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Thursday, July 28, 2011

क्या स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ते तलाक का कारण है ?

कई बार सुनने को मिलता है की स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता घरों को तोड़ रही है । आखिर कैसे ? यदि पुरुषों की आर्थिक स्वतंत्रता घरों को नहीं तोड़ रही तो स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता परिवारों को कैसे तोड़ सकती है भला ?

मैंने तो आज तक यही देखा और सुना है की स्त्री परिवारों को सदैव जोडती है और रिश्तों को बनाए रखने में अहम् भूमिका निभाती है । फिर वह परिवारों के टूटने का सबब कैसे हो सकती है ?

  • स्त्रियाँ यदि नौकरी करती हैं तो पति आर्थिक जिम्मेदारियों को भी साझा करती हैं , जिससे पति पर अनावश्यक बोझ नहीं रहता ।
  • नौकरी करने वाली स्त्रियाँ घर से बाहर निकलती हैं , जिससे उनमें आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है । वे घर के काम काज के अतिरिक्त अन्य बहुत से कार्यालय सम्बन्धी कार्यों और बारीकियों को समझने लगती हैं , जिससे वे पति की अन्य बाहरी जिम्मेदारियों का भी सहजता से वहां कर लेती हैं ।
  • सुन्दर पत्नी किस पति को नहीं अच्छी लगती । नौकरी करने वाली स्त्रियाँ स्वयं तो maintained और आकर्षक रखती हैं , अन्यथा वे अपनी परवाह कम करती हैं ।
  • बाहर निकलने से उनका exposure बढ़ता है तथा बाहर की दुनिया की समझ बढती है ! इससे उनमें जागरूकता आती है , और आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है । जो परिवार में एक स्वस्थ्य वातावरण को उपस्थित करता है।
  • स्त्री पुरुष में समानता आती है और आपसी द्वेष ख़तम होते हैं । कुंठा मिटती है और एक-दुसरे के लिए परस्पर सम्मान बढ़ता है ।
  • वह खुश रहती है ! उसे अपनी शिक्षा और जीवन दोनों सफल लगने लगते हैं । मन की ख़ुशी उसे परवार के ज्यादा करीब लाते हैं । बच्चे एवं पति उस पर गर्व करते हैं ।
  • उसकी भी तरक्की होती है । Promotion मिलता है । उसके कार्यों की सराहना होती है जो उसके self esteem को बढ़ाता है । उसे अपनी सम्पूर्णता का एहसास होता है। पति के साथ वह भी अपनी उपलब्धियों को साझा करती है ! दोनों की आपसी ख़ुशी बढती है ! समाज को भी अधिक योगदानकर्ता मिलते हैं ।
  • पति का अपनी पत्नी की योग्यता पर विश्वास बढ़ता है । पत्नी के लिए ह्रदय में प्यार तो पहले से रहता है , अब सम्मान भी बढ़ जाता है , अन्यथा घर की खेती साग बराबर ही रहती है ।
  • पति अपनी पत्नी को बेहतर understand करता है । उसके वर्क-लोड को कम करने के लिए घरेलु कामों में भी उसकी सहायता करता है । दोनों सच्चे अर्थों में एक दुसरे के जीवन साथी बन जाते हैं ।
  • इसके अतिरिक्त यदि एक गृहणी को उसका पति आर्थिक स्वतंत्रता देता है , तो वह कुंठाग्रस्त नहीं रहती , प्रसन्नचित्त रहती है । पति उसका ध्यान रखता है , इस बात से अभिभूत रहती है और दूरियां घटती हैं ।

आजकल तो पुरुष स्वयं ही अपने लिए समकक्ष योग्यता और नौकरी करने वाली पत्नी चाहते हैं , जो सही अर्थों में उनके दुःख सुख की भागीदार बने । पति गर्व के साथ अपनी पत्नी की उपलब्धियों की चर्चा अपने मित्रों से करता है। ऐसे बहुत से लोगों को जानती हूँ जहाँ पति- पत्नी दोनों आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर हैं और परिवार में खुशहाली है। मेरी समझ से परिवारों का टूटना , झूठे दंभ , दहेज़ प्रथा , लालच, अज्ञानता और रूढ़िवादिता के कारण होता है । आर्थिक स्वतंत्रता के कारण नहीं।

फिर भी पाठकों से निवेदन है मेरा भ्रम दूर करें !

