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Saturday, September 24, 2011

नामुराद-दिव्या

मोहन की चुप्पी , मैडम की व्याधि , कला नीला पीला धन , भ्रष्टाचार, व्याभिचार , अनाचार , आतंकवाद, रिश्वतखोरी, सीनाजोरी, भाजापाई और आतातायी , मोदी मित्तल , क्रिकेट और हॉकी , लाफ्टर शो और रियलिटी शो , अनशन और आन्दोलन , कहीं परचा लीक तो कहीं विकी लीक इतने सारे अनगिनत मुद्दे और विषय हैं फिर भी हिंदी ब्लॉगजगत में जिधर जाओ उधर इस 'नामुराद-दिव्या' पर ही पोस्टें लिखी मिलती हैं। हमें तो पता ही नहीं था की हम इतने बड़े आतंकवादी हैं।

बड़ी मुश्किल से समय निकाला की चलो कुछ अच्छी पोस्टें पढ़ी जाएँ लेकिन यह क्या ?.. क्रम से जितने ही ब्लौग पर गयी तो देखा सभी पोस्ट इस 'नालायक-दिव्या' पर ही लिखी हुयी थीं। हम तो अचंभित हो गए की भैया हम कौनो गुनाह तो नहीं कीन्हा तौ काहे हमरे ऊपर सभय कुर्बान हुए जात हैं।

पोस्ट मेरे ब्लौग की,
जित देखूं तित पोस्ट,
पोस्ट पढ़न को मैं चली ,
मैं ही बन गयी पोस्ट,


ब्लौग लिखते हुए जुम्मे-जुम्मे १५ महीने ही हुए हैं और हम ही मुद्दा बन गए हैं ? लोगों ने भ्रष्टाचार और त्यौहार भुला दिए हैं , मोहन और मोदी को भी बिसरा दिया है , बस मुई-दिव्या ही सबके 'जी का जंजाल' बनी हुयी है।

अब आप ही बताएं मैं उदास रहूँ या खुश रहूँ ? चकित होऊं या मौन रहूँ?


Zeal

Tuesday, January 25, 2011

ये तिरंगा उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा ..



महाकवि कालिदास के शब्दों में , " स्वर्ग से भी सुन्दर यदि कोई जगह है तो वो कश्मीर है " सुन्दर झीलों , झरनों और वादियों की अनुपम भूमि काश्मीर , सुख , शान्ति एवं आनंद को देने वाली है पृथ्वी पर सबसे खूबसूरत स्थल आज दो देशों के मध्य विवाद की हड्डी बना , सिसक रहा है
भारत और पाकिस्तान के मध्य राजनीति का खिलौना बन गया है कश्मीर भारत धर्म निरपेक्षता का पालन करते हुए काश्मीर की हिफाज़त कर रहा है , वहीँ पाकिस्तान धर्म के नाम पर कश्मीर पर अधिकार चाहता है । मुस्लिम-बहुल राज्य काश्मीर में , खून की होली खेलते आतंकवादियों के उत्पीडन से बचने के लिए , तकरीबन तीन लाख हिन्दू वहां से पलायन कर गए तथा एक लाख शांतिप्रिय , बुद्धिजीवी तथा उद्दार व्यक्तित्व वाले मुसलमान भी काश्मीर छोड़कर भारत के अन्य राज्यों में बस गए ।
१९४७ की आज़ादी के बाद से ही यह २२२, २४६ वर्ग किलोमीटर भूमि विवादित हैदक्षिण पूर्वी हिस्सा भारत का जम्मू-काश्मीर राज्य है जबकि उतर पश्चिमी भाग पकिस्तान के अधिकार में है

काश्मीर का नाम कैसे पडा -

प्राचीन ग्रंथों में मिले उल्लेख के अनुसार ऋषि कश्यप के नाम पर इसका नाम 'कश्यपामार' था जो बाद में 'कश्मीर' हो गया। सातवीं शताब्दी में Hiun-Tsang जब भारत आया तो उसने इसे 'काशिमिलो ' कहा।

कश्मीर की इस स्वर्गरुपी साझा ऋषि भूमि पर हिन्दू , मुस्लिम सदियों से साथ-साथ मिलकर रहते थे । कश्मीरी हिन्दुओं की ऋषि परंपरा तथा मुस्लिमों की सूफी-इस्लामिक परम्परा एक दुसरे की पूरक हुआ करती थी। दोनों ही समुदाय एक दुसरे के धर्म को पूरा सम्मान देते थे , तथा एक दुसरे के मंदिर और मस्जिदों में पूरी आस्था और विश्वास के जाया करते थे।

