आज देश को ज़रुरत है देश पर कुर्बान होने वालों की। सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के इस दौर में जहाँ शासक और रक्षक ही भक्षक बन गया है , वहाँ ज़रुरत है हमें सही और गलत मंतव्यों की पहचान कर आगे आने वालों की। दिशाहीन होकर बस जिए जाने से काम नहीं चलेगा। अपनी दिशा स्वयं निर्धारित करनी है और उसे प्रशस्त भी करना है। देश की जडें खोदकर देश की नीव हिलाने वाले , कालाधन जमा करके अपने वतन के साथ गद्दारी करने वाले और धर्म का नाश कर अधर्म का प्रसार करने वालों को पहचानकर उनका बहिष्कार करना ही समय की मांग है , तभी राष्ट की रक्षा और सेवा की जा सकती है।
हमारे देश का सबसे बड़ा अभिशाप है गरीबी। इस देश में करोड़ों स्त्री और पुरुष और बच्चे हैं जो भूखे पेट , पानी पीकर सो जाते है और सुबह हो जाने पर , दो दाने अन्न की चाह में उनका पूरा दिन श्रम करते हुए निकल जाता है। ढाबों और होटलों की नाली से निकले जूठे अन्न को पाकर अपनी क्षुधा की शान्ति के लिए उन्हें कुत्तों से भोजन छीनना पड़ता है। कई बार वे हार जाते हैं जब कुत्ता त्वरित गति से उन दानों को चट कर जाता है और हमारे देश के बच्चे भूख से बिलबिलाते रह जाते हैं।
सत्ता में बैठे संवेदनहीन रक्षक अपनी जेबें भरने में ही इतने व्यस्त हो जाते हैं की अपनी प्रजा का ध्यान उन्हें ही रखना है, यह बात पूर्णतया भूल जाते हैं। आजादी के ६५ वर्षों बाद भी आधा भारत भूखे पेट सोये इससे ज्यादा शर्म की बात हम सबके लिए, खासकर हमारी सरकार (हमारे पालक ), के लिए और क्या हो सकती है।
न आतंकवाद पर नियंत्रण कर पा रही है , न बढती हुयी आबादी का पेट भर पा रही है , न ही काले धन की कालाबाजारी पर अंकुश लगा रही है , न ही तीन चौथाई जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है।
ज़रुरत है हम पर शासन करने वाली सरकार को अपने लिए एक दिशा निर्धारित करने की , जिसमें देश का हित हो आम जनता का भला हो।
राष्ट्र सर्वोपरि हो
जय भारत !
जय हिंदुस्तान
वन्देमातरम !
Zeal हमारे देश का सबसे बड़ा अभिशाप है गरीबी। इस देश में करोड़ों स्त्री और पुरुष और बच्चे हैं जो भूखे पेट , पानी पीकर सो जाते है और सुबह हो जाने पर , दो दाने अन्न की चाह में उनका पूरा दिन श्रम करते हुए निकल जाता है। ढाबों और होटलों की नाली से निकले जूठे अन्न को पाकर अपनी क्षुधा की शान्ति के लिए उन्हें कुत्तों से भोजन छीनना पड़ता है। कई बार वे हार जाते हैं जब कुत्ता त्वरित गति से उन दानों को चट कर जाता है और हमारे देश के बच्चे भूख से बिलबिलाते रह जाते हैं।
सत्ता में बैठे संवेदनहीन रक्षक अपनी जेबें भरने में ही इतने व्यस्त हो जाते हैं की अपनी प्रजा का ध्यान उन्हें ही रखना है, यह बात पूर्णतया भूल जाते हैं। आजादी के ६५ वर्षों बाद भी आधा भारत भूखे पेट सोये इससे ज्यादा शर्म की बात हम सबके लिए, खासकर हमारी सरकार (हमारे पालक ), के लिए और क्या हो सकती है।
न आतंकवाद पर नियंत्रण कर पा रही है , न बढती हुयी आबादी का पेट भर पा रही है , न ही काले धन की कालाबाजारी पर अंकुश लगा रही है , न ही तीन चौथाई जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है।
ज़रुरत है हम पर शासन करने वाली सरकार को अपने लिए एक दिशा निर्धारित करने की , जिसमें देश का हित हो आम जनता का भला हो।
राष्ट्र सर्वोपरि हो
जय भारत !
