इस दुनिया में आस्तिक पहले आया या फिर नास्तिक , या फिर दोनों एक ही हैं ? आस्तिकता 'प्रकाश' है और नास्तिस्कता 'तम' है। आस्तिकता के बगैर, नास्तिकता का कोई अस्तित्व ही नहीं है !
नास्तिकता कुछ और नहीं , मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) की एक अवस्था है! किसी न किसी बात से निराश व्यक्ति ही हताशा की अवस्था में नास्तिक हो जाता है ! भाग्य यदि साथ नहीं दे रहा तो ईश्वर के अस्तित्व को क्यों नाकारा जाए ? भाग्य को ही क्यों न कोस लिया जाए थोडा ?
सफल व्यक्ति आज तक कभी भी नास्तिक नहीं देखे गए। वे अपनी उपलब्धियों का श्रेय एक सर्व शक्तिमान को अवश्य देते हैं ! जब भाग्य साथ देता है तो व्यक्ति की आस्था बनी रहती है ईश्वर में!
अतः विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न त्यागें ! ईश्वर और धर्म का त्याग मत कीजिये !
रहिमन चुप हो बैठिये, देख दिनन के फेर,
जब नीके दिन आईहें , बनत न लगिहें देर।
Zeal