Zeal

Saturday, July 23, 2011

अर्धांगिनी के लिए अर्थव्यवस्था

विवाह के उपरान्त एक पत्नी अर्थात एक अर्धांगिनी मिलती है पति को , जिसका वो सहज ही पूरा ख़याल रखता है ! उसकी छोटी-बड़ी हर इच्छा को भी पूरा करना चाहता है ! लेकिन एक पत्नी जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है , क्या उसके मन की सभी अभिलाषाएं पूरी हो पाती है ? यदि उस स्त्री के पास महीने के खर्चे का पूरा धन हो भी तो क्या वह उस धन को अपनी निजी ख़ुशी के लिए अधिकार के साथ इस्तेमाल कर पाएगी ? पति के धन को अपनी ख़ुशी के लिए कहीं खर्च करने से पहले उसे पहले अपने पति की अनुमति लेनी होगी ! यदि वह बिना बताये चुप-चाप उस धन को खर्च करती है तो उसके मन पर एक अनजाना सा बोझ रहता है !


तो फिर इसका विकल्प क्या है ? यदि कोई पत्नी एक छोटी सी धनराशी अपनी निजी ख़ुशी के लिए इस्तेमाल करना चाहती है , जिसका उल्लेख वह अपने पति से करना गैरजरूरी समझती है , तथा निजता की रक्षा के लिए अनुमति लेना असहज करता हो तो यह कैसे संभव है ? पत्नी काफी दुविधा से गुजरती है ! बिना बताये पति के धन का इस्तेमाल करने में अपराधबोध से ग्रस्त होती है ! तथा निजता की रक्षा हेतु अनुमति लेने का विकल्प भी उसे असहज करता है . अंततः वह अपनी छोटी-बड़ी कुछ अभिलाषाओं का दमन कर देती है और अपने पर्सनल स्पेस का गला घोंटकर खुद को परिवार की ज़रूरतों तक ही सीमित कर लेती है !

यह समस्या आर्थिक रूप से स्वतंत्र पत्नी को नहीं झेलनी पड़ती !चूँकि वह स्वयं कमाती है इसलिए अपनी खुशियों की पूर्ती के लिए उसे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता , न ही पति से बिल पास कराना पड़ता है !

दो ही विकल्प नज़र आते हैं ! स्वाभिमान के साथ जीने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए ! स्त्रियाँ यदि नौकरी कर रही हैं तो आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं , कांफिडेंट होती हैं , परिवार का सहयोग भी करती हैं और अपने कमाए हुए धन को अपनी मर्जी के अनुसार खर्च करके अपना पर्सनल स्पेस भी सुरक्षित रखती हैं !

लेकिन एक स्त्री जो अर्थोपार्जन नहीं कर रही है , उसके पति की जिम्मेदारी है की वो अपनी पत्नी को आर्थिक स्वतंत्रता अवश्य दे ! अपनी पत्नी के साथ जोइंट अकाउंट तो सभी खुलवाते हैं लेकिन आवश्यकता है की पत्नी के नाम एक separate खाता खुलवाना चाहिए , जिसमें अर्धांगिनी के लिए अपनी कमाई का आधा हिस्सा डालना चाहिए ! यदि आधा कुछ ज्यादा लगे तो अर्धांगिनी पर जितना भरोसा हो उसके अनुसार एक निश्चित राशि डालनी चाहिए , जिस पर सिर्फ पत्नी का अधिकार हो तथा जिसे वह बिना पति की अनुमति लिए इस्तेमाल कर सके और पति भी इस धन पर अनावाश्रक रूप से अपनी निगाह न रखे !

क्या एक गृहणी जो पति पर आर्थिक रूप से निर्भर है , इस आर्थिक स्वतंत्रता की अधिकारिणी है ? क्या पति अपनी पत्नी पर इतना भरोसा करता है की वह अपनी पत्नी को हर महीने एक निश्चित रकम देकर भूल जाये और पत्नी को यह एहसास दिलाये की उसका पति उसे प्यार के साथ-साथ उस पर भरोसा भी करता है और उसके निजी स्पेस का सम्मान भी करता है !