अक्सर देखा है , हर कोई प्यार पाना चाहता है , लेकिन अगर कोई प्यार देना चाहे तो ? प्यार देकर भी तो प्यार महसूस किया जा सकता है लेकिन जब कोई निस्वार्थ भाव से , बिना किसी अपेक्षा के , किसी को प्यार करना चाहता है तो वो उसे उसकी मर्यादाओं का बोध कराकर उसके आत्मविश्वास को ही तोड़ देता है। क्या प्रेम करने के लिए भी , मर्यादाओं का बंधन होता है ?
बिना अपेक्षा या बिना किसी शर्त के , तभी किसी को प्यार किया जा सकता है , जब हम ये स्वीकार कर लेते हैं की हम सिर्फ प्यार करना चाहते हैं, खुद से भी , और दूसरों से भी । प्यार करना एक सुखद अनुभूति है । क्या इसके मध्य भी मर्यादाओं का होना आवश्यक है ?
छोटे , मासूम बच्चे , बिना किसी अपेक्षा के सदैव निश्छल प्रेम करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वो बड़े होते जाते हैं , उनका प्यार सिमटता जाता है । विवाहोपरांत तो लोग किसी को प्यार करना जुर्म समझने लगते हैं। उनका भावुक मन किसी अनजानी आशंका से भय ग्रस्त रहने लगता है। वो इसी उधेड़बुन में रहते हैं की क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। क्या उनके मन के अंतस्थल में प्यार पाने की एक तृष्णा सांस नहीं ले रही होती , जिसे वे समझते हैं की वो कहीं खो गयी है ?
आज मन में बस यूँ ही एक प्रश्न आया की क्या प्यार की मर्यादाएं होती हैं ? क्या प्यार की भी उम्र अथवा अवस्था होती है । क्या मन में किसी के लिए प्यार का ख़याल आना भी गुनाह है ? क्या अपने प्यार की अभिव्यक्ति करना मर्यादा के विपरीत है।
मर्यादाएं सुनिश्चित कैसे होती हैं ?