तस्वीर में माँ के हाथ का लिखा औटोग्राफ है , जिसमें लिखा है --- "सफलता सदैव तुम्हारे कदमों को चूमती रहे "[M Srivastava , dated- 2nd oct 90 ]ऐसा ही हमारी माँ ने भी किया । हम चारों भाई-बहनों की अच्छी शिक्षा एवं विकास के लिए तत्कालीन , उच्च पदस्थ नौकरी को त्यागकर बच्चों की परवरिश पर ध्यान दिया। पिताजी की नौकरी बैंक मैं होने के कारण उनकी पोस्टिंग हर तीन साल पर अलग अलग शहरों में होती रहती थी। इसलिए लखनऊ में रह रहे हमारे परिवार की जिम्मेदारी माँ पर ज्यादा थी । पिताजी हफ्ते में एक दिन के लिए आते थे और हफ्ते भर का पेंडिंग गणित और अंग्रेजी एक दिन में पढ़ाते थे । इसलिए संडे का दिन कभी छुट्टी का दिन नहीं बल्कि एक टेरर [terror], लगता था। पढ़ना कौन चाहता है इतवार को। आज भी अगर उनके नाती-नातिन उनके हत्थे चढ़ गए तो आप उन्हें इंग्लिश ग्रामर पढ़ाते हुए पायेंगे। मुझे तो इससे बोरिंग विषय कभी भी और कोई नहीं लगा।
माँ की मृत्यु ३ अप्रैल २००७ में विवेकानंदा अस्पताल ,लखनऊ में हुई। छह दिन तक ICU में ventilator पर रहने के उपरान्त सातवें दिन दूसरी बार हार्ट-अटैक आने से उन्होंने हमारा साथ छोड़ दिया। उस समय जो चिकित्सक दल माँ की सेवा में तत्पर था , उनका विशेष आभार जिन्होंने पूरे मन से चिकित्सा सेवा की , हमारे दुःख में भी शामिल हुए और हमारी तरह लाचार भी थे क्यूंकि चिकित्सा सेवा करना उनके हाथ में था लेकिन जीवन देना उनके हाथ में नहीं था।
माँ की कही कुछ बातें अक्सर याद आती है । शायाद वही सब बातें और समझाइशें जो हर माँ अपनी संतान को देती है । लेकिन एक दिन का छोटा सा वाकया हमेशा याद आता है , जिसनें मेरा जीवन बदल कर रख दिया । आदतानुसार फोन पर माँ से एक आम लड़की की तरह पति की शिकायत कर रही थी । देखिये टेलेफोन का मिसयूज़ कैसे होता है ...
" माँ आप समीर को समझाइये घर पर ध्यान दिया करें , हर वक्त आफिस के कामों में व्यस्त रहते हैं। बच्चों को कभी पढ़ाते नहीं। घर बनवा रही हूँ, सभी मिस्त्री , मजदूर , ईंटा ,गारा , सीमेंट भी मैं ही देखूं , क्या डिजाईन देनी है वो भी मैं भी समझूं ..आदि आदि ...आखिर मैं भी इंसान हूँ कोई मशीन नहीं "
मेरा पिटा-पिटाया शिकायती रवैय्या देखकर माँ ने शाँत आवाज़ में कहा - " क्या इतनी शिकायतें करने के लिए ही तुम लोगों को पढाया लिखाया और आत्म-निर्भर बनाया था ? " । शिकायत वही करते हैं जिनमें स्वयं कोई कमी होती है और दूसरों पर निर्भर करते हैं। इसलिए दिव्या हो सके तो खुद को और भी लायक बनाओ ताकि समीर भी तुम पर निर्भर कर सकें और तुम पर गर्व कर सकें। "
वो दिन मेरे जीवन का एक turning point था। खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश जारी है । सच में आत्म-निर्भर होकर समाजोपयोगी होने में एक अलग ही आनंद है। बात बात पर शिकायतें कितना बचकाना लगता है । इसलिए शिकायत करने की आदत बाल्यावस्था के बाद छोड़ देनी चाहिए।
माँ को मीठी चीज़ें बहुत पसंद थीं , इसलिए उनकी याद में आज 'सूजी का हलवा' बनाने जा रही हूँ। भला हो शुक्ला जी का, जिनके कारण , विदेश में रहकर 'इंडियन ग्रोसरी' तो मिल जाती है ।
Happy birthday mom । You are forever alive in my heart , mind and memories।
वो शाम कुछ हसीन थी, ये शाम भी हसीन है...
आप कल भी साथ-साथ थीं , आप आज भी करीब हैं...
आभार ।