प्रसिद्द इतिहासकार कलहन के अनुसार , तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने काश्मीर में 'बौद्ध' धर्म का प्रचार प्रासार किया तथा नवीं शताब्दी होने तक काश्मीर में पूरी तरह से हिन्दू धर्म का वर्चस्व था।

चौदहवीं शताब्दी तक हिन्दू राजाओं का राज्य था यहाँ । फिर मुगलों के आगमन होने कारण १५ वीं शताब्दी मेंअनेक हिन्दू-तीर्थ नष्ट कर दिए गए और इस्लाम का प्रचार प्रसार होने लगा। १७ वीं शदाब्दी में अफगान शासकों ने काश्मीर की दुर्दशा कर दी। मुग़ल शासन काल का अंत हुआ ५०० वर्षों बाद जब सिक्खों द्वारा १८१९ में काश्मीरका राज्य हरण हुआ ।

१८४६ में प्रथम सिक्ख युद्ध के बाद यहाँ हिन्दू डोगरा शासकों का अधिपत्य हो गया। जिसमे महाराजा गुलाब सिंहका शासन काल १८४६ से १८५७, महाराजा रणबीर सिंह का १८५७ से १८८५ , महाराजा प्रताप सिंह १८८५ से १९२५तक तथा महाराजा हरी सिंह का शासन काल १९२५ से १९५० तक था। डोगरा शासकों ने ही काश्मीर को उसका आधुनिक स्वरुप प्रदान किया।

१९४७ में अंग्रेजी शासन समात होते ही काश्मीर विवादित हो गया। विभाजन के बाद भारत ने धर्म निरपेक्ष होनेके कारण हिन्दू और मुसलामानों दोनों को शरण दी , जबकि पाकिस्तान ने धर्म के नाम प़र पूरे काश्मीर कों हथियाना चाहा । अक्टूबर १९४७ में वहां के शासक महाराजा हरी सिंह ने ये फैसला किया की काश्मीर की जनता स्वेच्छा से भारत अथवा पाकिस्तान , जहाँ जाना चाहे वहां जा सकती है। लेकिन ये फैसला पाकिस्तान को मंजूर नहीं हुआ और उसने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया दिया क्यूंकि पाकिस्तान को लगता है की भारत के मुस्लिम -बहुल क्षेत्र उसके अधिकार में होने चाहिए। इस स्थिति में महाराजा हरि सिंह को भी भारत में ही शरण लेनी पड़ी।

यह युद्ध १९४८ तक जारी रहा , फिर प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी तथा संयुक्तराष्ट्र से हस्तक्षेप की गुहार की । संयुक्त राष्ट्र ने अपने फैसले तथा सुझाव में कहा की - " काश्मीर का परिग्रहण भारत या पकिस्तान में होने के लिए निष्पक्ष जनमत-संग्रह होना चाहिए। " अर्थात काश्मीर वासियों की स्वेच्छा को प्रमुखता मिलनी चाहिए। लेकिन पाकिस्तान को भला कहाँ मजूर था ये निर्णय। उसे तो पूरा काश्मीर चाहिए। १९४९ में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के मध्य एक नियंत्रण रेखा खींच दी गयी।

लेकिन पाकिस्तान शांत बैठने वालों में से नहीं है । वो समय-समय पर अपनी आतंकवादी गतिविधियों से काश्मीरकी शान्ति को भंग करता है , स्वर्ग के सामान सुन्दर धरती को मासूम इंसानों के खून से रक्तरंजित करता है तथा नयी पढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

ये तो था काश्मीर का इतिहास , लेकिन आज जब बासठवां गणतंत्र मनाने जा रहे हैं तो बस यही ख़याल आ रहा है की कसाब जैसा आतंकवादी ज़िंदा क्यूँ है । हमारे काश्मीर के भाई-बहन कब सुकून की जिंदगी बसर कर पायेंगे ।अलगाववादी नेता क्यूँ इस सुन्दर धरती को अपनी गन्दी राजनीति का हिस्सा बना रहे हैं। इस्लामिक मुल्क क्यूँ हमारे शांतिप्रिय मुस्लिम समुदाय को भड़का रहे हैं ।

आज अपने ही देश में , काश्मीर राज्य में हमारा राष्ट्रिय ध्वज जलाया जा रहा है। अलगाववादी नेता देश को बेचने की पुरजोर कोशिश में हैं। लेकिन सरकार को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। क्या काश्मीर वासी गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण करने की तमन्ना नहीं रखते ? क्या उग्रवादी , इस सुन्दर वादी के शांतिप्रिय भारत वासियों को गणतंत्र दिवस पर अपने राष्ट्रीय ध्वज को फ़हराने का अवसर नहीं देंगे ?

