बाबुल की दुआएं लेती जा ,
जा तुझको सुखी संसार मिले
मइके की कभी न याद आये ,
ससुराल में इतना प्यार मिले .....
मुग्धा हार गयी !
मुग्धा ने हारी हुई जंग लड़ने की कोशिश की थी । अंजाम तो मालूम ही था। आज पहले से भी बुरी स्थिति में है मुग्धा । एक दिन मुंह खोलकर क्या मिला ? भविष्य में मिलने वाला अपमान और हिंसा बदस्तूर जारी रहेगी। यही हश्र होना था उसका । उसने गलत निर्णय लिया था। जहाँ ह्रदय ही न हो वहां ह्रदय परिवर्तन की उम्मीद क्यूँ रखी। चिल्ला-चिल्लाकर यदि न्याय मिलता तो बहुएं नहीं जलाई जातीं। और टुकड़ों में न काटी जातीं।
कहते हैं यदि मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी ।
यहाँ तो पति ही मुग्धा के खिलाफ है। माँ शब्द से प्यार करता है , स्त्री का सम्मान करना ही नहीं जानता। जब पति ही खिलाफ हो जाए तो पत्नी की हार तयशुदा है।
कहते हैं , स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है ,
ये भी चरितार्थ हो गया मुग्धा के परिवार से । उसकी सास ही पिटवाती थी , और यदि सास न चाहती तो पति कभी नहीं पीटता क्योंकि वो पूरी तरह माँ के नियंत्रण में था। वही सास मुग्धा कों अपने आँचल की छाँव देकर उसे हर बला से बचा सकती थी और एक खुशहाल परिवार बनाने में सहयोग कर सकती थी।
मुग्धा के पास क्या-क्या विकल्प हैं ?
वो पिता के घर जाकर पति और सास पर घरेलु हिंसा का मुकदमा कर सकती है । लेकिन नहीं वो ऐसा करना नहीं चाहती । क्यूंकि वो बच्चों कों उसके पिता से दूर नहीं करना चाहती। और अपने माता पिता के जीवन के बचे हुए दो चार वर्षों कों अदालतों की जिल्लतों से दूर रखना चाहती है। बेटी के दुःख का उन्हें पता ही नहीं है । क्यूंकि मुग्धा तो फोन पर हमेशा उनके दामाद की तारीफ़ ही करती है। क्यूंकि वो जानती है की उसके बूढ़े पिता अपनी बेटी पर हो रहे अत्याचार कों नहीं बर्दाश्त कर पायेंगे और असमय ही चल बसेंगे।
वो तलाक दे सकती है ? लेकिन फिर वही समस्या। अपनी परिवार कों बिखरता हुआ नहीं देखना चाहती । विवाह करने के बाद तलाक के बारे में सोचना उसके संस्कार में ही नहीं है।
तो फिर वो क्या करे ? क्या सास बनने का इंतज़ार करे , क्यूंकि समाज के एक बड़े हिस्से की सहानुभूति सास के साथ है। कोई करे न करे बेटा तो हिफाज़त करेगा ही और फिर वो अपना बदला अपनी बहू से निकाले ?
मुग्धा का निर्णय --
क्यूंकि मुग्धा अपनी सास और पति से प्यार और सम्मान चाहती है । एक खुशहाल परिवार चाहती है , लेकिन ये सब अदालत की मदद से नहीं मिलता । प्यार तो सिर्फ प्यार करने वाले दिलों से ही मिलता है । इसलिए उसने अपनी नियति कों स्वीकार कर लिया है । कम से कम उसका परिवार तो नहीं बिखरेगा। बच्चे , बिना माँ अथवा पिता के तो नहीं रहेंगे। जहाँ दस साल कट गए , वहीँ दस और सही । कभी तो अत्याचार करने वाले के हाथ भी थकेंगे ।
मुग्धा अस्पताल में है । आज उससे मिलने गयी तो पूरे चेहरे पर नीले-काले धब्बे थे । मुझे देख कर मुस्कुराई , फिर आँख में आँसू आने पर उसने पलकें झुका लीं। कुछ बोली नहीं सिर्फ मेरा हाथ पकडे चुपचाप लेटी रही।
धीरे से बोली - "मेरा एक काम करोगी ? " ..मैंने पूछा - क्या ? ..तो बोली -
" बेटे से वादा किया था की फर्स्ट आओगे तो जन्मदिन पर PSP दिलाऊंगी । बेटा एक-एक दिन इंतज़ार कर रहा है अपने जन्मदिन का जो मई में है । जाने क्यूँ जीवन की अनिश्चित्तता दिख रही है । चाहती हूँ , उसे जल्दी से जल्दी वो गिफ्ट पहले ही दे दूँ , कहीं कोई वादा अधूरा न रह जाए......... "
जा तुझको सुखी संसार मिले
मइके की कभी न याद आये ,
ससुराल में इतना प्यार मिले .....
