सम्मान और पुरस्कार के मिलने और देने पर विचार किया तो लगा की यह भी अंग्रेजों के द्वारा अपनाई गयी 'डिवाइड एंड रूल पॉलिसी' की ही तरह है। जिसको समाज से तोडना हो , उसका नाम आगे कर दो । उसके दुश्मन नहीं भी होंगे तो दर्जन भर बन जायेंगे। उसकी प्रतिभा का लोहा अगर मानते भी होंगे लोग , तो उसका नाम ऊपर आने पर उसमें ७० कमियां दिखने लगेंगी सबको।
कौन देगा पुरस्कार उन शहीदों को जिन्होंने होटल ताज में अनेकों की प्राण रक्षा की आतंकवादियों से , उन इमानदार ऑफिसरों को जिनकी इमानदारी की सजा उन्हें गोलियों से भून कर दी गयी , स्वामी निगमानंद, अरुण दस और बहन राजबाला को , जिसने राष्ट्र की धरोहर बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी । क्या मिलेगा उन्हें पुरस्कार जो, तन,मन और धन से निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं ?
कौन देगा पुरस्कार उन शहीदों को जिन्होंने होटल ताज में अनेकों की प्राण रक्षा की आतंकवादियों से , उन इमानदार ऑफिसरों को जिनकी इमानदारी की सजा उन्हें गोलियों से भून कर दी गयी , स्वामी निगमानंद, अरुण दस और बहन राजबाला को , जिसने राष्ट्र की धरोहर बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी । क्या मिलेगा उन्हें पुरस्कार जो, तन,मन और धन से निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं ?
सचिन तेंदुलकर का नाम 'भारत-रत्न' के लिए उठने पर बेचारा मुफ्त में बदनाम हो गया। गलती से एक विज्ञापन यदि 'पेप्सी' का किया होगा , तो लाखों ताने आने लगे की पैसे के लिए विदेशी-जहर का विज्ञापन कर रहा है। गलती से राज्य-सभा का सदस्य मनोनीत हो गया तो और भी कहर बरपने लगा। जिसे देखने के लिए खेल-प्रेमी रातों की नीद खराब करके भी मैच देखते थे और एक-एक शॉट पर ख़ुशी से झूम उठते थे , वही तिलमिला उठे ये जानकार की इसे पुरस्कार मिल रहा है। पुरस्कार तो मिला नहीं, अलबत्ता वो ज़रूर दूर हो गया अपने बहुत से चाहने वालों से।
लेकिन यदि गंभीरता पूर्वक विचार किया जाए, तो वह "क्रिकेट-रत्न" तो हो सकता है लेकिन "भारत-रत्न" नहीं। क्योंकि भारत-भूमि एक से बढ़कर एक रत्नों से भरी हुयी है। एक को पुरस्कार देकर अन्यों के साथ अन्याय ही किया जाता है।
महादेवी वर्मा जी को उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए जब ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला तब उनके समकालीन बहुत से कवि उनकी तरह ही प्रतिभान थे लेकिन वे उस सम्मान से वंचित रहे।
रामधारी सिंह दिनकर को पद्म-भूषण मिला तो बहुत से कवि इस पुरस्कार से वंचित रहे। अब सभी को तो सम्मान से नवाज़ा नहीं जा सकता , लेकिन सम्मानित न होने के कारण अन्य लोग की प्रतिभा कम नहीं हो जाती।
फिर पुरस्कारों से लाभ क्या ? एक प्रोत्साहित हुआ तो दूसरा हतोत्साहित हो गया। एक से एक रियलिटी शोज़ हो रहे हैं , जिसमें एक से एक प्रतिभावान प्रतिभागी भाग लेते हैं , लेकिन अंत में एक का पावँ तो सातवें आसमान पर होता है, जबकि शेष प्रतिभागियों की निराशा अपने चरम पर होती है।
सम्मान अक्सर पाने वाले में अहंकार पैदा करता है , जबकि न पाने वालों में निराशा और लघुता को पैदा करता है। सम्मान सिर्फ प्रत्साहन के निमित्त ही देना चाहिए। श्रेष्ठता का प्रमाण पत्र नहीं होना चाहिए। अब प्रश्न यह उठता है जो स्वयं सिद्ध श्रेष्ठ है, क्या वे वाकई पुरस्कार के मोहताज हैं ? क्या पुरस्कार उनके कार्य क्षेत्र में किसी प्रकार का योगदान करते हैं?
बुकर पुरस्कार विजेता 'अरूंधती राय' आज अपने देश द्रोही बयानों से जनता की नफरत का पात्र बनी हुयी है । क्या किसी एक पुस्तक से वह इतने बड़े पुरस्कार की अधिकारी हो गयी ? और हज़ारों लाजवाब पुस्तकें अपनी पहचान तो बना चुकीं लेकिन पुरस्कृत नहीं हुयीं। तो क्या फरक पड़ा पुरस्कृत होने और अपुरस्कृत रह जाने से।
पुरस्कार का एक लाभ ज़रूर नज़र आता है की घर-परिवार और इष्ट-मित्रों पर रौब झाड़ने के भरपूर काम आता है। पर कितने दिन ? एक छोटे अंतराल के बाद उसी मंच पर कोई और खड़ा नज़र आता है।
नाम और शोहरत बहुत दिनों तक नहीं रहती। वक़्त करवटें लेता रहता है। हाँ जो चिरकाल तक रहती है वो है व्यक्ति की प्रतिभा , जो किसी पुरस्कार के मिलने से बढती नहीं , और न मिलने से घटती नहीं।
प्रतिभा तो स्वयं में ही सबसे बड़ा सम्मान है जो सदा-सर्वदा आपको औरों से अलग रखता है और यह वो सम्मान है जिससे नवाजकर ईश्वर आपको इस धरती पर भेजता है।
शेर कभी चुनाव से जीतकर जंगल का राजा नहीं बनता। वह अपने पराक्रम से ही सर्व-सम्मति द्वारा राजा स्वीकार कर लिया गया है। युगों बीत गए लेकिन शेर के सर पर से ताज आज तक नहीं उतार सका कोई।
शेर बनो...दहाडो....आपकी दहाड़ ही आपकी पहचान है....
Zeal