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ये तिरंगा , उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा
जो भी टकराएगा हमसे , ख़ाक में मिल जाएगा

खून की लाली जवानों की बड़ा रंग लाई है
दुश्मनों ने चोट दिल में , मातमो की खाई है
आग बनके उनपे बरसी , है हमारी गोलियां
जो किया उसकी सजा , उन दुश्मनों ने पाई है
हिंद की धरती पे दुश्मन , लौट कर ना आएगा
ये तिरंगा उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा

दुश्मन बिखर गए तिनके बनके , आँधियों के सामने
धज्जियाँ ऐसी उड़ीं , आया ना कोई थामने
उनकी लाशों को भी हमने, दफ़न इज्ज़त से किया
हमने एक मिसाल रखी , है जहाँ के सामने
अब वो दुश्मन , दुनिया से , आँखें मिला ना पायेगा
ये तिरंगा उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा

जो वतन पर मर मिटे , हर दिल में उनका दर्द है
उनके घरवालों की रक्षा करना ,अपना फ़र्ज़ है
उनकी कुर्बानी भुला सकता नहीं ,अपना वतन ,
देश के हर नागरिक के सर पर ,उनका क़र्ज़ है
देश अपना उम्र भर ये क़र्ज़ भर ना पायेगा ,
ये तिरंगा उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा

हम बनायेंगे शहीदों के समारक , हर जगह
हमने उनसे पायी है जीने की अपनी ये वजह
वक़्त के माथे पे लिख देंगे हम उनके नाम को
याद रखेगा ये भारत , उन शहीदों को सदा
कश्मीर का ज़र्रा ज़र्रा , उनके नगमे गायेगा
जो भी टकराएगा हमसे ख़ाक में मिल जाएगा

ये तिरंगा उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा.....

वन्देमातरम ! वन्देमातरम ! वन्देमातरम !

Monday, January 17, 2011

सौतन जुल्फें !

बादल में यूँ छुप-छुप के , जुल्फों की परी आई
भीगे हुए लबों पर , है मुस्कान थरथराई
तुम दूर क्यूँ बैठे हो , तुम कुछ तो पिया बोलो
तुम लब को कहो बोलें , और राज दिल के खोलें
बादल में यूँ ........

काली लटों से अपनी , तुम कह दो दूर रहना ,
मैं छू लूँ तेरे नैना, मुश्किल है अब ये सहना
काली घनेरी नागिन , ये जुल्फें हैं सौदाई ,
कहो दूर रहे तुमसे , यूँ बीच में आये
मैं चाहूँ तुम्हें इतना , उड़-उड़ के ये सताएं
बादल में यूँ.........

चलो जाओ बलम झूठे , यूँ मुझको भरमाओ ,
है लब पे तेरे मुरली , अब और ना तरसाओ
दोषी नहीं हैं जुल्फें , तुम खुद ही दूर रहते
बातें, बनाते हो तुम , और देते हो तन्हाई
ना बोलूंगी अब तुमसे , है मैंने कसम खाई
बादल में यूँ ......

जा जा रे हसीं जुल्फों , तुम इतना ना इतराओ
लेकर घनेरे गेसू , तुम इतना ना लहराओ
तुम बाँधो इन जुल्फों को , सौतन को अब हटाओ
तुम पास मेरे आओ , तुम मुझ में समा जाओ

बादल में यूँ छुप-छुप के , जुल्फों की परी आयी.....

दिव्या

Sunday, December 19, 2010

आप कल भी साथ-साथ थीं , आप आज भी करीब हैं...

