१९९४ में , 'रमन मैग्सेसे' सम्मान से पुरस्कृत किरण बेदी का नाम , देश विदेश में सम्मान के साथ लिया जाता है । भारत की पहली IPS अधिकारी , ने अपनी हिम्मत और लगन के सैकड़ों आदर्श उपस्थित किये हैं हमारे सन्मुख। आज वो आम आदमी के उत्थान के लिए समाज-सेवा में लगी हुई हैं।
इन्होने पुलिस सर्विस में जाने का सही निर्णय लिया , क्यूंकि ये एक ऐसा स्थान है , जहाँ रहकर पावर द्वारा बहुत से reforms किये जा सकते हैं। इन्होने जेल को रेफोर्म किया, कैदियों को किया तथा निरंतर प्रयासरत हैं समाज का स्तर ऊपर उठाने में।
किरण जी एक अनुशासनप्रिय व्यक्तित्व है , जिसमें उन्होंने कभी भी किसी प्रकार की ढील नहीं रखी। ट्रैफिक पुलिस में जब उनकी पोस्टिंग हुई तो उन्होंने प्रधान मंत्री , 'इंदिरा गांधी' की गाडी भी क्रेन से उठवा कर चालान कर दी। तब से इनका निक नाम 'क्रेन-बेदी' पड़ गया। निर्भीकता और कार्यों के प्रति इमानदारी की मिसाल हैं वो ।
गणतंत्र दिवस पर परेड को लीड कर रही थीं , जिसमें उनके उच्च अधिकारी ने उन्हें झंडा लेकर चलने की अनुमति नहीं दी, कारण ये बताया की वो स्त्री हैं और इतनी देर तक भार नहीं उठा सकेंगी । किरण जी ने कहा की जब वो इतनी कठिन ट्रेनिंग के बाद एक IPS अधिकारी बन सकती हैं तो क्या झंडा उठाकर परेड के दौरान नहीं चल सकती। अंत में किरण जी ही बातों को माना और उनको झंडा गर्व से थामने का अधिकार मिला।
दिल्ली में आयोजित एशियन खेलों के दौरान उनकी नियुक्ति , ट्रैफिक कंट्रोल आफिसर के पद पर हुई , तथा उनके पास बहुत कम समय में पूरी की जाने वाली जिम्मेदारी आ गयी। जिसको उन्होंने पूरी निष्ठां से निभाया और अत्यंत कम समय में ट्रैफिक में अनुशासन लाकर एक मिसाल कायम की। उन्होंने इसके लिए सुबह पांच बजे से लेकर रात ११ बजे तक अथक मेहनत की । उनकी माताजी ने घर का ध्यान रखा तथा किरण जी को निष्ठा से कार्य में सतत लगे रहने में बहुत सहयोग किया।
दिल्ली में एशियन खेलों के बाद किरण जी की पोस्टिंग ' Goa ' कर दी गयी। हर व्यक्ति की अपेक्षा उनसे कई गुना बढ़ गयी थी। गोवा वासी भी उनसे दिल्ली वाला अनुशासन अपने शहर में चाहते थे । किरण जी ने अपनी बेटी जो 'nephritis' के कारण AIIMS में भारती थी को छोड़कर गोवा में डयूटी ज्वाइन कर ली। उन्होंने कुछ समय माँगा दिल्ली में रहने के लिए, बेटी के लिए, लेकिन उनकी नहीं सुनि गयी । मौत से जूझ रही बच्ची को , छोड़कर जाने का मजबूत कलेजा सिर्फ किरण जी के ही पास है। ऐसे समय में हमेशा की तरह उनकी माँ ने ही बेटी का ध्यान रखा। बहुत कष्ट सहे लेकिन हमेशा लोगों की आशाओं पर खरी उतरीं।
सन २००२ में उन्हें भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला का खिताब मिला । उनके देश विदेश के बहुत से सम्मान मिले। जिसे उन्होंने सदैव अपने साथी आफिसर और subordinates के साथ बांटा और उन्हें श्रेय दिया।
जब किरण जी की नौकरी के मात्र दो वर्ष शेष थे और वो पुलिस कमिश्नर बनने के लिए सबसे उपयुक अधिकारी थीं और हर प्रकार से योग्य भी , तब भी उन्हें कमिश्नर नहीं बनाया गया और उनसे दो वर्ष जूनियर आफिसर को ये महत्वपूर्ण पद दिया गया। हमारे देश में सही व्यक्ति को उसका अधिकार नहीं मिलता । स्वाभिमानी तथा इमानदार अधिकारी किरण बेदी ने उस पद को त्याग दिया और निकल पड़ीं समाज सेवा के लिए। देश विदेश से हज़ारों कार्यक्रमों के लिए उनके पास आमंत्रण आने लगे।
ऐसा ही एक आमंत्रण उन्हें रजत शर्मा द्वारा दूरदर्शन से - " आपकी कचहरी " प्रोग्राम के लिए मिला। जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और जज की कुर्सी पर बैठकर न्याय कैसे किया जाता है , इसकी भी एक मिसाल कायम की । आज के दौर में जज की महिमामयी कुर्सी पर ' राखी सावंत ' जैसे लोग बैठकर अपनी फूहड़ भाषा से लोगों को डिप्रेशन और मौत के मुंह में भेज रहे हैं। कितना बड़ा अंतर हैं किरण जी और राखी के व्यक्तित्व में , लेकिन हमारा समाज लोगों के बीच का फर्क करना नहीं जानता।
किरण जी का व्यक्तित्व प्रेरणादायक है। मेरी आदर्श हैं वे। सभी महिलाओं को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए की कैसे निस्वार्थ तथा समाजोपयोगी जीवन जिया जा सकता है।
१८ मार्च २००९ को Bangkok में किरण जी से रूबरू दो घंटे चर्चा में ये जानकारी मिली। उनका बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व है , जो मुझे प्रेरणा देता है।
हमारे देश को बहुत सी किरण चाहिए आज !
