"आजकल के युवा दिशाहीन हैं " ऐसा जुमला लोगों की ज़बान पर चढ़ा रहता है । ज़ाहिर सी बात है ये जुमला युवाओं की जबान पर तो नहीं रहता।
किस पीढ़ी को दोष दिया जाए ? क्या वाकई में 'युवा' दोषी हैं ? या फिर इन युवाओं को मिलने वाले दिशा-निर्देशन में दोष है ?
जब युवा वर्ग कुछ अच्छा करता है , माता-पिता और समाज और देश को गौरवान्वित करता है तो तुरंत सुनने को मिलता है -"माँ-बाप ने अच्छे संस्कार दिए हैं " ..इसके विपरीत युवा यदि कुछ गलत करता है तो -"युवाओं से उम्मीद रखना बेकार है" , ऐसा जुमला आम होता है । यहाँ कोई दोष नहीं देता घर के बड़ों को , शिक्षकों और समाज को जिसने संस्कार देने में भूल की।
बदलाव प्रकृति का नियम है , देश काल परिस्थिति बदलती जा रही है तो उसमें बड़ा होने वाला युवा भी समय के साथ बदल रहा है। जो समय की मांग है , उसी के अनुसार अपने को ढाल रहा है। बिना संस्कारों को ग्रहण किये कोई भी बच्चा युवा नहीं होता । और संस्कार उसे अपने से पहले वाली पीढ़ी से , माता-पिता से , शिक्षकों से तथा समाज और परिवेश से मिलते हैं , इसलिए युवा जैसे भी है , उसके लिए जिम्मेदार ये सभी कारक होंगे।
कुम्भार मिटटी को जैसा आकार देगा , निर्मित वस्तुएं वैसी ही होंगी । काबिलियत तो कुम्हार की है की वो कितना संतुलित , सुन्दर और नक्काशीदार सृजन करता है। कच्ची गीली मिटटी तो अपने सृजन के लिए अपने निर्माता की तरफ निश्छल भाव से देख रही है।
हम जो बोयेंगे वही काटेंगे। हम जैसी शिक्षा अपने आने वाली संतति को देंगे , वो उसे ही ग्रहण करेंगे। यदि हम ज्यादा से ज्यादा वक़्त युवाओं को दें तभी सही दिशा-निर्देश कर सकेंगे और एक बेहतर व्यक्तित्व के सृजनकर्ता बन सकेंगे।
किस पीढ़ी को दोष दिया जाए ? क्या वाकई में 'युवा' दोषी हैं ? या फिर इन युवाओं को मिलने वाले दिशा-निर्देशन में दोष है ?
जब युवा वर्ग कुछ अच्छा करता है , माता-पिता और समाज और देश को गौरवान्वित करता है तो तुरंत सुनने को मिलता है -"माँ-बाप ने अच्छे संस्कार दिए हैं " ..इसके विपरीत युवा यदि कुछ गलत करता है तो -"युवाओं से उम्मीद रखना बेकार है" , ऐसा जुमला आम होता है । यहाँ कोई दोष नहीं देता घर के बड़ों को , शिक्षकों और समाज को जिसने संस्कार देने में भूल की।
बदलाव प्रकृति का नियम है , देश काल परिस्थिति बदलती जा रही है तो उसमें बड़ा होने वाला युवा भी समय के साथ बदल रहा है। जो समय की मांग है , उसी के अनुसार अपने को ढाल रहा है। बिना संस्कारों को ग्रहण किये कोई भी बच्चा युवा नहीं होता । और संस्कार उसे अपने से पहले वाली पीढ़ी से , माता-पिता से , शिक्षकों से तथा समाज और परिवेश से मिलते हैं , इसलिए युवा जैसे भी है , उसके लिए जिम्मेदार ये सभी कारक होंगे।
कुम्भार मिटटी को जैसा आकार देगा , निर्मित वस्तुएं वैसी ही होंगी । काबिलियत तो कुम्हार की है की वो कितना संतुलित , सुन्दर और नक्काशीदार सृजन करता है। कच्ची गीली मिटटी तो अपने सृजन के लिए अपने निर्माता की तरफ निश्छल भाव से देख रही है।
हम जो बोयेंगे वही काटेंगे। हम जैसी शिक्षा अपने आने वाली संतति को देंगे , वो उसे ही ग्रहण करेंगे। यदि हम ज्यादा से ज्यादा वक़्त युवाओं को दें तभी सही दिशा-निर्देश कर सकेंगे और एक बेहतर व्यक्तित्व के सृजनकर्ता बन सकेंगे।
- हम व्यस्त रहेंगे और बच्चों के लिए समय नहीं निकालेंगे तो युवा भी खुद को कहीं और व्यस्त कर लेंगे और हमारे साथ समय नहीं बितायेंगे।