जय हिंदुस्तान
वन्देमातरम !
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श्री हरी ॐ पंवार (मेरठ विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफ़ेसर व प्रसिद्द वीर रस कवी), द्वारा रचित इस ओजमयी कविता को पढ़िए।
मैं भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब संसद से पगडण्डी तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत लिखूंगा जन गण मन के क्रंदन के
जब पंछी के पंखों पर हो पहरे बम के गोली के
जब धरती के दामन पर हों दाग लहू की होली के
कोई कैसे गीत सुना दे बिंदिया कुमकुम रोली के
मैं झोंपडियों का चारण हूँ आस उगाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
अन्धकार में समाँ गए जो तूफानों के बीच चले
मंजिल उनको मिली कभी जो चार कदम भी नहीं चले
क्रान्ति कथा में गौण पडी है गुमनामी की राहों में
गुंडे तस्कर तने खड़े हैं राज महल की राहों में
डाकू ने खादी पहनी तो संसद में सम्मान मिला
राजनीति में लौह पुरुष जैसा सरदार नहीं मिलता
लाल बहादुर जी जैसा कोई किरदार नहीं मिलता
ऐरे गैरे नत्थू खैरे तंत्री बनकर बैठे हैं
लोकतंत्र का मंदिर भी लाचार बना कर डाल दिया
कोई मछली बिकने का बाज़ार बना कर डाल दिया
अब जनता को संसद भी प्रपंच दिखाई देती है
नौटंकी करने वालों का मंच दिखाई देती है
इतिहासों के पन्नो में वे सब कायर कहलाते हैं
कहाँ बनेंगे मंदिर मस्जिद कहाँ बनेंगी राजधानी
मंडल और कमंडल पी गए सबकी आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बसते मज़हब के स्कूल गए
कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल जले
सौन चिरैया सूली टंग गयी पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो पूरा भारत नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको ज़िम्मेदारी थी वो घर भरने में व्यस्त मिला
जागो राजघाट के गांधी तुम्हे जगाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
जो जो अच्छे सच्चे नेता हैं उन सबका अभिनन्दन है
जो सच्चे मन से भारत माँ की सेवा कर सकते हैं
हम उनके क़दमों में अपने प्राणों को धर सकते हैं
लेकिन जो कुर्सी के भूखे दौलत के दीवाने हैं
सात समंदर पार तिजोरी में जिनके तहखाने हैं
जिनकी प्यास महासागर भूख हिमालय पर्वत है
लालच पूरा नील गगन है दो कौड़ी की इज्ज़त है
इनके कारण ही बनते हैं अपराधी भोले भाले
वीरप्पन पैदा करते हैं नेता और पुलिस वाले
काला धन वापस न आये तो मुझको फांसी दे दो
जब कोयल की डोली गिद्धों के धर आ जाती है
तब बगुला भक्तों की टोली हंसों को खा जाती है
जब जब भी जयचंदों का अभिनन्दन होने लगता है
जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तो माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते हैं
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते हैं
बिल्ली में ताकत होती कायरता दिल्ली में है
कहते हैं की सच बोलो तो प्राण गंवाने पड़ते हैं
मैं भी सच्चाई गा गा कर शीश कटाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
कोई साधू सन्यासी पर तलवारे लटकाता है
काले धन की चर्चा हो तो आँख चढाने लगता है
कोई हिमालय ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई गंगा यमुना अपने घर में भरने लगता है
कोई गांधी को भी गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोंप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना यूं आइनों में ली जाता है
कोई अपनी संस्कृति में आग लगाने लगता है
सौ गाली पूरी होते ही शिशुपाल कट जाते हैं
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
आभार।