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Thursday, November 1, 2012

पहले मुर्गी या फिर अंडा ? आस्तिक बनाम नास्तिक ..

इस दुनिया में आस्तिक पहले आया या फिर नास्तिक , या फिर दोनों एक ही हैं ? आस्तिकता 'प्रकाश' है और नास्तिस्कता 'तम' है।  आस्तिकता के बगैर, नास्तिकता का कोई अस्तित्व ही नहीं है !

नास्तिकता कुछ और नहीं , मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) की एक अवस्था है!  किसी न किसी बात से निराश व्यक्ति ही हताशा की अवस्था में नास्तिक हो जाता है !  भाग्य यदि साथ नहीं दे रहा तो ईश्वर के अस्तित्व को क्यों नाकारा जाए ? भाग्य को ही क्यों न कोस लिया जाए थोडा ?

सफल व्यक्ति आज तक कभी भी नास्तिक नहीं देखे गए। वे अपनी उपलब्धियों का श्रेय एक सर्व शक्तिमान को अवश्य देते हैं ! जब भाग्य साथ देता है तो व्यक्ति की आस्था बनी रहती है ईश्वर में!

अतः विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न त्यागें ! ईश्वर और धर्म का त्याग मत कीजिये !

रहिमन चुप हो बैठिये, देख दिनन के फेर,
जब नीके दिन आईहें , बनत न लगिहें देर।

Zeal 

Thursday, July 5, 2012

नास्तिकों के चोंचले

मज़ाक तो देखिये-- ब्रम्हाण्ड के कणों को ढूंढ लिया। बोसोन्स से बने हुए हैं। ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं ये, सोच कर खुश हो रहे हैं नास्तिक । गर्भ धारण , संतानोत्पत्ति , फल पुष्प आदि का खिलना कैसे होता है ? नास्तिक जवाब दें। गरीब भूखे मर रहे हैं और अमीरों के चोंचले जारी हैं --कभी ब्रम्हाण्ड का रहस्य जान लेते हैं तो कभी अरबों रूपए बर्बाद करके सृष्टि की उत्पत्ति पर शोध करते हैं।

Zeal

Wednesday, April 6, 2011

यदि ईश्वर एक है तो भेद-भाव क्यूँ है ? -- आस्तिकता बनाम नास्तिकता

वर्ल्ड कप के खुमार में एक बात ने नया चिंतन मन में पैदा कर दिया। धुरंधर धोनी को सफलता मिली तो उन्होंने ईश्वर के साथ किया हुआ वादा त्वरित गति से पूरा किया । खेल से पूर्व इश्वर की श्रद्धा से पूजा अर्चना की थी और खेल के बाद सबसे पहले उन्हीं का स्मरण किया।

ज्यादातर सफल व्यक्ति ( अम्बानी से ओबामा तक ), ईश्वर की ताकत में आस्था रखते हैं। अपने अस्तित्व और सफलताओं का श्रेय ईश्वर को ही देते हैं । फिर नास्तिक कैसे होते हैं कुछ लोग । नास्तिक हो जाने के लिए किन कारणों का योगदान होता है । क्या असफलताएं किसी को नास्तिक बना सकती हैं । क्या निराशा के भाव जब गहरे हो जाते हैं , तो व्यक्ति नास्तिक हो जाता है? नास्तिक व्यक्ति अपनी सफलताओं और सृष्टि के संचालन का श्रेय किसे देता है ? क्या नास्तिक जन्मजात होते हैं ?

जब तक कोई स्वयं न बताये की मैं नास्तिक हूँ अथवा आस्तिक हूँ , तब तक हम उसे अपना जैसा ही पाते हैं , मानवीय संवेदनाओं से युक्त। लेकिन जैसे ही इश्वर की चर्चा आती है तो नास्तिक व्यक्ति क्यूँ उसके खिलाफ बोलता है जिसकी सत्ता ही नहीं है उसकी नज़रों में ? जब सत्ता ही नहीं है तो विरोध किसका ?

ईश्वर की सत्ता है, तभी धर्म हैं । क्या ईश्वर को साम्प्रदायिकता का जिम्मेदार मानना चाहिए । या फिर इंसान की अज्ञानता जिम्मेदार है साम्प्रादायिकता के लिए ? क्या ईश्वर की सत्ता ख़तम की जा सकती है ? क्या नास्तिक-जन धर्म के झगड़ों को मिटाने में कोई सार्थक भूमिका अदा कर सकते हैं ?

oxygen न हो तो जीवन भी नहीं होगा, पर हवा को किसी ने देखा नहीं है आज तक । पंखा चला दें तो भी हवा को देखा नहीं जा सकता , लेकिन उसके अस्तित्व को भली-भांति महसूस किया सकता है। इसी तरह इश्वर को किसी ने नहीं देखा , लेकिन उसकी सत्ता को अनेक रूपों में महसूस अवश्य किया है।

मेरे विचार - इश्वर की सत्ता सर्वव्यापी है , कण-कण में है । ईश्वर एक ही है। मेरी हर सफलता और ख़ुशी ईश्वर की कृपा से मिली है। दुखों का कारण अपनी अज्ञानता को मानती हूँ। बहुत बार इश्वर के साक्षात दर्शन भी किये हैं। जो नास्तिक हैं , उनमें भी ईश्वर के दर्शन किये हैं ।

आपका क्या विचार है इस विषय पर ...

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