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Tuesday, April 26, 2011

स्त्री उपभोग की वस्तु नहीं है -- Do not treat her like commodity.

झगडा मत करना
झूठ मत बोलना
अहंकार मत रखना
विनम्रता का व्यवहार रखना
मधुर वचन बोलना और अहिंसा का पालन करना आदि आदि ...

ऐसे बहुतेरे उपदेश/संस्कार दिए जाते हैं , लेकिन कोई ये नहीं बताता की जब किसी स्त्री के साथ अभद्र या अश्लील व्यवहार तो ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए ?

क्या चुप रहना चाहिए ?,
क्या लज्जावान सुशीला बनकर सबकुछ सहना चाहिए ?,
या अपने आप में तिरस्कार और अपमान सहकर घुटते रहना चाहिए ?
या फिर अदालतों में कभी मिलने वाले न्याय के लिए लड़ना चाहिए ?
या फिर पुरुष को श्रेष्ठ समझकर अपनी नियति को स्वीकार कर लेनी चाहिए ?

या फिर हिम्मत और साहस से काम लेकर सामने वाले को उसकी गलती का एहसास करा देना चाहिए ?
या फिर बिना डरे , बिना रोये , बिना स्वयं को कमतर समझे साहस के साथ , उस जड़ता प्राप्त , अज्ञानी , जाहिल एवं दुष्ट पुरुष को उसके कृत्यों की सजा दे देनी चाहिए , जिससे भविष्य में वो ऐसी हरकतें करे जिससे किसी स्त्री के सम्मान और शील को चोट पहुंचे ?
क्या उस महिला की तरह , जिसे विधायक ने त्रस्त कर रखा था , खून कर देना चाहिए ?
या फिर राजेश गुलाटी जैसे पुरुषों द्वारा शारीर के ७२ टुकड़े किये जाने का इंतज़ार करना चाहिए ?
या फिर अरुणा शानबाग की तरह बलात्कार के बाद ३७ साल तक कोमा में रहकर बलात्कार से भी बदतर जिंदगी जिया जाए ?
या फिर निशाप्रिया भाटिया की तरह की तरह न्याय व्यवस्था के हाथ का खिलौना बन कर तिल-तिल घुटना चाहिए?
या फिर मनु हत्या काण्ड या राठोर काण्ड की तरह पीडिता को आत्महत्या कर लेनी चाहिए ?

क्या "शठे शाठ्ये समाचरेत" का विकल्प नहीं अपनाना चाहिए जब नपुंसक हो रही व्यवस्था., स्त्री को सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकती है तो ?
क्या बलात्कारी को मौत के घाट नहीं उतार देना चाहिए ? जब अदालतों के चक्कर ही लगाने हों तो पीडिता बनकर क्यूँ ? क्यूँ स्वयं ही सजा दे दो फिर मांगने दो दुर्जनों को न्याय की भीख अदालतों में
क्या स्त्री को उपभोग की वस्तु समझने वाले पुरुषों को उनका सही स्थान नहीं बता देना चाहिए ?
सेक्स के भूखे इन नामर्दों के शिश्न काटकर इनके गले में लटका देना चाहिए।

आज घरों में , ऑफिसों में, अस्पतालों में बस में , रेल में हर जगह स्त्री का शोषण हो रहा है। छोटी छोटी बच्चियों को भी ये दरिन्दे नहीं बख्श रहे क्या स्त्रियाँ इस उम्मीद में हैं कोई राजकुमार सफ़ेद घोड़े पर आकर उनकी रक्षा करेगा ? समय गया है अपनी रक्षा स्वयं करने का मत देखो उम्मीद भरी आखों से किसी की ओर कोई नहीं आएगा तुम्हारे अंतर्मन को समझने, तुम्हारे शील को बचाने अथवा तुम्हारे सम्मान की रक्षा करने।

एक सत्य घटना का उल्लेख कर रही हूँ , शायद किसी स्त्री को हिम्मत मिले --
उस समय मैं १२ वीं कक्षा की छात्रा थी , एक बार मैं एक जाने-माने नेत्र-विशेषज्ञ के पास , उनके आवास स्थित क्लिनिक पर विज़न -टेस्ट के लिए गयी उन्हें देखकर उनकी योग्यता से अभिभूत होकर किसी के भी मन में उनके लिए त्वरित सम्मान उत्पन्न हो जाए , ऐसा था उनका बाहरी व्यक्तित्व लेकिन असली चरित्र कैसा था ?
......कक्ष में करीब २० मरीज अपनी बारी आने के इंतज़ार में बैठे थे। डॉ साहब ने लेंस बदलकर जाँच करके चश्मे का नंबर देने के बजाये retinoscope द्वारा एक अनावश्यक जाँच की (एक ऐसा यंत्र जिसके द्वारा जाँच करते समय चिकित्सक एवं मरीज के चेहरों के मध्य बमुश्किल - सेंटीमीटर की दूरी रहती है)

