जिसका जूता है और जिसका पाँव है, पता तो उसी को होगा न की कहाँ काट रहा है और कितना। शेष जन या तो सहानुभूति जता सकते हैं या फिर शिष्टाचार। या फिर कटे-छिले पर नमक छिड़ककर आनंद उठा सकते हैं।
कहा भी गया है- "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" , लेकिन जब उपदेशकर्ता पर स्वयं आ बनती है वह जार-बेज़ार होकर रो पड़ता है। उस समय उसके खुद के उपदेश उसके काम नहीं आते।
एक ही घर में रहने वाले भी प्रायः एक-दुसरे की मनः स्थिति से अनजान होते हैं और कब क्या बोला जाए इसका सही अनुमान नहीं लगा पाते और फलस्वरूप स्थिति सँभालने के बजाये और बिगड़ जाती है। ऐसा ही कुछ हर जगह होता है। फिर चाहे वो घर हो दफ्तर हो अथवा ब्लॉगजगत ।
जो भुक्त भोगी है वह परिस्थिति को बेहतर समझता है, इसके विपरीत जो उस दौर से गुजरे नहीं हैं , वे समय आने पर ही समझते हैं।
एक सहेली ने एक बार कहा था - जो अज्ञानी हैं , वही सब प्रकार के भयों से मुक्त हैं और वही खुश भी हैं। दूसरी ने उसकी बात काटते हुए कहा- "जो ज्ञानी हैं वे ही सत्य से परिचित हैं और वे ही खुश हैं " --- फिर प्रश्न उठा, जो न ही ज्ञानी हैं और न ही अज्ञानी , उनका क्या...?
वैसे मेरे विचार से तो पूर्ण ज्ञानी कोई है ही नहीं अधिकतर लोग अपने अधूरे ज्ञान के झूले पर सवार होकार लम्बी-लम्बी पेंगें भरते हैं। अतः खुश तो कोई अज्ञानी ही हो सकता है , जिसे दुःख, सुख, भूत-प्रेत, चोर-उच्चक्के , मान-अपमान, किसी भी बात का ज्ञान ही न हो...बस अपने खयाली पुलाव बना-बना कर खुश रहता हो........
कहा भी गया है ---
" Ignorance is bliss"
Zeal
कहा भी गया है- "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" , लेकिन जब उपदेशकर्ता पर स्वयं आ बनती है वह जार-बेज़ार होकर रो पड़ता है। उस समय उसके खुद के उपदेश उसके काम नहीं आते।
एक ही घर में रहने वाले भी प्रायः एक-दुसरे की मनः स्थिति से अनजान होते हैं और कब क्या बोला जाए इसका सही अनुमान नहीं लगा पाते और फलस्वरूप स्थिति सँभालने के बजाये और बिगड़ जाती है। ऐसा ही कुछ हर जगह होता है। फिर चाहे वो घर हो दफ्तर हो अथवा ब्लॉगजगत ।
जो भुक्त भोगी है वह परिस्थिति को बेहतर समझता है, इसके विपरीत जो उस दौर से गुजरे नहीं हैं , वे समय आने पर ही समझते हैं।
एक सहेली ने एक बार कहा था - जो अज्ञानी हैं , वही सब प्रकार के भयों से मुक्त हैं और वही खुश भी हैं। दूसरी ने उसकी बात काटते हुए कहा- "जो ज्ञानी हैं वे ही सत्य से परिचित हैं और वे ही खुश हैं " --- फिर प्रश्न उठा, जो न ही ज्ञानी हैं और न ही अज्ञानी , उनका क्या...?
वैसे मेरे विचार से तो पूर्ण ज्ञानी कोई है ही नहीं अधिकतर लोग अपने अधूरे ज्ञान के झूले पर सवार होकार लम्बी-लम्बी पेंगें भरते हैं। अतः खुश तो कोई अज्ञानी ही हो सकता है , जिसे दुःख, सुख, भूत-प्रेत, चोर-उच्चक्के , मान-अपमान, किसी भी बात का ज्ञान ही न हो...बस अपने खयाली पुलाव बना-बना कर खुश रहता हो........
कहा भी गया है ---
" Ignorance is bliss"
Zeal