तस्वीर में माँ के हाथ का लिखा औटोग्राफ है , जिसमें लिखा है --- "सफलता सदैव तुम्हारे कदमों को चूमती रहे "[M Srivastava , dated- 2nd oct 90 ]

आज १९ दिसंबर है , जो कभी मेरी माँ का जन्मदिन हुआ करता थादुनिया की सभी माँ अपने बच्चों के लिए अपना अतुलनीय स्नेह लुटाती हैं और यथाशक्ति अपनी शिक्षा , अपने ज्ञान और अनुभवों को अपने बच्चों के साथ बांटकर उसे संस्कार देती है और अपने पैरों पर खडा होने में मदद करती है

ऐसा ही हमारी माँ ने भी कियाहम चारों भाई-बहनों की अच्छी शिक्षा एवं विकास के लिए तत्कालीन , उच्च पदस्थ नौकरी को त्यागकर बच्चों की परवरिश पर ध्यान दियापिताजी की नौकरी बैंक मैं होने के कारण उनकी पोस्टिंग हर तीन साल पर अलग अलग शहरों में होती रहती थीइसलिए लखनऊ में रह रहे हमारे परिवार की जिम्मेदारी माँ पर ज्यादा थीपिताजी हफ्ते में एक दिन के लिए आते थे और हफ्ते भर का पेंडिंग गणित और अंग्रेजी एक दिन में पढ़ाते थेइसलिए संडे का दिन कभी छुट्टी का दिन नहीं बल्कि एक टेरर [terror], लगता थापढ़ना कौन चाहता है इतवार कोआज भी अगर उनके नाती-नातिन उनके हत्थे चढ़ गए तो आप उन्हें इंग्लिश ग्रामर पढ़ाते हुए पायेंगेमुझे तो इससे बोरिंग विषय कभी भी और कोई नहीं लगा

माँ की मृत्यु अप्रैल २००७ में विवेकानंदा अस्पताल ,लखनऊ में हुईछह दिन तक ICU में ventilator पर रहने के उपरान्त सातवें दिन दूसरी बार हार्ट-अटैक आने से उन्होंने हमारा साथ छोड़ दियाउस समय जो चिकित्सक दल माँ की सेवा में तत्पर था , उनका विशेष आभार जिन्होंने पूरे मन से चिकित्सा सेवा की , हमारे दुःख में भी शामिल हुए और हमारी तरह लाचार भी थे क्यूंकि चिकित्सा सेवा करना उनके हाथ में था लेकिन जीवन देना उनके हाथ में नहीं था

माँ की कही कुछ बातें अक्सर याद आती हैशायाद वही सब बातें और समझाइशें जो हर माँ अपनी संतान को देती हैलेकिन एक दिन का छोटा सा वाकया हमेशा याद आता है , जिसनें मेरा जीवन बदल कर रख दियाआदतानुसार फोन पर माँ से एक आम लड़की की तरह पति की शिकायत कर रही थीदेखिये टेलेफोन का मिसयूज़ कैसे होता है ...

" माँ आप समीर को समझाइये घर पर ध्यान दिया करें , हर वक्त आफिस के कामों में व्यस्त रहते हैंबच्चों को कभी पढ़ाते नहींघर बनवा रही हूँ, सभी मिस्त्री , मजदूर , ईंटा ,गारा , सीमेंट भी मैं ही देखूं , क्या डिजाईन देनी है वो भी मैं भी समझूं ..आदि आदि ...आखिर मैं भी इंसान हूँ कोई मशीन नहीं "

मेरा पिटा-पिटाया शिकायती रवैय्या देखकर माँ ने शाँत आवाज़ में कहा - " क्या इतनी शिकायतें करने के लिए ही तुम लोगों को पढाया लिखाया और आत्म-निर्भर बनाया था ? " । शिकायत वही करते हैं जिनमें स्वयं कोई कमी होती है और दूसरों पर निर्भर करते हैंइसलिए दिव्या हो सके तो खुद को और भी लायक बनाओ ताकि समीर भी तुम पर निर्भर कर सकें और तुम पर गर्व कर सकें। "

वो दिन मेरे जीवन का एक turning point थाखुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश जारी हैसच में आत्म-निर्भर होकर समाजोपयोगी होने में एक अलग ही आनंद हैबात बात पर शिकायतें कितना बचकाना लगता हैइसलिए शिकायत करने की आदत बाल्यावस्था के बाद छोड़ देनी चाहिए

माँ को मीठी चीज़ें बहुत पसंद थीं , इसलिए उनकी याद में आज 'सूजी का हलवा' बनाने जा रही हूँभला हो शुक्ला जी का, जिनके कारण , विदेश में रहकर 'इंडियन ग्रोसरी' तो मिल जाती है

Happy birthday momYou are forever alive in my heart , mind and memories

वो शाम कुछ हसीन थी, ये शाम भी हसीन है...
आप कल भी साथ-साथ थीं , आप आज भी करीब हैं...

आभार