
जैसे दो चुम्बक को पास लाने पर एक दुसरे को प्रतिकर्षित करते हैं , उसी प्रकार मनुष्यों में अति निकटता प्रतिकर्षित करती है और रिश्तों की मिठास को छीन लेती है । ऐसा शायद इसलिए होता है क्यूंकि सिमटती दूरियां , जज्बातों को बढ़ाती जाती हैं और अपेक्षाएं दानवाकार हो जाती हैं । जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पातीं तो मन में विषाद बढ़ता जाता है और रिश्तों में कडवाहट बढ़ने के साथ साथ , दूरियां बढती चली जाती हैं । इसलिए आवश्यक है की हर रिश्ते में एक स्वस्थ्य दूरी अवश्य रहे ।
अक्सर ऐसा भी देखा गया है की जिसके आप ज्यादा समीप होते हैं और अपना दुःख सुख बांटते हैं , वही आपसे द्वेष रखने लगता है और आपमें ही उसे सारी खामियां नज़र आने लगती हैं। सारी दुनिया के भ्रष्टाचार छोड़कर वो आपको ही सुधारने की पुरजोर कोशिश करने लगता है। वो मित्र कम , प्रवचनकर्ता ज्यादा लगने लगता है। वही मित्र जिसके शब्द कभी गुदगुदाते थे और दुखों पर मरहम की तरह शीतल हुआ करते थे , वही नश्तर का काम करने लगते हैं। कारण शायद अति निकटता ।
रिश्ते , कभी-कभी बैंक अकाउंट की तरह लगते हैं , जिसमें धन डालो वो बढ़ता ही जाएगा । और यदि कुछ अवधि तक धन डिपौज़िट नहीं किया तो खाता निष्क्रिय [dormant] हो जायेगा । उसके बाद दुबारा चालू करने के लिए 'दंड राशि ' अलग से भरनी पड़ेगी । इसलिए खातों में धन और रिश्तों में प्रेम सदा बना रहना चाहिए।
इसलिए निरंतरता भी बनाए रखनी चाहिए । बिना किसी का personal space छीने , प्रेम की अविरल धारा बहती ही रहनी चाहिए । यही रिश्तों की मांग है। ठहरा हुआ जल दूषित हो जाता है , इसलिए सतत प्रवाह ही रिश्तों की मिठास बरकरार रखते हैं।
आभार
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अक्सर ऐसा भी देखा गया है की जिसके आप ज्यादा समीप होते हैं और अपना दुःख सुख बांटते हैं , वही आपसे द्वेष रखने लगता है और आपमें ही उसे सारी खामियां नज़र आने लगती हैं। सारी दुनिया के भ्रष्टाचार छोड़कर वो आपको ही सुधारने की पुरजोर कोशिश करने लगता है। वो मित्र कम , प्रवचनकर्ता ज्यादा लगने लगता है। वही मित्र जिसके शब्द कभी गुदगुदाते थे और दुखों पर मरहम की तरह शीतल हुआ करते थे , वही नश्तर का काम करने लगते हैं। कारण शायद अति निकटता ।
रिश्ते , कभी-कभी बैंक अकाउंट की तरह लगते हैं , जिसमें धन डालो वो बढ़ता ही जाएगा । और यदि कुछ अवधि तक धन डिपौज़िट नहीं किया तो खाता निष्क्रिय [dormant] हो जायेगा । उसके बाद दुबारा चालू करने के लिए 'दंड राशि ' अलग से भरनी पड़ेगी । इसलिए खातों में धन और रिश्तों में प्रेम सदा बना रहना चाहिए।
इसलिए निरंतरता भी बनाए रखनी चाहिए । बिना किसी का personal space छीने , प्रेम की अविरल धारा बहती ही रहनी चाहिए । यही रिश्तों की मांग है। ठहरा हुआ जल दूषित हो जाता है , इसलिए सतत प्रवाह ही रिश्तों की मिठास बरकरार रखते हैं।
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