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Monday, November 7, 2011

ईद मुबारक


पूड़ी, पुलाव, दाल मखनी, मटर पनीर , खीर और सिवयीं खाएं, निरीह चौपायों की लाश खाएं। त्योहारों में खुशियों भरी किलकारियां गूंजनी चाहिए, भय मिश्रित हलाल होते पशुओं की चीखें नहीं। खेलना ही है तो रंगों की होली खेलिए। खून की होली क्यूँ ? धर्म के नाम पर निरीह पशुओं की बलि क्यूँ ? बदलते वक़्त के साथ अपनी सोच बदलिए। जबान के चटोरेपन के कारण देश और विश्व भर में कितनी कुर्बानियां दी जायेंगी आज ?

त्यौहार की शुभकामनाएं।


Zeal
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यह कोई बहस का मुद्दा नहीं है। यदि आप मेरी बात समझेंगे तो ज़रूर खुद को बदलेंगे, अन्यथा जिरह करेंगे अनायास ही अतः कमेन्ट ऑप्शन बंद है

आभार।