पूड़ी, पुलाव, दाल मखनी, मटर पनीर , खीर और सिवयीं खाएं, निरीह चौपायों की लाश न खाएं। त्योहारों में खुशियों भरी किलकारियां गूंजनी चाहिए, भय मिश्रित हलाल होते पशुओं की चीखें नहीं। खेलना ही है तो रंगों की होली खेलिए। खून की होली क्यूँ ? धर्म के नाम पर निरीह पशुओं की बलि क्यूँ ? बदलते वक़्त के साथ अपनी सोच बदलिए। जबान के चटोरेपन के कारण देश और विश्व भर में कितनी कुर्बानियां दी जायेंगी आज ?
त्यौहार की शुभकामनाएं।
Zeal
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यह कोई बहस का मुद्दा नहीं है। यदि आप मेरी बात समझेंगे तो ज़रूर खुद को बदलेंगे, अन्यथा जिरह करेंगे अनायास ही । अतः कमेन्ट ऑप्शन बंद है।
आभार।
जब खाने के लिए प्रकृति ने भाँती-भाँती की वनस्पतियाँ, फल और अनाज उपलब्ध करा दिए हों तो हिंसक पशुओं के समान 'लाश' के टुकड़े खाने की क्या आवश्यकता है ?
कम से कम उन पशुओं से ही कुछ सीखिए जिनके मृत शवों को आप खाते हैं। बेचारे बेजुबान पशु (गाय, ऊंट, बकरी, सुवर , मुर्गी आदि) तो शाक भाजी ही खाते हैं , लेकिन आप जैसे दरिन्दे इनके मांस का भक्षण करते हैं।
एक बकरीद आने की देर है , करोड़ों की संख्या में बेजुबान पशु हलाल कर दिए जायेंगे। बेदर्द और हिंसक आदमजात बैठकर इनकी लाश की दावत करेगी।
धिक्कार है ऐसी आदमीयत पर जिसमें मानवीयता का अभाव हो। लाश का सेवन करने वालों से मानवीय संवेदनाओं को समझ सकने की अपेक्षा व्यर्थ है।
ऐसे लोग हिंसक होते हैं तथा समाज में हिंसा और आतंकवाद को ही बढ़ावा देते हैं।
हमारी सरकार को चाहिए की भारत देश में पशुओं के हलाल पर पूर्णतया पाबंदी लगा दे। जिसे अपनी जबान के चटोरेपन पर नियंत्रण न हो वे तुर्किस्तान अथवा पाकिस्तान में जाकर निवास करें ।
हिंदुस्तान को सात्विक ही रहने दें।
Zeal
जब हम स्वयं को किसी परिस्थिति विशेष में " बलि का बकरा " बना हुआ पाते हैं तो अत्यंत मानसिक पीड़ा और भय के दौर से गुज़रते हैं । इसी बात पर ध्यान आया बकरीद के पावन अवसर पर हलाल होने वाले निर्दोष बकरों का। आँख बंद कर के देखा तो पाया की करोड़ों की संख्या में पशु हलाल हुए पड़े थे । खून की नदियाँ बह रहीं थीं। निर्दोष पशुओं की लाशें बिना शिकायत किये इंसान की ख़ुशी का सामान बन रही थीं। क्या ये त्यौहार हम मिठाई और सिवयीं खाकर नहीं मना सकते ? निर्दोष पशुओं की चीख से खरीदी गयी मुस्कुराहटें कहाँ तक उचित हैं ?
बकरीद एक खुशियों का त्यौहार है । एक बार अल्लाह ने पैगम्बर अब्राहम को सपने में उसके पुत्र की बलि देने के लिए कहा। पैगम्बर अब्राहम ने अल्लाह में अपनी आस्था को बताने के लिए उसे कबूल कर लिया । लेकिन कुर्बानी के वक़्त अल्लाह के दूत ने उसे रोक दिया यह कहकर कि , अल्लाह उसकी आस्था से प्रसन्न हैं , इसलिए उसे बेटे की कुर्बानी देने की आवश्यकता नहीं है। तब से आज तक बकरीद के पर्व पर पशु बलि की प्रथा चली आ रही है। मुझे तो लगता है , अल्लाह ने उस कुर्बानी को रोककर अपनी दयालुता का परिचय दिया है तथा हिंसा न करने का सन्देश दिया है।
बलि चढ़ाए जाने वाले पशु -
- बकरा या भेड़ [ आयु एक साल से ज्यादा हो ]
- गाय , भैंस [आयु २ साल से ज्यादा]
- ऊंट [आयु ५ साल से अधिक]
प्रति व्यक्ति एक बकरे की बलि तथा cattles का एक सर सात लोगों के लिए बलि किया जाता है। जिसमें सभी का हिस्सा बराबर होता है। इस्लाम को मानने वालों का ये कहना की हलाल का तरीका ऐसा होता है जिससे पशु को बहुत कम पीड़ा हो । यानि की वो इस बात को जानते हैं की हलाल के वक़्त पीड़ा होती है।
आखिर ये हिंसा क्यों ? कहा गया है - "जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन। " इस हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए । पूरी-कचौरी, मिठाई , खीर, सिवंयीं के साथ यदि यह त्यौहार मनाया जाए तो क्या इसकी महिमा कम हो जायेगी ?
क्या पशु-वध और हिंसा से " अमन का पैगाम " दिया जा सकता है ?