किरण बेदी जी को 'भारत-रत्न ' पुरस्कार से सम्मानित किया जाना चाहिए ।
दिल्ली में आयोजित एशियन खेलों के दौरान उनकी नियुक्ति , ट्रैफिक कंट्रोल आफिसर के पद पर हुई , तथा उनके पास बहुत कम समय में पूरी की जाने वाली जिम्मेदारी आ गयी। जिसको उन्होंने पूरी निष्ठां से निभाया और अत्यंत कम समय में ट्रैफिक में अनुशासन लाकर एक मिसाल कायम की। उन्होंने इसके लिए सुबह पांच बजे से लेकर रात ११ बजे तक अथक मेहनत की । उनकी माताजी ने घर का ध्यान रखा तथा किरण जी को निष्ठा से कार्य में सतत लगे रहने में बहुत सहयोग किया।
दिल्ली में एशियन खेलों के बाद किरण जी की पोस्टिंग ' Goa ' कर दी गयी। हर व्यक्ति की अपेक्षा उनसे कई गुना बढ़ गयी थी। गोवा वासी भी उनसे दिल्ली वाला अनुशासन अपने शहर में चाहते थे । किरण जी ने अपनी बेटी जो 'nephritis' के कारण AIIMS में भारती थी को छोड़कर गोवा में डयूटी ज्वाइन कर ली। उन्होंने कुछ समय माँगा दिल्ली में रहने के लिए, बेटी के लिए, लेकिन उनकी नहीं सुनि गयी । मौत से जूझ रही बच्ची को , छोड़कर जाने का मजबूत कलेजा सिर्फ किरण जी के ही पास है। ऐसे समय में हमेशा की तरह उनकी माँ ने ही बेटी का ध्यान रखा। बहुत कष्ट सहे लेकिन हमेशा लोगों की आशाओं पर खरी उतरीं।
सन २००२ में उन्हें भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला का खिताब मिला । उनके देश विदेश के बहुत से सम्मान मिले। जिसे उन्होंने सदैव अपने साथी आफिसर और subordinates के साथ बांटा और उन्हें श्रेय दिया।
जब किरण जी की नौकरी के मात्र दो वर्ष शेष थे और वो पुलिस कमिश्नर बनने के लिए सबसे उपयुक अधिकारी थीं और हर प्रकार से योग्य भी , तब भी उन्हें कमिश्नर नहीं बनाया गया और उनसे दो वर्ष जूनियर आफिसर को ये महत्वपूर्ण पद दिया गया। हमारे देश में सही व्यक्ति को उसका अधिकार नहीं मिलता । स्वाभिमानी तथा इमानदार अधिकारी किरण बेदी ने उस पद को त्याग दिया और निकल पड़ीं समाज सेवा के लिए। देश विदेश से हज़ारों कार्यक्रमों के लिए उनके पास आमंत्रण आने लगे।
ऐसा ही एक आमंत्रण उन्हें रजत शर्मा द्वारा दूरदर्शन से - " आपकी कचहरी " प्रोग्राम के लिए मिला। जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और जज की कुर्सी पर बैठकर न्याय कैसे किया जाता है , इसकी भी एक मिसाल कायम की । आज के दौर में जज की महिमामयी कुर्सी पर ' राखी सावंत ' जैसे लोग बैठकर अपनी फूहड़ भाषा से लोगों को डिप्रेशन और मौत के मुंह में भेज रहे हैं। कितना बड़ा अंतर हैं किरण जी और राखी के व्यक्तित्व में , लेकिन हमारा समाज लोगों के बीच का फर्क करना नहीं जानता।
किरण जी का व्यक्तित्व प्रेरणादायक है। मेरी आदर्श हैं वे। सभी महिलाओं को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए की कैसे निस्वार्थ तथा समाजोपयोगी जीवन जिया जा सकता है।
१८ मार्च २००९ को Bangkok में किरण जी से रूबरू दो घंटे चर्चा में ये जानकारी मिली। उनका बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व है , जो मुझे प्रेरणा देता है।
हमारे देश को बहुत सी किरण चाहिए आज !