कल एक वरिष्ठ ब्लॉगर मित्र ने पूछा---- "दिव्या एक बात बताओ, फलां फलां फलां तो बहुत पढ़े-लिखे हैं , मैं तो इन लोगों को बहुत अच्छा समझता था , लेकिन अत्यंत दुखित हूँ इन लोगों के विचार जानकार और इनकी असलियत जानकार। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है ? इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियां रखने वाले भी ऐसी तुच्छ सोच कैसे रख सकते हैं भला? मैं बहुत निराश हूँ इन लोगों के आचरण से" ।
क्या कहती उनसे--वे स्वयं ही विद्वान् हैं। उनसे कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने के समान होता, अतः चुप रह गयी।
लेकिन, "All that glitters is not gold"
इस समाज में सभ्यता का मुखौटा लगाये गंदे षड्यंत्रों में लिप्त ये लोग परदे पर तो चमकते हैं , लेकिन परदे के पीछे चौपाल लगाए , जाम से जाम टकराते हुए, नशे में उन्मत्त हो सारी गन्दगी बाहर निकालते हैं। तब इनका नकाब उतर जाता है और इनका 'वाचिक-संयम' और 'दिखावटी शालीनता' नदारद हो जाती है। वही समय होता है जब इनकी असलियत को जांचा परखा जा सकता है।
Zeal
क्या कहती उनसे--वे स्वयं ही विद्वान् हैं। उनसे कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने के समान होता, अतः चुप रह गयी।
लेकिन, "All that glitters is not gold"
इस समाज में सभ्यता का मुखौटा लगाये गंदे षड्यंत्रों में लिप्त ये लोग परदे पर तो चमकते हैं , लेकिन परदे के पीछे चौपाल लगाए , जाम से जाम टकराते हुए, नशे में उन्मत्त हो सारी गन्दगी बाहर निकालते हैं। तब इनका नकाब उतर जाता है और इनका 'वाचिक-संयम' और 'दिखावटी शालीनता' नदारद हो जाती है। वही समय होता है जब इनकी असलियत को जांचा परखा जा सकता है।
Zeal