जहां की बातें करते हैं हम दोस्त। दुःख और सुख में अनेकों बार शरीक होते हैं एक दुसरे के। जरूरत के वक़्त आंसू भी पोंछे होते हैं एक दुसरे के। बहुत बार सहारा बनते हैं हम एक दुसरे का ।
हज़ारो मुश्किलें आयें , लेकिन एक दोस्त की मीठी सी सांतवना सारे गम भुला देती है। ये होती है दोस्ती की महिमा। हर क्षण हम अपने दोस्तों के एहसानों से उपकृत होते रहते हैं। जो अपने प्यार से हमें गहरा बाँध लेता है और कठिन क्षणों में हमें हर तरह के दुखों से उबार लेता है, एक नया जीवन देता है। उससे हम कैसे मुह मोड़ सकते हैं ? क्यूँ हम कभी कभी छोटी -छोटी बातों को सीने से लगाकर अपने दोस्त से दूर हो जाते हैं। क्या ये एहसान फरामोशी नहीं ?
सुख के बिताये हुए सौ पलों को , एक पल में ही, एक झटके में तोड़कर हम अलग हो जाते हैं? क्या यही संस्कार है ? यही शिक्षा है ? यही दोस्ती और प्रेम है ? जो अपने होते हैं , वो कभी दूर नहीं होते चाहे जितने झगडे होआपस में। लेकिन जब अजनबियों के साथ एक दोस्ती का , विश्वास का, सौहार्द्य का और अपनेपन का रिश्ता कायम होता है , तो क्यूँ उसकी अवधि अल्पकालिक होती है । क्या सब दिखावा होता है । क्या मौकापरस्ती होती है । या रिश्तों के साथ खिलवाड़ होता है ।
हमारी भारतीय संस्कृति में ही सबसे ज्यादा महत्त्व रिश्तों और संबंधों का है । ऐसा विश्व के दुसरे हिस्सों में कम ही देखने को मिलता है। तो क्या हमें रिश्तों को सहेज के रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ? बहुत मुश्किल से मिलते हैं दोस्त । बहुत मुश्किल से मिलते हैं भाई-बहन। बहुत मुश्किल से मिलते हैं साथी जिनके साथ लगता है -- कुछ अपना-अपना सा।
अक्सर हम अपने अभिमान, स्वाभिमान और अहंकार को संभाल नहीं पाते और जल्दबाजी में किसी की बात बुरी लगने पर उसके खिलाफ कठोर कदम उठा लेते हैं फिर पछताते हैं। सदा के लिए दूर हो जाने की मुनादी कर देते हैं। क्या जरूरी है रिश्तों को चिंदियों में बिखेरना।
दुश्मन बनाना बहुत आसान है , लेकिन क्या हम कोशिश करते हैं अपनों को अपने साथ बनाए रखने की । दूर जाकर तो दोनों ही दुखी रहते हैं । फिर जीत किसकी ? जहाँ अपनापन होता है, जहाँ मर्यादाएं हैं, जहाँ रिश्ते संस्कारों और प्रेम में पगे होते हैं , वहाँ नफरत का क्या काम । प्रेम की आंधी जब हिलोरें लेती है तो समेट लाती है , बिखरे हुए पलों को और वापस बाँध देती है एक सूत्र में। उसी प्रेम के धागे में , जिस पर समय ने बहुत से सुनहले मोती टांक रखे हैं।
संतुलित आहार की तरह हमारा व्यवहार भी संतुलित होना चाहिए। न तो हमें इतना मीठा होना चाहिए की कोई हमें निगल ले, न ही इतना कड़वा की लोग थूक दें। रिश्तों में दरार न आये इसकी कोशिश करनी चाहिए लेकिन यदि दो-तरफ़ा सहारा न हो तो रिश्ते को एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए , बिना किसी को लज्जित किये।
ताकि , कभी आमने-सामने हों तो मुस्कुरा सकें। और आँख न चुरानी पड़े।
ब्लॉग-जगत , ये स्नेह का धागा और हम -
ब्लॉग जगत में अक्सर ये देखा है, लोग छोटी-छोटी बातों पर खफा होकर , अपने साथी ब्लोगर्स को नीचा दिखाने के लिए उसके खिलाफ गोल-मोल लेख लिखते हैं , अपनी भड़ास निकालते हैं और आमंत्रित करते हैं अन्य लोगों को भी इस हवन में नफरत की आहुति देने को। इस तरह के कृत्य निंदनीय हैं और हमारी छोटी मानसिकता को इंगित करते हैं। ऐसे कृत्य गुटबाजी को भी जन्म देते हैं। हमें बचना चाहिए इसे ईर्ष्यायुक्त कृत्यों से।
कुछ उम्रदराज लेखक/लेखिकाओं को भी इस तरह की भावना से ग्रस्त देखा है । जो मन में क्षोभ उत्पन्न करता है। जब बड़े ही ऐसा लिखेंगे तो युवा क्या सीख लेंगे ? जो ब्लोगर्स ऐसे लेख लिखते हैं, वो ये दिखाना चाहते हैं की वो एकदम सही हैं और जिनके बारे में लिखा है वो गलत हैं। लेकिन वो ये भूल जाते हैं की सही-गलत का निर्णय हर व्यक्ति अपनी बुद्धि और अनुभवों के आधार पर करता है, ऐसे लेखों के आधार पर नहीं। इसलिए हमें ऐसे लेखों से बचना चाहिए। विषय पर लिखिए। किसी व्यक्ति की निंदा करने में अपना समय मत गवाइये । समय मूल्यवान है।
-------------------------------
कभी-कभी जब विचार न मिलें तो सीखना चाहिए एक दुसरे के विचारों का सम्मान करना । कभी कभी चुप होकर भी अपनी असहमति जताई जा सकती है। लेकिन दूरी बना लेना तो कोई उपचार नहीं। घृणा को पालना तो कोई हल नहीं। और गुटबाजी तो राजनीतिज्ञों की बपौती है, इसे अपनी अमानत मत बनाइये।
दूर ही जाना था , तो पास मेरे तुम आये क्यूँ ।
नहीं निभाना था, तो ये रिश्ते तुमने बनाए क्यूँ ॥
प्रेम के धागे , बहुत नाज़ुक होते हैं, इन्हें जतन से संभालिये । आप चले जाते हैं , लेकिन आप नहीं जानते की आपके साथ बहुत सी सकारात्मक ऊर्जा भी चली जाती है। इसलिए बने रहिये और बनाये रखिये इस अपनेपन के एहसास को ।
मेरे मन का धागा प्रेम का, इसे मत तोड्यो चटकाय....