कल चिड़ियों के लिए पानी रखने के लिए 'मिटटी का कोसा' खरीदा , फिर एक छोटी सी गगरी भी खरीद ली, जिनके मूल्य क्रमशः ३५ रूपए और ३० रूपए थे! वहीँ मुझे एक छोटा सा 'मीठी नीम' का पौधा रखा दिखा , हमने पूछा क्या ये भी बेच रहे हो ? उसने कहा नहीं ! हमने कहा दे दो , जो दाम हो ,ले लेना ! उसने मना कर दिया ! हम लोग गगरी आदि लेकर गाड़ी में बैठ गए! चलने ही वाले थे की अदिति ने कहा -"डैडी रुकिए, वो पौधा लेकर आ रहा है" ! हमने दरवाजा खोला उसने मुस्कुराते हुए हमें वो पौधा पकड़ा दिया ! फिर पतिदेव ने बहुत चेष्टा की उसे दाम देने की , कहा की नाम मात्र के लिए ही ले लो कम से कम , लेकिन वो मुस्कराता रहा पर रूपए नहीं लिए उसने ! फिर हम घर की और चले दिए!
अदिति बोली - " डैडी गरीब लोगों का दिल कितना बड़ा होता है" इन्होने कहा --" बेटा गरीब लोगों का ही दिल बड़ा होता है "
अब ये नन्हा सा 'तोहफा' मेरी बगिया की शोभा बढ़ा रहा है जो उत्तरोत्तर बड़ा होता जाएगा और मेरे साथ रहेगा !
मेरा अपने पाठकों से निवेदन है की भले ही फ्रिज का पानी क्यों न पीते हो वे हर गरमी में कुम्हार की दूकान से एक घड़ा /मटका/ गगरी अवश्य खरीदें ! ये ही इनकी जीविका का साधन है ! और मटके का पानी स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है !