- यदि हम अपने से छोटों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे तो युवाओं की नज़रों में भी सम्मानित नहीं रह सकेंगे।
- प्यार और सम्मान देंगे तो प्यार और सम्मान करना सीखेंगे युवा भी।
- बड़े बुज़ुर्ग यदि बात-बात पर युवाओं को नीचा दिखायेंगे तो धीरे-धीरे वे स्वयं ही युवाओं की नज़रों में छोटे होते चले जायेंगे।
- आज दादी-दादा , माता-पिता , चाचा-चाची अपने आप में व्यस्त है फिर युवाओं को समय कौन दे ? वो भी अपने उम्र के दोस्तों के साथ , तो कहीं विडिओ-गेम, टीवी आदि देखने में व्यस्त हो जाते हैं , जहाँ उन्हें गलत और सही का मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं होता। फिर उनसे कोई भूल होती है यदि तो क्या हमें ये हक है की हम उनके दोष बताएं , जबकि हमने उन्हें समय ही नहीं दिया और मार्ग दर्शन करने की जहमत ही नहीं उठाई।
यदि हम १०, २० , ३० , ४० , ५० , ६० एवं ७० वर्ष की आयु वर्ग को ध्यान में रखकर बात करें तो हर दशक अपने आप में एक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। जहाँ वो अपने से छोटे अथवा कमतर को एक दिशा-निर्देश कर सकता है और उसके व्यक्तित्व को आकार देने में मदद कर सकता है।
जब हम किसी को कुछ सिखाते हैं तो उसमें अहम् नहीं होना चाहिए । विनम्रता और दोस्ताना अंदाज़ में कही गयी बातें ही सुनने वाला ग्रहण करता है। यदि समझाने वाले की आवाज़ में दंभ , अपमान और छींटा-कशी होगी तो युवा उसे ग्रहण नहीं करेगा और आपका प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए यदि हम कुछ देना ही चाहते हैं तो लेने वाले के अबोधपन , स्वछंदता, उच्श्रंखलता का मान रखते हुए , बिना उनके बालमन को कोई ठेस पहुंचाए अपनी बात कहनी चाहिए।
सबसे अहम् है धैर्य और चाव के साथ बच्चों की बातें सुनना । उनके पास आपसे कहने के लिए बहुत कुछ होता है , उससे भी ज्यादा उनके पास अनुत्तरित प्रश्न होते हैं , जिसे सुनने और उत्तर देने का वक़्त नहीं होता है पढ़े-लिखे संस्कारित वयस्कों के पास। फिर युवा , मन की उलझनें लिए हुए जायेंगे कहाँ और किसके पास। इसी भागम-भाग की जिंदगी में बच्चा बड़ा हो जाता बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों और आशंकाओं के साथ और फिर वही बांटता है जो उनसे बड़ों से पाया है।
उम्र के इस पड़ाव पर मेरे ऊपर एक बुज़ुर्ग पीढ़ी है , जिससे सीखने को मिलता है लेकिन उससे भी ज्यादा सीखती हूँ मैं अपनी युवा पीढ़ी से। चाहे वो तकनीक का क्षेत्र हो , चिकित्सा का, अथवा सामाजिक सन्दर्भों हों। हर जगह युवा बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं , वो बड़ों का अनुभव भी ले रहे हैं और अपने नव-सृजन से हर क्षेत्र में विस्तार कर रहे हैं और बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं । हमें तो गर्व होना चाहिए अपनी युवा पीढ़ी पर।
कैसे कह दूँ की युवाओं में संस्कार नहीं है। जब भी आस-पास परिवेश में अनेक बच्चों को देखती हूँ तो उपवन के रंग-बिरंगे फूलों के समान मोहक, मासूम और उमंग से चहकते हुए ही लगते हैं । और युवाओं से मिलती हूँ तो उन्हें अद्भुत प्रतिभा से संपन्न पाती हूँ। मुझसे बहुत बेहतर मुझे आज के युवा लगते हैं , जो बुद्धिमान भी हैं , जागरूक भी हैं और संस्कारी भी। उनके अन्दर आक्रोश भी है जो दुनिया बदलने का जज्बा भी रखता है।
संस्कार देना जिस पीढ़ी का दायित्व है , यदि वो अपना दायित्व निष्ठा से निभाये तो ह्रदय को दुखी होने का अवसर ही नहीं आएगा। अच्छे संस्कार देंगे तो अच्छा एवं शुभ सृजन ही होगा , ऐसा मेरा विश्वास है।
आभार।