मुग्धा हार गयी !
मुग्धा ने हारी हुई जंग लड़ने की कोशिश की थी । अंजाम तो मालूम ही था। आज पहले से भी बुरी स्थिति में है मुग्धा । एक दिन मुंह खोलकर क्या मिला ? भविष्य में मिलने वाला अपमान और हिंसा बदस्तूर जारी रहेगी। यही हश्र होना था उसका । उसने गलत निर्णय लिया था। जहाँ ह्रदय ही न हो वहां ह्रदय परिवर्तन की उम्मीद क्यूँ रखी। चिल्ला-चिल्लाकर यदि न्याय मिलता तो बहुएं नहीं जलाई जातीं। और टुकड़ों में न काटी जातीं।
कहते हैं यदि मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी ।
यहाँ तो पति ही मुग्धा के खिलाफ है। माँ शब्द से प्यार करता है , स्त्री का सम्मान करना ही नहीं जानता। जब पति ही खिलाफ हो जाए तो पत्नी की हार तयशुदा है।
कहते हैं , स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है ,
ये भी चरितार्थ हो गया मुग्धा के परिवार से । उसकी सास ही पिटवाती थी , और यदि सास न चाहती तो पति कभी नहीं पीटता क्योंकि वो पूरी तरह माँ के नियंत्रण में था। वही सास मुग्धा कों अपने आँचल की छाँव देकर उसे हर बला से बचा सकती थी और एक खुशहाल परिवार बनाने में सहयोग कर सकती थी।
मुग्धा के पास क्या-क्या विकल्प हैं ?
वो पिता के घर जाकर पति और सास पर घरेलु हिंसा का मुकदमा कर सकती है । लेकिन नहीं वो ऐसा करना नहीं चाहती । क्यूंकि वो बच्चों कों उसके पिता से दूर नहीं करना चाहती। और अपने माता पिता के जीवन के बचे हुए दो चार वर्षों कों अदालतों की जिल्लतों से दूर रखना चाहती है। बेटी के दुःख का उन्हें पता ही नहीं है । क्यूंकि मुग्धा तो फोन पर हमेशा उनके दामाद की तारीफ़ ही करती है। क्यूंकि वो जानती है की उसके बूढ़े पिता अपनी बेटी पर हो रहे अत्याचार कों नहीं बर्दाश्त कर पायेंगे और असमय ही चल बसेंगे।
वो तलाक दे सकती है ? लेकिन फिर वही समस्या। अपनी परिवार कों बिखरता हुआ नहीं देखना चाहती । विवाह करने के बाद तलाक के बारे में सोचना उसके संस्कार में ही नहीं है।
तो फिर वो क्या करे ? क्या सास बनने का इंतज़ार करे , क्यूंकि समाज के एक बड़े हिस्से की सहानुभूति सास के साथ है। कोई करे न करे बेटा तो हिफाज़त करेगा ही और फिर वो अपना बदला अपनी बहू से निकाले ?
मुग्धा का निर्णय --
क्यूंकि मुग्धा अपनी सास और पति से प्यार और सम्मान चाहती है । एक खुशहाल परिवार चाहती है , लेकिन ये सब अदालत की मदद से नहीं मिलता । प्यार तो सिर्फ प्यार करने वाले दिलों से ही मिलता है । इसलिए उसने अपनी नियति कों स्वीकार कर लिया है । कम से कम उसका परिवार तो नहीं बिखरेगा। बच्चे , बिना माँ अथवा पिता के तो नहीं रहेंगे। जहाँ दस साल कट गए , वहीँ दस और सही । कभी तो अत्याचार करने वाले के हाथ भी थकेंगे ।
मुग्धा अस्पताल में है । आज उससे मिलने गयी तो पूरे चेहरे पर नीले-काले धब्बे थे । मुझे देख कर मुस्कुराई , फिर आँख में आँसू आने पर उसने पलकें झुका लीं। कुछ बोली नहीं सिर्फ मेरा हाथ पकडे चुपचाप लेटी रही।
धीरे से बोली - "मेरा एक काम करोगी ? " ..मैंने पूछा - क्या ? ..तो बोली -
" बेटे से वादा किया था की फर्स्ट आओगे तो जन्मदिन पर PSP दिलाऊंगी । बेटा एक-एक दिन इंतज़ार कर रहा है अपने जन्मदिन का जो मई में है । जाने क्यूँ जीवन की अनिश्चित्तता दिख रही है । चाहती हूँ , उसे जल्दी से जल्दी वो गिफ्ट पहले ही दे दूँ , कहीं कोई वादा अधूरा न रह जाए......... "