फिर उन्होंने अपनी कुर्सी पर बैठकर कागज़ पर लिखना शुरू किया , चूँकि कक्ष में बैठे मरीज़ बहुत करीब थे , और कोई भी संवाद सभी को श्रव्य था इसलिए वे लिखकर संवाद कर रहे थे , जिसे केवल मैं पढ़ सकती थी। उसमें जो लिखा था उसे पढ़कर किसी का भी मन करता की इनको दो थप्पड़ मारकर इनका चरित्र सबके सामने ला दे।

लेकिन स्त्री की लज्जा, उसकी विवशता , उसे बहुत मजबूर करती है ज़रा सी भी उफ़ तक करने को। फिर मैंने क्या किया ? अपना परचा लिया और बहुत सफाई से उस कागज़ को भी उठा लिया जिसपर उनकी कारगुजारी की दास्तान उन्हीं की लिखाई में लिखी हुई थी।

वहां से बाहर निकलते ही , बिना विलम्ब किये उनके आवास के मुख्य द्वार पर जाकर घंटी बजायी। उनकी गरिमामय ५० वर्षीय पत्नी बाहर आयीं मैंने पूछा आप इस लिखाई को पहचानती हैं ? उन्होंने कहा हाँ ये तो डॉक्टर साहब की लिखाई लगती है। मैंने कहा - "उन्हीं की है , आराम से पढियेगा क्या -क्या लिखा है और रात का भोजन परसते समय ये कागज़ का टुकड़ा अपने स्वामी को देना मत भूलियेगा "

कहकर मैं वहां से चल दी बाहर मेरे भैया हतप्रभ खड़े थे , वो आज भी नहीं जानते की क्या हुआ था। हम घर वापस गए , फिर कभी वहां जाना नहीं हुआ। नहीं जानती उनकी पत्नी ने क्या किया। वो चिकित्सक सुधरे अथवा नहीं , लेकिन मुझे पूरा संतोष था की मैंने उन्हें समय रहते सही पाठ पढाया है।

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स्त्री की समाज में दुर्दशा का एक रूप --

औरत ने जनम दिया मर्दों को , मर्दों ने उसे बाज़ार दिए।
जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया।

तुलती है कहीं दीनारों में, बिकती है कहीं बाजारों में
नंगी नचवाई जाती है, उन ऐयाशों के दरबारों में
ये वो बेईज्ज़त चीज़ है जो , बंट जाती है इज्ज़त्दारों में
औरत ने जनम दिया.......

मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवाँ , औरत के लिए रोना भी खता
मर्दों के लिए लाखों सेजें , औरत के लिए बस एक चिता
मर्दों के लिए हर ऐश पर हक , औरत के लिए जीना भी सजा
औरत ने जनम दिया.......

जिन होठों ने उनको प्यार किया , उन होठों का व्यापार किया
जिस कोख में उनका जिस्म ढला, उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोपल बनकर , उस तन को जलीलोखार किया।
औरत ने जनम दिया .................

मर्दों ने बनायी जो रस्में , उनको हक़ का फरमान कहा
औरत के जिन्दा जलने को , कुर्बानी और बलिदान कहा
किस्मत के बदले रोटी दी , और उसको भी एहसान कहा
औरत ने जनम दिया ......................

संसार की हर एक बेशर्मी , ग़ुरबत की गोद में पलती है
सपनों ही में आकर ही रूकती है , ख़्वाबों में जो राह निकलती है
मर्दों की हवास है जो अक्सर, औरत के पाप में ढलती है
औरत ने जनम दिया................

औरत संसार की किस्मत है , फिर भी तकदीर की हेती है
अवतार पयम्बर जनती है , फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बदकिस्मत माँ है जो , बेटों की सेज पर लेटी है
औरत ने जनम दिया....................


http://youtu.be/WJAfEimtkHM

साहिर लुधियानवी जी का लिखा हुआ तथा लता मंगेशकर की आवाज़ में साधना फिल्म का ऊपर लिखा गीत सुनिएशायद समाज में स्त्रियों की दुर्दशा से रूबरू हों आप भी

आभार

Tuesday, January 4, 2011

क्या ब्लॉग्स के माध्यम से हमारा योगदान समाज तक पहुँच रहा है ?

