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Monday, October 25, 2010

एक डॉक्टर की मौत -- भाग दो

जब एक पुरुष की नौकरी विदेश में लगती है , तो उसकी पत्नी अपनी नौकरी , अपना करियर , अपनी महत्वाकांक्षाएं त्यागकर और स्वजनों का मोह छोड़कर , अपने पति के साथ विदेश जाती है।

एक स्त्री के इस निर्णय के पीछे उसको बचपन से दिए गए संस्कार ही होते हैं एक परिवार को बनाये रखने की ही शिक्षा हमें मिली होती है बचपन से। ज्यादातर स्त्रियों के लिए उनका परिवार ही उनकी प्राथमिकता होती है। इसीलिए वो हमेशा परिवार के साथ रहने को ही प्राथमिकता देती हैं। चाहे इसके लिए उन्हें अपने डिग्री , को ताख पर क्यूँ रखना पड़े।

स्त्री को हमेशा एक दो-धारी तलवार का सामना करना पड़ता है। यदि वो अपने करियर की खातिर भारत में रहती है , तो परिवार बिखरता है, और यदि पति के साथ विदेश में रहती है। तो करियर बर्बाद हो जाता है। उसे हमेशा इन दो में से एक को चुनना होता है। परिवार या फिर करियर। बहुत विरली ही कोई स्त्री होती है जो विदेश में जाकर अच्छी नॉकरी पाकर परिवार और करियर दोनों का सुख उठा सकती है।

मैं हर तरह से सौभाग्यशालिनी होते हुए भी , मेडिकल की प्रक्टिस कर पाने का दुःख हमेशा महसूस करती हूँ। लेकिन मेरे पास दूसरा कोई ऑप्शन भी नहीं है। पति की जॉब यहाँ होने के कारण डिपेनडेंट- वीजा पर ही हूँ यहाँ पर। इस कारण जॉब-परमिट भी नहीं है। हमारी भारतीय डिग्री भी मान्य नहीं है यहाँ। यहाँ मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए यहाँ की भाषा सीखनी होगी और फिर यहाँ से ही मेडिकल के किसी क्षेत्र में डिग्री लेकर ही प्रैक्टिस की जा सकती है।

मेरे मन की उलझन मेरे पति समझते हैं और वो भी मेरी असहायता पर दुखी हो जाते हैं। उनको दुखी देखकर कोशिश करती हूँ खुश रहने की खुद को व्यस्त रखती हूँ ब्लोगिंग में। किसी से अपनी मजबूरी का रोना रोने से तो बेहतर है की अपना मन किसी और दिशा में लगाया जाए। मुझे ब्लोगिंग एक सशक्त माध्यम लगा खुद को व्यस्त रखने का भी और कुछ सार्थक करने का भी।

खाली बैठकर कुंठा का शिकार होकर अपने पति, भाई-बहन, और वृद्ध पिता को दुखी करने का कोई औचित्य नहीं लगता , इसलिए खुद को व्यस्त रखकर खुद भी खुश रहने का प्रयत्न करती हूँ और परिवार को भी खुश रखती हूँ।

मैं खुश हूँ ! शिकायत करना और फ्रस्टेट होना मेरी फितरत में नहीं है।

आभार।

Monday, September 27, 2010

हमारा जीवन और अपेक्षाएं !

"Greater the expectations, Greater is the disappointment "

बहुत कोशिशों के बाद भी हमको ये मालूम पड़ता है की कहीं न कहीं हम भी , किसी न किसी से कुछ अपेक्षा कर ही रहे होते हैं। अपेक्षाएं हमें कुछ नहीं देतीं , सिवाय निराशा के।

पत्नी या पति चाहे सब कुछ समर्पित कर दें एक दुसरे के लिए, फिर भी कहीं न कहीं कुछ शेष रह ही जाता है॥

दोस्त कितनी भी संजीदगी से आपके साथ हो, लेकिन कहीं न कहीं वो अनजाने में ऐसी कोई भूल कर रहा होता है , जिससे उसके दोस्त का भला नहीं बल्कि नुकसान हो रहा होता है, क्यूंकि मानवीय भूलें तो स्वाभाविक हैं। और हमें पता भी नहीं होता की अमुक व्यक्ति की हमसे अपेक्षाएं क्या है।

इसलिए स्वयं को दुखों से बचाने के लिए हमें कोशिश करनी चाहिए की हम किसी से कोई भी अपेक्षा न रखें।

अपेक्षाएं हमारे व्यक्तित्व को कमज़ोर बनाती हैं। जब हम अपेक्षाओं का दमन करने में सफल हो जाते हैं , तो हमारे आत्म विश्वास में वृद्धि होती है।

आभार ।