व्यक्ति के मन में एक जज़्बा होता है की हम भी समाज के लिए कुछ योगदान कर सकेंकुछ जागरूकता ला सकेंविसंगतियों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करके समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव ला सकें

कुछ वर्ष पहले तक ऐसी कोई सुविधा नहीं थी जहाँ हम विचार रख सकते हों , विमर्श कर सकते होंलेकिन आज ब्लॉग एक सशक्त माध्यम बन कर उभरा है , जिसके द्वारा हम लोग आपस में विचार -विमर्श कर सकते हैं तथा अपने विचारों एवं आक्रोश को समाज तक पहुंचा सकते हैंबहुत से लोग जो ब्लोग्स पढ़ते हैं, चाहे सरसरी तौर पर ही पढ़ें , लेकिन निरंतर उठने वाली आवाजें उनके अंतर्मन को कहीं कहीं कचोटती या झकझोरती तो होंगी हीशायद उनके दिल में भी वो आवाज़ बुलंद होती होगी और फिर उनके माध्यम से ये लहर आगे भी बढती होगी

मेरे मन में ये प्रश्न है की क्या वास्तव में हमारी आवाज़ जनता के अंतर्मन को influence करने में सक्षम है? क्या हमारी आवाज़ एक बहुत छोटे दायरे तक तो सीमित नहीं हैक्या हम ब्लोगर्स की आवाज़ , विशाल समुद्र में मात्र एक बूँद के सामान है ? क्या हमारे प्रयत्न व्यर्थ हैं ? क्या हमारे अथक परिश्रम की कोई सार्थकता नहीं है ?

मेरी एक पाठक राधिका ने कहा - " दिव्या तुम्हारी आवाज़ एक छोटे दायरे तक सीमित है , तुम अपनी शक्ति को अनायास ही व्यय कर रही हो, तुम्हारे प्रयासों से समाज में कोई बदलाव आने वाला नहीं है। "

उसकी बात से मन में उपजे इस प्रश्न को आपके सामने रख रही हूँ

मेरे विचार से , जो लोग मेरे सामाजिक लेखों को पढ़ रहे हैं और कहीं कहीं सकारात्मक रूप में प्रभावित अथवा सहमत हो रहे हैं, उनके द्वारा ये विचार चार अन्य लोगों तक पहुंचेगाफिर उन चारों के द्वारा १६ तक और इस प्रकार geometrical progression में विचार फैलेगा और लोगों में कहीं कहीं जागरूकता लाएगा हीदृढ विश्वास है की बिंदु-बिंदु से ही सिन्धु बना हैमेरी पहुँच बहुत सीमित हैं , लेकिन मेरे पास बेहतर विकल्प भी तो नहीं हैंइसलिए अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ कर्म जारी है

इस विषय पर आपके क्या विचार हैं और क्या सुझाव हैं , उनका स्वागत है

आभार

Friday, December 3, 2010

क्या प्रेम-विवाह करना गुनाह है ? -- Love marriage

दिल्ली में एक नवविवाहित जोड़ा अपने परिवार वालों से डरकर छुपता फिर रहा हैउन्हें डर है उनके घर वाले कहीं उन्हें मरवा ना डालेंउस दम्पति का जुर्म सिर्फ इतना है की उन्होंने प्रेम-विवाह किया है२८ साल का युवक जिसकी दोनों टांगें पोलिओ से ग्रस्त हैं , को एक ऐसी सुन्दर और सुशील लड़की मिली जो सर्व गुण संपन्न है तथा इस युवक से प्यार करती हैकल जब दोनों का सुन्दर , मासूम और सहमा हुआ चेहरा टीवी पर देखा तो मन में यही प्रश्न आया की क्या प्रेम-विवाह करने वाले घुट-घुट कर जीने तथा समाज से तिरस्कार मिलने के लिए अभिशप्त हैं ?

वही माता पिता जो अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने के लिए तत्पर रहते हैं , वो आखिर क्यूँ अपनी संतान के खिलाफ हो जाते हैं जब वो अपनी पसंद की लड़की अथवा लड़के से शादी करना चाहते हैं

जब बच्चे वयस्क हो जाते हैं , तो वो अपना अच्छा बुरा समझने के लायक हो जाते हैंइसलिए विवाह जैसा अहम् फैसला संतान की मर्जी से ही होना चाहिएऔर माता-पिता को अपने बच्चे की ख़ुशी में शामिल होकर अपने आशीर्वाद के साथ , उनके चयन को सम्मान देकर उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए

जीवन में चाहे आपदाएं आयें, चाहे समस्याएं , चाहे तिरस्कार , प्रत्येक स्थिति में यदि कोई साथ देता है तो वो हैं माता पिता और परिवार वालेफिर प्रेम विवाह जैसी परिस्थिति में माँ बाप साथ क्यूँ नहीं देते जबकि उस समय उन मासूम बच्चों को समाज के प्रतिकार से बचने के लिए अपनों की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है

प्रेम तो एक सदगुण है फिर प्रेम विवाह समाज में इतना उपेक्षित क्यूँ है ? क्या मनचाहा जीवन-साथी पाने के लिए अपनों से जुदा होना ही नियति है मासूमों की ? या फिर क्रूर परिवार वाले अपने झूठे दंभ को पोषित करने के लिए इसी तरह प्रेम करने वालों की जान के प्यासे बने रहेंगे सदा ?